Monday, December 17, 2007

जिसके बिना काम नहीं चलता..

ऐसी लिस्‍ट नहीं बनायी है, हालांकि जब भी ऐसे मौके बने हैं तब आम तौर पर हुआ यह है कि लिस्‍ट ही हमें बनाती-सी लगती हैं! लिस्‍ट में हम कुछ हसरतों-सा ठेलने लगते हैं. माने कि वर्ष में दो बार पैरिस और तीन बार काहिरा गए से काम चलेगा, या क्‍या दो हज़ार पाउंड किसी यात्रा-खर्च के लिए पर्याप्‍त होंगे टाइप. फिर अडिशन-सब्‍स्‍ट्रेक्‍शन के झमेले. या फिर कुछ ऐसे मद जो खुद लिस्‍ट में ठिलने लगते हैं. मसलन सोनाली या बर्नाली का हुंकारी के स्‍वर में सवाल करना कि हम? हमारे बिना चल जाएगा? काम? तुमि की पूरा-पुरी कॉ‍न्फिडेंट? ऐं, की बोलछो की?..

तो फिर लिस्‍ट तैयार करने का मज़ा क्‍या! एडवेंचर से ज़्यादा वह भय की तस्‍वीर बनने लगती है. ऐसे ही सोच लेना ज़्यादा सुकूनदेह है कि किसके बिना चलेगा किसके बिना नहीं. सोनाली-बर्नाली सवाल करें तो जवाब देने की नहीं बस मुस्‍कराने की ज़रूरत पड़ती है. आप अपना मतलब कन्‍वे कर दें, वह अपना आकलन गेस करके अकुलाती-लड़ि‍याती रहें. लात-हाथ या प्रेम के अन्‍य मार्मिक क्रिया-व्‍यापारों की नौबत नहीं आती. दिन शांत बना रहता है. आदमी तसल्‍ली से सोचता रह सकता है कि किसके बिना चलेगा, किसके बिना नहीं चल पाएगा. सुबह उठकर नहाने, बाबा मार्क्‍स का एक और पंडित राहुल सांस्‍कृत्‍यायन के तीन निबंधों के परायण के बिना? आपका मालूम नहीं, मेरा चल जाता है. सोचता था नहीं चलेगा लेकिन देख रहा हूं इन दिनों पेपर के परायण के बिना भी चल जा रहा है (सोनाली-बर्नाली तो नाराज़ हैं ही कि पूरे तीन दिन उनसे व्‍यौहार-मनुहार के बिना मैंने खींच लिया है. बेचारी-सुकुमारी-मारी बड़ी ही खिंची-खिंची-सी हैं. मैं भी तना-तना-सा हूं, वर्ना नदी के द्वीप के भर्र-भर्र नाला हो जाने में ज़रा वक़्त नहीं लगेगा. लगेगा?)..


कलम? कागज़? क्‍या ज़रुरत है? आदमी को लिखने के लिए एक अदद चेकबुक से अलग किसी दूसरे कागज़ की क्‍यों ज़रुरत होनी चाहिए? मुझे नहीं लगता होनी चाहिए. हवाई चप्‍पल? चप्‍पल, जहाज़, योजनाएं जिस-जिसके पहले हवा और हवाई का जुड़ाव होता हो, मेरे ख्‍़याल में ज़रूरी हैं. नहीं हैं? सपनों की? नहीं. सपने गलत हैं. जैसा वक़्त है ये आसानी से स्‍वप्‍न दु:स्‍वप्‍न में बदल सकते हैं. हर सूरत में उनसे बचने की ज़रुरत है. तकिये? तकियों के बिना नहीं चल सकता. तकिये तो चाहियें. तीन-चार. ज़्यादा हों तो भी चलेंगी. पसलियों के पीछे, कांख के नीचे. पैरों के बीच. कहीं भी फंसाकर अच्‍छा लगता है. आपको नहीं लगता? अरे? आपके-हमारे बीच एक तकिया तक नहीं, फिर हमारे बीच है क्‍या? वेरी सरप्राइज़िंग. रियली! क्‍योंकि कमेंट्स के बिना मैं दिन बिता लेने की सोच सकता हूं, तकियों के बिना नहीं (कमेंट्स न पाकर अंतत: मैं स्‍वयं को क्‍वेश्‍चन कहां, आपकी समझ व सोच-सामर्थ्‍य को करता हूं)..

यूं ही कमेंट्स की बात निकलवाकर आपने मेरी सोच का क्रम गड़बड़ा दिया. बखूबी मेरा इस गड़बड़ाये क्रम के बिना काम चल सकता था! अब? क्‍या कहने को बचा है सिवाय इसके कि मेरी याद में आप नय्यरा नूर की उदासी गायें, मैं राय कूडर और मानुएल गालबान बजाऊं. ओह.




3 comments:

  1. "आदमी को लिखने के लिए एक अदद चेकबुक से अलग किसी दूसरे कागज़ की क्‍यों ज़रुरत होनी चाहिए?"

    कम्प्यूटर टर्मिनल (ऑनलाइन ट्रांजेक्शन), प्लास्टिक मनी (डेबिट, क्रेडिट कार्ड)के जमाने में चेक के लिए भी काग़ज की कौनो जरूरत नाही... हाँ, कमेंटवा की बात दीगर है. और तकिया... वो तो एम्बेडेड है!

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  2. संगीत अच्छा लगा । धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

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  3. एक बार यहाँ आ जाने वाले का यहाँ आये बिना काम नहीं चलेगा... this is for sure!!!

    चरणस्पर्श प्रणाम!

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