Monday, December 3, 2007

कंगले अमीर लोग!

डोंबिवली महाराष्‍ट्र के इंटिरीयर का कोई देहात नहीं, मुंबई से लगा हुआ ‘फलता-फूलता’, पुराने से नए में तब्‍दील होता, नया उपनगरीय केंद्र है. उपनगरीय रेल के सेंट्रल लाईन पर और कल्‍याण से महज छह किलोमीटर की दूरी पर है. कल शाम किसी पुराने परिचित का कर्ज़ा उतारने सड़क के रास्‍ते डोंबिवली की तरफ जाना हुआ. बीच-बीच में ढेरों नए निर्माण-उपक्रमों पर नज़र पड़ती रहती है. रास्‍ते में महाराष्‍ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) का एक बड़ा इंडस्ट्रियल कॉम्‍प्‍लेक्‍स है. रिलायंस के दो विकराल कंपाउंड्स हैं. दूसरी ढेरों औद्योगिक ईकाइयों के कैंपसेस हैं. ज़्यादा नहीं, हो सकता है चार-पांच वर्ष की अवधि में डोंबिवली तक में एक औसत आदमी का मकान खरीदना असंभव हो जाये. ऐसे में आप स्‍वाभाविक कल्‍पना कीजिएगा कि डोंबिवली तक का रास्‍ता सजा-धजा, स्‍वस्‍थ्‍य और डोंबिवली एक नये, चमकते उपनगर की तस्‍वीर प्रस्‍तुत करता होगा? नहीं, साहब, ऐसा कुछ भी नहीं है. रास्‍ते में ढेरों ऐसे पॉयंट्स हैं कि कहीं बीच-रात आप अटक जायें तो किसी गांव-जंगल में भटक जाने की प्रतीति हो. रास्‍ते की तो मत ही पूछिये. इतने सारे गड्ढे हैं कि हड्डी-हड्डी बजने लगे! मगर कोई पहचान का व्‍यक्ति बता रहा था कि इस तरह हड्डी-हड्डी बजाते हुए काफी लोग रोज़ सड़क के रास्‍ते मुंबई नौकरी करने पहुंचते हैं (रेल से तो पहुंचते हैं ही). खास डोंबिवली के अंदर पहुंचिए तो आस-पास अभी काफी ज़मीन होने के बावजूद निजी और सार्वजनिक डिब्‍बानुमा निर्माणों का स्‍तर ऐसा है कि आप देर तक घबराते रहें कि अगर मानवीय ठंसाव के पहले स्‍तर का यह स्‍तर है, तो गजर-मजर के बाद आलम क्‍या होगा!

रास्‍ते में ज़रा-ज़रा दूर पर लगी हुई जो औद्योगिक ईकाइयां हैं, बाहर सड़कों का नज़ारा देखकर उनकी आत्‍मा में कुछ नहीं होता? नहीं ही होता होगा, वर्ना ऐसा नज़ारा होता ही क्‍यों. शायद हम ऐसा मुल्‍क हो गये हैं कि हमारे घर का हिसाब-किताब ठीक से चलता रहे तो बाहरी दुनिया गड्ढे में जाये नहीं, गड्ढा बना रहे, हमें कुछ नहीं होता. डोंबिवली की हटाइए, पवई से कल्‍याण की ओर निकलते हुए ठीक आईआईटी कैंपस गेट के बाहर संकरी गेटवे सड़क पर ट्रैफिक की जो हाय-हाय मची रहती है, उसे ही व्‍यवस्थित करने का क्‍या रास्‍ता निकल गया? ज़रा आगे एक हाल का बना नया फ्लाईओवर है, ठीक फ्लाईओवर से लगा गड्ढों का ऐसा सुहाना नेकलेस है कि आप बायें जाते हुए दायें की गाड़ी से लड़ न जायें तो उसी क्षण किसी ईश्‍वरीय अदृश्‍य सत्‍ता के प्रति आपमें भक्ति उमड़ने लगे!

अभी कुछ महीने पहले फोर्बेस की दुनिया के बीस सबसे अमीर लोगों की लिस्‍ट प्रकाशित हुई थी. तीन दिन तक मुकेश अंबानी विश्‍व के सबसे अमीर आदमी बताये जाते रहे. फिर वह उपाधि वापस बिल गेट्स के माथे गई. मगर अब भी मुकेश की अमीरी दुनिया के चौदहवें क्रम पर है. अट्ठारहवें नंबर पर उनके छोटे भाई अनिल अंबानी है. पांचवा स्‍थान भारतीय मूल के और अब भारतीय नागरिक भी लक्ष्‍मी मित्‍तल हैं. मगर इससे हमारे सामाजिक-नागरिक जीवन की बेहतरी में दो कौड़ी तक का भी कोई फर्क़ आता है? आएगा? अपने मित्रों, जाननेवालों के बीच दुनिया के ये पहुंचे हुए अमीर, अचानक बातचीत के बीच भारतीय लद्धड़ इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की बात निकले तो क्‍या करते होंगे, मुस्‍कराते हुए वाईन पीते रहते होंगे? गुस्‍से और शर्म से उनकी नसें नहीं फड़कती होंगी? कि उनके लिए मुल्‍क सिर्फ़ पैसा छापने की ज़मीन है, मुल्‍क का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर तेल लेता रहे? कहनेवाले कहते हैं अकेले रिलायंस का सालाना टर्नओवर भारतीय जीडीपी का पचास प्रतिशत है, ऐसे में कुछ तो ऐसे उद्योगपतियों की हस्‍ती होगी, उनकी बतकही की साख होगी! कहने के लिए ही धमकी वाले अंदाज़ में किसी दिन महाराष्‍ट्र की सरकार को कहें, कि अबे, ये इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर दुरुस्‍त करो नहीं तो अगले वर्ष हम टैक्‍स नहीं देंगे! जहां का पीट-पीट के खा रहे हैं उस धरती के लिए इतना तो करें? बहुत ज़्यादा करने की कह रहा हूं? इतना भी नहीं करे तो दुनिया के पांचवे, चौदहवें, अट्ठारहवें इंडियन आदमी की अमीरी का घंटा हम क्‍या करें? हमारे समाज के लिए तो वह हम सबों की तरह वह एक कंगला ही ठहरा.. हमारी ही तरह जो गड्ढों से गुजरता अपने गंतव्‍य तक पहुंचता है!

1 comment:

  1. वास्तव में कंगले..

    अब तो पूरा देश मुंबई के रस्ते है.

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