Friday, December 14, 2007

धरातल का ज़रा-सा फर्क़..

एक

- फिर?..

- फिर क्‍या?

- इतने दिनों बाद मिल रहे हो और देखो ज़रा खुश तक नहीं हो!

- हूं.. जितना हो सकता हूं.. सच्‍ची.

- क्‍या बात क्‍या हुई? फिर चिट्ठी आई है.. कि मकान-मालिक.. नहीं, आंसुओं में डूबी चार सौ पन्‍नों की किताब पढ़ ली? या रात भर आवारा टहलते रहे, दुनिया-जहान.. मेरे बारे में- सब नयी राय बना ली?

- ऐसा क्‍यों कहती हो..

- तो कैसे कहूं.. तुम खुद तो कुछ कहोगे नहीं? कभी-कभी लगता है तुमसे बात नहीं करती दीवार पर सिर मारती रहती हूं!

- दीवार पर सिर तो मेरा है!.. सारा समय.. इतने शब्‍द.. कहां जाते हैं, कहीं जाते हैं?.. फिर भी रोज़ टाईपराइटर पर बैठ जाता हूं.. जैसे कितनी कहानियां कहनी हैं.. कुछ नहीं कहना मुझे.. किसकी कहानी जानता हूं? अपनी कहानी तक मैं नहीं जानता!



दो

- What is wrong, lady, you look down?

- Nay.. I am all right.

- You are?

- Hmm, tell you so.

- Yeah?

- Yes.

- Well, I thought I might offer some help. A word or two of some advice..

- No need. I’ll get by. Thanks anyway for your kindness, sweetheart.

- Fine, if you need anything, you know where to get me.

- I do.

- Can’t see that expression on your face. I’d rather you cry your heart out on my shoulder.

- I appreciate your concern. You’re a darling.

- I know that.

2 comments:

  1. उतना ही फर्क है जितना बाँग्ला और हिस्पानी गानों में !

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  2. भाई ये पहला गीत तो कुछ कुछ उड़िया में भी गाया जा रहा है, पर आवाज़ खांटी बंगला लगती नहीं है, और दूसरा गाना भी मिलता जुलता है,अच्छा है सुनाते रहिये

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