आदमी (या औरत) अपने को बर्दाश्‍त करते रहने के सिवा और क्‍या-क्‍या बर्दाश्‍त कर सकता है? माने एक सवाल है आदमी (या औरत) ब्‍लॉग कब तक झेलता रह सकता (या सकती) है? मेरी दाढ़ी की ही तरह आखिर हर चीज़ की एक उम्र होती है, नहीं होती? (नहीं, मैं बेनज़ीर की समझदारी की उम्र की नहीं बात कर रहा. वॉज़ शी रियली सेन एनफ़ टू रिटर्न टू पाकिस्‍तान? अबॉव दैट, देन, मूव अराऊंड इन पब्लिक? कुडंट शी कंडक्‍ट द होल ‘एफ’ इलेक्‍शन बाई स्‍टेइंग इनसाईड सम पैलेस एज़ स्‍टेट गेस्‍ट? ये सारे सवाल मेरे लिए उसी तरह रहस्‍य हैं जैसे प्राचीन पाली या अभिषेक बच्‍चनों-से रिटार्डेड्स पर उमड़ती आपकी लड़ि‍याहटें..). एनीवे, पाकिस्‍तानी डेमोक्रेसी के जो ब्‍लॉक्‍स हैं वह पाकिस्‍तान सेटल करेगा मगर ब्‍लॉग का सवाल तो हमारा- मेरा.. गुजर रहे साल के अंत और नये की शुरुआत का सवाल है. क्‍या अगले वर्ष भी मैं यूं ही पतनशीलता के हाथ (और पैर) चलाता रहूंगा? और आप हें-हें, ठें-ठें करते (या नहीं करते) रहेंगे? डज़ंट इट साऊंड एब्‍सर्ड? वेल, टू मी इट सर्टेनली डज़! हर चीज़ की उम्र के साथ एक हद भी होती है. आदमी (या औरत) आखिर कितने वक़्त तक ‘ओहो, ब्‍लॉग!’, ‘अहा, ब्‍लॉग!’ करते हुए एक्‍साईट रह सकता है? और बावजूद ऐसी चिरकुटइयों के आदमी (या औरत) बना रह सकता है? इस देश में सब जानते हैं सब संभव है मगर क्‍या ब्‍लॉगवर्ल्‍ड में भी वही सब रिपीट होगा? कि लोग कचर-कचर करते रहेंगे और बात निकलेगी तो कहीं दूर तक नहीं ही जायेगी?

कितने सारे सवाल हैं और ब्‍लॉग में जो है कहीं किसी का जवाब नहीं है. ब्‍लॉग के बाहर भी कहां है. दोस्‍त, समाज, साहित्‍य, गली हर कहीं ठुल्‍ला-ठेलईगिरी छाई हुई है. कोई सही सवाल पोज़ नहीं कर रहा. पोज़ कर भी रहा है तो जवाब के लिए बगले झांक रहा है या मेरे तीन वर्ष पहले लिखे पोस्‍ट का संदर्भ क्‍वोट कर रहा है. हद है. भई, जब तीन वर्ष पहले मैं इतना फालतू नहीं ही था कि ब्‍लॉगिंग करता बैठूं तो मेरे तीन वर्षीय पोस्‍ट को संदर्भित करने का क्‍या तुक है? हर वक़्त मुंह बजाते रहने और की-बोर्ड टिपियाते रहने का भी है? क्‍या हम कुछ समय के लिए चुप नहीं रह सकते? क्‍या पोस्‍ट दर पोस्‍ट लिखते हुए ही दर्शाया जा सकता है कि हम कितने बड़े चिरकुट हैं, चुप रहकर भी तो हिंदी समाज में इस लक्ष्‍य की प्राप्ति होती रही है?..

मैं बाज आया, सचमुच. नये वर्ष में (किसी भी सूरत में.. चाहे कहीं से हरे पत्र प्राप्‍त हों चाहे प्रेमसने पत्र!) वे सब चूतियापे नहीं करने हैं जो कंप्‍यूटर के मुंह से पोस्‍टरूपी पीक थुकलवाती रहे! एनफ़ इज़ एनफ़! भाई (या बहन), आप अपने घोड़े (या खच्‍चर) मज़े में दौड़ाते रहो पर अपन अपने बैल को ज़रा आराम देने का इरादा रखते हैं.. !

