Saturday, December 8, 2007

बात क्‍या है जानते हो, सीताकांत?

क्‍या है जानते हो, सीताकांत? बातें, बातें, बहुत सारी बातें बोलकर क्‍या होता है कुछ नहीं होता? चक्राकार घूमते रहते हैं (भारतीय दर्शन में भी प्रवृति है. यह भी सही, वह भी सही), घूमकर थक जाने पर ज़रा सुस्‍ताके फिर बोलने लगते हैं. घूमकर अंत नहीं होता चलती चली जाती हैं बातें मगर जाती कहां हैं, सीताकांत? मैं नहीं कहता कि हर विचार का सामान्‍यीकरण करें लेकिन नहीं लगता तुम्‍हें कि चर्चा की शुरुआत, मध्‍य और अंत होना चाहिए? दर्शन की पुरानी लीक में कुछ नये मूल्‍यों का भी समावेश होना चाहिए? अनादिकालता की अमूर्तता में सामयिकता की चिंताओं का पुट? दार्शनिकता की टेक का नहीं फिर मतलब क्‍या होगा, नहीं, खुद बोलो तुम?

विचार को सीमित करने की बात नहीं है, मित्र, न स्‍थूलता का मेरा आग्रह है. लेकिन जीवन की लय और रोमान को बातों में मिलाये बिना हम बात कहां ले जायेंगे. चार दिन बाद फिर यही चिंता होगी, चार दिन बाद फिर कोई और या मैं यही गाना गायेंगे. तुम ऐसे सुलझे, तीक्ष्‍णबुद्धि, विचारवान हो मगर इस पर सोचते नहीं हो ताज्‍जुब होता है. गुस्‍से में नहीं हूं न कातरता है, विनम्र निवेदन है, एक बार विचार करो, मित्र सीताकांत?

1 comment:

  1. बात आप की ठीक है मित्र.. पर करें क्या सवाल भी उठकर कहीं जाते नहीं.. ढीठ की तरह घूम-फिर कर फिर वहीं डट जाते हैं.. तो फिर वही-वही बात करनी पड़ती है.. नहीं करेंगे तो.. चुप रहेंगे.. और चुप रहने के पाप और विकट हैं..

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