Wednesday, December 5, 2007

हमारे सीईओ बन जाओ, प्रभु!

धन्‍य हो, महाराज, इस भूखंड पर अब भी पुण्‍यात्‍मा बचे हुए हैं
सही है शहरों में कॉरपोरेशंस ने ज़मीन घेरा है मगर यह भी सही है
मुनि-ऋषि-महात्‍माओं से घिरे हुए हैं. नहीं तो हम कहां से कहां
पहुंच जाते, प्रभु? मगर गहरे उतरकर देखता हूं तो क्‍यों
सिर्फ़ अतल गहराई ही दीखती है? हम कहीं कहां
पहुंच पा रहे हैं, प्रभु? बाबा रामदेव कहते हैं बैठना बंद करो
देह हिलाओ! श्री श्री रविशंकर उच्‍चारते हैं सही-सही सांस लो
सब सही होगा. जबसे सुना है, प्रभु, घरघराती जैसी जो भी
सांस थी, अटक गई है. बैठा नहीं, गिर गया हूं
देह कहां से हिलाऊं? किस तरह छाती में सांस लाऊं.
प्रभु, सुना है जबसे ख़ून सूख गया है. ऐसा क्‍या हुआ
हमारा कि हम देह हिलाना भूल गए, छाती में सांस
लाना भूल गए? हमसे और कहां-कहां गड़बड़ी हुई, मालिक?
भक्ति, हमारी भक्ति खरी है? कि उसमें भी हमने खटाई डाल दी है?
खूला आंगन हवादार होना चाहिए था वहां चटाई डाल दी है?
खाना हम ठीक से खा रहे हैं? कि सिर्फ़ संडास तक जाकर
पेट खाली करने का रास्‍ता बना रहे हैं? घर हमारे कैसे हैं जैसे
होने चाहिएं वैसे हैं? हमारे बच्‍चे सही बात पर मुस्‍करा
रहे हैं, प्रभु? दुनिया-देश की जैसी समझ बननी चाहिए
वैसी बना रहे हैं? शिक्षा सही चल रही है? संस्‍कृति
समाज? घर के भीतर औ’ बाहर का लोक-लाज?
ठीक-ठीक बताओ, प्रभु, मैं जेन्‍युनली घबरा गया हूं
इस अगति से हमें उठाओ, हमारा कुछ कराओ, मालिक!
कितनी अच्‍छी बात है, सोच-सोचकर जीवित बचा हुआ हूं
सांस धौंकनी की तरह चल रही है कि अब भी इस पापिन
धरा पर पुण्‍यात्‍मा बचे हुए हैं. बता रहे हैं सांस लो छोड़ो
जांगर चलाओ. सब कहीं अंधेरा-अंधेरा है प्रकाश में आओ.
ओहोहो, धन्‍य हैं हम, प्रच्‍छन्‍न धन-धान्‍यपूर्ण यह धरा
गड्ढे की देहरी पर दांत दिखाता हूं खड़ा. आप ज्ञानदान
करो, सब हमारी भ्रांति हरो. व्‍हॉट नेक्‍स्‍ट?

3 comments:

  1. हद है....अब मालिक को सीईओ बनायेंगे...।

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  2. सारी भ्रांति एक ही बार में मिट जायेगी तो सौर मंडल के नये चमकते सितारे नहीं बन जायेंगे सब ? आपकी तरह ?

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  3. भक्ति, हमारी भक्ति खरी है? कि उसमें भी हमने खटाई डाल दी है?
    खूला आंगन हवादार होना चाहिए था वहां चटाई डाल दी है?
    ***
    संसार की विसंगतियों को महसूस कर जेन्‍युनली घबराया कवि जब कविता में प्रभु से कम्युनिकेट करता है, तो प्रभु कविता के प्रश्नों में ही समाधान बन चमक उठते हैं...

    चटाई को हटाकर पुनः हवादार करना है आँगन को, पाठक ये सन्देश लिए यहाँ से आगे बढ़ते हैं और जीत जाती है कविता! नियंता ने कमान संभाली है ज़रूर!

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