 
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क्या मैदान छोड़ कर भागने का इरादा है? चाहे साप्ताहिक ही, पर डटे रहो। बात दूर तक भी जाएगी।

Srijan Shilpi - December 29, 2007 6:09 PM

कुच्छो साबित नहीं करना चाहते। आपकी समझदारी लौट आई....धीरे-धीरे दूसरे ब्लॉगर भी समझ जाएंगे। काहे टेंशन लेते हैं।

मीनाक्षी - December 29, 2007 7:44 PM

प्रमोद जी, नमस्कार ! आपके ब्लॉग पर आना जैसे जंतर-मंतर में आना या क्रिस्टल मेज़ में आना पर फिर भी आना और भटकना अच्छा लगता है. नए वर्ष में कुछ नया पढ़ने की आशा है, उत्सुकता है.. (आराम हराम है)
नए वर्ष की शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिए.

Vipin - December 29, 2007 8:27 PM

bhayi kya ho gaya. itne kyon ukhad rahe hain. blog ke bare mein to aap jaise aadmi ka na nirash hona hi ashcharya janak hota. han saval uthane vale jaroor honge, lekin shayad hum vahan tak pahunch nahin pa rahe.
vipin

Mired Mirage - December 29, 2007 9:15 PM

मीनाक्षी जी से सहमत हूँ ।
घुघूती बासूती

डा० अमर कुमार - December 29, 2007 11:40 PM

प्रमोद जी,
आपसे आग्रह है, कि जब आप इतने सारे चूतियापों के बीच जीने को मज़बूर हैं, तो यह सितम भी झेल जाईये । this life is full of idiosyncrasies, so enjoy this Chootiyaapa ! Shakespears once wrote- Life is a tale, full of sound and fury, signifying nothing . मैं नहीं समझता कि आपको इतना परेशान होने की ज़रूरत है । मुफ़्त का चंदन ,घिस मेरे लल्लू को जीवनसूत्र मानने वाले बहुतेरे जन मिल जायेंगे । सही फ़रमाया आपने ब्लागिंग को उगालदान का दर्ज़ा देने की होड़ सी लगी है , बस ठेलमठेल ! उनकी अपनी सोच पर आप लगाम लगाने में अक्षम भले ही हों, लेकिन माऊस तो आपके हाथ में ही होती है । आप अपना स्तर बनायें रखने को कृतसंकल्प रहें, यही बड़ा योगदान होगा । इतना हताश और आक्रोशित होने की आवश्यकता अभी नहीं है । अनुज -
अमर कुमार

Sanjay - December 30, 2007 2:31 AM

किसी ..... की बात पर ध्‍यान नहीं देना प्रमोद जी. अगर कोई फैसला किया है तो उस पर जमे रहें. मैं आपके साथ हूं. नया साल मंगलमय हो.

Prem Chopra - December 30, 2007 4:58 AM

ब्लागिंग शुरु कर के आप महान नही हुए थे और ना छोड कर होंगे - करते रह कर भी कुछ उखाड नही लोगे.. जाना ही है तो जाओ मुन्ना लेकिन बाकियों को जाते जाते लतियाने की कोई जरूरत नही है!

डा० अमर कुमार - December 31, 2007 3:21 PM

अरे तुम तो यथा नाम, तथा गुण !
बड़े तीखे मिज़ाज़ हैं आपके तो ?
मैं लपक पड़ा ,आपकी दुकनिया की तरफ़, लिंक पकड़ के । लेकिन आप तो सिर्फ़ लिंकै पकड़ाये जानत हौ, ऊहाँ तो कुच्छौ नहीं है ।
ई उखाड़े पखाड़ै की बात गलत है, शिरी चूपड़ा जी !
जब सब लोग उखाड़ने उखड़वाने पर ही आमदा हो जायेंगे तो ईहाँ बचबै का करेगा ।
हम तो पहिले ही कह दिये हैं , जब हथवा में चूहा पकड़ै हो, तो कोनो नेयोता भेजे रहा ईहाँ आवै का ?
भाषाप्रयोग की शहूर नहीं अउर उखाड़ै पर आमदा ! बहुतै मिल जएहैं बिरादरी मा, कोनो आपै उखाड़ै को बचे हो ?
अनक्वालिफ़ाईड हुईगै, आप तो !

अरुण - March 24, 2008 3:51 PM

सबसे ज्यादा पोस्ट ठेलू आपही हो ,आपही इस कार्य की तकलीफ़ देह पडताल मे लगे थे आप ही दहाड रहे थे,तो आज काहे मिमियाय रहे हो जी..?
हम तो कल भी मस्त थे आज भी है कल भी रहेगे

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