Wednesday, December 26, 2007

पेट, लड़की और भूख..

- अबे, ठेल-ठेलके खाओगे, कुत्‍ते की मौत मरोगे!

- न ठेलके न खाकर कुत्‍ते की मौत न मरेंगे?

- संशयग्रस्‍त कुत्‍ता-विमर्श, प्राचीन चीन संग्रहणी, भाग: तीन, खंड: सात.

लड़के को गोद में रोते बच्‍चे को चुप कराने के खेल से हमेशा भय रहा लेकिन लड़की छोटी थी जभी से फूले पेट पर हाथ फेरते हुए गर्व से आसपास के संसार को देखने का अरमान पाले थी. और अंतत:, बीस वर्ष बाद, अब जब अरमान लगभग पूरा होने के कगार पर था, ढेरों ऐसी चीज़ें थीं जो लड़की में संशय जगा रही थीं. बैलून की तरह फूलते जाते अपने देह को बिछौने से उतारने और बिछौने पर लिटाने में उसे घबराहट होती कि वह उसका अनिष्‍ट कर डालेगी. बहुत सारे अनिष्‍टों की आशंका में वह भरी-भरी भुरभुराती रहती. मगर इन सब दुविधाओं से ऊपर सबसे बड़ी चिंता थी वह अपनी क्षुधा कैसे शांत करे. लड़का भी काम से घबराया घर लौटता कि कहीं लड़की भूख से कातर छटपटायी तो नहीं बैठी हुई!

धीरे-धीरे सेब कुतरती (सेब के बाद संतरे की फांक, और उसके अनंतर काजू के टुकड़े, फिर गाजर का हलवा, फिर..) लड़की सोचती क्‍या ऐसा कोई क्षण होगा जब वह भूख को पार पा लेगी? मगर कहां पा पाती. जहां कहीं जाती, बेहया व नंगी भूख वहां पहले ही पहुंची होती. धीमे-धीमे डोलते देह वह लड़के के लिए नाश्‍ता तैयार करती और चिंता करने लगती लेकिन दोपहर के खाने का क्‍या? नहाने के लिए जाते हुए बिस्‍कुट साथ लेकर जाने का मन होता. ज़रा-सा सुस्‍ताने के लिए लेटी हुई लड़की को मन होता बाजू में केले का हौदा होता तो वह छील-छीलकर केला खा लेती. या इमरती या लड्डुओं की तश्‍तरी? लड़का रात को बगल में लेटा मज़ाक करता नींद न लगे तो मुझे जगा लेना. ऐसा न हो सुबह उठूं और कनपटी पर कान न हो.

- क्‍यों कान न हो?- लड़की सवाल करती.

- इसलिए कि भूख से रात में कुतरकर तुम हजम कर चुकी होंगी! हंसते हुए लड़का लड़की को छेड़ता. लड़की बुरा मानके कहती- अच्‍छा तो मैं राक्षस हूं? और क्‍या-क्‍या खाके तुम्‍हारा हजम कर जाऊंगी वो सब भी बता दो ज़रा?

- भई, कुछ भी खा सकती हो, लड़का हथेली पर पेंसिल बजाता चेहरा गंभीर बनाकर कहता- कुर्सी, कपड़े, तकिया, जूते, घड़ी, हैंगर, परदे..

लड़की फूले हुए मुंह को और फुलाकर बुरा मान लेने का अभिनय करती दूसरे करवट हो लेती. दूसरे करवट आंखें मूंदे गंभीरता से सोचती यह सब खा लेने पर उसकी क्षुधा शांत हो जायेगी?..

7 comments:

  1. एक ही सवाल है.....यह वाली मन की गाँठ पतनशील कैसे हो गई?!

    बहरहाल पोस्ट बहुत पसंद आई

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  2. आपकी संगत में मन की जो-जो जैसी-जैसी गांठ न बन जाये.. पतनशील तो बहुत कम है!

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  3. avasthaa ki maang..koi karey bhi to kya kare....aapki lekhni...bahut kuchh purana mun me dol gaya...

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  4. वैसे यह वाली भूख बडी सच्ची है ....बाकि आपके यहाँ आकर सब कुछ खुद ही पतनशील हो जाता है ।

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  5. भूख को बहुत सही दर्शाया है । परन्तु बहुत सी स्त्रियाँ उस समय चाहते हुए भी नहीं खा सकतीं और यही भूख कुछ महीने बाद इससे भी विकाराल रूप में सामने आ खड़ी होती है ।
    घुघूती बासूती

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  6. और घर आसमान पेड़ चिड़िया फूल पत्ती धूप खुशबू ... ये सब खाने से ? बुढ़िया के बाल और डंडे पर लट्ठो , दुनिया जहान नीला आसमान ? थोड़ी सी रुलाई और हँसी के आँसू ? ये खाने से ?

    (ओह ! कैसा अनोखा अजूबा बच्चा पैदा हो रहा है आखिर ? )

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