Thursday, December 27, 2007

किस रास्‍ते, कौन पगडंडी..


किसी सुलझे-दुनियादार घोड़े से पूछूं, किस सफ़र के आख़ि‍र में मिल जायेगी शांति, जानता होगा मेरे सुख का राज़? या इतिहास से साबूत रह गयी रंग खोयी कोई डोंगी जो करवायेगी पार सभी मुश्किल, घनघोर रात? महीन सुबह की कोमलता में कौन संकेत पढ़कर किस पगडंडी कौन रास्‍ते निकल चलूं कि चमकते आकाश के नीचे मिले ज़रा निर्दोष ज़मीन का टुकड़ा?

नर्मदा तीरे क्‍या बुदबुदाते हैं बाबा, सचमुच गुल खिलायेगा गंडा? या वैष्‍णो देवी के रास्‍ते क्‍या ज़ाहिर कर देना चाहती है उस बदहाल कुली की मुस्‍कान? ओह, मराकेश के कहवाघर में पढ़े जा रहे अख़बार में छिपा है मेरे सुख का भेद, या आर्मेनिया के किसी निर्जन गांव के बदरंग गिरिजाघर की निपट ख़ामोशी में? उत्‍तर-पूर्व का वह लड़का बार-बार क्‍यों मुस्‍कराता है, पिघलते मोम की तरह धीमे-धीमे चांदनी क्‍यों मेरे पलकों पर जलती उतरती जाती है? जंगली एक हाथी हंसता पत्‍तागोभी के खेत में भागता है, एक नन्‍हा साही मेरे किताबों के झोले से सिर बाहर निकाल हैरत से झांकता है.



2 comments:

  1. मस्त बिम्बों का पोस्ट मस्त है, पर साथी जो संगीत सुनवा रहे हैं उसका संदर्भ तो दिजिये, पहला वाले का संगीत मध्धम होने के साथ मधुर है,दूसरे में आवाज़ किसी अलग ही दुनिया की लगती है,उस दुनिया से हमारा भी प्रिचय काराया जाय !!

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  2. किस पगडंडी कौन रास्‍ते निकल चलूं कि चमकते आकाश के नीचे मिले ज़रा निर्दोष ज़मीन का टुकड़ा?

    क्या बात है! वैसे जिधर निकल पड़ेंगे आप वो ही रास्ता राही के प्रताप से निर्दोष ज़मीन के टुकड़े तक ले जाएगा!

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