Tuesday, November 27, 2007

कस्‍बे में शहर..

बाहर से देखनेवाला कोई कहता कि उसकी आंखों में हिक़ारत भरी है तो शायद शहर की लड़की भी ताज्जुब करती. कहती- नो, यू आर रीडिंग मी रॉंग, इट्स जस्‍ट फ्लैट क्‍यूरिओसिटी, दैट्स ऑल! लेकिन शहर की लड़की क्‍यूरीयस से ज़्यादा टाईम किल कर रही थी. टाईम किल करनेवाले तरीके से ही सेलफ़ोन को अपने गालों पर बेमतलब घुमाते हुए बोली- तो जब उनके बारे में नहीं सोचती.. घर का काम नहीं होता.. तब क्‍या करती हो?..

शहर की लड़की की पैनी आंखों को अपना मुआयना करता देख कस्‍बे की लड़की यूं भी चौकन्‍ना थी.. सोचकर मुसकराते हुए

जवाब दिया- घर का इतना तो काम रहता है!.. फिर ठहरकर बोली- तुमलोगों की तरह खाली थोड़ी रहते हैं!..

सुनकर शहर की लड़की को अच्‍छा नहीं लगा, लेकिन उसने चेहरे पर अच्‍छा नहीं लगने के भाव आने नहीं दिये.. फ़ोन को होंठों से सटाकर बोली- लेकिन कभी तो खाली रहती होगी? जब रहती हो तब क्‍या करती हो?..

कस्‍बे की लड़की हंसने लगी.. देरतक हंसती रही.. मानो कोई मज़ेदार चुटकुला सुन लिया हो..

2 comments:

  1. आप तो लिखते ही जा रहे हैं...

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  2. ओहोहो.. तो क्‍या करुं, न लिखूं? ठीक है, कान पकड़कर माफ़ी मांगता हूं!

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