Friday, November 30, 2007

हिंदी किताबों के बहाने पंजीरी और चरणामृत..

कल शाम दिल्‍ली से एक बंधुवर ने फ़ोन करके खींचना शुरू किया.. कि दाढ़ीवाली फ़ोटुएं दिखाकर मैं हज जाने की अपनी एलिजिबिलिटी प्रूव कर रहा हूं ऑर व्‍हॉट? कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा वाले अंदाज़ में मैंने जवाब दिया- गुरु, किताबों की लिस्‍ट हिलाने-फड़फड़ाने के बावजूद कोई टेरराइज़ नहीं हो रहा है, हद है, मेरे स्‍टॉक एकदम नीचे झूल रहे हैं, भइया.. एनीवे, जैसा कर ले जाने की मेरी प्रतिभा है, झिकझिक मेरी दाढ़ी से बहककर किताबों पर आ गई.. और जैसाकि तब स्‍वाभाविक था ही, दिल्‍लीवाले बंधुवर चुप हो गए और सारा टिल्‍ल-बिल्‍ल मैं ही बोलता रहा.. बात से बात निकली (मैंने ही निकाली) तो याद आया (दिल्‍ली के ही किसी और मित्र से चर्चा हुई थी) कि बचपन में पढ़े हिंदी के ढेरों ऐसे शीर्षक हैं जिनकी संगत में मन रससिक्‍त हुआ था, मगर जिनका न अब कोई अता-पता नहीं है, बल्कि कई मर्तबा पहुंचे हुए पढ़वैयों के आगे भी उनका ज़ि‍क्र करो तो वे मुंह खोलकर हवा में उंगली की पेंसिल (या मैग़जीन, जो भी पकड़े हों) घुमाने लगते हैं.. फिर हिंदी प्रकाशनों का ऐसा व्‍यवस्थित हिसाब-किताब है कि क्‍या मजाल कोई भी प्रकाशक किताब के प्रकाशन विवरण वाले पृष्‍ठ पर पुस्‍तक प्रकाशन का व्‍यवस्थित इतिहास ज़ि‍म्‍मेदारी और प्रेमभाव से छापे! इस छोटे-से काम से, अलग से कोई पैसा खर्च नहीं होता, एक पुस्‍तक-प्रेमी को अपनी पसंदीदा किताब के प्रकाशन की शुरुआत से अबतक का विवरण पाकर किताब के सामाजिक जीवन और उसके सामाजिक दखल का एक समूचा पर्सपेक्टिव मिलता है; मगर चूंकि इसे नहीं करने से प्रकाशक की कोई बिक्री प्रभावित नहीं होती, और उसकी इस प्रकाशकीय लापरवाही को कोई क्‍वेश्‍चन नहीं करता, उसके लिए जो जैसा चल रहा है, बरोबर चलता रहता है, और आगे भी जबतक चल सकेगा यूं ही चलता रहेगा..

