Tuesday, December 4, 2007

एक बदचलन स्‍त्री के फ़रेब..

पैरों में ऊनी मोजे थे, ऊपर कसे हुए स्‍नीकर्स. भारी चादर पर शॉल साटे कसकर देह पर खींचे हुए थी फिर भी जाने कहां से रह-रहकर ठंड की सूई चुभती. बिना आंखें खोले, पैर उलझाये, देह सिकोड़े कोशिश करती ठंड का असर कम जाये और सुबह धूप निकलने तक नींद में खलल न हो. मगर थोड़ा वक़्त गुजरता नहीं कि फिर जगह-जगह सुइयां चुभतीं.. अबकी ठंड का अहसास होने पर औरत ने हारकर आंखें खोल लीं. कसमसाकर अपने कंधे पर सिर गिराये, धीमे-धीमे नाक बजाते आदमी की बोझ से खुद को मुक्‍त किया और उसी गुड़ी-मुड़ी अवस्‍था में अकड़ी देह को सीधा करने लगी. कितने घंटे हो गए थे इस तरह अंड़से, अकड़े-अकड़े बैठे..

गिरी हुई खिड़कियों के बाहर सब कहीं अंधेरा था. घर्र-घर्र करती बस धीमी चाल पहाड़ी रस्‍ते चढ़ रही थी. आगे मोड़ आया तो बस की बत्तियों से घास के कुछ टुकड़े रोशन हुए. घुमाव के पीछे छुटते फिर सब अंधेरे में छिप गया. सिर्फ़ बस की घर्र-घर्र की आवाज़ बनी रही. औरत ने सोचा कहीं ऐसा न हो कि ड्राईवर भी नींद में बस चला रहा हो, फिर सोच के बचपने का अहसास होने पर औरत सामने से चेहरा हटा कर शॉल हटाकर घड़ी खोजने लगी. पता नहीं सुबह होने में अभी और कितनी देर है? मगर घड़ी तो सीट के नीचे बक्‍से में है. मोबाइल भी बंद करके ‘इन्‍होंने’ घड़ी के साथ ही रख दिया था. अपनी चीज़ों में आदमी के दखल का सोचकर औरत जाने किस पर खिझी तनकर बैठ गई. पता नहीं कब सुबह हो. अब राम-नाम जपते रहो चुपचाप! जबकि कंधे का सहारा हट जाने के बावजूद आदमी के सोने में खलल नहीं आया. नाक भी बजती रही. अलबत्‍ता उसके बजने का स्‍वर बदल गया था. ऐसा नहीं कि आदमी के निश्चित सोये रहने से औरत को जलन हुई मगर शायद उसकी पसलियों में कुहनी ठेलकर औरत अपना समय वापस चाहती थी. आदमी ने चिंहुककर आंखें खोली, फिर होंठों के कोने पर इकट्ठा हुए लार को उल्‍टे हाथ पोंछते हुए कहा- ‘आंSS, आ गए?’, नज़रें गड़ाकर हाथघड़ी देखी, बुदबुदाया- ‘अभी बहुत टाईम है.’ और दुबारा आंखें मूंद लीं.

कान पर मफलर लपेटे, एक मामूली शॉल लपेटे कैसा मज़े में सो रहा है. जैसे दुनिया में किसी बात की चिन्‍ता नहीं. उसके जगे होने की चिन्‍ता नहीं! अपना सर्वस्‍व सौंपने को उसे ऐसा ही व्‍यक्ति मिला. ज़रा-सा सिर उठाकर औरत ने नींद में डूबे बस के अंदर एक उड़ती-सी नज़र डाली. जैसे देखने के लिए कि उसके भीतर के शर्म को किन्‍हीं और आंखों ने तो नहीं देखा, हालांकि पूरा बस सो रहा था फिर भी जाने क्‍या सोचकर औरत उदास हो गई.

जब पहली बार देखने आया था तब कैसे सम्‍भल-सम्‍भलकर बोलता था. धीमे-धीमे. तब अभी की तरह ऐसी बड़ी-बड़ी मूंछें भी नहीं थी. आवाज़ भी अब कितनी रूखी हो गई है! हंसी भी ऐसी कि अनजान बच्‍चे डर जायें. बहुत बार रहा नहीं जाने पर औरत ने स्‍वयं कहा है- ठीक है, अब चुप भी करो!

शादी के तीन-चार साल तक वह दुखी रहती थी कि उसके बच्‍चा नहीं है, मगर अब तो उसे बच्‍चों का सोचकर झुंझलाहट होती है. खामख़ाह जीवन में झंझट बढ़ता. स्‍कूल में नाम लिखवाते वक़्त कैसा अजीब लगता कि बच्‍चे का बाप.. पहले औरत को भी अजीब नहीं लगता था कि मंडी से लाकर फलों की दुकान चलाते हैं, अब सोचती है तो जाने क्‍यों सोचकर बेचैनी होती है. कहीं बात उठे तो वह कोशिश करती है आदमी के काम के बाबत उसे सीधे कहना न पड़े. सिर्फ़ काम ही नहीं, वह आदमी के किसी भी चीज़ में साझीदार नहीं दिखना चाहती!

मज़दूर कारखाने में जाकर अपने हिस्‍से के काम से काम रखते हैं कारखाने की बड़ी तस्‍वीर में नहीं उलझते, औरत भी वैसे ही, आदमी की ज़रूरतों के निपटारे से निपटकर आदमी की दुनिया से बाहर, अपने एकांत में लौट आती. आदमी के होने को अपने लिए खारिज कर देती. कभी आदमी उसे आवाज़ देता खोजता आता तो औरत झुंझलाहट से भर जाती. अपने एकांत में छिपी गुमसुम चुप बैठी रहती. जबतक कि बाहर से आकर आदमी उसे ढूंढ़ न निकाले. हैरत भरा फिर जब वह सवाल करता कि इतनी देर से पुकार रहा है, उसने जवाब क्‍यों नहीं दिया? औरत उसे जवाब देने की जगह उल्‍टा सवाल करती- ‘इतनी जल्‍दी तुम लौट क्‍यों आये?’

नींद और अंधेरे में डूबे बस के घर्र-घर्र के बीच औरत ने आंखें मूंद लीं. एक झपकी-सी आई होगी जभी आदमी का बोलना सुन पड़ा- ‘अरे, अभी तो ... ही बजे हैं!’, फिर औरत ने कंधे पर उसके सिर का बोझ महसूस किया. कड़वाहट में वह कुछ कहना चाहती थी, मगर थकान व उनींदेपन के दबाव में चुप बेजान, मुर्दा पड़ी रही..

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