Thursday, December 13, 2007

सुबह-सुबह सुख में नहायी हुई खुशी..

“Life has more imagination than we have, you know.”
- The Lady Next Door, Francois Truffaut.
“If he doesn’t know where else to go in his spare time, why did he say he wanted to go to India? I went to India and I didn’t even want to go. I walked in Bombay and I saw nothing but hot little men and women who really didn’t know where to go.”
- Here Comes, There Goes, You Know Who, William Saroyan.

अट्ठारह रुपये के घिसे गमछा में गीला हाथ पोंछते, तंबाकू और पान से खराब दांतों का प्रदर्शन करते राधेमोहन खुश हैं. ऐसी कोई ख़ास वजह नहीं. सुबह नित्‍यकर्म के लिए न केवल सपरकर एकांत मिल गया था, बैठने को साफ़-सुथरी जगह भी मिल गयी थी. फिर बाल्‍टी लेकर सूखे कुएं के बाजू के निगम के नल पर दौड़े गए तो वहां भी एक-दूसरे की जान लेने की जगह हंसी-खुशी का माहौल था. औरतें आपस में झोंटा खींचने की बजाय पटीदारी की बहनों की तरह पेश आ रही थीं. दैया की मां ने सास के काम के लिए पंचाग देखने की बात उठाई. आधे घंटे में पंडितजी से आकर मिलने का आग्रह किया. बिना स्‍नान किये, बिना शिवलिंग पर जल चढ़ाये इस तरह जजमानी का रजिस्‍टर खुलता देख राधेमोहन को बलिया से चक्रधरपुर आकर बाबूजी के साथ बिताये अपने अप्रेंटिसशिप के पुराने दिनों की भावुक याद हो आई. बाबूजी की साइकिल के पीछे बैठकर इस जजमान के यहां से उस जजमान के यहां भागने के कैसे व्‍यस्‍त, कमाऊ दिन थे. कितनी जल्‍दी राधेमोहन के हाथ उनकी अपनी एक अलग साइकिल आ गई थी.. मगर बाबूजी के गुजर जाने पर कितनी ही जल्‍दी सब बदल भी गया था!

दैया की मां को मुस्‍कराकर साढ़े दस बजे तक आने की बात से मनवाकर राधेमोहन जल्‍दी-जल्‍दी देह पर कांसे के टुटही लोटे से पानी उलीचने लगे. दैया की मां को बताने की ज़रूरत नहीं हुई कि घर में आटा चुक गया है, पत्‍नी के हल्‍ले के जवाब में उन्‍हें मेन बाज़ार जाकर बोरी ढो के लानी है. दैया की मां ने पलटकर देरी का अपना रोना भी नहीं रोया. राधेमोहन सूखी धोती चढ़ाकर अभी गमछा धो रहे थे कि गंजेड़ी सोमारू ने पीछे से आकर दो बार जैराम किया.

मंदिर से लगे पीपल के नीचे आज हमेशा की तरह आवारा कुत्‍तों का जमाव नहीं था. न साइकिल चोरी गई थी न साइकिल पर चढ़ा भारी चेन. दीवार पर पाथे गोईंठों के साथ भी किसी ने हरमपना नहीं किया था. न मंदिर की सीढ़ि‍यों पर कोई कुत्‍ता पखाना करके गया था. पूजा करके घर लौटे तो पत्‍नी जाने कहां से थाली में तिलकुट, मुढ़ी और गुड़ निकालकर धूप में खटोला खींचकर उस पर रख रही थी.

बिना पत्‍नी के गाली-गलौज के राधेमोहन चुप्‍पे-चुप्‍पे नाश्‍ता ही नहीं कर लिए, बेटी पायल बाहर आई तो सिर्फ़ थाली वापस लेने नहीं आयी थी, ‘पापाजी’ के लिए हाथ के स्‍टील के गिलास में चाय लेकर आयी थी. बाप को चाय देते हुए लड़की ने स्‍कूल के किसी खर्चे या कापी-कागज़ का जिक्र नहीं किया.

खटोले से थोड़ी दूर पर मर्तबान में मूली और गाजर के अचार को सूखता देख राधेमोहन अपनी गृहस्‍थी की व्‍यवस्‍था से प्रसन्‍न हुए. आंगन की छोटी-सी हरियाली भी आज कुछ ज्यादा ही हरी-हरी दिख रही थी. अघाहट के संतोष से एक भरी-पूरी डकार छूटी. टूटे कप में अपना चाय सुड़कती पत्‍नी ने सवाल किया- कौन बात है आज बड़ा खुश हैं?

फटी मगर धुली हुई गंजी पर कुर्ता चढ़ाते हुए राधेमोहन सिर्फ़ मुस्‍कराये, जवाब नहीं दिया.

2 comments:

  1. पंडिज्जी बताशा और मिश्री किधर है ? दो दाने अंदर डलें तब जाकर सुख और खुशी की पुराई होगी न !

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  2. कारू का खज़ाना भरा पड़ा है अज़दक में....

    कितने टाइम अब अज़दक की टोकरी में उड़ेल दें, और पिरमोद जी की टोकरी खाली के खाली...


    वाह, ये पोस्ट जैसे ठहरा हुआ गुनगुना समय.

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