Saturday, March 31, 2007

रेहाना कहती है ऐसे तो न मुझे देखो!

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: इक्‍कीस

चश्‍मे का शीशा साफ करने के बाद यह पता चला कि नीली आंखों वाली सवाल का मीठा कंकड़ मुझ पर नहीं अविनाश पर फेंक रही थी, लाड़-दुलार की पिचकारी एक फिल्‍म में अभिनय करवाने के लिए ही नहीं चल सकती. अविनाश अविनाश ही है कोई जॉनी डेप या लियोनार्दो नहीं. चश्‍मा एक बार और साफ करने पर यह भी दिखा कि नीली आंखों वाली दरअसल मुझे देख ही नहीं रही. जैसे टैक्‍सी में मैं होऊं ही नहीं, सिर्फ अविनाश का सांवलापन और उसके चमकते सफेद दांत हों! मेरे साथ करती, अनुभवी हूं ठीक था, मगर मेरे सामने अविनाश के साथ ऐसी नंगई कर रही थी मुझे लड़की की बदचलनी पर बड़ा गुस्‍सा आने लगा. अविनाश पर भी आया कि वह दांपत्‍य की महिला और प्रेम में समर्पण जैसे विषयों पर महिलाओं की प्रगतिशील पत्रिकाओं में हर तीसरे महीने एक लेख लिखता रहा है और आज वास्‍तविक जीवन में उतारने का मौका आया तो इंटर फेल रामाधीन भैया के लाईन पर बेहयाई और व्‍यभिचार की मिसाल बना जा रहा है! इस सुलगती तीली पर जल्‍दी ही अगर लोटा भर जल गिराया न गया तो शायद थोड़ी देर में यह रूपसी टैक्‍सी की छत पर आज फिर जीने की तमन्‍ना और मरने का इरादा है वाला गाना गाती दिखने लगें.

चश्‍मा उतार कर (कि रूप प्रस्‍ताव के आड़े न आए) मैंने रूपसी को खालिस भोजपुरी में फींचना शुरू किया क्‍यों ईरान का नाम खराब कर रही हो, बहिनी. हमारे विजिट का पर्पस सांसकृतिक ही है लेकिन वह संस्‍कृति नहीं जिधर तुम हमें (माने अविनाश को) खिंचे लिए जा रही हो.

लड़की ही नहीं अविनाश मियां भी मुझे सुनने से परहेज कर रहे थे. थोड़ी देर तक गंभीरता से फ्रेंच में लड़की की खुसुर-पुसुर सुनते रहे, और फिर अपने ही नहीं मेरे भाग्‍य का भी फ़ैसला कर लिया. नीली आंखों वाली शैतान की खाला के फोन पर मिन्‍टों में एक पुरानी पिटी हुई ‘रेनॉ’ और उसे चला रहा बाईस-तेईस साल के लंबे चेहरे वाला एक हिंदी अनुवादक नौजवान मेरी सेवा में आ गया, और मुझको बहिरिया कर अविनाश से अभिनय और जाने क्‍या-क्‍या करवाने खाला जान टैक्‍सी में बैठकर उसके साथ फुर्र हो गईं. गुस्‍सा तो मुझे बहुत आ रहा था. लड़की पर नहीं, नशीली मुस्‍कानों से अलग बुरके की वजह से उसे अभी ठीक से देखा भी कहां था, अविनाश पर आ रहा था, बावजूद इसके आ रहा था कि इस तरह की हरमज़दगी उसने पहली मर्तबा नहीं की थी (बिना पर्याप्‍त नोटिस और हमारी मानसिक तैयारी के फुर्र हो जाने की). मगर परदेस में बीच सड़क पर गुस्‍सा करके हम क्‍या उखाड़ने वाले थे. चुपचाप रेनॉ के कोमलांगी ड्राईवर की बाजूवाली सीट पर धंस गए. लंबे चेहरे वाले लौंडे से कहा- हम समझते थे हमारे यहां ही लीला होती है, पर तुम लोग तो, बेटा, दो कदम आगे चल रहे हो!

***

- बाहर दुनिया समझती है ईरान में जनाना पर बंदिश है, औरतें घुट-घुटकर सांसें ले रही हैं लेकिन हम तो स्‍वच्‍छंदता की सुहानी बयार बहता देख रहे हैं, आं.. क्‍यों?- नीले चेक के खुले बटनों वाले सूती शर्ट के अंदर सफेद टी-शर्ट पहने नौजवान गाईड की पीठ में मैंने तर्जनी दबाते हुए कहा.

लड़के ने अपनी काली आंखें फैलाकर, अपने महीन, कोमल होंठों को थोड़ा खोलकर मेरी तरफ देखा.

- क्‍यों?.. आपको अच्‍छा नहीं लग रहा?- अंदर ही अंदर कुछ सोचने के बाद लड़के ने जवाब दिया. जैसे मेरे पिछड़े नज़रिये

और आनेवाले मिनटों में व्‍यक्‍त दकियानुसी विचारों की संभावना से अभी से असहमति की दूरी तान रहा हो, एक सिगरेट निकालकर अपने महीन होंठों के बीच दाब लिया और सुलगाकर रेनॉ की दीवारों के द‍रमियान धुंआ इकट्ठा करने लगा.

- नहीं, बेटा (रिश्‍ता नहीं, श्रीलाल शुक्‍लीय अधिकार जतानेवाला संबोधन), अच्‍छा कैसे नहीं लगेगा! अच्‍छा तो खूब लग रहा है.. पिक्‍चर की ऐसी शूटिंग रोज़-रोज़ देखने को कहां मिलती है? ऐसा है, लालमोहन, कल्‍चरल टुअर का काम फिर कभी के लिए मुल्‍तवी करते हैं, तुम तो हमें फिल्‍म के सेट पर ही लिये चलो! आखिर क्‍या है कि आपकी डायरेक्‍टर साहिबा..?

- मासुमेह मोहामदी. डायरेक्‍टर का नाम.- लड़के ने हमें हमारी अटक से बाहर निकाला.

- हां, हम ज़रा देखना चाहते हैं आपकी मासुमेह मोहतरमा क्‍या-क्‍या रंग निकलवा रही हैं अपने अविनाश लाल से?

जैसे आसमान का चांद मांगने जैसी मैंने कोई असंभव इच्‍छा प्रकट कर दी हो, लड़के ने पैर एकदम-से ब्रेक पर दाबा, और सड़क के एक किनारे ले जाकर रेनॉ रोक दी. खिड़की से बाहर सिगरेट फेंककर मुझे ऐसे देखने लगा जैसे भावुक भारतीय माताएं पंद्रह साल के बेटे के दराज में कंडोम का पैकेट पाकर दीवार, कैलेंडर, पुराने अलबम देखने के बाद हैरत से खुद को आईने में देखने लगती हैं. उत्‍तेजित होकर लड़का कार से उतर गया. अपने छोटे-छोटे महीन बालों में हाथ फेरता सोचता रहा, फिर उसी उत्‍तेजना में लौटकर मेरी खिड़की पर आया.

- यानी आपको ख़बर नहीं है? मासुमेह मिस्‍टर दास को किसी शूटिंग पर लेकर नहीं गई!

- अच्‍छा..?- मैंने चौंकने का नाटक किया, तब म्‍यूजियम घुमाने गई है?.. रोम-रोम में एकदम-से आग लग गई. हमारा शक हवाई नहीं था! पड़ोस में रंगरेलियां मनाई जा रही है, बस हमीं को रस से बहिष्‍कृत किया गया है! जिंदगी हमारे साथ ही क्‍यों इस तरह के गंदे मज़ाक खेलती है?

- ईरानी फिल्‍मों का आपको शौक है. सब यही सोच रहे थे कि आपके बल देने से मिस्‍टर दास तेहरान आए. हमें भी मिस्‍टर दास के आने के बारे में सीधे ख़बर नहीं मिली. पहले बांग्‍लादेश से मैसेज आया, फिर फिनलैंड से किसी ने फोन करके कन्‍फर्म किया. यहां सिर्फ इतना जानते थे कि तेहरान कब आ रहे हैं. उसी हिसाब से प्‍लैनिंग हुई. मासुमेह एक्‍सपीरियेंस्‍ड है इसलिए एक्‍चुअल किडनैपिंग का काम उसी को सौंपा गया.. वापस सिगरेट जलाकर लड़का इस तरह इन्‍फॉर्मेशन दे रहा था मानो तेहरान में बाटा के बड़े स्‍टोर तक पहुंचने का रास्‍ता एक्‍सप्‍लेन कर रहा हो.

मैं बेचैन होने लगा. इच्‍छा हुई लड़के के होंठों से खींचकर मैं भी सिगरेट के दो कश ले लूं. बेचैनी में ही सवाल किया- तुम्‍हारी वो नीली आंखों वाली.. वो किडनैपर है? अविनाश को किडनैप किया गया है.. क्‍यों?

- इसलिए कि एशिया रीजन के रजिस्‍टर्ड सभी ब्‍लॉग्‍स का कंट्रोल मिस्‍टर दास के अंडर है! सारी सेंसरिंग, सीज़र और सप्रेशन मिस्‍टर दास के कमांड पर होता है. और ईरान में मूवमेंट फॉर डेमोक्रेसी की हमारी लड़ाई का तब तक कोई मतलब नहीं जब तक हम अपने ब्‍लॉग्‍स को फ्री न करवा लें! और मिस्‍टर दास को इसके लिए तैयार करने के तरीके मासुमेह जानती है. वो बहुत सिजंड फाईटर है.. मासुमेह के ग्रुप से मामला हैंडल नहीं हुआ तो मिस्‍टर दास को इटली ब्रिगाता रोस्‍सा के पुराने पके हुए मेंबरान के हवाले किया जाएगा.

मैं कन्‍फ्यूज़ हो रहा था. और पहली बार नहीं हो रहा था. यह लड़का या तो गलत नाटक के डायलॉग बोल रहा है या फिर मैं परले दरजे का चूतिया हूं. अविनाश लाल समूचे एशिया का ब्‍लॉग्‍स दाबे हुए हैं और हमको भनक तक नहीं? यार, आदमी आज किस पर भरोसा करे. एक सिंगल व्‍यक्ति.. नाम बताईये जिस पर भरोसा करें? अभय तक ने यह बात हमारे आगे नहीं खोली! अच्‍छा हुआ साले को उड़ाकर ले गए. हाथ-पैर के नाखून उखाड़ेंगे, कनपटी पर बिजली का नंगा तार लगेगा तब अकल खुलेगी. मज़ा करो, ससुर! लेकिन मुक्‍ता सामने पड़ गई तो उसको अपनराम क्‍या जवाब देंगे?.. कोई ज़रूरत नहीं किसी को जवाब देने की. हमारे सामने फुल पैंट पहनना सीखनेवाला अविनाश दास जब इतना उड़वैया साबित हो रहा है तो मुक्‍ता रानी कौन दूध की धुली निकलने वाली हैं!

आवाज़ को संयत रखने की कोशिश करता मैं बोला- वो तो उसकी करनी थी, किडनैपिंग के गड्ढे में गया, हमारा अब क्‍या हाल करने का विचार है?

शायद मेरे चेहरे का उजबकपना होगा, लड़का खुलकर हंसने लगा. पतले महीन होंठों के अंदर अनार-से छोटे-छोटे दांत. बोला- मैं आपको एक बहुत ही खास जगह दिखानेवाली हूं!

- वाली हूं?.. कार की सीट पर बैठा हुआ था, थोड़ा उठ गया- तुम.. तुम्‍हारा.. तुम्‍हारा नाम क्‍या है?

