Monday, December 3, 2007

एक लड़की का परायापन..

कुएं की देहरी पर खड़ा बाबू कुएं के अंदर झांकने की कोशिश करता. सकलदीप बो या छोटकी चाची बरजतीं कि गिर जाओगे. बाबू बिना सिर घुमाये जवाब देता कि नहीं गिरेगा, और कुएं के अंधेरे में झांककर ताज्‍जुब करता कि काई और हरे पानी पर डोलती परछाईं का बच्‍चा उसकी ओर देखता हुआ क्‍या इशारे कर रहा है. दुनिया से दूर ऐसी गहराई और अंधेरे में छुपे परछाईं के बच्‍चे के बारे में सोचते बाबू की देह में झुरझुरी दौड़ जाती, और वह, मानो इतनी मात्रा का रोमांच बर्दाश्‍त न कर पाता हो, एकबारगी कूदकर कुएं की देहरी से अलग हट जाता.

ज़मीन को अपलक देखता जाने किस जादू में खोया, धूल में नहाया मुन्‍ना उठंगा एक कदम आगे जाता और झाड़ि‍यों के पार गायब हो जाता. दौड़ते-दौड़ते बाबू ठहर जाता और हवा में सूंघने लगता. रामधनी काका से पूछने पर वह सिर हिलाकर कहते हां, ऐसा ही है. अलग-अलग टाईम हवा में अलग-अलग महकों की ड्यूटी लगी रहती है. नीम, तरबूज, कच्‍चा गुड़, चावल की माड़, गीले-बसाईन कपड़े, सूखी मकई, ईंख सबकी ड्यूटी लगती है.

कांसे की थाली में खाना परसते देख शोभा रोने लगती, उसके लिए अलग से स्‍टील की थाली मांगकर लाई गई थी. तब भी उसे तसल्‍ली नहीं थी. खाने से पहले भात के सारे लाल दाने वह बीन-बीनकर अलग करती, तब कहीं जाकर पहला कौर मीसती. बाबा कहते ऐसा पक्‍का मकान खड़ा होगा जैसा टोला में दूसरा नहीं! ईया मुंह फेरकर हुक्‍का गुड़गुड़ाने लगती. बड़के चाचा कमजोर ओरचन वाली खटुली को बिछाकर सवाल करते गांव के छोरवाली ज़मीन का फ़ैसला कबतक होगा. बाबा झींककर कहते उनका पनबट्टा कहां है? रमधनिया के हियां देख लो, ओझाजी का देखो! सब पक्‍का दुमंजिला खड़ा कर लिए हैं तब क्‍या वे लोग इतने गए-गुजरे हैं? खटोले के कोने पर देह टिकाये छोटके चाचा शीशे का एक बड़ा खाली मर्तबान ऐसे तकते रहते जैसे दुनिया का सारा भेद उस मर्तबान में छिपा हो. बाबू मर्दों के पीछे धीमे कदमों चुपचाप घूमकर जाता और नज़दीक सामने खड़ा होकर ईया का हुक्‍का गुड़गुड़ाना देखता. ईया थोड़ी देर में खीझकर कहती हट, खांसी आएगी. बाबू कहता नहीं, हुक्‍के की महक आती है. हज्‍जाम के आने पर बाबा पहले उसे चार गाली सुनाते फिर कुर्सी के हत्‍थे पर पटरा डालकर जनार्दन मुन्‍ने को पटरे पर बिठाता और थोड़ी देर में कच्-कच् के साथ उसके पैर, कुर्सी और ज़मीन पर कटे हुए बालों के गुच्‍छे गिरने लगते. पता नहीं क्‍या बात होती कि तब तक शोभा रोने लगती. अंदर कोई बर्तन गिरता और बड़की चाची की बड़बड़ाहट सुन पड़ती कि शोभा जैसी लड़की पाकर वह कितना परेशान हैं. हुक्‍का एक ओर कर, अंदर की ओर मुंह उठाकर ईया आवाज़ लगातीं कि आ जा, रानी बेटी, हमरे काजे आ जा! परित्‍यक्‍त और अजानी, दरवाज़े की मुंडेर पर बिसुरती शोभा ठहरकर इशारा करती कि वह हुक्‍के के पास नहीं आ सकती..

5 comments:

  1. "अलग-अलग टाईम हवा में अलग-अलग महकों की ड्यूटी लगी रहती है." सच ही तो है,कातिक लगे या चैत्र हवायें बिना कैलेडर के मौसम बता देती हैं……

    ReplyDelete
  2. यह गांठ हमारे मन में भी बँध गई है।

    ReplyDelete
  3. कूँये में झाँकने का भय मिश्रित रोमाँच फिर हो गया , लड़की के अकेले बेचारेपन को पीछे ठेलता ।

    ReplyDelete
  4. किसी बड़ी कहानी का एक टुकड़ा लगता है.. उड़ते उड़ते यहाँ गिर गया..

    ReplyDelete