Thursday, December 20, 2007

लोग भूल गए हैं..

लोग भूल गए हैं. कम से कम मैं तो रहा ही हूं. अब जैसे आज ही देखिए, क्‍या नाम है उनका.. देखिए, भूल रहा हूं, शिकायत करने लगे कि क्‍या महाराज, आजकल कमेंट-वमेंट नहीं करते? मैंने कहा- यार, और कुछ नहीं, बस भूला हुआ हूं. आज यूं ही टहल करने की गरज से निकला, एक ब्‍लॉग की खिड़की खुली, देखकर भुनभुनाहट हुई कि यह सब क्‍या चिरकुटई लिखी जा रही है. झल्‍लाहट में ऐसा ही कुछ कमेंट लिखने जा रहा था कि नज़र गई कि ससुर, यह तो अपना ही ब्‍लॉग है! सचमुच भूल रहा हूं. सिर्फ़ पुरानी चि‍ट्ठि‍यां ही नहीं हैं, एक समूचा जीवन है जो हाथ से सरका-खिसका जा रहा है! और भाई लोग हैं अपने कमेंट को रो रहे हैं! कुछ शरम करो, यार. शरम नहीं रहम ही करो!

मगर इस भूले हुए से क्‍या कुछ का क्‍या कुछ लिख गया तो? इस कैंप से उस कैंप की हेरा-फेरी हो गई तब? जैसलमेर से कोई पत्र लिखकर कहे बड़ी विचारप्रवण, प्रवर और जाने क्‍या-क्‍या अर लिखा आपने, मन में उमंगों की तरंगें उठने लगीं, हिलोर झकझोर भरने लगे आदि-इत्‍यादि तब? फिर मैं अपना इतना-सा मुंह लेकर किधर जाऊंगा? या जितना-सा भी है लेकर कहीं नहीं भी कैसे जाऊंगा? क्‍यों भूल रहा हूं? क्‍या उम्र पीछे से आकर हाथ मार रही है? अपना अकाउंट नंबर और पासवर्ड तो याद है लेकिन? और हाल के महीनों और तेईस वर्ष पहले जहां-जहां और जिस-जिसने लंगी लगाई थी, वह भी? तब? क्‍या यह भूलना सिर्फ़ ब्‍लॉगकेंद्रित, ब्‍लॉगसीमांकित है? ऐसा किसने क्‍या लिख दिया और मैंने पढ़ लिया कि स्‍मृति इस हिंसा व वीभत्‍सता से हाथ-पैर छोड़ने लगी? कौन लोग हैं जो इस तरह तोड़फोड़ फैला रहे हैं? पहले से ही लतियाये हुए मुझ-से निष्‍पाप को सता रहे हैं?


ओह, दुनिया किस तेजी से बदल रही है. क्‍यों बदल रही है? अभी वर्ष भर भी तो नहीं हुआ हमें आये हुए और क्‍या से क्‍या हो गया (किस बेवफ़ा के प्‍यार में?). मैं भूलना नहीं चाहता, रियली. लेकिन रहा हूं.. इट्स ए फैक्‍ट.. क्‍या? आपने क्‍या नाम बताया अपना?

5 comments:

  1. भूलना भी एक कला है
    आप तो अपने ब्लॉग को भूले हैं
    लोग तो अपना नाम भूल जाते हैं
    सब्जी खरीदते समय बीवी को कहते हैं
    बहनजी, आपको लगता है, कहीं देखा है ?

    आप मुझे भूल गए क्या ?
    वैसे अभी मैंने अपना नाम नहीं बताया है
    छिपाया भी नहीं है, अभी नहीं बाद में भूलेंगे
    जब स्मृतियों के हिंडोले पर कूदेंगे झूलेंगे भूलेंगे.

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  2. सुकून मिला यह पढ़ कर कि अपने जैसा भूलने वाला एक मनई तो है जो ऑनेस्टी से यह मान ले रहा है!

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  3. हम तो आपको पहले भी नहीं भूले थे और आज भी नहीं भूले है.
    पर आप ही हमे........... क्या किया जा सकता है शायद उम्र का तकाजा हो? लेकिन क्या सिर्फ़ उम्र ही बाधक है या हो सकता है नहीं भी पर फ़िर भी भूले तो है. कभी नाम भूल जाते है कभी काम भूल जाते हैं पर हाँ भूलना जरुरी है. लेकिन ये मानना तो नही भूल सकते कि हम कुछ भूल रहे हैं.

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  4. सही पकड़ा है भाई बालकिशन आपने
    सब कुछ भूल जाएं पर कैसे भूलेंगे
    कि हम कुछ भूल रहे हैं,अर्थ है इसका
    स्मृति विलोप नहीं हुआ है, बस कुछ
    सैटिंग रिसैटिंग जैसा ही है,सत्य है
    फार्मेट की जरूरत नहीं और दिमाग
    के मामले में यह सुविधा उपलब्ध
    भी नहीं है।

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  5. मेरे नाना कहते थे कि वे भूलना चाहते हैं, अभ्यास करते हैं भूलने का और इसलिए भूल जाते हैं बहुत सारी ज़रूरी गैर ज़रूरी बातें, कि ढेर सारी चीज़ें याद रहे तो नए के लिए जगह कहाँ से बनेगी, मस्तिष्क की कैपेसिटी तो लिमिटेड होती है न.…
    यह पोस्ट पढ़े तो नाना की बातें याद आयीं!
    "मैं भूलना नहीं चाहता, रियली. लेकिन रहा हूं.. इट्स ए फैक्‍ट.."
    and this fact makes you great, Sir!

    चरणस्पर्श प्रणाम!

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