Wednesday, December 26, 2007

लाइफ़बाय की टिकिया, कि कड़ुआ तेल?..

प्रेमी जो अपने को अबतक प्रेमी समझने की गलती किये हुए था (हमेशा करता रहा था, और शायद इसीलिए, दूसरों के लिए ही नहीं, लड़की तक के लिए हास्‍यास्‍पद था. लड़की- जिसके घर का नाम शारदा वर्मा था- अपने को प्रेमिका महसूस अवश्‍य करती थी, किंतु नितांत दूसरे महीन, मुलायम व लुभावने संदर्भों में. गुलकी बुआ की शादी के दौरान दूसरे माले के भंडारे के अंधेरे में तथाकथित प्रेमी के जोर-जबर्जस्‍ती के समक्ष एक अप्रीतिकर दैहिक प्रसंग जो लड़की ने स्‍वेच्‍छा से घट जाने दिया था, सिर्फ़ उसी बिना पर वह सुरती खाने व हवाई चप्‍पल धारण करनेवाले किसी बिंदेश्‍वरी को अपना सर्वस्‍व मानने से पूरी तरह इंकार करती थी. ऐसा शारदा ने उसे नमकीन चाय पिला और बेनमकवाली तरकारी खिलाकर ज़ाहिर करने की कोशिश की भी, लेकिन प्रेमी ने इन निर्मम संकेतों को मीठा चरणामृत समझ पी लिया, और मदहोशी पर ज़रा भी आंच आने नहीं दी.. प्रेमिका के रसीले खेल मान सांकेतिकता के नये मुहावरों में सज्जित, संजोये रखा). शारदा के बड़े भाई विष्‍णुप्रताप के लिए ‘बिंदेसरी’ प्रेमी नहीं वह थैली था जिससे उसकी उपस्थिति में सुरती झड़ती, या जिसे रास्‍ते में कहीं रोककर उसकी साइकिल उधार ली जा सकती. विष्‍णुप्रताप से छोटे अजयप्रताप के लिए ‘बिन्‍नेसर’ प्रेमी कम वह जरिया ज़्यादा थे जिसका खुद के पास पैसों के अभाव में सिनेमा देखने के मौके पर ‘संगी-सहोदरता’ के नाम से बड़प्‍पन से इस्‍तेमाल होता आया और किया जाता रहा है.

तथाकथित प्रेमिका शारदा के विवाह में रुकावट को तथाकथित प्रेमी बिंदेश्‍वरी अपनी नौकरी में रुकावट से जोड़कर देखते थे. यही वजह है कि आसनसोल जिंक डिपो में काफी खींचतान के बाद किसी तरह तेईस सौ की नौकरी हाथ लगने के अनंतर पहली छुट्टी में वह बेहद आशान्वित गुलाबी शर्ट में प्रेमिका के सम्मुख उपस्थित हुए, और प्रेमिका के नयनों में किसी भी तरह के गुलाबीत्‍व के अभाव में किंचित उद्वेलित व व्‍यग्रमना होने भी लगे. समय से पूर्व विदाई लेकर प्रेमिका को प्रताड़ि‍त कर रहे हों के अंदाज़ में झोले में सामान ठूंसते कातर-से स्‍वर में प्रार्थना की- इतनी दूर से आया मगर.. ओह.. क्‍या उम्‍मीद लेकर.. अब कुछ दोगी तुम?..

शारदा के स्‍वर की भावना प्रेमी-प्रेमिका संवाद से ज़्यादा सामनेवाले कमरे में टेलीविज़न पर चल रहे नाटकीय अंत से वंचित रह जाने के झल्‍लाहट में नहायी हुई थी. उसने उसी चिढ़े स्‍वर में कहा- कौनची मांग रहे हैं? सफर बास्‍ते साबुन का टिकिया? कि कंपौंडर वाला शीशी में थोड़ा कड़ुआ तेल डालके दे दें, कान में गिरा लीजिएगा कि हमरा बात का ठीक-ठीक अर्थ बूझ सकें! एकदम्‍मे कइसा थेथर अमदी है, जी!

5 comments:

  1. ई कहीं असली किस्‍सा तो नहीं

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  2. गज़ब भयो……ज़ुलम भयो

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  3. ओह हमारी आँख में तो आँसू भर आये !

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  4. यानि भग्‍नाशाओं का शमन....ओम नमो: स्‍वाहा.

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  5. जय हो! लाइफ़बाय है जहां, तन्दुरस्ती है वहां! :)

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