रेहाने सबूरी. टेंशन मत लीजिये, आप ही नहीं और भी बहुत से लोग देखकर मुझे लड़का समझते हैं- लड़कानुमा लड़की ने सिगरेट के कुछ और कश लिये, इतमिनान से कार के अंदर आई, व्‍हील के पीछे बैठकर बैक व्‍यू एडजस्‍ट करने लगी. नीले चेक वाला उसका शर्ट थोड़ा-थोड़ा मुझे छू रहा था, या फिर सिर्फ वहम था मेरा. लेकिन अपनी जगह बैठा कांप रहा था वह कत्‍तई वहम नहीं था.

टेंशन तो मैंने ले लिया था. कुछ ज्‍यादा ही ले रहा था. छोटे महीन बालों और बड़ी-बड़ी काली आंखों वाली ऐसी हसीन लड़की ज़माने से नहीं देखी थी. अब देखने को सामने थी तो उसके चेहरे से नज़र हटाने के ख्‍याल से तकलीफ हो रही थी.

रेहाने ने मुस्‍कराकर कहा- इस तरह देखियेगा तो हमारे बीच बातचीत में मुश्किल हो जाएगी!

मैंने मुस्‍कराने और रोने के बीच वाले किसी एक्‍सप्रेशन से उसे देखा. बातचीत में मुश्किल वैसे भी हो गई. क्‍योंकि हमारी कार के ठीक पीछे सड़क पर अचानक गोलियां दगने लगी थीं.

(जारी...)

उच्‍चवर्ग का बाकी देश से विभाजन भारत का सबसे सफल विभाजनकारी आंदोलन है: अरुंधति रॉय

सिंगुर और नंदीग्राम एक सवाल खड़ा करते हैं- क्‍या हर क्रांति का आखिरी स्‍टॉप विकसित पूंजीवाद है?...आक्रामक भोग व उपभोक्‍तावाद की खुराक पर विकसित हो रहे हमारे देश के मध्‍यवर्ग को विस्‍तार चाहिये, नए संसाधन चाहिये. औद्योगिक बन रहे पश्चिमी देशों में यह मांग औपनिवेशिक संसाधनों की लूट-पाट व सस्‍ते गुलामों की बहाली से पूरी हो रही थी. चूंकि अब उपनिवेशों का समय नहीं रहा, हमें अपने भीतर ही उपनिवेश खड़े करने हैं, कच्‍ची ज़मीनों पर हाथ मारना है. हमने अपना स्‍वयं का मांस-मज्‍जा खाना शुरु कर दिया है.
''भारत एक पुलिस राज्‍य में बदल रहा है. जो कुछ इन दिनों इस देश में घट रहा है उसके खिलाफ़ राय रखनेवाला हर व्‍यक्ति आतंकवादी करार दिये जाने के खतरे में है. इस्‍लामिक आतंकवादी होने के लिए पहले मुसलमान होना ज़रुरी है- तो उस छतरी के नीचे हम सारे लोगों को शामिल करने में ज़रा दिक्‍कत है. इन्‍हें थोड़ा ज्‍यादा फैली हुई छतरी चाहिये. तो इसका इलाज है डिफिनिशन को ज़रा ढीला, अनडिफाइन्‍ड छोड़ दिया जाए. यह ज्‍यादा असरकारी रणनीति है क्‍योंकि वह दिन ज्‍यादा दूर नहीं जब हम सभी माओवादी या नक्‍सलवादी, आतंकवादी या आतंकवादी समर्थक कहे जाएंगे, और हमको वे लोग चुप करा रहे होंगे जिन्‍हें माओवादियों या नक्‍सलाइटों की पहचान है न परवाह. गांवों में तो यह खेल शुरु हो ही गया है- समूचे देश में हज़ारों लोगों को जेल के अंदर इसी ढीली कैटेगरी और इल्‍ज़ाम के तहत बंद रखा गया है कि वे आतंकवादी हैं जो राज्‍य का तख्‍ता पलटने की कोशिश कर रहे थे...''

मध्‍यवर्ग की बढ़ती भूख, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्‍य में तेजी से मिटते वाम और दक्षिण का फर्क, लोकतांत्रिक प्रतिरोध की मुश्किलें और सीमा और भारतीय राज्‍य का स्‍वरुप क्‍या है. एक समझदार, संवेदनशील नागरिक के सामने चयन क्‍या हैं: ये ढेरों सवाल हैं जिन पर अरुंधति रॉय ने खुलकर बेलौस, जीवंत टिप्‍पणी की है. तहलका के लिए शोमा चौधुरी से अरुंधति की पूरी बातचीत यहां पढ़े.

अपनों की दग़ाबाजी और पहली (2007 की) साहित्यिक चोट

साहित्‍य की अप्रगतिशील धारा का पहला अनियकालीन अधिवेशन

कभी होगी का आशावाद अभी बना हुआ है मगर जहां तक अभी की बात है तो अभी ऐसी हैसियत हुई नहीं कि स्‍थानीय कॉरपोरेटर या बिल्‍डर के स्‍तर के दल-बल के जोर से हम इच्छित नतीजा प्राप्‍त कर लें. पुश और पुल की कमी रह जाती हो ऐसा नहीं है, पुश और पुल कहां से शुरू कर के किधर ले चलें की अपनी ट्रेनिंग ही ज़ीरो है. मंच पर विनम्र निवेदन का कुछ अभिनय किया है. सो ज़रूरत का मौक़ा जान उसको अप्‍लाई करते हैं. अगल-बगल लोगों से विनम्र निवेदन करते हैं- गुरु, उद्येश्‍य साहित्यिक ही नहीं सामाजिक भी है, थोड़ा हाथ बंटाईये! लोग उंगली भी बंटाने को तैयार नहीं. एकदम-से यह बात प्रकट होती है कि समाज में सामाजिकता व साहित्यिकता के खिलाफ कैसी प्रतिकूल हवायें चल रही हैं(1).

दरअसल दोष हमारे आशावाद का भी है. साहित्‍य की अप्रगतिशील धारा का पहला अनियकालीन अधिवेशन आहूत करने की घोषणा के समय ही संभावित संकटों का एक औसत अंदाज़ हो जाना चाहिये था. हम अंत तक लड़की फंस जाएगी की तरह अधिवेशन भी निपट जाएगा के भावुक आशावाद के लपेटे में रहे. ऐसे में दुर्गत तो होना ही था. शुरुआत उन्‍हीं के मुखारविंद से हुई जिनकी प्रेरणा से अप्रगतिशील धारा का यह पुण्‍य विचार पहले-पहल हमारे मन में उठा था. अधिवेशन का प्रस्‍ताव सुनकर पहले तो रवीश उत्‍साहित हुए, कहा शुभ कार्य जितनी जल्‍दी हो उतना अच्‍छा, फिर डांट और गालियों(2) से मुझे इस पर राजी करवाया कि मुख्‍य अतिथि की शोभा के लिए क्‍यों उनके बॉस दि बिग ही सबसे उपयुक्‍त कैंडिडेट रहेंगे. अप्रगतिशीलता उनके पैर के अंगूठे से लेकर भौं के बाल तक विराजती है. अप्रगतिशीलता में ताल ठोंककर भी दूसरा उनके टक्‍कर का नहीं. मैं राजी हो भी गया फिर रवीश अपना चिर-परिचित उत्‍तरी बिहारी खेलने लगे. माने लंगी देने लगे. पहले कहा साली के गौना की पहली वर्षगांठ है. फिर गोली दिये बॉस का पेट खराब है और चुनाव कवर करने के लिए हमको जालौन भेज रहा है. हमने भी जमकर डांट और गालियां(3) झाड़ीं मगर उसका रवीश जैसे थेथर पर वांछित असर होना नहीं था. सो नहीं हुआ.

आखिरी मोमेंट की हड़बड़ी में मुख्‍य अतिथि के लिए हमने डॉली शर्मा से बात की. अब देखकर डर लगता था लेकिन कभी इनके पास रूपसी होने की ख्‍याति थी. 1996 में गीता वर्मा के कभी न पूरा होनेवाले सीरियल ‘’जनम-जनम का साथ’’ के पाइलट एपिसोड में डॉली ने आधुनिक माने बदचलन लड़की की एक्टिंग ही नहीं की थी उसको वास्‍तविक जीवन में साकार भी किया था. शूटिंग के ठीक बाद गीता वर्मा के अस्थिर फायनांसर और स्‍थाई प्रेमी को ले उड़ी थी. माने अप्रगतिशीलता के हमारे खांचे में सही बैठती थी. डॉली शर्मा को अधिवेशन का मुख्‍य अतिथि बनाने का एक अन्‍य फायदा यह था कि प्रैस के साथ लसर-पसर का उसका पुराना रेकॉर्ड ही नहीं था, इन दिनों वह ‘बड़े शहर में एक अकेली लड़की’ नामक एक सॉफ्ट पॉर्न वेबसाइट भी चला रही थी. शुरूआती संकोच व हिचकिचाहट के अनंतर एक तरह से कहिये तो मुख्‍य अतिथि के पद पर डॉली को पाकर मेरे हर्ष का पारावार नहीं था. अधिवेशन के एक दिन पहले डॉली के सेक्रेट्री का फोन आया कि एक दिन के लिए मैडम का रेट तीस हज़ार है.

झटकों के शुरुआत की वह पहली घंटी थी. क्‍योंकि डॉली के पीछे-पीछे पता चला आयोजन की संयोजन कमेटी के सभी मेंबर अलग-अलग स्‍तर पर धांधली का खेल खेल रहे थे. नाश्‍ता-पानी और बैठने की व्‍यवस्‍था जिन केपी जायसवाल के हाथों थी (टीवी के लिए इन्‍होंने बेहतरीन घटिया लेखन किया था और अप्रगतिशील धारा के उभरते चमकते सितारे साबित हो रहे थे) इन्‍होंने पहले तो ये कहा कि जमशेदपुर में मां को हार्ट अटैक आया है, पैसे वहां भेजने पड़े. बाद में पता चला अपने मद का पैसा भाई साहब ने अंबूजा सीमेंट के स्‍टॉक में लगा दिया था. हालांकि त्रिलोकी त्रिपाठी (अप्रगतिशील धारा का दूसरा चमकता सितारा) का यह कहना था कि स्‍टॉक वाली खबर गलत है, सच्‍चाई यह है कि जायसवाल की दूसरी प्रेमिका उनकी पहली प्रेमिका के आदर्श नगर वाले फ्लैट से पैसे चुराकर अपनी मां के पास आसनसोल भाग गई है.

उद्घाटन सत्र में किसकी पुस्‍तक का विमोचन होगा की चिंता करता मैं कुछ दुखी हो गया था तभी तारण के लिए अभय तिवारी उपस्थित हुए. टीवी के लिए घटिया साहित्‍य तो इन्‍होंने लिखा ही था, हाल ही में ‘’मेरे अपने राम’’ नाम की एक गुटका-पुस्तिका भी छपवाई थी. नाम की श्रद्धा पर मत जाईये पुस्तिका के अंदर की सामग्री हमारी अप्रगतिशीलता की ज़रूरतों पर एकदम खरी उतरती थी. अभय खुशी-खुशी उद्घाटन सत्र में अपने चालीस पेजी गुटका के संपूर्ण पाठ को तैयार भी हो गए. फिर मौली गुप्‍ता ने जब इन्‍हें निमंत्रण पत्र दिखाया तो मौली के रूप और छापे में अपने नाम के बड़े पायंट पर गौर करने की बजाय ये अप्रगतिशील धारा की संज्ञा पर अटक कर हमसे ज़्रिरह करने लगे. बात ज़्रिरह से खिंचकर हाथापाई तक चली आई. मौली ने अपना असली अप्रगतिशील रूप दिखाकर गुटके पर थूक दिया. अनंतर अभय की हतप्रभावस्‍था का लाभ उठाकर भाग भी आई. मगर उत्‍तेजना में नीचे सीढियों पर गिर पड़ी. गिरी मेरी बांहों में ही थी लेकिन उसका यथोचित लाभ उठा सकने की जगह मेरे भी पैर फिसल गए और इस तरह अप्रगतिशील धारा का प्रथम अनियकालीन अधिवेशन होते-होते रह गया. मगर अधिवेशन, और मौली- दोनों ही के संबंध में हमने आशा अभी छोड़ी नहीं है.

