Friday, November 23, 2007

चीन की दीवार.. ये गिरी वो गिरी!

देखिए, डायरी की बात चली और असल काम की चीज़ कहना रह ही गया! काम की चीज़ यह कि दिल्‍ली प्रवास की इस लम्‍बी अवधि के सारे समय मैं इसी मुगालते में था कि मेरी चीन यात्रा वाली डायरी किसी मोहतरमा ने उड़वा ली है. (और किस वजह से उड़वातीं? सिर्फ़ इसीलिए उड़वाया, जैसा मैं सोच और समझ पा रहा था, कि बेग़म न केवल गाओपिंग को पसन्‍द नहीं कर पा रही थीं; उस बेचारी गंवार और ज़ाहिल औरत से तहेदिल नफ़रत करने लगी थीं. अब अभय की निर्मलता चाहे जो कहे, औरतों का मन इसी तरह से काम करता है, इसका हम और आप क्‍या कर सकते हैं? आप बीच-बीच में दारु पी लेते हों मैं तो वह भी नहीं कर सकता. इन दिनों कॉफ़ी तक की मनाही है. डॉक्‍टर तक बेग़मजात है तो सर्द सांस ही ली जा सकती है. समझाया तो नहीं ही जा सकता. एनीवे, मैं अपनी चीन डायरी व दिल्‍लीवाली इन ख़ास मोहतरमा की बाबत कह रहा था. उनकी गाओपिंग से नफ़रत तो पहले की ही तरह बदस्‍तूर जारी है, मगर बंबई आकर बंदे को अपने जूते-चप्‍पलों के कंजास में, जहां वह अपने गुप्‍तधन छिपाकर रखता है, जूतों की एक जोड़ी गायब मिली, मगर हैरतअंगेज़ तरीके से डायरी का सूराग मिल गया! माने चीन वाली डायरी वहीं गायब जूतों के बीच पड़ी मिल गयी!..)

थोड़े समय के लिए मन हतप्रभ बना रहा (ऐसे मौकों पर बन ही जाता है) मगर डायरी के धूल खा रहे पन्‍नों को पलटते हुए- दरअसल पन्‍नों से ज्‍यादा चार-पांच सिगरेट फूंकने का बहाना पाकर सुखी व टेंस होते हुए- गाओपिंग, ज़ानसी, नानान और जाने क्‍या-क्‍या देखते, व पहचानते हुए शक़ की गुंजाइश ही नहीं थी कि मेरे हाथ में और कुछ नहीं मेरी खोयी हुई चीन डायरी ही है. हर्षातिरेक तो महसूस हो ही रहा था थोड़ी शर्म भी महसूस हो रही थी, क्‍योंकि डायरी के खो जाने की चिंता में मैं रवीश समेत राजधानी के ढेरों अन्‍य पत्रकार मित्रों से पहले ही झगड़ चुका था कि घंटा तुमलोगों के पहुंचे हुए पत्रकार होने पर धिक्‍कार है अगर मेरा अविस्‍मरणीय चीनी संस्‍मरण समेटे एक अदद डायरी तक न खुजवा सके? बेचैन होकर फ़ोन उठाते हुए और यह देखने के बाद कि फ़ोन पत्‍नी का है उसे तत्‍काल डिसकनेक्‍ट करते हुए रवीश ने बुदबुदाके आत्‍मस्‍वीकारोक्ति की भी थी कि इतना नाटक बतियाने की ज़रूरत नहीं, हिन्‍दी का पत्रकार होकर वह यूं भी धिक्‍करित हैं! फिर उन ख़ासमख़ास मोहतरमा से झगड़े का किस्‍सा तो पहले कह ही चुका हूं. गुस्‍से की रौ उखड़कर मैंने यहां तक कह दिया था कि अबे, आप प्राचीन परम्‍पराओं वाली अपने को हिन्‍दुस्‍तानी औरत कहती हो? किस मुंह से कहती हो? कि एक प्राचीन परम्‍पराओं वाली शराफ़त से लबरेज़ एक चीनी महिला के इकतरफ़ा प्रेम तक को नहीं बरदाश्‍त कर सकतीं?.. बरदाश्‍त तो नहीं ही कर सकती हैं, मगर देख रहा हूं डायरी उड़वाने वाली बात कोरी गप्‍प साबित हुई है..

ख़ैर, इस उलझे, बेमतलब जीवन में क्‍या गप क्‍या सच्‍चाई. काम की बात इतनी सी है कि चीन का बहुत सारा अनकहा छुटा रह गया है, और चीन में मौका-बेमौका जो कुछ मेरे साथ घटित होता रहा, या नहीं हो सका- उसके साथ-साथ इस पर्टिकुलर ‘’दिल्‍ली में डायरी खोयाई और बंबई में पाई’’ वाले हादसे को लेकर मैं जेनुइनली शर्मसार हूं. वैसे यह भी ऐसी तोप घटना नहीं है. असली तोप ख़बर यह है कि जल्‍दी ही चीन की बची हुई किस्‍तों की गोली आपकी ओर दागना शुरू करुंगा. उसके लिए धीरे-धीरे तैयार होना शुरू कीजिए.

2 comments:

  1. हम इंतजार में हैं. चीन यात्रा के बाद दिल्ली यात्रा शुरु करें.

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  2. हाँ-हाँ.. दिल्ली यात्रा की डायरी कहाँ है?

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