Tuesday, December 11, 2007

अ डिटेक्टिव म्‍यूजिकल..

हम जासूसी उपन्‍यास क्‍यों पढ़ते हैं, उन्‍हें क्‍लासिकी साहित्‍य का दर्जा मिलना चाहिए या नहीं जैसी जिरहों पर मैंने ढेरों लेख पढ़े हैं. बीच-बीच में अपने इस ‘गिल्‍टी प्‍लेज़र’ पर शर्म व ग्‍लानि भी हुई है.. मगर जैसे इंडियन मिडिल क्‍लास बहसों में समाज के विकास की ढेरों अवधारणायें पकाने-पचाने के बावजूद वास्‍तविक जीवन में अंतत: ठेले अपने ही विकास को रखता है, या जैसे प्रमोद सिंघ हैं सिगरेट के नुकसान की जिम्‍मेदार लिस्‍ट बनाते हुए होंठों में मगर केएन सिंह स्‍टाइल की सिगरेट झुलाते रहना नहीं भूलते, वैसे ही मेरा भी जासूसी उपन्‍यास पढ़ना कम भले हो गया हो, बंद नहीं हुआ है. जॉर्ज सिमेनॉन की कोई पुरानी जिल्‍द दिख जाये तो अब भी भावुक एकांत खोजने लगता हूं.

ढेरों लिखवैया हैं, सबकी अपनी-अपनी पसंद है, चूंकि हमारी पसंद को ज़रा ज़मीन से ऊपर चलने की आदत है तो हमने बचपन में भले इब्‍ने सफ़ी, कर्नल रंजीत, चेज़, पुज़ो –और फलना और ढिकना को तकिये के नीचे सजाया हो, अब आलमारी में नहीं सजाते. आलमारी में बेल्जियम के मॉडर्निस्‍ट सिमेनॉन मिलेंगे, और मिलेंगे हमारे चहेते इटली के दार्शनिक लियोनार्दो शाशा और स्‍पेन के वामपंथी जासूसंदाज़ मानुएल वास्‍क्‍वेज़ मॉंतलबान.

दिल्‍ली में यहां-वहां से जो किताबें उठायीं, एक किताब मॉंतलबान की भी थी, ‘व्‍युनोस आयरस क्विंटेट’. इन दिनों शुरू किया है. इधर-उधर से कुछ लाइनें टीप रहा हूं. छोटे-छोटे टीज़र्स समझिए. टांगो का अपना स्‍टॉक नहीं है, तो बैकग्राउंड के लिए बीच-बीच में दूसरी लड़ि‍यां टांक रहा हूं. संभल के पैर रखिएगा, देखिए, गिरें नहीं..


Welcome to Buenos Aires. We know you come here because Argentina is up for sale to foreigners. But it’s not only Japanese who are buying us: even the Spaniards are here, although Spain itself is for sale as well… We Argentines love people to take our watches, our sweethearts, our islands. So we can write tangos about it afterwards!

बत्तियातो का बेचारा मुल्‍क मेरा..



Marx said you only get to know a country when you’ve eaten its bread and drunk its wine.

पाओलो कोंते का समझदार सहकर्मी



As individuals we tend to forget the harm we do or that’s done to us. Why should it be any different for a society?

फ्रंचेस्‍को दे ग्रेगोरी का कप्‍तान साब की मांसपेशियां..



I’m more interested in the biological memory of the animals than in the historical one of men. What use is historical memory to us today?

ये आखिर का डेविड ग्रिसमैन का डाऊन होम वॉल्टज़‍, ब्‍लू ग्रास मैंडोलिन एक्‍स्‍ट्रावैगांजा से है. जितना ले सकते हैं, मज़ा लीजिए.



6 comments:

  1. पता नहीं इस अंग्रेजी के अज्ञान को कब तक ढोना होगा....जासूसी के शौकीन हम भी है मालक। आप जितने पढ़ेलिखे होते तो जो नाम लिए है उन्हें भी गुटक जाते। ब्लाग व्लाग कुछ नही....बस वोई इटली वाला या स्पेन वाला इब्नेसफी ही पढ़ते रहते सुबह पांच बजे तक।
    का करें, भाई साब, घनघोर अवसाद मे डाल दिया आपने, एहसासे कमतरी भी छाने लगी है।
    वैसे , ये नई फोटो जो आपने लगाई है ना, वो आपके भीतर छुपे बच्चे की है। और शायद हमें चिढ़ाने के लिए ही इतनी जल्दी बदले हैं...:)

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  2. ग्रेटम ग्रेट वैसे सुरेंद्र मोहन पाठक ने कुछ उपन्यास परम धांसू लिखे हैं। भौत मजे के हैं। मेरे पास पूरा कलेक्शन है अगली दिल्ली यात्रा में आपको दिखाऊंगा।

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  3. भाषाई तौर पर कुछ पल्ले नही पड़ा, पर सारे गाने मधुर हैं,पर फ़ंचेस्को ग्रेगोरी और ब्लू ग्रास मेन्डोलिन एक्स्ट्रावेगेन्ज़ा को सुन कर आनन्द आ गया,प्रमोद मेरी भी इच्छा हो रही है कि ग्रेगरी स्टाइल मे गाना गाऊं, शैली गाने की अद्भुत लगी,और मेन्डोलिन तो ऐसा सुनवा दिये है, कि सुनने के बाद भी कानों में मेन्डोलिन तार मस्त किस्म से झनझना रहे हैं, मज़ा आया काश भाषा भी समझता तो और आनन्द आता !!

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  4. वैसे आलोक पुराणिक सही कह रहे हैं। मेंरे पास भी कुछ अच्छे उपन्यास हैं उनके।

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  5. कोंते की तरह सिर्फ ला ला ला कहने का मन कर रहा है । फिर कप्तान साहब की माँसपेशी सुन ली । आप किताबें चाहे जैसी पढ़ें , म्यूज़िक शानदार सुनते हैं ।

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