Wednesday, December 12, 2007

मिठास से लबरेज़ एक गाना..

- मिठास है?

- हम्‍म.. देखने की नज़र चाहिए.. फिर तुम्‍हारी आंखों पर तो इतना मोटा चश्‍मा चढ़ा है!

- इसीलिए कि सारी उम्र आंखें फाड़-फाड़के देखने की कोशिश करता रहा.. सब तरह के लोगों के बीच घूमके रायशुमारी की.. मगर मिला क्‍या? हमारी तो जहां तक नज़र जाती है अंधेरा ही अंधेरा दिखता है..

- आपके साथ बड़ी दिक्‍कत है, अबु तालेब, आप पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं लेकिन खुदा के रसूख में आपका यकीन नहीं..

- आह्, अब यही बाकी था.. और?..

- उस बच्‍ची से क्‍या सीखा आपने? कभी ऊंची आवाज़ बात नहीं करती, कभी किसी ने शिकायत करते नहीं सुना..

- किसकी बात करती हो?

- जिस पर ज़रा भी आपकी मनहूसियत की छांह नहीं पड़ी.. सउद.. आपकी बेटी..

- आह्, एक तुम हो और दूसरी वो.. जाने किस परात में तुम औरतें खाना खाती हो कि इतनी उम्‍मीदबर बनी रहती हो..

- ज़िंदगी बहुत हसीन है, तालेब साहब, रोज़-बरोज़ के छोटे वाक़यों में ख़ून जलाकर हम खुदा की कैसी बंदगी करते हैं? इंसान की तहजीब, उसकी नेकदिली का कैसा इंसाफ़ करते हैं..


- रहने दो अपना फलसफ़ा, और जल्‍दी से कॉफ़ी का एक प्‍याला पिलाओ..

- तब से आपकी हुज़ूर में ही तो लगी हूं.. लीजिए, संभालिए अपना प्‍याला और गाना सुनते हुए अपने आग और अंधेरे पर ठंडे पानी के छींटें छिड़किये!

- किसका कह रही हो, परवीन, कैसा गाना?

- वही जो सामी ने बाजे पे लगाया है

- (खिड़की से चेहरा बाहर निकालकर) नील यंग, चचा, यू विल लव इट!


6 comments:

  1. ज़िंदगी बहुत हसीन है, तालेब साहब!!

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  2. कहाँ कहाँ से खोज कर माल निकाल रहे हैं आप!

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  3. उम्मीद है कॉफ़ी के प्‍याले के साथ गाना सुनते हुए अबु साहब के आग और अंधेरे पर ठंडे पानी के केवल छींटें नहीं एक ठंडी फुहार पड़ी होगी।

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  4. हमारी तो जहां तक नज़र जाती है अंधेरा ही अंधेरा दिखता है..
    ***
    जिसके पास अँधेरे को अनुभव करने की आखें हैं,वही तो रचेगा उजाला...!
    अज़दक यही तो कर रहा है अनवरत!

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