Monday, December 10, 2007

कलकत्‍ते की हवा में सुबह-सुबह..

- का जी, आप तो कलकत्‍ता न जा रहे थे, जी? का हुआ, एत्‍ता जल्‍दी लौटके आइयो गये? कि घंटा, गइबे नय किये, ऐं?..

- रसोगुल्‍ला, खीरमोहन, चित्रकूट, सोंदेस.. ओह, कोलकाता!

- एगो बात बोलिए, सिंघजी.. कवनो पंडिजी से पंचांग देखाके पिलैनिंग कैंसिल कै लिये.. कि प्रियन्‍कर महराज अपना घर का केताब सब का लिस्‍ट भेजके आपको डिप्रेसन में भेज दिये? हें हें हें.. बोलिए न, ठाकुर साहेब, कौची कलकत्‍ता का मारग में आ गया, जी?

(चुप कर, थेथर ससुर! कलकत्‍ता निकल गए होते तो तुम नराधम से सुबह-सुबह इस स्‍नेहासिक्‍त संवाद का सुअवसर कहां आता? कहीं गली के मुहाने पर चुक्‍कड़ की छुटो चा पी रहे होते.. सिंघड़ा, काचोड़ीर गुन-ग्‍यानेर मोंदो-मोंदो सुगंधो पात्‍ताम, ना की? तोर बोकार मुख देखबार ओभिशाप थाकबे, स्‍साला!)

- सुने, साथ में एगो बीडियो कैमरा लेके जा रहे थे, प्रियन्‍कर जी पे डकूमेंट्री बनावे वाला थे का हो? कि सुचित्रा सेन पर.. कि कवनो हेराइन को ब्रेक देबे वाला रहे? बैकग्राउंड का म्‍यूजिक देते बाबू रशीद ख़ान? हें हें हें, का सिंघजी?..

(ओ टा कि थॉमस बेरनार्डेर नतून बोई ना कि?.. आर कि पोड़ा-सुना चोलछे एइ दिन?.. दीपशिखा, ऐसा क्‍यों है तुम्‍हारे शहर में कि हर चालीस कदम पर मिठाइयों की दुकान मिल जाती है, और बजाय इसके कि तुम कोशिश करो मैं सिर्फ़ तुम्‍हारी आंखों में देखता रहूं, तुम ऐसी स्थितियां बना रही हो कि मेरी आंखें भटक-भटककर मिठाइयों पर जा रही हैं? तुम ऐसी नहीं थीं, दी‍पशिखा.. तुम कितना बदल गई हो? मगर उतना नहीं बदली हो जैसे पुराणिक की तरह के लोग तुम्‍हें बदनाम करने के लिए लिख रहे हैं, येस, देयर इज़ अ टिंज ऑव ट्रूथ.. बट नॉट द होल ट्रूथ..)


- चल गये होते, महाराज.. कुछ सस्‍ता कुरता-टुरता कीनते? कालेज इस्‍ट्रीट का बोइ-बज़ार पर धावा बोलते.. बंगला लइकि-टइकि से मन में मोह-माया जगाते, हां, सिंघजी?..

(इस शहर की गलियों से यह क्‍या गंध छूटती है, दीपशिखा? और इन इकतल्‍ला पुराने मकानों की छत पर, देखो, अब भी कपड़े सूखते हैं? और वह तुम्‍हारा पुराना टेप रिकॉडर्र, एखनो आछे ना कि? तुम्‍हें याद है अनिरबन की शादी में बाबुन घोषाल के हेमंग दा वाला गाना गाने पर तुमने क्‍या कहा था? लाल किनारे की पीली साड़ी में किस तरह तुम्‍हारा चेहरा तमकने लगा था? उस शाम मोयना दी के घर तभी हमने तय किया था कुछ दिनों के लिए ये शहर छोड़ देंगे.. इस शहर की चिक्-चिक्.. शाम बाज़ार की शामें.. भागकर रांची चले जायेंगे.. या दक्षिण में कहीं, कनो स्‍मृति आछे?)

- कभी कुच्‍छो साधते हैं कि खाली खयालिये पुलाव जीमते रहेंगे, सिंघजी.. अरे, बोलिये न, महाराज?

(बोलेंगे नहीं, अब लात चलायेंगे, ससुर!.. आमाय खोमा कोरो, शिखा, खूब मोन छीलो जे, किंतु आशते पारी ना.. कतो कारोन.. किंतु एखन की बोलबो, गो!)

2 comments:

  1. নলিন গুড়ের রসগোল্লা , খীরকদম , ঝালমূড়ী আর ইলীশ মাছ কিছু পেলেন না . কী বোলবো . শরীর টা কে সুস্থ করূন .

    ReplyDelete
  2. किछुओ खेलाम ना, किछुओ पेलाम ना.. सेई तो कुल काहिनी..

    ReplyDelete