Thursday, November 29, 2007

व्‍यवस्‍था बदलाव का एक्‍सरे: एक

पिछले महीने दिल्‍ली में देह का जो कर्म हुआ, मन जुड़ानेवाली एक मज़ेदार बात यह हुई कि मस्‍त और मुश्किल रवि गड़ि‍या से पहचान बनी.. बोनस में यह कि उनकी उन्‍मुक्‍त उदारता के सौजन्‍य से आंदोलन व सामाजिक परिवर्तन-संबंधी दसेक ऐसी किताबें हत्‍थे चढ़ी जिनका- मन की तमाम अभिलाषा के बावजूद- व्‍यवस्थित परायण धीरे-धीरे जीवन से छूटता गया है. हम अभी असमंजस में थे ही कि मुंबई के लिए निकलते हुए रवि को किताबें न लौटाने का क्‍या बहाना बनायेंगे, कि बंदे ने अपने वकीली जाकिट को बेमतलब बनाकर, कहते हुए, ‘अरे, भाईसाब, हमारी तरफ़ से गिफ्ट समझके रख लो!’, हमें मुंहजोर व चोर बनाते-बनाते लगभग बचा लिया.. सोचिए, दुनिया में अभी भी रवि जैसे लोग हैं.. और राजधानी दिल्‍ली में हैं! और सबसे बड़ी बात वक़ालत जैसे धंधे में हैं!..

ख़ैर, एक साथ पंद्रह किताबों को उलटने-पुलटने के क्रम में (आप आतंकित होते रहे हैं या नहीं? दरअसल कोष्‍ठक में ऐसे वाक्‍यांशों को ठेलने के पीछे आपको आतंकित करना ही मक़सद होता है..) इन दिनों रवि की दी गयी एक किताब, ‘ट्रांसफ़ॉर्मिंग द रेवोल्‍यूशन: सोशल मूवमेंट्स एंड द वर्ल्‍ड सिस्‍टम’ भी देख रहा हूं. समिर अमीन, जोवान्‍नी अर्रिगी, आंद्रे गुंडर फ्रैंक और इमैनुएल वैलरस्‍टाइन के संपादन में पांच ‘विचारोत्‍तेजक’ लेखों का संकलन है जिसे 2000 में पहले मंथली रिव्‍यू प्रेस, न्‍यूयॉर्क ने छापा था, 2006 में दिल्‍ली के आकार ने पुनर्प्रकाशित किया है. संपादकों की छोटी-सी भूमिका के बाद पहला निबंध ‘व्‍यवस्‍थाविरोधी आंदोलन: इतिहास और संशयइमैनुएल वैलरस्‍टाइन ने लिखी है. (दूसरा लेख जोवान्‍नी अर्रिगी का है, ‘मार्क्सिस्‍ट सेंचुरी- अमेरिकन सेंचुरी: द मेकिंग एंड रीमेकिंग ऑव द वर्ल्‍ड लेबर मूवमेंट’; तीसरा, ‘द सोशल मूवमेंट्स इन द पेरिफ़ेरी: एन एंड टू नेशनल लिबरेशन?’, लिखवैया हैं: समिर अमीन; फिर आंद्रे गुंडर फ्रैंक और मार्ता फ्युंतेस लिखते हैं, ‘सिविल डेमोक्रेसी: सोशल मूवमेंट्स इन रिसेंट वर्ल्‍ड हिस्‍टरी’; अंतिम निबंध ‘अ फ़्रेंडली डिबेट’ के नाम से संपादक मंडल का कन्‍क्लूज़न है).. मैं वैलरस्‍टाइन वाले पहले निबंध से गुजर रहा था. वैलरस्‍टाइन साहब अपने लंबे और दिलचस्‍प लेख में (जिसके लिखे जाने तक गोर्बाचोव बाबू अभी पदच्‍यूत नहीं हुए रहिन) कुछ मज़ेदार विभाजन करते हैं, तो कहीं-कहीं दिल को तक़लीफ़ देनेवाले सरलीकरण (एक ही निबंध में सबकुछ सम-अप करने की मज़बूरी में?).. आइए, कुछों पर एक नज़र फिराया जाये..