(1). लोग ब्‍लॉग के शॉर्टकट से समाज में जाना चाहते हैं. सीधे रास्‍ते समाज में प्रवेश करना पड़े तो कन्‍नी काट लेते हैं- श्री रोजर सैंडर्स, मैसेचुसेट्स यूनिवर्सिटी, 2001.
(2). उत्‍तरी बिहार का गालीकोश, दरभंगा ग्रंथागार, 1987.
(3). दक्षिणी बिहार गालीकोश, डुमरांव राज-परिवार प्रकाशन, 1988.

Friday, March 30, 2007

बीस के वर्चुअल में रियल में वर्चुअल

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: बीस

लेकिन.. लेकिन?.. लेकिन, किंतु, परंतु करते सिर धुनने की इच्‍छा हो रही थी. धुनाई से अलग चारा भी नहीं था.

- यार, लेकिन ये कैसे हो सकता है? मेरे सामने बैठकर घरवाला पराठा-भिंडी की भुजिया खा रहा था! बॉस (दि बिग) को गालियां दे रहा था, गांव और अंड-बंड की याद में दुखी हो रहा था.. लाजपत नगर के पौने तीन सौ के शर्ट और मिक्‍स्‍ड कॉटन के घटिया पैंट में.. शर्तिया वह रवीश ही था.. ऐसी हालत में आदमी एक पायंट के बाद पागल हो सकता है, किसी चैनल को मिट्टी बनायेगा? उसकी औकात क्‍या है, यार?

ऊबा हुआ अविनाश इधर-उधर देखता रहा, जवाब नहीं दिया. शायद चेंज के लिए मेरी बजाय उसने एक गजब ढावक जापानी लड़की पर नज़र मारी, मुस्‍कराने लगा. उंगलियों से गजब ढावका को पास आने का इशारा किया. वह चेहरे से ही नहीं, कमर से भी भाव बनाती हुई आई. अविनाश के कंधे पर रेशमी बाल गिराकर उसकी गंदी फुसफुसाहटें सुनती रही. मैं जलकर खाक़ होता रहा. फिर वह उसी तरह से कमर हिलाऊ भाषा में मैसेजेस देती वापस लौट गई. ये मैसेजेस गुप्‍त नहीं थे, उसका लाभ मैं भी ले सकता था. ले सकता क्‍या ले रहा था. अपनी अधेड़ अमरीकन प्रेयसी के साथ बगल के टेबल पर बैठे एक इज़रायली बिजनेसमैन भी ले रहे थे. अविनाश ने एक ही घूंट में ग्‍लास की वाईन खत्‍म कर दी और मुस्‍कराकर जाने किन नज़रों से मुझे देखने लगा.

- आपको याद है डलहौजी में आप तीन-चार महीने रहे थे?.. एक लड़की थी आपके साथ.. सिरिंज, टेबलेट-सेबलेट यूज़ करती थी?..

कैसे याद नहीं होगा! रंजु सरकार.. मगर उसके टेबलेट्स नहीं उसकी देह की याद आई, और एक बार फिर तेजी से छाती में हूक उठी और अहसास हुआ कि जीवन में सुख कितना क्षणिक होता है!

सुख की सुलगती यादों पर पानी गिराता अविनाश ने अपनी बात पूरी की- तो आपके इन रवीश मियां को भी बीच-बीच में टेबलेट लेने का फितूर चढ़ता है. नशा करने के बाद इसी तरह बहकी-बहकी बातें करते हैं. पुराने कपड़े पहन लेते हैं, गांव, बाप और बॉस को याद करके कभी गालियां देते हैं, कभी रोने लगते हैं. पर्स से निकालकर वाईफ और बेटी वाली फोटो भी दिखाई होगी?

मैंने जवाब नहीं दिया, दुखी होकर मैं भी अविनाश को जाने किन नज़रों से देखता रहा. इस बार सन्‍न होने की सहूलियत भी नहीं हुई. फौजी गेटअप की बजाय अविनाश डॉक्‍टरी गाउन में होता तो ज़रूर उससे थोड़ी देर के लिए साइकॉबैबल करना चाहता. पूछता आधुनिक जीवन की इन अजीबो-गरीब बहकों का अंत कहां है. उपभोक्‍तावाद के सुख के चरम पर पहुंचकर मनुष्‍य सबसे निकृष्‍ट और कंगले प्राणी में कैसे बदल जाता है. क्‍या वापस अशिक्षित होकर और मकई की खेती करते हुए मनुष्‍यता सरलता के सुखी जीवन में लौट सकेगी? मगर अविनाश ने मनोविज्ञान नहीं प्रगति प्रकाशन, मॉस्‍को का पूंजी: एक परिचय पढ़ा है और वैसे भी मैं प्रकृति से दुखी और निराशावादी हूं. नतीजतन सवालों को बाहर लाने की बजाय करीने से तह करके उन्‍हें अंदर ही रखे रहा. बाहर, प्रकट में, दुखी दिखता रहा.

- तो रवीश का डबल-ट्रिपल नहीं था रवीश ही था?.. तुम मुझसे मज़ाक तो नहीं कर रहे, अविनाश? क्‍योंकि दोस्‍त, मैं इस फैंटेसी में भटक गया हूं.. स्‍वप्‍न-दु:स्‍वप्‍न का भेद समझ में नहीं आता!.. थोड़ी देर में मुक्‍ता आकर बतायेगी कि जिसे अविनाश समझकर बातें कर रहा था वह मेरे परिचय का व्‍यक्ति नहीं एम्‍सटरडम के किसी साइंटिस्‍ट का क्‍लोन है..!

अविनाश मुस्‍कराता रहा. बोला- मैंने सोचा था जापानी लड़कियों के प्रेसेंस में आपका एंटरटेनमेंट होगा लेकिन आप तो दुखी हो गए. आपको तरो-ताज़ा करने के लिए क्‍या किया जा सकता है, बताईये?

मैंने बुदबुदाकर कहा- सीधे-सादे परिवार का सीधा-सादा बच्‍चा था! एनडीटीवी में अच्‍छी-सी नौकरी थी, इतना सारा खुराफात फैलाने की क्‍या ज़रूरत थी उसे?.. और इंवेस्‍टमेंट के लिए इतना पैसा कहां से आया! सचमुच मेरी समझ से बाहर है..

- आपने ब्‍लॉग में वहां की फिल्‍मों के बारे में लिखा था लेकिन एक्‍चुअल में कभी गए नहीं.. चलिये, आपको घुमा लाते हैं.. दिल बहल जाएगा!

- दिल बहल जाएगा? जापानी लड़कियां बुरा मान जाएंगी, अविनाश.. जा कहां रहे हैं?

- चलिये, उठिये तो.. !

***

कोई हेलीकॉप्‍टर या रॉकेट की सवारी करके हम नहीं पहुंचे थे, हज़ारों किलोमीटर की यह दूरी पलक झपकते कैसे तय हुई थी इसका सही भेद तो अविनाश ही खोल सकता है, मगर आंखों के आगे जिस वास्‍तविक शहर का साक्षात कर रहा था वह अलबोर्ज़ पहाडियों के ढलान पर बसा फारस की खूबसुरत राजधानी तेहरान ही था!

हम मेहराबाद अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डे पर नहीं उतरे, न ही कहीं किसी ने हमसे हमारा पासपोर्ट या वीसा मांगा. मिलाद टॉवर और बोर्ज़-ए-सफेद की एक झलक लेकर हमारी टैक्‍सी पसदारान, पुनाक, जमरन, ज़न्‍नताबाद से होती पुराने तेहरान की ओर चल निकली. मैंने खुश होकर अविनाश की पीठ पर तीन-चार धौल जमाये- सही है, गुरु, एकदम सही जगह आए हैं!

यकीन नहीं हो रहा था मैं क्‍यारोस्‍तामी, घोबादी और मजीदी के शहर में था. उन्‍हीं सड़कों, कहवाघरों और बच्‍चों के बीच टहल रहा था जिसकी देखी-अदेखी अनगिन कल्‍पनाओं के चित्र मन के अलग-अलग खानों में करीने से टांक रखे थे. टैक्‍सीवाले बूढ़े ड्राईवर ने अविनाश या मुझसे यह नहीं पूछा अह्ल ए कोजा हस्तिद? (आप कहां से हो?), क्‍योंकि टैक्‍सी में हमारे चढ़ते ही उसे अंदाज़ हो गया होगा जभी उसने रेडियो पर मुकेश का छोड़ गए बालम ऑन कर दिया. गाने से लापरवाह अविनाश ने मेरे छूटे हुए सवाल का अब इतमिनान से जवाब देना चालू किया.

- आपके साथ दिक्‍कत है, प्रमोद जी.. आपको लगता है हिंदी में सब राजेंद्र यादव और पंकज बिष्‍ट हैं. दो हज़ार-चार हज़ार के सर्कुलेशन से ज्‍यादा के झंझट में नहीं पड़ना चाहते! मगर हिंदी की सीमा समझकर सबने हथ्रियार डाल दिया हो ऐसा नहीं है.. खास तौर पर बिहारियों ने. आप समझते हैं मंत्री पद पाकर एक रामविलास पासवान की महत्‍वाकांक्षा आज संतुष्‍ट हो जाएगी? छपरा और सहरसा के गुंडे चार करोड़ की फिरौती पाकर चुपा जाएंगे? वो दिन गए, महाराज. आज हिंसा और अनाचार में रवीश कुमार कोई अकेले थोड़ी हैं!

मैंने जफर पनाही के ‘ऑफसाईड’ में खुले चेहरे वाली लड़कियां देखी थी लेकिन फिर भी तेहरान की सड़कों पर बिना बुरके की लड़कियों को स्‍वीकारने में ताजुब्‍ब हो रहा था. उसी ताजुब्‍ब में अविनाश से सवाल किया.
- लेकिन इस तरह के एक मामूली बिहारी पर कोई इतना इन्‍वेस्‍ट क्‍यों करेगा?