ख़ैर, इस मसले की चर्चा के पीछे वजह यह थी कि जो किताबें सीन से ग़ायब हुईं, या फिर उन्‍हें किसी प्रकाशक ने उठा लिया, एकाध संस्‍करण छापे भी तो किसी बड़े लेखक (मतलब जिसे आलोचना संसार बड़ा कहता है) की किताब हुई, तो शायद इधर-उधर चर्चा पढ़कर आप किताब लोकेट कर लें.. अगर लेखक ऐसा बड़ा नहीं हुआ, जिसे बड़े आलोचक बड़ा बनाये रखें, और आप शोधार्थी नहीं हुए तो खोजते रहिए किताब.. सौ में से पंचान्‍यबे प्रतिशत चांस है हाथ नहीं लगेगी!.. जैसे दिल्‍ली में रहते हुए पिछले महीने मैं पानू खोलिया का सत्‍तर में छपा एक उपन्‍यास खोज रहा था (‘सत्‍तर पार के शिखर’).. किताब हाथ नहीं आई से ज्‍यादा, लोग मुंह बनाकर ऐसे देखते रहे मानो आयं, क्‍या-कौन पानू खोलिया.. अब चूंकि कोई परमानंद श्रीवास्‍तव एक और परमानंद ओझा दो ने पानू खोलिया को साहित्यिक समीक्षात्‍मक परिदृश्‍य में जीवित नहीं बनाये रखा है तो कहां से किताब पाइएगा? नहीं पाइएगा. मगर बहुत बार ज़रा बड़े क़दवाले लेखकों की पुस्‍तकों के साथ भी इससे अलग और कोई अच्‍छा व्‍यवहार नहीं दिखता. राही मासूम रज़ा की आत्‍मकथा है- ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’ या शानी का नॉन-फ़ि‍क्‍शनल ‘शाल वनों का द्वीप’, क़ुरर्तुल एन हैदर का ‘गर्दिशे रंग-ऐ-चमन’ खोजते रहिए, नहीं मिलेंगी, सर्कुलेशन में नहीं हैं. क्‍यों, भाई, इसलिए कि मुस्लिम लेखक हैं? नहीं, सोचनेवालों के लिए यह एक एंगल हो सकता है मगर हमेशा वजह यही नहीं होगी. एक बार फिर ख़ैर, देखिए, मित्र से चर्चावाली बात उठाकर मैं कहां से कहां बहक-भटक रहा हूं.. तो चर्चा यह होती रही थी कि क्‍यों न कोई मानक वर्ष सामने रखकर, मसलन 1950, उसके बाद से प्रकाशित-चर्चित उन सभी पुस्‍तकों को, वे जब याद आयें, एक दशकीय खांचे के नीचे न्‍यूनतम प्रकाशकीय विवरण के साथ चेंपना शुरू किया जाये.. मसलन कोई मौलवी साहब जो ग़दर के दौरान अंग्रेजों को उर्दू का ट्यूशन इस और उस छावनी में देकर अपना अनुभव उर्दू में टीपते रहे और बाद में किताब छपी, जिसका हिंदी तर्जुमा ज्ञानमंडल या बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी ने सन् बावन में छापा, और हममें से किसी को उसकी ख़बर है और उस पुस्‍तक से प्रेम तो इतनी सी सूचना इस नए उद्देश्‍य से शुरू किए गए ग्रुप ब्‍लॉग में पचास के लेबल के नीचे चेंप दें?.. क्‍या कहते हैं, कैसा आइडिया है? एनीवन गेम फ़ॉर दिज़? एक ब्‍लॉग शुरू कर दें?..

ज़रूरी नहीं कि ब्‍लॉग पर सिर्फ़ उपन्‍यासों और कथा-कहानी की ही बात दर्ज़ की जाये. भूगोल, इतिहास, समाजशास्‍त्र, गणित, अनुवाद, जीवनी- वह फैले जीवन के किसी भी क्षेत्र की किताब हो सकती है, शर्त बस इतनी कि रोचक हो, उपयोगी-संग्रहणीय हो.. वर्ना पोंपस, प्रिटेंशस दीखने के ख़तरे के बावजूद एक बार फिर कहूंगा कि अगर ब्‍लॉग पर हमने कुशवाहा कांतों, अमृता प्रीतम, शिवानियों को चेंपना शुरू किया तो बेमतलब के कचर-मचर की एक अंतहीन सूची के जाल में फंसके रह जायेंगे. (मेरा ऐसा मानना है, आप बताइए, आपका क्‍या मानना है).. हालांकि भागाभागी के इस दौर में, घंटा, किसको अब किताबों की इतनी पड़ी है! मुझसे पगलेट अब धीरे-धीरे एक विलुप्‍तप्राय नस्‍ल में बदल रहे हैं.. किताबों की बढ़ी हुई छपाई किताबों से बढ़े लगाव का नहीं, उसकी आक्रामक मार्केटिंग का सूचक है.. फिर भी, जैसे मैं हूं, और भी पगलेट होंगे ही, तो उन सभी पगलेटों को आमंत्रण है कि इस नए उद्दम में अपने-अपने सुझाव दें कि सब सुझावों को नए ब्‍लॉग में इनकॉरपोरेट किया जा सके, मेंबरी की पंजीरी और चरणामृत बांटी जा सके.. या फिर अपनी जोशीली ,ख़ामोशी से ज़ाहिर कीजिए कि मैं फिर अकेला ही दीवार से सिर फोड़ता दु:खी होता रहूं!..

