Wednesday, December 12, 2007

बर्फ़ और सुबह..

ठंड. बरसात. बर्फ़. कीचड़. ठिठुरता नान लेकर घर लौटता बच्‍चा. शकूर की उखड़ी हुई दुकान पर फुसफुसाकर जिरह करते तीन बूढ़े. बाजे पर ओम कुलसुम का घिसा हुआ आदम के ज़माने का गाना. दुकान के अंदरूनी हिस्‍से में जवान बेटे को अकल की बात समझा-समझाकर हार रही शकूर की बेवा. सन् बासठ में उतारी गई शकूर और उसके छह बच्‍चोंवाले हंसते परिवार की फ़ोटो (जिनमें से चार अब दुनिया में नहीं). पुराने बक्‍से-असबाब. जर्मन मशीन-टूल का कंजास. अंग्रेज बिस्‍कुट का खाली खोखा. होंठों के ऊपर जाने कहां से उग आये बालों से लापरवाह उम ताबी चूल्‍हे पर पानी गर्म करने के बाद कॉफ़ी के तैयार होने की राह तकती. बाजू में कंबल में डेढ़ साल की बेटी नींद में भूली हुई. सड़क पार हज्‍जाम रामी की गुमटी के दरवाज़े पर पिछली रात के झगड़े की खुरचन. ख़ामोशी. वहशत. हमेशा की तरह धुले कपड़ों में नाके की चौकी पर संतरी के सवालों का बड़े सब्र से जवाब देते अबु हदी.


- जितना हाथ बढ़ाओगे उतने जूते खाओगे.. किसी के आगे हाथ फैलाने का क्‍या फ़ायदा, रफी मियां?

- मतलब घर में बंद बिला शिकायत कैद रहो, बच्‍चे पैदा करो और इंतज़ार करो कब ठंड खतम हो.. कब ज़िंदगी?

- एक बात कहूं, जनाब? सब आये यहां.. रोमंस आये, बाइजें‍टेनियंस, क्रुसेडर्स, तुर्क, अंग्रेज कौन नहीं आया यहां? आज कहां हैं सब? किसी का पता नहीं.. सब गायब हो गए.. सोवियत रूस कहां है? हवा हो गयी.. एक दिन सब गायब होते हैं.. चीजों के बदलने में बस एक उंगली भर की दरकार होती है, हां.. कोई हस्‍ती नहीं है.. बस खुदा-ताला की ही एक हस्‍ती है!

लाशों को दफ़नाकर अपने-अपने अंधेरों में अपने गुस्‍से व हार से जूझकर सोए पड़े सलेम, तालेब, माहेर, अयमान.

2 comments:

  1. जाड़े भरी उदासी का शोकगीत !

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  2. "एक दिन सब गायब होते हैं.."
    So sad and so true!

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