Monday, December 10, 2007

जो नहीं है उसे हममें ठेलने की कोशिश न करें!..

भारत बेहतर हो रहा है कहां-कहां हो रहा है? इकॉनमी के चार प्रतिशत क्षेत्र में?.. सर्विस सेक्‍टर में? बिहार का एक लड़का मिनमिनाये स्‍वर में कहता है बिहार में सड़कें बन रही हैं, विकास हो रहा है. जिन लोगों ने कभी नगद देखा नहीं था वो बैंक में अकाउंट खोल रहे हैं.. ज़्यादा अंदर पहुंच गए हैं, जो नहीं पहुंचे मॉल के बाहर टहल रहे हैं (कोई किताब खरीद रहा है? नहीं, हम किताब खरीदने और पढ़नेवाली संस्‍कृति नहीं हैं.. हम उपवास रखने और धर्म के नाम पर थुरा व थूर देनेवाली संस्‍कृति हैं.. हमरे इसके और उसके खिलाफ़ कुछ बोले, साले, तो देह की यहीं भुरकुस निकाल के रख देंगे, हां?).. हम नाला पार करके नाले के पिछवाड़े पिकनिक मनाके सुखी हो जानेवाली संस्‍कृति हैं.. एक दशक पहले तक इंजीनियरिंग और मेडिकल में जोंक की तरह क्‍लायंटेल से चूस-चूसकर शहर में सबसे जल्‍दी बड़ा मकान पीट लेनेवाली.. और अब सर्विस सेक्‍टर की इकॉनमी मैं पैसा खींच-खींच कर सबसे अलग बन जाने और वहीं बने रहने में गुमान महसूसने वाली संस्‍कृति हैं. खाने के स्‍पॉट्स बदल गए हैं, देह के कपड़ों के लेवल भी. घर का डेकॉर और घर के बाहर की गाड़ी. अंतर्मन का विस्‍तार, माथे की चिंता का परतदारपना.. विवेक की डेंसिटी? वह सब क्‍या होता है? उस सब के होने व हमारे उसमें होने की कोई आवश्‍यकता है? क्‍या अंतत: संसार से इस सारी बौद्धिकता का बाजा बजाकर उसे किसी रीसायकल बिन में डालकर हम उसे भूल जानेवाले नहीं?

क्‍या करेगा कोई भारतीय कार्ल लेवी स्‍त्रास, रोलां बार्थ, एरिक हॉब्‍सबाम, एडवर्द सईदों का? हमें दोपहर में दाबकर खाने और फिर सोने की आदत है. पढ़ने की मजबूरी ही होगी तो हम बैंकवाला कागज़ पढ़ने को पड़ा है. आपका पोस्‍ट पढ़ लिये इतने में ही सिर पिरा रहा है. लोकप्रिय लिबिर-सिबिर नहीं लिखना तो हिंदी में काहे लिखते हैं? हमारे हिंदी में ऐसा परायापन ठेलने की कोशिश न करिये.. हमारी संस्‍कृति में नहीं है.

5 comments:

  1. जहाँ खास लोग हों वहाँ आम जनता को ठेल कर आप क्या प्रूव करना चहते हैं ? हद है ! हद ! आखिर इतनी कचर मचर भीड़ बढ़ा कर क्या मिल जायेगा ? एक्स्लूसिविटी खत्म नहीं हो जायेगी ?आपके इतने चिंतन का आखिर क्या फायदा ? ऊपर वहाँ बौद्धिक धरातल पर बहुत थोड़ी ज़मीन है ।

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  2. http://vikashkablog.blogspot.com/2007/08/blog-post_08.html

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  3. बतिया आपकी ठीके होती है,पर एतने से काम चलने वाला मुद्दा तो अच्छा उठाए हैं पर थोड़ा तफ़्सील की ज़रूरत दरकार है, गूढ्भाषा में अगर कोई समजाता भी है तो घुरमी आने लगता है, ईहे बतिया कुछ अईसे समझाइये की हमहूं चार लोगों को समझा पांवे !!!!

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  4. आप अपनी बात कहने में इतनी क्लिष्टता क्यूँ ले आते हैं आखिर ?

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  5. "विवेक की डेंसिटी"
    पहली बार ना जाने कैसे यह ध्यान में नहीं गया। इसका पेटेंट करवा लीजिये,कुछ भी हो सकता है कोई इसी को मार्केट कर मालामाल हो जाये।

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