Friday, November 30, 2007

व्‍यवस्‍था बदलाव का एक्‍सरे: दो

रवि गड़ि‍या और इमैनुएल वैलेरस्‍टाइन के सौजन्‍य से कल हमने व्‍यवस्‍थाविरोधी आंदोलनों के समीक्षात्‍मक इतिहास का एक स्‍केची खाक़ा खोलना शुरू किया था.. दूसरी बड़ी लड़ाई के बाद, सन् पैंतालीस के आसपास तीन खानों में बंटी दुनिया के प्रभावकारी राजनीति हलचलों, गति का एक स्‍थूल विभाजन.. मगर इससे पहले, आइए, ज़रा इस समूचे परिदृश्‍य के एकदम बिगनिंग और वैलेरस्‍टाइन साहब के निबंध के भी एकदम शुरू से शुरू करें..

The capitalist world-economy has been in existence for at least 500 years. Its early years were marked by considerable labor unrest, which took many forms, from peasant rebellion to food riots to messianic movements to banditry. But it was not until sometime in the nineteenth century that continuing organized antisystematic political movements of the oppressed strata were first formed. In itself, this was a remarkable social invention, which has too long gone unheralded and unanalyzed.

This social invention, this mechanism of social change, was very efficacious, but it also had limitations, and it is this double reality which explains the curious phenomenon of the post-1945 period. Never did antisystematic movements seem stronger than in the period after 1945. But never did more people have doubts that these were achieving their aims…


लोगों की आशंकाएं निर्मूल नहीं थीं. बहुत जल्‍दी यह दिखने लगा कि लोगों के हीरो जिन व्‍यक्तियों और ताक़तों ने नाजी व फासी आक्रमण का जमकर लोहा लिया था, और युद्ध के बाद बड़े जनसमर्थन के साथ जो अपनी सरकारें बनाने में सफल हुए थे.. जैसे फ्रांस में नाजी दमन का जुझारु पार्टिज़न लड़ाका दी गॉल, इंग्‍लैण्‍ड में लेबर पार्टी सत्‍तारूढ़ हुई.. औपनिवेशिक देशों में अंतत: राष्‍ट्रीयता का सवाल विजयी हुआ, राष्‍ट्रीय सरकारों के बनने की एक लहर-सी चली.. यह वह समय था जब दुनिया के भूगोल के एक बहुत बड़े हिस्‍से पर आशावाद की तूती बज रही थी. पांचवें दशक के उत्‍तरोत्‍तर लोगों के जीवन में नाटकीय परिवर्तन आये भी.. औद्दोगिक क्रांति से पूर्व और उसके पश्‍चात पश्चिमी यूरोप में समृद्धि का ऐसा विस्‍तार हुआ जिससे पहले लोगों का परिचय नहीं था. इसी तरह औपनिवेशिकता से मुक्‍त जनता भी भविष्‍य को आशावाद के एक नए तराजू में तौल पा रही थी.. लेकिन जल्‍दी ही लोगों ने महसूसना शुरू किया कि फ्रांसीसी क्रांति के अनंतर जिस ‘स्‍वतंत्रता, बराबरी, बंधुता’ के सुरीले सुरों में वह अपनी लड़ाइयां लड़ते रहे थे, वह दो कदम आगे जाकर कहीं सोशल-डेमोक्रेसी और फोर्डिज़्म के जाल में उलझ गई है.. सोवियत संघ को दुनिया में समाजवाद के विस्‍तार की जगह पौलेंड, हंगरी, चेकोस्‍लोवाकिया जैसे देशों में स्‍तालिनिस्‍ट दमनकारी दानव के बतौर देखा गया.. वहीं पूर्व-उपनिवेश और अब आज़ादी जी रहे राष्‍ट्रों ने भी ढंग से महसूसा कि नये शासकों की चमड़ी का ही रंग बदला है, नीतियां नहीं..

तो इतिहास से एक बार फिर ठगे जाने की अनुभूति के साथ लोग भविष्‍य के रास्‍ते का क्‍या नया भूगोल बुनने की कल्‍पनाएं सजा रहे थे..

(क्रमश:)

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