Tuesday, November 27, 2007

नॉट लाइक अ रेस्‍पोंसिबल हस्‍बैंड..

लंदन के इसलिंग्‍टन रोड पर वह इकलौती बर्मी कंपनी थी (ऊपर से मज़ा यह) जिसने अपने यहां वेलफ़ेयर का ज़ि‍म्‍मा एक जापानी को दे रखा था. इतिकावा सनकी था. उसने यूरोप में एज़ ऑव एनलाइटमेंट की पढ़ाई नहीं की थी मगर घड़ी देखने की तर्ज़ पर लॉजिक और कॉमन सेंस देखकर हर काम करता. इसीलिए ऐसा हुआ कि महीने भर से छुट्टी के लिए उसके पीछे कांख रहे मैट और क्रेग (जिन्‍होंने अबकी मध्‍य-पूर्व की टहल की योजना बनायी थी) सिर घुनते रह गए, उन्‍हें नहीं मिली.. छुट्टी मिली दफ़्तर के लावारिस, गुमनाम हिन्‍दुस्‍तानी जयकांत पंडा को जिसने पहले ही मान लिया था इस वर्ष मां-बाप का चेहरा देखना किस्‍मत में नहीं लिखा..

तनाव और झुंझलाहट के असर में जयकांत ने गुरुदासपुर की पंजाबी पत्‍नी सोहन के आगे छुट्टी की बात तक नहीं उठाई थी. इसीलिए रसेल स्‍क्‍वेयर के ट्यूब से बाहर आने पर पत्‍नी के दिखते ही उसने उसे हर्षातिरेक में सूचित किया कि महीने भर की नहीं लेकिन बीस दिन की छुट्टी मिल गयी है.. तीन दिन पाईं गां जाई गांर लोको आऊ मां-बपा संगे रहीबा कू हेब्‍ब.. फिर उन्‍हें साथ लेकर बाकी के दिन भाई श्रीकांत के यहां मौज़-तफ़रीह करके बितायेंगे!

सुनकर सोहन एकदम-से खुश हुई और फिर उसी तेज़ी से उसके चेहरे का रंग उड़ भी गया. - और मम्‍मी-पापा? मेरा गुरुदासपुर?- वह चिंहुककर पूछी तो पहले जयकांत पंडा को समझ नहीं आया.. फिर हकलाता वह बचाव की सोचने लगा.. ज़बरजस्‍ती मुस्‍कराने की कोशिश करता यह भी सोचता रहा कि इतिकावा साहब की आंखों में वह एक वाजिब कारीग़र भले बन गया हो, सोहन की नज़रों में रेस्‍पोंसिबल हस्‍बैंड बनने में, शादी के दस वर्षों बाद, वह अभी भी फ़ेल क्‍यों होता रहता है?..

2 comments:

  1. दो बातें बडी पसन्द आयीं
    ज़बरजस्‍ती और आधुनिक लोककथा !

    ReplyDelete
  2. sir ji kahan se late hai samvedana ki itni laharen.
    udhake de maarte hai dil par, dimag par.
    ki aadmi dekhta rah jaye. asar aisa karte hai ki ruh ke bheetar bahut bheeta tak sukun nahi milta.
    Sarkar, aap salamat rahe.

    ReplyDelete