Thursday, December 6, 2007

ममान, मैं तुमसे बहुत नाराज़ हूं..

मिश्री में घुली किसी फ्रेंच औरत की ललाबाई का पुराना, घिसा रेकर्ड था जो बज रहा था. भारी रजाई के अंधेरे में ललाबाई की धीमी तानों को तैरता सुनते हुए मेरा रोने का मन करने लगा. एकदम-से रजाई से चेहरा बाहर निकालकर मैंने चिल्‍लाकर ममा को इत्तिला की- फेर में मत रहना कि मौसा फ्रांसुआ या लाबेल काका की तरह मैं बैंकर बनूंगा, मैं नर्स बनूंगा, हां. बड़ा होके वही करूंगा जिससे मुझे खुशी हो! नर्स, नर्स, नर्स!

सामने आना मारिया का बिछौना बनाती हुई ममा ने जवाब नहीं दिया. चुपचाप चादर की सलवटें दुरुस्‍त करती रही. मैं ख़ौफ से भर गया कि कहीं ऐसा न हो, ममा मेरी ओर पलटे तो उसके चेहरे पर एक भीनी, दबी हुई मुस्‍कान खिंची हो, मानो मौसा फ्रांसुआ की तरह उसे भी मेरी भविष्‍य संबंधी अपने बारे में राय बनाने की बात फिजूल लगती हो, और उनकी तरह वह भी मानती हो मैं चाहे जितनी भी बकबक करूं, होगा वही जो पापा और उनके करीबी दोस्‍त मार्तिने फ़ैसला करेंगे. सोचते ही मेरा ख़ून उबलने लगा. मैंने चीखकर ममा से जवाब तलब की- अब चुप क्‍यों हो? वही करूंगा जो मुझे करना है.. बात हो गई, बस!

- तो मैं कौन बहस कर रही हूं. जो करना होगा, करना, बाबा, मगर अभी सो जाओ! सुबह फिर जूलिया के साथ उठते वक़्त झिक-झिक करोगे, अच्‍छी आदत नहीं है, बेटे- ममा ने बिना मेरी ओर देखे कहा और बिछौने के बाद डेस्‍क पर आना मारिया के कागज़-नोटबुक्स ठीक करने लगी.

बेवकूफ की तरह रजाई से चेहरा बाहर निकाले मैं उधेड़बुन में फंसा रहा कि ममा ने अपनी तरह से मुझे निरुत्‍तर भले कर दिया हो, इसके मुगालते में न रहे कि उसका झांसा मैं समझता नहीं. उसे ज़ाहिर करने की मेरे पास फ़ि‍लहाल तरक़ीब न हो मगर इसका ये मतलब नहीं कि बड़ों के खेल मैं समझता नहीं? खूब समझता हूं.. और थोड़ा बड़ा हो जाऊं तो चट ममा के मुंह से सचाई उगलवा लिया करूंगा.. ममा की होशियारी और अपने बड़ा न होने पर मुझे बेतरह गुस्‍सा आ रहा था. ममा पर ज़्यादा.

सोने से पहले कल रात दूध नहीं पियूंगा. खाने की मेज़ पर जूलिया जैसे ही मेरी प्‍लेट में सलामी रखना चाहेगी, मैं दोनों हाथ बढ़ाकर प्‍लेट छेंक लूंगा फिर ममा को अक़ल आएगी! ओह, कितना गुस्‍सा आ रहा था मुझे ममा पर. जबकि वह अब रेकर्ड की औरत के स्‍वर में स्‍वर मिलाकर ललाबाई गा रही थी, और चाह रही थी कि दौड़कर मैं पीछे से उससे चिपट जाऊं और उसे प्‍यार कर लूं (ममा से ज़्यादा मैं चाह रहा था!) और फिर वह झूठे रजाई से मेरे बाहर आने पर अपनी नाराज़गी दिखाये.. ओह, इतना बुद्धू नहीं हूं मैं कि उसके झांसें में फंसूं. आज तो किसी भी सूरत में नहीं! मगर कितनी अच्‍छी ललाबाई है, और कितनी तो मीठी ममा की आवाज़ है.. कितना-कितना तो मेरा मन रोने का कर रहा है! लेकिन दांत भींचे हुए मैंने अपने रोने को बुरी तरह से रोका हुआ है..

(ज़रूरी नहीं आप मुझे फ्रेंच बच्‍चा ही समझें.. ठीक-ठीक मैं क्‍या बच्‍चा हूं, यह अभी भी मुझे जानना है.. लेकिन अरब या अफ्रीकी तो मैं कतई नहीं हूं.. ममान ज़ि‍द करके आपसे मनवाना चाहे तो भी यकीन न कीजिएगा.. उसकी किसी बात का न कीजिएगा..)

5 comments:

  1. enfant ? et vous ? non, pas vraiment

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  2. बच्चा कौन होता है...

    मासूम, निष्कलंक,उत्सुक, जिज्ञासु,नैसर्गिक...

    आप में तो सारे गुण मौजूद हैं...
    रोने का मन हो तो रो लेना चाहिये...

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  3. कहाँ-कहाँ उड़ रहे हैं आप.. बच्चे पर थोड़ा रहम खाइये.. रुला रखा है बिचारे को..

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  4. कितना 'क्रिएटिव' बच्चा है जी. जो लोरी सुन कर सोता नहीं रोता है . रोता भी कहां है,रुआंसा होकर अरस्तु की तरह न जाने क्या-क्या फ़लसफे सोचता है. सचमुच बड़ा 'क्रिएटिव' बच्चा है .

    वैसे तो हर बच्चा 'क्रिएटिव' होता है जी . ये तो हमारी 'एडूकेशन' है जो उसे घोंघाबसंत बना देती है .

    बहुत मार्मिक प्रेक्षण .

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  5. मैं नर्स बनूंगा, हां. बड़ा होके वही करूंगा जिससे मुझे खुशी हो! नर्स, नर्स, नर्स!
    This conviction says it all!

    और जहां तक बच्चा होने की बात है, तो हममें से कौन एक बच्चा नहीं है...
    कविता सी भीतर उतरती यह पोस्ट हमें वर्नर अस्पेंसट्रोम की एक कविता तक ले गयी...

    एक दिन अपने जीवन के सत्तरवें वर्ष में
    जब मैंने कोशिश की याद करने की कि कैसा अनुभव था
    दुनिया में नवागंतुक होने का और स्वयं
    ढूँढ़ना उसकी सात और सत्तर निविष्टियों को

    तब मदद ली मैंने एक अवकाशप्राप्त प्रोफ़ेसर से,
    सात भाषाओँ में दक्ष,
    जो अश्रु पूर्ण नेत्रों से खड़ा था कक्ष में
    और ढूंढ़ रहा था हाथ घुसाने की जगह कोट के आस्तीन में.

    वह स्वयं करना चाहता था यह.

    और हममें से कौन एक बच्चा नहीं है
    और कौन नहीं है वह प्रोफ़ेसर?
    ***
    [मगर कितनी अच्‍छी ललाबाई है, और कितनी तो मीठी ममा की आवाज़ है.. कितना-कितना तो मेरा मन रोने का कर रहा है! लेकिन दांत भींचे हुए मैंने अपने रोने को बुरी तरह से रोका हुआ है..]

    अज़दक पर इतने सारे पोस्ट हैं, और इतनी मीठे हर पोस्ट के सुर हैं..
    कि आँखें नम हो जाती हैं,एक अबूझ ख़ुशी रुला जाती है... और रोते हुए मुस्कानें खिल जाती हैं!

    With Regards,
    From a traveler of this blog.

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