लेख का पहला खंड है- 'व्‍यवस्‍थाविरोधी आंदोलनों का जन्‍म और रणनीति संबंधी डिबेट, 1789-1945’.. तो यहां कुछ महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक उठानों को वैलरस्‍टाइन साहब तिथियों की संगति में समझने व वैश्विक स्‍तर पर उनके महत्‍व को समझाने की कोशिश करते हैं.. 1789, 1830, 1848, 1870, 1914, 1945 ये वे ख़ास तिथियां थीं जिनके गिर्द घटनेवाली घटनाएं, अपनी स्थानीयता से परे दुनियावी स्‍तर पर, सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का विचार बनाने में महत्‍वपूर्ण साबित हुईं.. निबंधकार बताते हैं लोगों में शोषण के विरोध का तत्‍व हमेशा होता है. जितना वे कर सकते हैं उसका वे एक्टिव विरोध करते हैं, जितना ज़रूरी होता है पैसिवली उसे झेलते हैं. 1789 से 1945 का समय काम की स्थिति में बेहतरी, सामाजिक बराबरी और समाजवादी आकांक्षाओं की मांगों के सांगठनिक मुश्किलों की एक लंबी यात्रा थी. यह एक मुश्किल लड़ाई थी, जिसमें आमतौर पर, दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा खुद को शोषित महसूस करता था. 1945 इस लिहाज़ से एक बड़ा मनोवैज्ञानिक परिवर्तनकारी बिंदु साबित हुआ. ऐसा क्‍यों? ऐसा इसलिए कि उन्‍नीसवीं सदी से ज़ारी व्‍यवस्थाविरोधी आंदोलन अंतत: अब एक ऐसे बिंदु पहुंचा जो उनके पूर्ववर्ती सभी संघर्षों की भरपाई करता दिख रहा था. फ़्रांसीसी क्रांति से जिस सीक्‍वेंस की शुरुआत हुई थी, जिस कड़ी में पहले राजसत्‍ता की प्राप्ति होनी थी, फिर उस सत्‍ता का समाज बदलने में (मतलब क्रांति के स्‍वतंत्रता, बराबरी और बंधुत्‍व पाने की दिशा में) इस्‍तेमाल होना था.. उस मुकाम की दहलीज़ खुल रही थी..

जिस सामान्‍य अर्थ में हम आज ‘विश्‍व’ का तीन हिस्‍सों में वर्तमान विभाजन देखते हैं.. वह यथार्थ भी, अपने आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक नीहितार्थों में, 1945 के ठीक बाद से ही हमारे स्‍मृतिपटल पर स्‍थायी होना शुरू हुआ. इसमें जहां एक ओर पश्चिम का औद्दोगिक संसार था (जिसमें मुख्‍यत: पश्चिमी यूरोप, उत्‍तरी अमरीका और ऑस्‍ट्रेलेशिया थे; मगर, 1970 के बाद से जापान भी), तो दूसरी धुरी समाजवादी मुल्‍क थे (सोवियत रूसी गणराज्‍य, पूर्वी यूरोप, चीन, उत्‍तरी कोरिया, तीन इंडोचीनी राज्‍य; और हां, क्‍यूबा); और तीसरा विभाजन था तीसरी दुनिया (एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमरीकी महादेश).. आनेवाले वर्षों के इस निर्णायक विभाजन की 1945 महत्‍वपूर्ण धुरी बनी.. क्‍या महती परिवर्तन हुआ था वैश्विक समाज में?.. और आंदोलनों की धार को कहां मजबूत किया जाना था?.. इसके बारे में एक-दो किस्‍तों में अभी और बात करेंगे.. रवि गडि़या को धन्‍यवाद देते हुए..

(क्रमश:)

3 comments:

  1. इसे कहते हैं ज्ञान का आतंकवाद..
    इतना सब बता रहे हैं तो प्रकाशक की वेबसाइट भी बता दीजिये जहाँ दूसरी किताबों की सूची और प्राप्त करने का तरीक़ा आदि उपलब्ध हो..

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  2. मैं तो सचमुच सहमा हुआ हूं । ऊपर से ब्लागर मीट का वृत्तांत भी पढ़ लिया...

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  3. मुझे बहुत खुषी है कि आप सही चीजें पढ रहे हैं। और आनन्द महसूस कर रहे हैं।
    vipin

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