टैक्‍सीवाले से मुकेश का गाना बंद करवाकर अविनाश ने जवाब दिया- आपको दूसरी गलतफहमियों के साथ रवीश के मामूली होने की भी कुछ ज्‍यादा ही गलतफहमी है. वह मामूली नहीं है; एनडीटीवी में एसएमएस से पहले जिन दिनों चिट्रठयां आया करती थी उनको छांटने-बांचने का काम रवीश बाबू के ही जिम्‍मे था, लेकिन खाली चिट्ठी नहीं पढ़ रहे थे रवीश बाबू. हेगेल, अंतोनियो ग्राम्‍शी, एडवर्ड सईद सब घोंट रहे थे. नौकरी के ही दौरान वूहान विश्‍वविद्यालय से कानून की डिग्री ली. वेन जियाबाओ के किसी नज़दीकी को सेट करके एक अरब शेख फंसाया, इनके ब्‍लॉग पर मूल जर्मन में रिल्‍के पर की गई इनकी टिप्‍पणियां पढ़कर किसी जर्मन बिधवा का सिर घूम गया. वह इनको खोजती हुई अबू धाबी पहुंची. जनाब ने उस पर डोरे डालकर बेचारी के करोड़ों का चूना लगाया. रवीश के बड़े और जटिल फ़रेबी तंत्र का यह दो प्रतिशत भी नहीं, और इस समूचे प्रसंग का ऑफिशियल-अनऑफिशियल कोई रिकॉर्ड उपलब्‍ध नहीं क्‍योंकि जो कोई भी इस कहानी में किरदार या साक्षी था उनमें अब एक भी जीवित नहीं बचा! रवीश के ऑपरेशंस की पेचिदगियां आपकी-हमारी कल्‍पनाओं से बहुत आगे की उड़ान उड़ चुकी हैं, भाई साहब.. पिछले दिनों दानापुर में इनके एक भाई ने पांचवी में इनके फेल होने का रिज़ल्‍ट एक स्‍थानीय अख़बार में प्रकाशित करवा दिया. एक हफ्ते के भीतर न वह अख़बार बचा न बेचारा भाई. आप जितना कम जानें उतना ही अच्‍छा रहेगा, क्‍योंकि रवीश की सच्‍चाईयां ऐसा कुंआ है जिसमें झांकने पर सिर्फ बेहोशी के चक्‍कर आते हैं, कोई उजाला नहीं दिखता!

ट्रैफिक सिगनल पर टैक्‍सी के रुकते ही हमारी खिड़की पर बुरके में खिला एक हसीन चेहरा उपस्थित हुआ. नीली आंखों के बारे में सुना था मगर देख पहली बार रहा था. हसीना ने मुस्‍कराकर फ्रेंच में सवाल किया- क्‍या आप मेरी‍ फिल्‍म में अभिनय करेंगे?..

(जारी...)

Thursday, March 29, 2007

सच क्‍या है और क्‍या है मिथ्‍या की मदहोशी

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: उन्‍नीस

लहीम-शहीम हूनान प्रांत का चीनी और अल-बसरा का इराकी केश संवारे, हाथ बांधे ऐसे खड़े हो गए मानो स्‍कूल के सालाना समारोह में ईनाम मिलने की घोषणा होने वाली हो. प्रेमिल चितवन की बहार फैलाये बाबा ने भी अपनी बांकी अदाओं की टंकी खोल दी और अलग-अलग अंदाज़ में अविनाश को इम्‍प्रेस करने की होड़ में जुटे रहे. अलिखित कालातीत रचना की एक-एक पुर्जी, पन्‍नी, कागज़, नोट्स, पु‍लिंदा पसारकर दिखाने लगे जैसे आईसीएससी बोर्ड के पहले छात्र महंगे ट्यूटर को अपनी विहंगम तैयारी की झलक दिखा रहा हो.

- उन्‍नीसवीं सदी में फुकॉन और मार्सेलस की यात्राओं का विशद इस्‍तेमाल किया है, नोटबुक नंबर सत्रह के सत्रहवें पृष्‍ठ पर नज़र डालिये, सर.. किसी शहर की पुनर्रचना पर हिंदी में कर्मठता और बौद्धिक जिज्ञासा की पहले कभी इतनी लागत नहीं हुई, अविनाश बाबू.. अतिरंजना नहीं यथार्थ बोल रहा हूं! ज़े-सुआन काउंटी के इन उच्‍च अधिकारी का फैक्‍स देखिये आप.. ये साहब भी यही राय रखते हैं! रांची मेरी रचना से अमर हो जाएगी, सर!

प्रेमदर्शन के फैलाये कागज़ी अंबार को पैर से एक ओर हटाकर अविनाश हंसने लगा. ऐसी हंसी या तो पागल हंसते हैं या फिर पुलिसवाले. बाबा को घूरकर देखा जैसे दुनिया के सबसे बड़े पागल हों.

- हमसे कह दिया किसी और के सामने रांची मत कहियेगा. दो सौ कोड़ों की सज़ा मिलेगी और उठाकर सोलिटरी सेल में डाल देंगे!.. अपनी परिचित गुस्‍से की शैली में अविनाश ने बकना शुरू किया- आपको मालूम है, प्रेमदर्शन जी, उस शहर की सीमा के डेढ़ सौ किलोमीटर तक के क्षेत्र में आदिवासियों का घुसना निषिद्ध है? बिरसा का शहर एशिया के सबसे बड़े कसीनो में बदल गया है? शंघाई और शेज़्वान से वहां लोग लड़कियां खरीदने आते हैं? एक कोलंबियन-जर्मन कंपनी प्रदेश के सारे जंगलों को काटकर वहां मिनरल- मॉल डेवलप कर रही है? आपके बचपन का शहर प्रेतनगरी हो गया है.. अब वहां ऐसा कुछ भी नहीं रहा जिसे अमर करने का आप मुग़ालता पालें, प्रेमदर्शन जी!..

बाबा के हाथ का पुलिंदा छूटकर कमरे में कागज़ उड़ाने लगा. भिंचा चेहरा ज़र्द हो गया, लगा थोड़ी देर में मुंह से फेन फेंकने लगेंगे. अविनाश ने उदासीन भाव से हूनान के चीनी और अल-बसरा के इराकी की ओर देखा. डील-डौल वाले दोनों पट्ठे जिम्‍मेदारी से भागते हुए आए और पलक झपकते में अविनाश के सामने से प्रेमदर्शन और उनका कालातीत साहित्‍य क्लियर कर दिया.

- देश बिक गया और ये अमरता का लैमनचूस चूसना चाहते हैं!- बाबा की ओर हिक़ारत से एक नज़र मार अविनाश ने आंखें फेर ली. इसके पहले कि उसका तनाव किसी और बिंदु पर फटे, मैंने अपना आवेदन पत्र खोल लिया. चिढ़कर कहा- मुझे पहचान रहे हो, या मैं भी किसी प्रेतनगरी के कंकाल में बदल गया हूं?

अविनाश बेतिया मेन बाज़ार के उपभोक्‍ताओं की रुचियों के स्‍तर वाले विज्ञापन की हंसी में हंसने लगा. प्रेमदर्शन, प्रेतनगरी सब भुल गए, और वह वापस हमेशा वाली नौंवी कक्षा के फुटबॉल कप्‍तान के जगमग बाल-सुलभ निश्‍छलता में चमकने लगा. हंसते हुए ही जवाब दिय- कैसी बात करते हैं, भाई साहब.. आपको नहीं पहचानेंगे?

चिढ़ में झुंझलाहट घोलकर मैंने जोड़ा- लेकिन मैं तुम्‍हें नहीं पहचान रहा हूं! देवानंद के जॉनी मेरा नाम में भी आईएस जौहर के तीन ही रूप थे मगर तुम्‍हारा तो यार, थाह ही नहीं लग रहा है? कभी दिल्‍ली यमुना पार के निम्‍न मध्‍यवर्गीय चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हो जा रहे हो, कभी रवीश के सताये सर्वहारा तो कभी पिनोशे टाईप दमनकारी मशीनरी का सुरक्षा कवच! क्‍यों इतना टंटा खड़ा किये हो? क्‍या है तुम्‍हारी असल पहचान!..

अविनाश की हंसी उड़ गई. बीस वर्ष पहले मुक्‍ता एक असमिया पत्रकार के प्रेम में गौहाटी भाग गई थी उन दिनों अविनाश जैसे घायल और कटा-कटा रहता था, कुछ उन्‍हीं दिनों की एक्‍सप्रेसिव उदासी में उसने जवाब दिया- गरीब घर का बच्‍चा हूं, प्रमोद जी. कहां दमनकारी मशीनरी से जोड़ते हैं! सर्वहारा थे, वही रहेंगे..

- तो ये मैडल और बैज-सैज क्‍या है? बेल्‍ट में दो-दो पिस्‍तौल क्‍या है?- मैं एकदम-से उबलने लगा.

कंधे पर हाथ रखकर अविनाश ने मुझसे उठने का इशारा किया- बाहर चलिये, आपसे कुछ बात करनी है.

***

फैंसी इंडी पत्रिकाओं व टोक्‍यो के वेबसाइटों में भी मैंने ऐसी रंगीन तस्‍वीर नहीं देखी थी जिस तरह के रंगीन बार में लिफ्ट के चालीस माला दूरी को लांघकर अविनाश मुझे ले आया. काउंटर के पीछे, टेबलों के बीच हर किस्‍म की त्‍वचा और कटावों वाली जापानी लड़कियां घूम रही थी. झिलमिल रोशनी और किसी जैपनीज़ ब्‍लू बैंड के नशीले संगीत में यह कोई अन्‍य मौका होता तो मैं उन्‍माद में पागल होने लगता. अभी संज़ीदा होकर अपनी वासनाओं पर नियंत्रण रखने की चेष्‍टा की. लड़कियों को निरखने की जगह खुद को अविनाश की उदासी पढ़ने पर मजबूर किया. नीले फव्‍वारे से लगी स्‍कूली यूनीफॉर्म में एक तीस वर्षीय बाला लेकिन फिर भी गजब ढा रही थी, उससे सायोनारा कहने के लिए मैं मचलने लगता तभी हमारी मेज़ पर एक दूसरी गजब ढावक आ गई, मेज़ पर अविनाश की फ्रेंच वाईन और मेरी काली कॉफ़ी सजाने लगी. मेरे बिला वजह मुस्‍कराने को भंग कर अविनाश बताने लगे.

- पिस्‍तौल से गलत नतीजा मत निकालिये, भाई साहब.. ये बहुत बड़ा रैकेट है, मैं इस बड़ी मशीन का मामूली कल-पुर्जा भी नहीं!

- मगर यह सब रवीश के नाम पर क्‍यों हो रहा है? उस बेचारे को क्‍यों मोहरा बना रहे हैं? उसकी कहानी सुनकर मेरा तो मुंह ही खुला रह गया! जान कर वह तो मर जाएगा, यार? उसे बचाने के लिए कुछ कर नहीं सकते?- यही दिक्‍कत है मेरे साथ. अभी मिनट भर पहले हंस रहा था, अभी भावुक होकर लगभग रोने-रोने को होने लगा.

- आप एक तानाशाह की तरफदारी न करें. जैसी करतूतें रवीश करता रहा है जानकर मेरा भी मुंह पहले भक्‍क से खुला रह गया था!

- तुम असली रवीश को किसी और के साथ मिलाकर कन्‍फ्यूज़ कर रहे हो. उसकी फटीचर हालत मैंने देखी है, अविनाश. मुझसे अपनी सच्‍चाई कह रहा था इसीलिए तो मुझे जेल में डाला गया, उसे पता नहीं कहां ले के गए! उसका इस्‍तेमाल हो रहा है, अविनाश. कुछ बड़ी ताक़तें हैं जो उसके नाम के नीचे बड़े फ्रॉड खेल रही हैं!- जापानी लड़कियों वाली उत्‍तेजना रवीश के बहाने प्रकट होने लगी.

