Sunday, November 25, 2007

हड़बड़ बैचेनियों की इतवारी कला..

आप नीचे उकेरी रेखाओं, रंगों को कला-टला का नाम से नवाज़े जाने से एतराज़ करें तो आपके एतराज़ से हमें ऐसा विशेष एतराज़ न होगा.. क्‍योंकि इस तरह (या किसी भी तरह की टकसाली कला से) सबसे ज्‍यादा एतराज़ खुद हमें होता है.. तो वह सब ठीक है.. बात दरअसल यह है कि कल अभय के एक अविनाश के जवाबी मेल फ़ॉरवर्ड को देखने के बाद हमारा मूड ज़रा बहका-उड़ा-उड़ा-सा है.. अविनाश के तौर-तरीके से दुखी होने से कहीं हम डिप्रेस ज्‍यादा होते रहे.. इस तरह की सोच की लकीरें बहुत मेरे पल्‍ले नहीं पड़तीं.. जितना पड़ती हैं वह यही बताती है कि सहोदर सामाजिकता की कितनी स्‍पष्‍ट सीमायें और व्‍यर्थतायें हैं.. इच्‍छा हुई दिल्‍ली में उड़ रहे चील को फ़ोन घुमाकर ज़रा बात करें.. फिर लगा कभी-कभी हम खुद से बात करना भी भारी महसूसने लगते हैं तो ऐसे वक़्त इस जहालत से क्‍या खाकर अभी संवाद करेंगे? करके और दुखी होने से ज्‍यादा और क्‍या कबारेंगे.. तो कबारने का ख़्याल छोड़, कुछ कला कोड़ने और गोड़ने लगे.. इंडियन इंक, जेल पेन और थोड़े एक्रिलक की छुवाइयों के साथ.. आपका गाली देने का मन करे तो उन्‍हें मेरी ओर फेंकने की बजाय, प्‍लीज़, दिल्‍ली की ओर उछालियेगा..

तस्‍वीर एक: रात में दु:स्‍वप्‍न..



तस्‍वीर दो: बीहड़ में यात्रायें..



तस्‍वीर तीन: सोचता हुआ आदमी..

6 comments:

  1. अविनाश.. उस अभद्र टिप्पणी को लेकर लोग तुम्हारे बारे में क्या राय बनाते हैं- ये आप की परेशानी का सबब है! समझा जा सकता है.. मगर ये क्या किया तुमने?
    एक तो अनूप जी को गाली दे दी.. क्यों? कि तुम्हारे साथ नहीं खड़े हुए.. वो तो तुम्हारे साथ पहले भी कभी नहीं खड़े हुए.. और इसलिए भर से तुम्हे उन्हे ऐसी उपाधि देने का अधिकार नहीं मिल जाता!
    दूसरा.. तुमने एक योजना के तहत..सागर चन्द्र नाहर के साथ एक पत्र व्यवहार करवाया अपने गुप्त मित्र से.. और फिर उसे छापा भी..बावजूद इसके कि वह कहीं भी यह सिद्ध नहीं करता कि सागर ने कोई षडयंत्र किया.. बल्कि तुमने एक षडयंत्र किया ज़रूर सिद्ध करता है..!
    यह पूरा प्रकरण बेहद खेदजनक है!

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  2. सोचते हुये आप कित्ते हसीन लग रहे हैं। सच्ची। मानिये भी। दुखी मत हों। गाना सुनें।

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  3. सोचता हुआ आदमी कभी मुस्कुरायेगा क्या नहीं ?

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  4. यहाँ पर की हुई सबसे ऊपर लगी टिप्पणी जो मेरे नाम से है.. यह मैंने की ज़रूर थी पर मोहल्ले पर .. यहाँ किसने चस्पाँ की है पता नहीं। कहीं ये वही सज्जन तो नहीं जिन्होने अविनाश के नाम से दस्तक पर टिप्पणी की?
    करने वाले ने मेरे नाम को मित्र बोधिसत्व के ब्लॉग से जोड़ दिया है.. बहुत शुक्रिया! अब मैं उसके चिट्ठे का भी अधिकारी हुआ!

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  5. अभय, माफ़ करो, प्‍यारे, ये सब खेल और ऐसी रोशनदान बुद्धि की बलखायी अदायें न अबतक ज्‍यादा मुझे समझ आयी हैं, न उनके पीछे माथा खराब करके मैं कोई एनर्जी जाया करने की सोचता हूं.. जिन्‍हें दस दिशाओं में लात चलाने, चीखने-चिल्‍लाने और फलाने को वर्गशत्रु और अपने को वर्गीय हीरो का तमगा देने का शौक है.. वे दें.. व उसे आपस में बांट-बांट कर सुखी व धन्‍य हों.. इस दुर-दुर की दो कौड़ि‍या कुकुरवाद में मेरी बेसिकली दिलचस्‍पी ही नहीं.. ज़िंदगी में और ज्‍यादा दिलचस्‍प चीज़ें हैं करने को.. जिनके करने को यह है, उनके लिए मैं तो नहीं ही मागूंगा, तुम्‍हें मांगना हो तो दो-चार दुआ फुसफुसाके मांग लेना..

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  6. चित्र बहुत अच्छे बने हैं । दु:स्वप्न तो कुछ कुछ मेरे दु:स्वप्न सा है । सोचते हुए आदमी के बारे में कह नहीं सकती, क्योंकि ना मैं सोचती हूँ, ना आदमी हूँ ।

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