Monday, November 26, 2007

हूं का भूगोल..

फूल हूं धूल हूं मौक़े पे बबूल हूं.
अपहचानी सौगात हूं उलझी हुई बात हूं
दिखते-दिखते दिखी गुम गई ऐसी अंधेरिया सियह रात हूं.
ग़रीबी का गड्ढा हूं घोड़े की लीद औ' अपनी मट्टी पलीद हूं.
शायद मामूली घिसी हुई लकड़ी का पट्टा हूं मगर शायद
कभी भी चल जाये वैसा देशी कट्टा भी हूं.
दायें से बायें में उल्‍टा नहाये तीन कदम
आंय और पांच कदम बांय हूं.
आईने में मुंह बाये अलबल गाये हूं.
हंसी में उड़ाये हूं रोते-रोते चुपाये
बिनबुलायी महफ़ि‍ल में आये हूं.
सुलगती रात में परछाई हूं अजन्‍मे बच्‍चे की दाई हूं.
कहें तो आपकी लोरी हूं लंगोटिया यार हूं वर्ना
क्‍या है न पक सकनेवाली खिचड़ी हूं
चूल्‍हे में बरसात की सीली लकड़ी हूं.

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