10 comments:

  1. बड़ा तेज चैनल है जी आपका. हम तो सोच रहे थे कि चीन यात्रा के बाद हज करने जायेंगे फिर कुछ करेंगे पर आप तो...
    हमें भी इसमें शामिल कर लीजिये जी.और इसमें कुछ अंग्रेजी की किताबें भी शामिल कर सकते हैं क्या..?

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  2. असल में हिन्दी में प्रकाशन और साहित्य दूनो दू नंबर के धंधे बन के रह गया है. प्रकाशक लेखक के रायल्टी मारता है, लेखक अपने वाद के चक्कर में सच्चाई मारता है और आलोचक गुट के फेर में लेखक के महत्त्व मारता है. अकादमी-ओकादमी का कौनो अध्यक्ष-सचीव हो गया ता ऊहो भाई-भतीजावाद के फेर में भगवान् जाने का-का मारता है! अईसने में आपे बताइये कईसे कौनो किताब मिलेगा भाई?

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  3. अब, काकेश बाबू, ऐसा है कि किताबी कोना पर अंग्रेजी शामिल करने से कहीं ऐसा न हो, हिंदी वाले भाईलोग रूसने लगें.. फ़ि‍लहाल नयी जगह हिंदी का ही पताका लहराया जाये.. अंग्रेजी की बतकुच्‍चन की ऐसी बेचैनी हुई तो उसका कोई नया इंतज़ाम देखेंगे.

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  4. आपकी बात सही है इष्‍ट देव जी, इस देश का शायद ही कोई क्षेत्र, कोई कोना हो जो इन भ्रष्‍टाचारी आंधियों से परे रहा हो.. लेकिन इसे के बीच हमें सार्थकता के स्‍पेस भी तो खड़े करने हैं, हुज़ूर? जितना संभव हो, हाथ-गोड़ चलाते हैं..

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  5. आप सीन से गायब हुई किताबों की बात कर रहे हैं, पर हमें तो हिन्दी किताबों की दुकानें ही सीन से गायब होती नजर आ रही हैं।
    सिवाय रेलवे स्टेशन के ए. एच. व्हीलर्स के, कहीं और दिखाई ही नही देतीं।
    किताबी कोना के लिये शुभकामनाएं।

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  6. और भी हैं .. माने पगलेट !

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  7. "अगर ब्‍लॉग पर हमने कुशवाहा कांतों, अमृता प्रीतम, शिवानियों को चेंपना शुरू किया तो बेमतलब के कचर-मचर की एक अंतहीन सूची के जाल में फंसके रह जायेंगे."

    मैं इस कथन के समर्थन में अपना मत देता हूं.

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  8. बिलकुल ठीक कहा परमोद जी. ई अलख जगाए रखना है. हम भी ओही कोसिस में हूँ. आपो हाथ-गोड़ चलाई रहे हैं. स्वागत है.

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  9. बहुत बढ़िया बात उठाई प्रमोद जी। शालवनों का द्वीप मेरी प्रिय पुस्तकों में एक रही है। कई सालों से तलाश रहा हूं। हमारे कलेक्शन में हार्ड बाऊंड और पेपरबैक दोनों थीं। मित्रो की कृपा रही। सबसे पूछते फिर रहे हैं।
    हमने अपने एमए का लघुशोध प्रबंध शानी पर ही किया और खुद दिल्ली में अपने हाथों उसे भेंट भी किया। बाद में उसका एक अंश नेशनल पब्लिशिंग हाऊस से शानी पर प्रकाशित एक पुस्तक में भी आया।
    दुर्लभ में तो उग्रजी का चाकलेट भी है।

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  10. दुर्लभ में तो पांडेय बेचन शर्मा उग्र जी का चाकलेट भी है।

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