Thursday, December 20, 2007

सौ चूहे खाकर बिल्‍ली पतनशील हज पर चली..

सेंचुरी सेलीब्रेट करने की अपने यहां परंपरा रही है. ज़्यादा गिरे हुए पचास पहुंचते ही थाली, कलछुल पीटना शुरू कर देते हैं. मैंने नहीं पीटा. सौ पहुंचकर भी नहीं पीटा. जेनुइन पतनशील लीक की स्‍थापना नहीं होती. लोग कहते (माने वही गिने हुए आठ) कि देखो, अपने को पतनशील लगाते थे और इतनी-सी बात पर (माने सौ पहुंचने पर) फुदकने लगे (फिसलने लगे. हें हें हें) ! सही बात है. फिर यूं भी मैं प्रगतिशील लोगों के मुंह नहीं लगना चाहता. उलझना नहीं चाहता.

हालांकि निर्दोष-सी इच्‍छा थी कि पतनशीलता आंदोलन बने, सालाना न सही छमाही गौहाटी, गजपुर में कैंप लगें, सभापतित्‍व पाकर व असमी सुकुमारियों के कर-कमलों से गले में माला वारकर, उनके मीठे बोझ हाथों में धारकर उन्‍हें उपकृत करूं. वह सब नहीं हुआ. हिमाचल और पंजाब की रहने दें, राजस्‍थान पुलिस भी हमें नहीं खोज रही! लंदन, जोहानेसबर्ग की क्‍या कहें, बिहार शरीफ विश्‍वविद्यालय तक ने अपने अंडर ग्रेजुएट कोर्स में पतनशील साहित्‍य नहीं चढ़ाया है, न हमसे पैसा खाके चढ़ाने को सोच रही है. न इस विशेष मद में पैसा खिलाने को लोगों ने हमारे एकाउंट में पैसा पूल किया है. पतनशीलता के जो थोड़े बहुत हाफ़-हार्टेड कन्‍फ़्यूज़्ड, डिसओरियेंटेड प्रहरी थे, नौकरियों ने उनका ख़ून जलाकर उन्‍हें यू भी किसी काम का नहीं रखा है. ऑथेंटिक पतनशील तो नहीं ही रखा है. फिर इन भाईयों को अभी भी इसका भय है कि पतनशील पोस्‍टर पर इनके मुख-राशि का कटआऊट फबेगा या नहीं? अबे, इसी दो कौड़ी आंतरप्रेनुअरशिप के बूते पतनशीलता को आगे बढ़ाने, ठेलने का सपना देख रहे थे? हद है, अनामदास, यू बिट्रेड मी, मैन! या तो आप जेनुइनली अनोनिमस रहो या फिर अपने को पतनशील मत कहो!


पतनशीलता की ज़रा-सी कहीं रोशनी नहीं ऐसे में आदमी क्‍या खाक़ सेलीब्रेट करे? किसके बूते करे? अभय जैसों रेनेगेड्स को लाईन में खड़ा करके करे? यू टू, रवीश, फॉर वन्‍स यू कुड हैव बीन जेनुइनली रबिश? लेकिन अब तक प्रगतिशीलता की पूंछ थामे ऐसों के लिए अभी गुजरात के सिवा और कहीं कुछ कहां दिख रहा है? मैं और पतनशील आंदोलन तो नहीं ही दिख रहे. ओह, इट ब्रेक्‍स माई हार्ट! ऐसे में क्‍या लिखूं, किस चीज़ से लिखूं? मगर शुद्ध एक पंक्ति न लिख सकनेवाले जहां दिन में बाईस पंक्तियां लिख रहे हैं, मैं चुप बैठा रहूं? एक बैलेड की भूमिका तक न लिखूं? एक ऑथेंटिक पतनशील म्‍यू‍ज़ि‍कल की ओपेनिंग? व्‍हॉट डू यू सजेस्‍ट, अभय? देखिए, ऐसी नाज़ुक घड़ी में अपना नाम सुनकर इस व्‍यक्ति का चेहरा कैसा सफ़ेद-ज़र्द पड़ गया? ओह, डोंट बी सच ए पुट ऑन, बी ए मैन, मान! ओके, लेडीज़, मिस प्र, आप ही बताओ! व्‍हॉट? व्‍हॉट इज़ द पॉयंट, दे आर ऑल इल्लिटरेट? भई, एज़ इफ़ आई डोंट अंडरस्‍टैंड, भई, ऐसा चिरकुटी अंधेरा है इसीलिए तो इस डार्न डार्कनेस में पतनशीलता की जोत जलानी है? यू डोंट अग्री? फ़ाईन, यू मिस बी, वोंट यू रेकमेंड सम अमेजिंग जेसुदास नंबर टू चियर अप द ओकेज़न? ‘आज जाने की ज़ि‍द ना करो, यूं ही पहलू में बैठे रहो..’ ? हे, हे, लेडी, हाऊ द अरब वाईरसेस हैव इन्‍फेक्‍टेड एंड अफेक्‍टेड यूअर इमैजिनेशन.. यू आर मिक्सिंग फनी फ़रीदा ख़ानम विद जेनुइन जेसुदास? ओह, हाऊ हार्ट रेंचिंग!..

अबे, यारो, नथिंग टू सेलीब्रेट द सेंचुरी दैन? ओके, आई एंड अप विद् ए पीस ऑव माई ओन. नथिंग लेस दैन ए जुएल ऑफ ए पतनशील पोयम (लात नहीं खानी तो जस्‍ट एक्‍सेप्‍ट एंड अप्रीसियेट इट!)..

लिखो, लिखो, लिखो. दिन के बीच दिन के बाहर लिखो. सुबह लिखो सुबह को तोड़कर लिखो, जब नहीं हो समय जोड़कर लिखो. घोड़े घड़ी घमंडी पर लिखो, बचा रह जाये तो दालमंडी पर लिखो. चंडी चिरकुंडी ‘हाय, यहीं तो रखा था, नहीं मिल रहा, जी?’ की खोयी हुई दंडी पर लिखो. सोचते हुए सोचने के पहले, नींद में दबे हुए खुद से पके हुए थकी अकुलाहट में, अलबलाहट में लिखो. अ- ल- ब- ल लिखो लिखो. मुंह में लार हो बथता कपार हो सपने में सियार हो, अंतत: सिरे से सिरे तक खालिस चिरकुट व्‍यौपार हो, बीच में लाज मत लाओ बाज मती आओ, लिखो, ठेलकर लिखो.

3 comments:

  1. अधोगति की ओर जाती बधाईनूमा टिप्पाणी स्वीकारें.

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  2. आपकी पतनशील पोयम से अति पतनशील प्रेरणा पाकर मैं भी जुट रही हूं जी अपने अधमशील खयाल !पतनोन्मुखता काबिज रहे !आमीन !!

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  3. नॉट जेनुइनली पतनशील इवन ! सौ की पुराई में इतनी साजसज्जा ? आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी भई !
    पोयम पतनशील पताका ! ज़रूर ज़रूर !

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