Saturday, December 15, 2007

सुगंधी इन द लैंड ऑफ सुख

सुगंधी किस्‍मतवाली है. जीवन में जो चाहा, पाया. बाकी सहेलियां इस टिल्‍ले कस्‍बे उस मरगिल्‍ले शहर गईं, सुगंधी व्‍याह कर टोक्‍नो गई. सपनों के देश में सपनों का शहर टोक्‍नो. बचपन से सुगंधी लोगों को बातें करते सुनती- ऐसा टोक्‍नो, ओह, क्‍या कमाल की जगह. ताली बजाओ तो ये हो जाये, आंख नचाओ तो वो! खूब-खूब बातें करते रहते लोग. सपना देखते, योजना बनाते. जा नहीं पाते. सुगंधी पहुंच गई थी. बिना आंख नचाये. बिना ऊपर-नीचे आये. जैसे उसकी किस्‍मत में टोक्‍नो नहीं, टोक्‍नो की किस्‍मत में वह लिखी थी. ओह, टोक्‍नो. उफ़्फ़, टोक्‍नो!

कार में पति सुगंधी का हाथ भींचे हैरत से टोक्‍नो को तकता रहा- ओह, कैन यू बिलीव इट, वी रियली मेड इट? ओ गॉड, वी आर हियर! जबकि सुगंधी टोक्‍नो की बजाय पति को तकती रही. सोचती तबसे हाथ दबाये क्‍या ज़ाहिर करना चाहता है. हाथ छोड़ दे तो मैं कौन चीज़ दबाकर क्‍या ज़ाहिर करुंगी. पति इतना उछल रहा है सोचकर सुगंधी भी कार में जितना फुदकना था, फुदकती रही. सुखी टोक्‍नो में सुखी पति की सुखी सुगंधी. सुखी नौकरी, सुखी घर, सुखी पड़ोस, सब सुखी सुखी सुखी.

सुख का पहला दिन बीता. दूसरा, तीसरा फिर कितने तो सुख के दिन बीत गए. नींद का गड़बड़ाया क्रम दुरुस्‍त हो गया, पति के तनावग्रस्‍त पेट की पेचिश पटरी पर आ गई, सुगंधी ने रसोई में अपने मसाले और अपना लक्ष्‍मी-गणेश सेट कर लिया. टोक्‍नो में इस चीज़ के लिये ये और उस चीज़ के लिए वो की फेहरिस्‍त बनाकर फ़्रि‍ज पर चिपका ली और तीन बार जम्‍हाई लेकर सुखी हो गई. तभी सुख का ऊबाऊ, उदास क्रम टूटा. माने जीवन के मामूली अनोखेपने का हस्‍तक्षेप हुआ.


बात यह हुई कि दो दिन पहले दफ़्तर की किसी गैदरिंग में पतिराज कोई दावत दबाकर लौटे थे. और लौटने के बाद से घंटे-घंटे भर पर वही ‘ओह, व्‍हाट फुड द बगर्स इट हियर. कांट टेल यू अबाऊट द डैम ब्रोकोल्‍ली!’ का रेकर्ड बजाते रहते. सुन-सुनकर सुगंधी के कानों को सुख तो नहीं ही हो रहा था. तीसरे दिन पति मियां घर से निकलकर नौकरी गए, और सुगंधी सुपरस्‍टोर गई ‘डैम ब्रोकोल्‍ली’ हथियाने.

शाम को पतिलाल खाने पर बैठे तो खाने के सुखी मेज़ पर रसम था, अप्‍पम, टिक्‍कम, बक्‍कम था और थी मसाले में तर, ऊपर से नीचे खर्र-खर्र ब्रोकोल्‍ली बोगांजा! चहकती हुई सुगंधी के लाड़ में पति ने मुंह में रखा तो गले में कहीं कुछ बिगड़ा, ब्रेक हुआ. आंखें फैलाकर बोले- देयर सीम्‍स टू बी समथिंग रॉंग समव्‍हेयर विद् ब्रोकोल्‍ली, सुगंधी? सुगंधी ने चम्‍मच से पति के मुंह में नया कौर ठेला, चहककर बोली- नो रॉंग. एवरीथिंग फाईन, फाईन. बेस्‍टमबेस्‍ट, राजा!

पति के बाद अपने मुंह में पहला निवाला रखने के बाद सुगंधी समझी इट वॉज़ नॉट सो. डैम ब्रोकोल्‍ली वहीं मेज़ पर थूक दिया. कुडंट स्‍टैंड दैट डैम थिंग वन मोर टाईम!

बट अदरवाइस इट वॉज़ आल सुख एंड सुखेस्‍टेमसुख इन टोक्‍नो, एंड सुगंधी कुडंट आस्‍क फॉर मोर.

6 comments:

  1. पढ़ कर मुस्कुरा रही हूं……टिप्पणी कर ना बस मे नही,सुगंधी नाम बहुत अच्छा लगा……

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  2. सुखेस्टेमसुख वाह..सुख मिल रहा है। मोदीस्टेममुख। इससे और भी कई शब्द निकल सकते हैं।

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  3. सुखी टोक्नो में, सुखी पति की सुखी सुगंधी। सुखी घर सुखी पड़ोस सब सुखी ही सुखी।
    क्या गजब का अनुप्रास अलंकार है।
    सब सुखी ही सुखी और इस सुखी में मेरी हंसी नहीं रूकी

    वैसे बाय द वे ये सुखस्टेमसुख क्या होता है

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  4. अद्भुत...अद्बभुतम् ये क्या कर रहे हैं आप ? हमें अपना फैन बना कर ही छोड़ेंगे क्या ? आधुनिक लोककथा नहीं ये सिर्फ लोककथा है, बस्स। और पूरा मज़ा दे रही है।
    बस, कमी एक ही है कि आधुनिक कथाकार नतीजा निकालने का काम पाठक पर छोड़ देते हैं और नतीजे में पाठक सिर फोड़ लेता है। क्योंकि लिखने वाला उसके पास नहीं होता । मगर ये लोककथा ही है और इसकी सीख या हासिल क्या है ये भी आपको बताना चाहिये तो ये और हिट्टमहिट जाएगी। वैसे न भी बताएं तो भी कोई दिक्कत नहीं । हम तो पढ़ेंगे क्योंकि अलग किस्म के शैलीकार हैं।

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  5. शैलीकार वाली बात भी आपके लिए ही कही है। जल्दबाजी में ऐसा लिखने से ऐसा लग रहा है जैसे मैं खुद के लिए कह रहा हूं।

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  6. अज़दक "बेस्‍टमबेस्‍ट" है!!!

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