होंठों से वाईन का ग्‍लास हटाकर अविनाश वापस गहरी उदासी में डूब गया- आपने नहीं, एनडीटीवी की नौकरी मैंने की है! आपको मालूम है उस गौरवपूर्ण संस्‍था को मिट्टी करने में किस एक व्‍यक्ति का अकेले का जिम्‍मा है? आप जानते हैं उस उच्‍च संस्‍था का सबसे बड़ा शेयर होल्‍डर आज कहां है? प्रणय रॉय मैक्सिको की एक घटिया ऑयल रिफायनरी में मामूली क्‍लर्क की नौकरी कर रहे हैं और राधिका रॉय काठमांडू में एक व्‍यूटि पार्लर चलाती हैं. अपने नौ साल के बॉस दि बिग को अपने ड्राईवर का ड्राईवर बनानेवाला और प्रेमदर्शन को विक्षिप्‍तावस्‍था में पहुंचाने वाला और कोई नहीं आपका वही रवीश कुमार है! और आप उस घिनौने आदमी की तरफदारी कर रहे हैं?..

बिजली का करंट लगा हो मैं इस तरह सुन्‍न हो गया. यह कहानी ठीक-ठीक मेरे भेजे में साफ नहीं हुई तो प्रेमदर्शन की तरह जल्‍दी ही मैं भी विक्षिप्‍त होने को प्रस्‍तुत हो सकता था.

(जारी...)

हिंदी में चिंता

बड़ी मुश्किल है बेगूसराय, मुंगेर, बनारस, बरकाकाना है हिंदी की दिल्‍ली नहीं है. दिल्‍ली की हिंदी का दिनमान, हिंदुस्‍तान, धर्मयुग नहीं है. चालीस प्रकाशक हैं उनका धंधा है. चार सौ कवि-पत्रकार हैं उनका चंदा है. हंस का पोखर और समयांतर का लोटा है. पटना के मंच से युगपुरुष कहकर सम्‍मानित हुए उनका कद भी बहुतै छोटा है.

हिंदी की छपाई में पंचांग और कलेंडर हैं वर्ल्‍ड मैप नहीं है. वर्ल्‍ड मैप का ठेका है जिसके खिलाफ़ शशिधर शास्‍त्री ने दो मंत्रालयों को लिखा है सात लुच्‍चों को तीन वर्षों से समझा रहे हैं. राष्‍ट्रहित का प्रश्‍न है, बच्‍चो, पाप चढ़ेगा. लाजपत नगर का लुच्‍चा थेथर है हंसकर पेट हिलाता है. गुटका खाता हिंदी अकेडमी की गाता है. अराइव्‍ड फ्रॉम रांची हेडिंग फॉर मॉरीशस का लुच्‍चा शालीन है शास्‍त्री जी को चार रुपये वाली चाय पिलाकर समझाता है क्‍या चिट्टी-पत्री में लगे हो, मास्‍टर. भाग-दौड़ की नहीं अब आपकी घर बैठने की उम्र है. फालतू के झमेलों में देह और दिल जला रहे हो. आराम करो मुन्‍ना भाई की वीसीडी देखो. साहित्‍य-फाहित्‍य का रहने दो यहां लौंडे हैं संभालेंगे.

बेटा बेरोज़गार है और शास्‍त्री जी समझते हैं. मंत्रालय की सीढियों पर गिरकर प्राण गंवाना नहीं चाहते. वैसे भी पिछले दिनों से हिंदी की कम जवान बेटी की चिंता ज्‍यादा है. उद्वेग, उत्‍कंठा, आकांक्षा, साधना थी मगर अब उसका आधे से भी आधा है.

इतनी भागाभागी में किसको संस्‍कार की पड़ी है. शिक्षा में टुच्‍चई समाज में गुंडई है. पुरानी स्‍मृतियों के ताप की अगरबत्‍ती जलाकर कितनी और कब तक बदबू हटायेंगे. फिर अगरबत्‍ती महंगी है ज़मीन का भाव चढ़ रहा है और नई बीमारियां बढ़ रही हैं.

हिंदी की रेट लिस्‍ट का नया सर्कुलर आया है. नई दूकानों की लाइसेंसिंग हुई है. खुली है एक देहरादून में दूसरी दूकान बरेली में. मुन्‍ना भाई और मुलायम हैं हिंदी के माखनलाल और प्रशस्‍त राजमार्ग कहां है. सत्‍ता अंग्रेजी की ही नली से निकलती है. हिंदी पियराये कागज़ की नाव है संकरी नाली में बह रही है.

(पुनश्‍च: अंतरजाल में भी वही हाल है. सात छंद और सत्रह सेवैया है उससे बाद का बाहरी गवैया है. लोग आंगन में भंटा छत पर भतुआ फैला रहे हैं. तरकारी को बघार और घर-दुआर बुहार रहे हैं. कहते हैं इसी में सुख है. हिंदी का यही लुक है.)

रांची नहीं रांचोन और प्रेम के दर्शन

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: अट्ठारह

भौतिक आंखों से पहले अचेतन आंखों का कार्य-व्‍यापार शुरू हुआ. सवाल दर सवाल हैं जवाब हमको चाहिये का भावनात्‍मक उत्‍पात मचा हुआ था. रवीश को क्‍या सचमुच इसकी खबर नहीं कि उसके नाम, उसकी पहचान का कितना भारी षड़यंत्रकारी, बलात्‍कारी दुरुपयोग हो रहा है? वह एक विराट कॉरपॉरेशन का फ़रेबी चेहरा बना हुआ है और भले आदमी को इसकी सूचना तक नहीं? दस-पंद्रह वर्षों में अंतर्राष्‍ट्रीय मानवाधिकार संस्‍थायें जब रवीश रिसोर्सेस इंक को कठघरे में खड़ा करके उसके खिलाफ आरोप पत्र पढ़ेंगी तब कौन रवीश उसका सामना कर रहा होगा? अंतर्राष्‍ट्रीय फ्रॉड का सॉफिस्टिकेटेड क्‍लोन या मोतिहारी का भोला, भावुक रवीश कुमार?.. क्‍या अविनाश, भूपेन, अभय इस दोहरे दोगले यथार्थ से वाकिफ हैं? क्‍या रवीश को बचाने के लिए हममें से कोई कुछ भी नहीं कर सकता?.. अचेतन अवस्‍था में भी आंखों पर सवालों के नुकीले तीरों की बरसात हो रही थी.

वास्‍तविक आंखें एक ऐसे हॉलनुमा कमरे में खुलीं जिसे बंबई के बांद्रा में किराये पर पाने के लिए के लिए बीस वर्ष पहले भी बीस हज़ार पर्याप्‍त नहीं होते. फिलहाल मुफ्त में उसका सुख भोग रहा था. और अकेला नहीं था, हरी और सफेद पट्टियों के यूनीफॉर्म में तीन और लोग भी वही सुख भोग रहे थे. दो अच्‍छी लहीम-शहीम डील-डौल के कॉफी का मग लिये ताश खेलने का लुत्‍फ ले रहे थे, तीसरा- अपनी ही नस्‍ल का सांवला, विरूप, गर्दन तक बढ़ी दाढ़ी- दफ्ती वाले बोर्ड पर कागज़ चढ़ाये अपने विचार दर्ज़ करता दिख रहा था, साथ-साथ दर्ज़ भी कर रहा था. ध्‍यान गया यूनीफॉर्म के डेकोरेशन से ये तीनों ही सज्जित नहीं हैं, मैं भी उसी सजावटी श्रृंगार में हूं. बाकी तीनों की तरह मेरी छाती और कंधे पर भी चंद आंकड़े दर्ज़ थे. मैंनें आंकड़ों की तागोंवाली बुनावट को टटोला. मानो जांच रहा होऊं कशीदाकरी के इस वर्क की आउटसोर्सिंग चायना वाली है या अपने देसी लुधियाना का कमाल है. सामने विमल लाल होते तो चीखकर कहता साले, तुमसे गलती हुई है. हम बीमार नहीं हैं जो तुमने अस्‍पताल में डाल दिया है! लाइफ में कभी तो एक अकलवाला काम किया होता, यार!

सामने विमल लाल नहीं थे, और कंठ के अंदर स्‍वर भी बहुत चीखनेवाला महसूस नहीं हो रहा था. लग रहा था प्रयास करुं तो शायद कंठ से आं-बां जैसा कोई स्‍वर फुटे. मुझे एकदम-से बेचैनी होने लगी. मगर हकलाकर अजनबियों के बीच मैं बेचारा नहीं दिखना चाहता था. मगर दिख शायद वही रहा था. वही ताड़कर सांवले, विरूप सज्‍जन ने हाथ की दफ्ती फर्श पर रख दी और दाढ़ी में हाथ फेरते हुए मेरी ओर देख मुस्‍कराने लगे- घबराईये नहीं. उत्‍तम प्रबंध है. दिलशाद गार्डन के हमारे घर में सिर्फ घंटे भर के लिए आता था लेकिन यहां पानी की सप्‍लाई ट्वेंटी फॉर इन टू सेवन है! वेरी अफिशियेंट. यहां आने के बाद मेरी घटी नहीं क्रियेटिविटी बढ़ी ही है. बच्‍चों को मिस करता हूं इसका दुख ज़रूर है!

हवा में संवाद के इस हस्‍तक्षेप से लहीम-शहीम पार्टी ने अकुताकर दाढ़ीवाले बाबा पर एक नज़र फेरी. रिमोट से एफएम रेडियो ऑन किया और वापस अपने ताश के लुत्‍फ में लौट गए. चैनल पर अरब मुल्‍क चीनी सहयोग से कितनी तेजी से तरक्‍की कर रहे हैं इस पर चीनी में एक बातचीत प्रसारित हो रही थी. बीच-बीच में उल्‍लसित स्‍वर में ‘अल्‍लाहो- अकबर’ का एक कोरस उठता.

हाथ में दफ्ती लिए दाढ़ीवाले बाबा मेरे और करीब सरक आए. प्रेम से मुस्‍कराकर अपना परिचय दिया मानो चालीस वर्ष की स्‍त्री दुस्‍साहसी होकर अपनी उम्र का राज़ खोल रही हो- प्रेमदर्शन. मेरा साहित्यिक नाम है. सलमान रुशदी और ख्‍यातिलब्‍द्ध अंग्रेजी प्रकाशन संस्‍थाओं व हिंदी चैनलों में इसी नाम से विस्‍तरित व सुविख्‍यात हूं. नेहरु ने अहमदनगर किला जेल में भारत की खोज की, मैं यहां नो वंडर जेल में रांची के रंग की रचना कर रहा हूं..

मेरी हकलाहट एकदम से उड़ गई- ये अस्‍पताल है या जेल?

प्रेमदर्शन प्रेम से मुस्‍कराये. शायद मुस्‍कराना इनका फेवरेट एक्‍सप्रेशन है- मैं तो कहूंगा अस्‍पताल से ज्‍यादा सहूंलियत है. अब आपकी जिज्ञासा होगी जिस शहर को हूनान प्रांत के काला बजारियों ने खरीद लिया भला मैं उसके रंगों की रचना कैसे कर रहा हूं? तो सर, मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि रांची से मेरे बड़े निकट, अंतरंग संबंध रहे हैं. और मेरी यह वर्क इन प्रोग्रेस कृति बाल्‍यकाल की उन्‍हीं कोमल स्‍मृतियों को समर्पित होगी. इस संबंध में मैं हूनान प्रांत के जिम्‍मेदार अधिकारियों से पत्र-व्‍यवहार भी कर रहा हूं कि वे आनेवाले समय में रांचोन (रांची का वर्तमान नाम) में मेरी एक कांस्‍य प्रतिमा स्‍थापित करे. क्‍योंकि मेरी (अर्द्धलिखित लेकिन लिखी जाकर कालातीत होनेवाली) कृति रांची व रांचोन के मध्‍य एक सेतु का काम भी करेगी.

