Saturday, November 24, 2007

उत्‍तरआधुनिक हौले-हौले..

परिदृश्‍य बहुत डिप्रेसिंग है, दोस्‍तो. सुबह चेहरे से चादर हटाता हूं और आंखों के आगे डिप्रेसन का अनन्‍त विस्‍तार खुलने लगता है.. खुलता चला जाता है. इंजीनियरिंग की पढ़ाई अफ़लातून ने की है, अनूप शुक्‍ला ने की है.. अफ़लातून कहीं भी सस्‍ता शेर लिखने का बहाना खोजते रहते हैं, जबकि गीतवाद में नहाये अनूप डेंस व कॉम्‍प्‍लेक्‍स गद्य को न समझ पाने का.. जबकि इंजीनियरिंग न पढ़के मैं स्‍ट्रक्‍चरलिज़्म और मॉडर्ननिज़्म में मुंह मारके डिप्रेस होता रहता हूं.. व्‍हॉई? बिकॉज़ आई एम एज़ नॉलेजेबल एज़ नॉलेज़ इटसेल्‍फ़? बिकॉज़, एज़ एक्‍लेस्यितास सेज़- ‘..ही दैट इन्‍क्रीसेथ नॉलेज़, इन्‍क्रीसेथ सॉरो’? व्‍हॉई कांट आई बी अवे फ़्रॉम टाईटल्‍स लाइक- ज़ां फ्रांकुआ ल्‍योतार्द्स ‘द पॉस्‍टमार्डन कंडिशन: ए रिपोर्ट ऑन नॉलेज़ एंड बी अ हैप्‍पी पर्सन लाइक अनूप ड्रेंच्‍ड इन सॉंग्‍स एंड सॉनेट्स, एंड गो ऑन लिविंग इन अ हवेली काइंड ऑव हाऊस फ़ॉर हैपिली एवर आफ़्टर?.. लेकिन नहीं. कुछ लोगों के रहने के लिए हवेली है तो मेरे लिए हेल और होल! इज़ ईट फ़ेयर? दिल्‍ली के ज्‍यादातर पत्रकार दोस्‍तों के घर की (आत्‍मा की तो रहने ही दीजिए!) बनावट ऐसी है कि क्‍या मजाल बैठक में सुबह सूरज की रोशनी चली आये! जबकि मेरी आत्‍मा में तो आती रहती है लेकिन बैठक में सूरज में रोशनी ले सकूं, इतनी जगह नहीं निकल पाती.. वहां की सारी जगह मेरी चिन्‍ताओं और ल्‍योतार्द के मेटानैरेटिव और माइक्रोनैरेटिव ने घेरी हुई है! फिर जबसे वापस बंबई लौटा हूं वर्तनी की अशुद्धियों का एक नया दु:ख जान खा रहा है. पैंतालीस को पैंतालिस लिख देता हूं और आयुर्वेदिक टैबलेट्स खाकर निश्चिंत रहता हूं.. व्हेयर शैल इट टेक मी? सर्टेनली नॉट टू अ बैटर अंडरस्‍टैंडिंग ऑव लैंग्‍वेज एंड लाईफ़?

ख़ैर, आइए, हिन्‍दी का पाखंड और अनुवाद की अपनी दिक्‍कतें उतार फेंककर ल्‍योतार्द की तार्किकता का कुछ आनंद लिया जाये. खांटी फ़्रेंच में नहीं, जिम पॉवेल की अनुदित अंग्रेजी में.. मगर पहले ज़रा बेसिक बैकग्राउंड..

बैंकग्राउंड अट्ठारहवीं सदी के एज़ ऑव एनलाइटमेंट के रीज़न व तार्किकता का है, जिसकी सामान्‍य धारणा थी कि अंततोगत्‍वा विज्ञान से अंधविश्‍वास छंटेंगे, तरक्‍की आयेगी.. दुनिया धुंधलकों से निकलकर सीधे विकास पथ पर जाएगी.. माने यह मेटानैरेटिव का समय था.. एक केंद्रीय धुरी वाला ग्रैंड नैरेटिव था.. विज्ञान व तरक्‍की के रास्‍ते समूची दुनिया को उसके गिर्द प्रोग्रैम्‍ड होकर आगे बढ़ना था.. मगर इसी विज्ञान की नींव पर हिटलर का ऑश्वित्‍ज़ खड़ा हुआ, हिरोशिमा और नागासाकी की आणविक तबाही हुई तो पहुंचा हुआ दर्शन व शास्‍त्री लोग विज्ञान और तरक्‍की को शंका से देखने लगे.. केंद्रित वैश्विक मेटानैरेटिव खंड-विखंडित होकर माइक्रोनैरेटिव के बहुविध बहाव में दुनिया को बहकाने लगा. वी डू व्‍हॉट वी डू, बिकॉज़ दैट्स द वे वी डू इट का दुनिया गाना गाने लगी. लोग सुनने और सराहने भी लगे.. ल्‍योतार्द इसी असमंजसी क्षण में कहीं अपना तर्क ठेलते हैं..

After all, applying science and reason to the construction of gas chambers and efficient railroad schedules, the Nazis exterminated millions of human beings. Did these people experience freedom and liberation?

And did science fulfill Hegel’s narrative of increasing knowledge? No. For physics has led us to the realization that electrons can travel two different paths through space simultaneously—or pass from one orbit to another crossing the space in between. A paradox! And how can we unfold the Unity of all Knowledge if our thought processes are not even able to comprehend how these things happen?

Because of disbelief in the metanarratives that had legitimized science, science no longer plays the role of a hero that would lead us slowly toward full freedom and absolute knowledge.

Question: But if science is no longer about finding truth—then what is it about?

Answer: When science encounters paradoxes, such as the electron goes opposite directions simultaneously, it abandons its search for decidable truth and seeks to legitimize itseld through performativity. Science stops asking, “What kind of research will unfold the laws of nature?” and begins asking, “What kind of research will work best?” And to “work best” means “What kind of research can generate more of the same kind of research? Can it perform? Can it produce more of the same kind of research?” So science is no longer concerned with truth but with performativity—performing—producing more of the same kind of research, because the more research you produce, the more proof you produce and the more you are seen as being right, the more money and power you get.

So when people no longer believe in metanarratives that legitimize science, science is then forced to legitimize itself..

बात घुस रही है भेजे में? कहां से घुसेगी.. गीत होती तो घुसती, सुबह-सुबह दर्शन घुसाना होता तो तहसील के दफ़्तर और बस अड्डे के पीछेवाली गली में रहकर आपने हाईस्‍कूल थोड़ी किया होता.. मेरे साथ पैरिस और वियेना टहलते होते.. ख़ैर, यह किस्‍सा यहीं खत्‍म नहीं हुआ है.. आगे और है ल्‍योतार्द और ज़्यां बॉदरिलार..

4 comments:

  1. साइंस तो बाँदी है बाज़ार की.. क्या रिसर्च की जाएगी ये कोक और पेप्सी तय करते हैं.. साइंस का काम बाज़ार को वैधता प्रदान करना!

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  2. अरे बाप रे! अभी और भी है?

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  3. the more proof you produce and the more you are seen as being right"
    ई सच समझ गये। आप सही में ज्ञानी हैं।

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  4. प्रमोदजी , उत्तर आधुनिकता का आरोप वापस लीजिए। मैं वि.वि. में कला संकाय का छात्र था।

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