अमरता पर अभी और प्रवचन चलता लेकिन मैंने बाबा को रोक लिया- माने आप-हम.. ताश खेलते ये दोनों लफंगे मरीज नहीं.. कैदी हैं?

- एक तो हूनान प्रांत का ही है. गांव की लड़कियों को नेपाल में बेचने का कारोबार करता था. दूसरा इराकी है. युद्धपीडित अपाहिज बच्‍चों की तस्‍करी के इल्‍जाम में पकड़ा गया है- बाबा ने चहकते हुए मेरे ज्ञान में वृद्धि की. मेरी पुस्‍तक में इन दोनों का ही मार्मिक वर्णण होगा. आपका भी होगा, मुस्‍कराकर प्रेमदर्शन बाबा ने स्‍वयं को करेक्‍ट किया- लेकिन उसके पहले आपको अपना परिचय देना होगा?

चार्ल्‍स ब्रॉंसन या यूल ब्राइनर होने की तमन्‍ना नहीं थी फिर भी जेल की दीवारों का महीन निरीक्षण करता उदासीनता से मैं बुदबुदाया- मेरा कोई परिचय नहीं, बाबा. मैं व्‍यर्थ और बेमतलब हूं.

तब तक एफएम के एक अन्‍य चैनल पर पहचानी आवाज़ में प्राथमिक चीनी का काव्‍य पाठ आरंभ हुआ. अंदाज़ करना मुश्किल था मान्‍या का स्‍वर प्रिय के विरह में उदास और कातर हो रहा था या असल वजह थी बलपूर्वक चीनी पाठ को मजबूर किया जाना! तदोपरांत किन्‍हीं सज्‍जन कुमार ने चीनी में ब्‍लॉगिंग के फायदे गिनाना शुरू किया. ऑनलाईन ऑरेंज व स्‍नूकर पुरस्‍कारों का विस्‍तृत विवरण देने के पश्‍चात् उन सभी को आगाह किया जो अभी भी छिपकर छोटी बोलियों व अपनी मातृभाषा में ब्‍लॉग चलाने के जिद पर अड़े हुए थे. इस संबंध में हज़ारीबाग के जंगलों से पटना के एक नौजवान रियाज़ुल हक़ की गिरफ्तारी एक बड़े सबक की तरह पेश की जा रही थी.

इतने में फौजी बूटों का टिक्- टॉक् सुनाई पड़ा. फिर रौबिले ठाठ में फौजी की साक्षात उपस्थिति हुई. लहीम-श‍हीम पार्टी एकदम-से ताश फेंककर अच्‍छे बच्‍चों के आदर्श तस्‍वीर में परिणत हो गई. प्रेमदर्शन बाबा आड़े-तिरछा होते हुए मुस्‍कराहट चुवाने लगे. स्‍वर में रसगुल्‍ले का रस घोलकर बोले- सर, इस फॉर्मल पोशाक में एगो फोटो दे देते त् हमरी पुस्‍तक में चार चांद लग जाता!

- ठीक है, ठीक है, लडियाईये नहीं, प्रेमदर्शन जी. जो संभव है वह अपने समय पर किया जाएगा.

रिमोट से रेडियो ऑफ करने के बाद रोबिले फौजी यानी अविनाश ने पैरों से कुर्सी खींची. होंठों में एक सिगरेट दाबकर आराम से बैठ गया.

(जारी...)

Tuesday, March 27, 2007

बीड़ी के बंडल से तंबाकू के पाउच तक

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: सतरह

रवीश उठकर खड़ा हो गया. मेरी बात का जवाब देने की बजाय टहलकर गोदाम के शेल्‍व्स पर पड़े भारी पैकेटों का मुआयना करने लगा. हाथ के इशारे से मुझे अपनी तरफ बुलाया मानो मैं ताजमहल देखने आया कोई विदेशी टुरिस्‍ट हूं और वह लोकल राजू गाईड.

- ये वेयर हाऊस देख रहे हैं, भाई साहब? मालूम है मार्केट में कितनी कीमत है?.. फिल्‍मवाला मामला होता तो मैं भी अमिताभ की तरह कहता इस शहर में आया तो कुछ नहीं था मेरे पास और आज शहर मेरे पैर चूमती है.. सब मेरा है!.. कहकर रवीश हंसने लगा.

- कॉलेज में ये सब खूब किया करता था. लड़कियां पसंद करती थीं. कहती रवीश, वन्‍स मोर. डू दैट अर्लियर बिट. कल्‍पनाओं में हमने बहुत सारे शहरों से पैर चुमवाये हैं, सर. ढेरों वेयर हाऊस अक्‍वायर किया है... हक़ीकत में आकर उलझ जाते. सामनेवाला समझ जाता घसियारे हैं जबर्जस्‍ती अमिताभ वाले रोल के लिए जिद कर रहे हैं.

- ये सब तुम्‍हारा नहीं है?, मैंने टोका.

रवीश ने प्‍लास्टिक वाली कुर्सी खींची. फैलकर बैठ गया. पैर उठाकर टेबल पर फेंक दी. शायद सिगरेट होता तो उसे होंठों के बीच फंसाकर फिर से दीवार वाला कोई डायलॉग बोलता. कहने लगा- बाहर सेक्‍युरिटी की ड्यूटी पर एक बुड्ढा बैठता है. उसकी जेब में बीड़ी का एक बंडल डालकर लंच के लिए यहां आते हैं. बीड़ी का बंडल उसका रेट नहीं है. यहां आने देकर मुझपर अहसान करता है. इसलिए नहीं करता कि हमारे गांव का है. गांव-टोले की प्रतिबद्धताएं खत्‍म हो गईं, सर. छोटे बेटे को चीन भेजने के लिए इसने गांव की ज़मीन बेच दी थी. पैसे पूरे नहीं पड़ रहे थे. अंत में बाबूजी ने उबारा था. उसी का अहसान एक बीड़ी का बंडल लेकर मुझे अंदर आने देने से करता है. हालांकि चीन जाकर बेटा फिर वापस नहीं लौटा. और न ही हर महीने कैलेंडर देखकर नियम से बाप के अकाउंट में युआन का एक्‍सचेंज डालता है. बुड्ढे ने दिल पे नहीं लिया है. बाप का दिल आखिर बाप का दिल होता है. सामाजिक पतन में हम कितना भी ऊंचा हाई जंप ले लें बाप फिर भी बेटों को माफ़ करते हुए ही दिखेंगे. भारतीय समाज है, सर. खालिस गांव के संस्‍कार हैं.

- तुम कहां बहक रहे हो, यार! तुमसे सीधा सवाल कर रहा हूं जवाब देने की बजाय तुम कभी गांव टहल रहे हो, कभी चीन!...

रवीश बुरा मान गया. टेबल से पैर उतारकर गंभीरता से मेरी ओर देखने लगा- एक बात बताईये, सर. हम पहले कितनी दफा मिले हैं? साथ-साथ डिनर किया है? ढाबे पर बोटी नोंची है? ब्‍लैक में टिकट खरीदकर फिल्‍म देखी है साथ?...

मैं बेवकूफों की तरह उसे देखता रहा. बात समझ में नहीं आ रही थी. आखिर कहना क्‍या चाहता है? रवीश को समझ आ रहा था वह क्‍या कहना चाहता है.

- तब से आप यार-यार किये जा रहे हैं! चार दफे हमारा लिखा पढ़ लिया, हमने हंसकर दो बात कर ली तो आपके यार हो गए? ऐसे ही आप लाइफ में यार बनाते रहे हैं, सर?.. हमारी बात का बुरा मत मानियेगा. लेकिन हर चीज़ का एक तरीका होता है. तहजीब होती है. सामने वाले को हमेशा जोकर मत समझिये. वह भी हाड़-मांस का आदमी है. कहीं से आया है. शिक्षा ली है. जीवन का अनुभव होगा उसके पास. उसका अंदाज़ है आपको? कभी थाह लेते हैं आप लोग? पलक झपकते यार बोल दिया! किस बात के यार? कहां के यार?.. आप तो नाराज़ हो गए. आप हल्‍ला मचायें तो ठीक हमने मुंह खोल दिया तो आपकी संवेदना को ठेस लग गई! क्‍या करे गांव का आदमी आप जवाब दीजिये, सर! शहर आना बंद कर दें? समझ लें कि उसकी जगह टूटी मेंड़ों और खड़खड़ाती बसों में है बड़े शहरों में जाकर वह परिष्‍कृत संवेदनाओं को सिर्फ ठेस पहुंचाने में ही योगदान कर सकता है? यही कन्‍वे कर रहे हैं आप?..

मैं थक रहा था. यह आदमी सहज मानसिक अवस्‍था में नहीं. इससे सिंपल बातचीत होने से रही. फिर? गोद में हाथ डाले इसके सामान्‍य होने का इंतज़ार करुं? या इसकी पत्‍नी को फोन मिलाकर पता करुं कि ऐसे मौकों पर रवीश को डील करने का तरीका क्‍या है. वह जानती होगी? इसका बॉस जानता होगा? मैं क्‍यों बहक रहा हूं? रवीश या किसी की भी असामान्‍यता मेरा कंसर्न नहीं. मुझे अपना ब्‍लॉग चाहिये, बस! एंड ऑव द स्‍टोरी. वही मैंने उससे कहा भी.

- मेरा ब्‍लॉग लौटवा दीजिये, महाराज. फिर आप मोतिहारी में रहें कि चीन जायें आपका टंटा है हमको क्‍या करना है...

रवीश एकदम-से बुरा मानकर खड़ा हो गया. शायद फिर किसी अमिताभ टाईप डेलिवरी के मोह में आ गया था. मुक्ति मिली कि तभी अपने विमल लाल टहलते हुए चले आए. मानो अंदर सिनेमा हॉल में गाना शुरु हुआ हो और साहब सिगरेट पीने बाहर निकल आये. बाहर आकर सिगरेट नहीं दांत से गुटका वाला पाउच काट रहे थे.

- आप भी प्रमोद जी... आदमी दो घड़ी चैन से सांस ले रहा है और आप आकर खोल दिये पिटारा! चलिये, हटिये, यार.

विमल जी रुपक में बोल रहे थे. क्‍योंकि मैं रास्‍ते में नहीं था जो हटता. जहां था वहीं रहा. विमल लाल ज़रुर रवीश के बाजू जाकर खड़े हो गए. पाउच का तम्‍बाकु थोड़ा रवीश की हथेली पर गिराया, कुछ अपने मसूड़े में दाबा. रवीश प्रसन्‍न होकर चहकने लगे.

विमल मुझको और बीच-बीच में रवीश को घूरता रहा, फिर बेचैन होकर उसने जेब से इंटरकॉम का फोन बाहर किया. चीखकर पता नहीं किस ज़बान में इंस्‍ट्रक्‍शन दिये. तब तक रवीश भी बेचैन होने लगे. दाल में काला का केस नहीं यह काली दाल वाला मामला लग रहा था.

रवीश एकदम-से विमल के कंधे पर अपना भारी हाथ रखकर झूलते हुए बोले- ये आपने हमें क्‍या खिलाया है, विमल जी?

विमल मियां ने जवाब नहीं रवीश के चेहरे पर खींचकर घूंसा जड़ा. रवीश बाबू कटे पेड़ की तरह ढेर हो गए.

मैं कूदकर विमल पर हमला करने वाला था मगर उसकी नौबत नहीं आई. वेयर हाऊस के दरवाज़े से ढेरों फौजी भागते हुए अंदर आ रहे थे.

(जारी...)

Monday, March 26, 2007

शहर में रामकुमार

जै कन्‍हैयालाल की, मदन गोपाल की. रेलवे क्रॉसिंग की भीड़ से दोपहिया निकालते रामकुमार उससे आगे का भूल रहे हैं. परात में सिंघाड़े का हलुवा याद है मां की साड़ी का छापा भुल रहा है. लोहरदगा की छोटी लाईन नहीं भूले लेकिन मंजु मई की गर्मी में बेदम होकर गिर पड़ी थी की याद धुंधली पड़ गई है. बगीचे की छांह याद है पर आम का स्‍वाद मुंह से उठ गया है.

सड़क के किनारे दोपहिया रोककर जतन से अंतर्देशीय खरीदते हैं रामकुमार लेकिन मन की परत दर परत उघाड़कर अगली रेल से वापस घर भेज सकें ऐसा होता कहां है. दोपहिये की पेट्रोल की तरह मन की उथल-पुथल भी शहर की सड़कों पर चुक जाती है. रात के निबिड़ खालीपन में बस एफएम रेडियो का गाना और गली के कुत्‍तों का शोर बचता है. नल का टपकना सुनकर अचकचाये उठते हैं रामकुमार. भोर की भागा-भागी में कुम्‍हलाया चेहरा तकते हैं आईने में. कितने महीने हुए, कितने साल. कितनी तेज़ी से बदले हैं रामकुमार.

दीवार में मदन पुरी को खिड़की से फेंकनेवाला सीन भूला नहीं हूं, सर!

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: सोलह

- यहां कोने में बैठ के अब ये कौन नाटक खेल रहे हो?- मैं लगभग चीखता हुआ रवीश तक गया.

अच्‍छे काम के बावजूद ऑफिस में डांट पड़ रही हो के अंदाज़ में रवीश का चेहरा उतर गया. धीमे-धीमे मुंह में पराठा घुमाते हुए बोले- आप फिल्‍मवालों के साथ यही दिक्‍कत है, भाई साहब, हर जगह नाटक दिखता है. चार घंटे की शुद्ध रगड़ाई के बाद मुंह में दो निवाला डाल रहा हूं मगर आप चाहते हैं वह भी हराम हो जाये. ऑफिस में बॉस को कहते हैं एक लैपटॉप दे दो, फील्‍ड से रिपोर्टिंग में आराम हो जाएगा तो वो कहता है कानपुर जा रहे हो कि कैलिफोर्निया? ग्रेटर कैलाश में में थ्री बेडरुम फ्लैट भी खरीदकर दे दूं? अच्‍छा तमाशा है. आदमी जिम्‍मेदार अधिकारी से अपनी परेशानी बोल रहा है और साहब व्‍यंग्‍य में जवाब दे रहे हैं! क्‍यों मजाक कर रहे हैं, सर? आपका डंडा हुआ है उसके लिए हम रेस्‍पॉंसिबल हैं? बीस साल पहले मीरा नायर ने एक फिल्‍म बनाई थी. द नेमसेक. जाईये, जाकर वो फिल्‍म देखिये, फिर आदमी की तरह हम से बात कीजिये. हम सब अपने जड़ों से कटे हुए लोग हैं, सर. गांव से तोड़कर पेट ने हमें महानगर से जोड़ दिया है. डीटीसी की बस और इकानॉमी क्‍लास में चार पैसे बचाकर इंसानियत सहेजने की कोशिश करते रहते हैं. दिहाड़ी मजूर की तरह जूझे रहते हैं साले को. शिकायत का कभी मौका नहीं दिया. आपसे लैपटॉप मांग लिया गलती हो गई? गुनाह हो गया, आलमपनाह? घर में जो कुत्‍ता पाल रखा है उसका मंथली बजट क्‍या है? जो लड़कियों की संगत में शाम को वाईन ऑर्डर होता है उसका! हम सवाल करें तो खराब? और आप दिन भर हमारे ऊपर थूकते रहें वो जॉनी लीवर का जोक! मुस्‍कराकर कहें अच्‍छा कर रहे हैं? प्‍लीज़, डू इट अगेन, थैंक्‍यू, सर? कमाल है! लैपटॉप मांग के ऐसी गलती कर दी? आप भी छोड़ दो फिर कंपनी का टाटा सियेरा? जेपी के टाईम के कुरता झोले में घुमो! जाओ जनता के पास?

लगा मेरा सामने खड़ा होना मात्र संयोग है. मन के तारों के खुलने का बहाना भर है. बस. रवीश मेरे साथ नहीं दफ्तर में अपने बॉस के साथ संवाद में हैं. झुंझलाकर मैंने रवीश को रोकने की कोशिश की- चबर-चबर किये जा रहे हो! बात सुनो, यार!

भरी-भरी पनीली आंखों से रवीश ने एक बार मेरी तरफ देखा, फिर बचे हुए पराठे की तीन-चार परत करके मुंह के अंदर ठूंस लिया और लगभग अंदर ठेलते हुए निगल गया. गले में तकलीफ हुई तो हाथ उठाकर ठहरने को कहा. प्‍लास्टिक की बोतल से गट-गट दो घूंट भरी, फिर लंबी सांस खींचते हुए भारी देह को सामान्‍य के सम पर लौटाने लगे. बुदबुदाकर कहा- खड़े-खड़े किसी दिन गिर पड़ेंगे साला तब आप लोगों को चैन पड़ेगा!

- यहां मंच पर नाटक नहीं हो रहा, रवीश!, मैं बरसा. - कि तुम दर्शकों की सहानुभूति के लिए आत्‍म-दया का पार्ट खेल रहे हो. कि मुझको भटकाने के लिए यह फिर कोई रुप धरा है तुमने!

- ऐसा ही प्‍यारा रुप है तो आप ही क्‍यों नहीं ले लेते? ले लीजिये!, दुखी होकर रवीश पुराने अखबार से टेबल की गंदगी बुहारने लगा.

- सीधे बात करो तो किसी के समझ में ही नहीं आता! गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में संवेदना और युग का सच बोलेंगे! इंडिया इंटरनेशलन सेंटर में आम आदमी की पीड़ा और संवादहीनता पर पर्चा पढ़ेंगे. क्‍या नहीं समझ में आता है, भाई साहब? क्‍यों? आपको है और हमको लैपटॉप की दरकार नहीं है! अशोक विहार पैलेस में लंच खाके आप बारह हजार का चेक काट दीजिये और हमने मुंह खोला तो कंकड़बाग के घसियारे? प्रैस क्‍लब के शराब का बिल लाकर दिखाऊं आपको? या एनालिस्‍ट के यहां सीटिंग पर पैसा बहाया है वो लाकर रखूं सामने?...

लंबी सांस खींचकर रवीश ने आंखें बंद कर लीं. दोनों हाथों से चेहरा मला फिर थकी नज़रों से सामने की दीवार तकने लगा.

- पटना-दानापुर कहीं बैंक की नौकरी कर लिये रहते तब ठीक रहता. दिन भर अंतरविरोध नहीं जीते. गुस्‍सा आता तो गुस्‍सा ज़ाहिर करते. मुस्‍कराकर माफ़ी नहीं मांगते कि गलती हो गई. सॉरी, सर! दिन भर सॉरी बोलते-बोलते थक गए हैं लेकिन आप अभी भी समझने से इंकार कर रहे हैं. किसी दिन बांध टूट गया, कोने में भागकर आपका गला पकड़ लिये तो बहुत देर हो जायेगी. फिर सॉरी मैं नहीं आप कहने के लिए छटपटायेंगे मगर तब तक बहुत देर हो चुकी हो होगी. बांध को टूटने से रोके हुए हैं. बटुए में सुखी परिवार की एक पुरानी फोटो है. बेटी और पत्‍नी का मुस्‍कराता चेहरा है. मैं भी उनकी खुशी में कदम मिला कर चलने का प्रयास कर रहा हूं. गौर से फोटो देखिये तो आपको दिखेगा. इसे हमारी कमज़ोरी मत समझिये. गांव की शिक्षा और शुद्ध संस्‍कार हैं. किसी दिन फैल गया तो फिर आप भागकर किसी चैंबर, केबिन में छिप नहीं सकियेगा, सर! अमिताभ बच्‍चन की पुरानी फिल्‍मों का फैन हूं. पटना के मोना टॉकीज में दीवार सात दफे देखी थी. परवीन बाबी की मौत के बाद एक सीन है. होटल के कमरे में मदन पुरी लड़की को लेकर लेटा हुआ है. उसे लगता है मौज है. एवरीथिंग इज़ फाईन. लेकिन दरवाज़ा ठेलकर अमिताभ घुसता है अंदर और कठघरे में और खबरों की खबर का खुलासा नहीं करता. सीधे मदन पुरी को टांगकर हाई राइज़ होटल की खिड़की से बाहर फेंक देता है! मेरे लिए बहुत सिंबोलिक सीन था सर! वह सीन आज भी भूला नहीं हूं, सर!

अमरीकी फिल्‍मों में सीबीआई का अफसर जिस तरह मुज़रिम को घेरने के लिए देह टेढ़ा और पैर नीचे लटका कर टेबल पर नितंब की टेक लेता है, कुछ उसी अंदाज़ में टेबल को अपना भार सौंपकर मैंने रवीश को घेरा. ब्‍लॉग विक्टिम की जगह फिलहाल सरकारी वकील वाले रोल में था. पूछा- एक बात बताओ. तुम्‍हीं नहीं थके हो, तुम्‍हारे पीछे नाच-नाचकर मैं भी पक गया हूं. इतना बताओ तुम जो दिख रहे हो अभी वह रियल है या...?

हैरानी से एक दफे मुझको देखकर रवीश ने मुंह फेर लिया. पेपर की गंदगी को मुट्ठी में बंद करते हुए कहा- परौठा-भुजिया खाता आपको रियल क्‍यों लगूंगा! आपको तो शो चाहिये, टीम-टाम चाहिये? क्‍या करुं फिर? सिर के बल खड़ा हो जाऊं! फिर रियल लगेगा आपको?

रवीश के कंधे पर हाथ रखकर मैंने कहा- तुम ये हो तो वो कौन है? ज़मीनों का कब्‍जा, लोगों का दमन? चीन के साथ सांठ-गांठ. रवीश रिसोर्सेस इंक! अब ये मत कहो तुम्‍हें इन सबकी कोई खबर नहीं है?

(जारी...)

ब्‍लॉग में कौन आए की बहस का एक और पहलू

बेजी ने अपने ब्‍लॉग पर कल एक पोस्‍ट चढ़ाया- पत्रकार क्‍यूं बने ब्‍लॉगर?- और नारद पर उसे खूब हिट्स मिले. प्रतिक्रियायें उतनी नहीं मिलीं. माने इस विषय में जिज्ञासा बहुतों की थी, मगर राय ज़ाहिर करने से भाई लोग कतरा गए. क्‍यों? इसलिए कि चबर-चबर बोलनेवाले पत्रकारों से वे फिर किसी नये विवाद में उलझना नहीं चाहते थे? याकि यह विषय उन्‍हें चिंतित तो करती है मगर पत्रकार बिरादरी से वे अपने संबंध बिगाड़ना नहीं चाहते? वजह जो भी हो कुल जमा यही रहा कि बेजी ने एक चिंता को स्‍वर दिया जिसमें ढेरों लोग हिस्‍सेदार हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर नतीजे तक आने से कतरा रहे हैं. इम्‍तहान देकर टेंशन सबने पाल लिया है मगर रिज़ल्‍ट को पेंडिंग कर रहे हैं.

यह बात समझ में आती है कि लोकप्रियता की गरज से या जेनुइन चिंता में, जो भी वजह रही हो, अविनाश ने अपने ब्‍लॉग पर कुछ बहसों का सिलसिला चलाया. कुछ मुद्दे ऐसे निकल आए कि दो सौ-ढाई सौ (ठीक संख्‍या मुझे मालूम नहीं है, क्षमा करेंगे) के इस चिट्ठाकार समाज में विरोधी कैंप बन गए. शायद हंसी-खेल की अंताक्षरी में एक निहायत नया स्‍वर घुस आया था और खेल बिगाड़ रहा था.

अब इस पर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है कि खेल के बिगड़ने का मतलब क्‍या है. खेल क्‍या है. चिट्ठाकारी और ब्‍लॉगिंग क्‍या है. ऑन लाईन डायरी गुलज़ार की किताब को पा लेने के सुख, पास्‍ता का वर्णण और लिट्टी-चोखा का आस्‍वाद, अपनी कविताओं को सजा-छपा देखने की खुशी, किसी देखी गई फिल्‍म और उतारे गए फोटो पर हमारी-आपकी राय, मन की उधेड़-बुन और यार-दोस्‍तों की गपास्‍टक, इंटरनेट व हिंदी ब्‍लॉगिंग की तकनीक व नई जानकारियों को जानने-बांटने का उल्‍लास- के दायरों में ही रहे ऐसा हम क्‍यों चाहते हैं? क्‍या यह कक्षा में किसी नये छात्र के चले आने पर पैदा हुई बेचैनी है जिसका व्‍यवहार, रंग-ढंग ठीक-ठीक वैसा ही नहीं है जैसा सामुदायिक तौर पर हम देखते रहे थे? अपने बारे में आपकी राय मैं नहीं जानता मगर समुदाय में रवीश कुमार और अनामदास को पाकर आप प्रसन्‍न नहीं हैं? भाषा और विचारों की प्रस्‍तुति का उनका अंदाज़ आपको लुभावना नहीं लगता? ये दोनों पत्रकार हैं, मैं नहीं हूं, लेकिन दोनों के ही पोस्‍ट बड़े चाव से पढ़ता हूं, जबकि अनामदास की चिंतायें बहुत मेरे मिजाज़ के अनुकूल भी नहीं हैं. फिर भी. क्‍योंकि उनको पढ़ने में एक विशेष रस मिलता है.

आप फिर मुझे बड़बोला और सर्वज्ञानी की गाली देकर धिक्‍कारेंगे, दीजिये. वह ज्‍यादा अच्‍छा और स्‍वास्थ्‍यकर है बनिस्‍बत किसी फारुकी या नीलेश मिश्र के लिखे पर बम-गोला होने लगने के. भई, पत्रकार समीक्षा करेगा तो ज़ाहिर है अपनी बिरादरी को पहले याद करेगा. आप किसी तकनीकी फॉरम में चर्चा करेंगे तो तकनीकी बिरादरी के कामों की तारीफ करेंगे, रवीश की लिखाई को याद करना शायद तब आपको याद न आए. इसमें ताजुब्‍ब और तकलीफ क्‍यों है? अंतत: तो आप भी मान ही रहे हैं अच्‍छे और सार्थक पोस्‍ट्स ही अपनी तरफ ट्रैफिक खींचेंगे, कोरा सेंशेनलिज्‍म नहीं. मेरी जानकारी इस विषय में कम है मगर हिंदी के अच्‍छे और बुरे ट्रैफिक में भी अभी फ़र्क कितना है? चार सौ? पांच सौ? सिलेमा वाले मेरे ब्‍लॉग पर औसतन पचास लोगों की आवाजाही होती है, कभी-कभी और भी कम. अभय अच्‍छा लिखते हैं मगर वह भी पचास पाठक पाकर सुखी हो लेते हैं. तो उसके लिए अभय और मैं पत्रकारों को तो दोष नहीं दे सकते. ढाई सौ की बिरादरी में जिनकी संख्‍या पंद्रह से ज्‍यादा तो कतई नहीं ही होगी, और उसमें भी हल्‍ला करनेवाला अकेला अविनाश है.

भई, अंताक्षरी के खेल के बिगड़ने की अभी तो यह ढंग से शुरुआत भी नहीं है. अपने माध्‍यम में अपनी इच्‍छा का करने से वंचित हुए पत्रकार ब्‍लॉग में मन की भड़ास निकाल रहे हैं. हम फिल्‍म बनाना चाहते थे, पैसा लगानेवाला मिला नहीं, मगर सिनेमा की जो हमारी पसंद है उस पर अपने ब्‍लॉग में लिख रहे हैं. लिखते रहेंगे. पैसे का अभाव हमारे इस एक्‍सप्रेशन के राह रोड़ा नहीं बन रहा. इसमें क्‍या बुराई है? हेल्‍दी ही है. गंध तो आनेवाले दिनों में मचेगा. जैसे-जैसे सुलभता बढ़ेगी, नये खिलाड़ी आयेंगे. बाज़ार के विचार, सेक्‍स और सामान बेचनेवाले.

ब्‍लॉग में बात कम विज्ञापन ज्‍यादा होगा. हमारे गरीब टेप्‍लेट से ज्‍यादा चमकदार, ज्‍यादा प्रभावी होगा. वीडियो क्लिपिंग्‍स दिखाएगा, हिट गाने सुनाएगा. उनके ट्रैफिक के आगे हम कहीं नहीं टिकेंगे. फिर? तब क्‍या करेगा नारद? शायद तब तक नारद का और विस्‍तार हो, ज्‍यादा साधन-संपन्‍न बने, मगर जो बीस तरह की नई आवाज़ें होंगी और जिनके पास बाज़ार की ताकत और ज्‍यादा साधन-संपन्‍नता होगी वो चुप तो नहीं ही बैठेंगे. लुभावने ठाट-बाट के आकर्षण से लैस नए पोर्टल खोलेंगे. ट्रैफिक की नाटकीयता से हमें चकाचौंध कर देंगे. तब? उस बड़े परिदृश्‍य के आगे बिचारे चार अदद पत्रकारों का ‘नाटक’ क्‍या मायने रखता है? हमारे लिए तो वह स्‍वास्‍थ्‍यकर चुनौती होनी चाहिये. नये चैलेंजेस का मज़ा लेने की बजाय हम नये विद्यार्थियों की तरफ ढेला क्‍यों फेंके? उन्‍हें पहचानना हो तो सीधे उन्‍हीं से क्‍यों न बात करें? आप फिर हमें गालियां देकर चुप्‍पा मारकर गुमसुम मत हो जाइयेगा. मारना ही होगा तो कमेंट मारियेगा. स्‍वागत होगा.

नीचता के समर्थन में

साहित्‍य की अप्रगतिशील धारा का घोषणापत्र (एड हॉक)

हमारी आंखें बंद थीं. अब खुल गई हैं. इसके लिए रवीश कुमार के सामाजिक अध्‍ययन काम न होने का मानसिक तनाव के हम आभारी है. आनेवाले कुछ घंटे रहेंगे. आभारी (इससे ज्‍यादा रहने में हमारा दम फूलने लगता है. अपने बाप तक के नहीं रहते. कुछ घंटों के बाद. बीवी तक हमारी नहीं रहती. आभारी. श्री रकु सामाजिक प्रकिया समझते हैं सो हमारी मुश्किल भी समझेंगे. और आभारी होंगे और बने रहेंगे). बाकी जहां तक काम न होने के मानसिक तनाव की बात है उसका हल हमने खोज लिया है. प्रेमचंद, निराला, यशपाल, रेणु, और ‘जहां लक्ष्‍मी कैद है’, ‘एक पत्र और तीन आलपिनें’ के रचयिताओं ने जहां साहित्‍य की धारा को छोड़ दिया था मैं उसे वहां से उठाकर एक कदम आगे ले जाने को कृतसंकल्‍प हो गया हूं. भैरव, भवानी, अमरकांत, मार्कण्‍डेय, दूधनाथ, गुप्‍ता, शर्मा जहां पहुंचने में चूक गए मैं वहां जाकर अपनी विजय-पताका लहराना चाहता हूं. मैं साहित्‍य में अप्रगतिशील धारा का सूत्रपात करना चाहता हूं.

काम न होने के मानसिक तनाव से बचने का इससे अचूक औषध दूसरा मुझे नज़र नहीं आ रहा. फिर आज के समय के लिए ऐसा साहित्‍य बहुत प्रासंगिक भी रहेगा. चतुरी चमार और बिल्‍लेसुर बकरिहाओं को निकट रखकर सामाजिक शर्मिंदगी के भय से मैं मुक्‍त हो जाऊंगा. तॉल्‍सतॉय और दॉस्‍तेवेस्‍की पुराणों के भारी-भरकमपने को खिड़की से बाहर फेंक देने में मुझे फिर तकलीफ नहीं होगी (रणनीति में थोड़ा परिवर्तन किया है. खिड़की से बाहर फेंकने की बजाय उन्‍हें रद्दीवाले को सौंपकर मैंने आंदोलन का अभी-अभी बिगुल बजा दिया है). नीच लोगों को लगातार गालियां देकर थकते रहने की जगह उन्‍हें साहित्‍य में नायकत्‍व देकर इस थकान से बचा जा सकता है. समाज के बाहर हो ही रहा है साहित्‍य में भी नये मूल्‍यों की स्‍थापना हो सकेगी. साहित्‍य और समाज के अंतर्संबंध प्रगाढ़ होंगे. सस्‍ता साहित्‍य मंडल, एनबीटी और श्रीराम कला सेंटरों की दया पर आश्रित रहने की जगह साहित्‍य सा‍माजिक मुख्‍यधारा में स्‍थान पाएगा. जो काम बीस वर्ष पहले दीप्‍ती नवल से लिखवाकर गुलज़ार साहब ने किया था वैसे ही करीना कपूर व प्रियंका चोपड़ाओं से पोयम लिखवाकर मैं साहित्‍य को उन्‍नत करने की दिशा में योगदान कर सकूंगा. पत्‍नी के पास भी तब शिकायत करने को नहीं रहेगा कि पढ़ने की मेज़ पर विवेकानंद को हटाकर मैंने करीना कपूर को क्‍यों सुशोभित किया है. हो सकता है मेरी बजाय वही इस पुण्‍य काम को अंजाम दे. और दीवार पर करीना को टांगने के बाद दो कदम पीछे हटकर हम साथ-साथ फोटो की ओर देखकर मुस्‍करायें और कोडेक फैमिली मोमेंट जेनरेट करके पारिवारिक सामंजस्‍य का एक सुखी क्षण भी क्रियेट कर जायें. इस तरह पत्‍नी साहित्‍य-संहारक से साहित्यिक-संगिनी के कमनीय, रोमेंटिक रोल में शिफ्ट हो लेगी. फ़ायदे ही फ़ायदे होंगे, गुरु. यादव और कमलेश्‍वर ने आंख खुली रखी होती तो चालीस साल पहले ही आंदोलन ले उड़े होते. मगर ईश्‍वर और रवीश की दया से यह ऐतिहासिक कार्य मेरे हाथों होना लिखा था.

अप्रगतिशील साहित्‍य के क्रियान्‍वयन का एक दूसरा फ़ायदा यह है कि आयोजन-संयोजन कमेटियों में सब तरह के लुच्‍चों को डाला जा सकेगा. फिर छोटे शहरों के कंगले कवि दारु-कबाब को तरसेंगे नहीं. मंत्रालयों व दूतावास के लुच्‍चों के समर्थन से विदेशों में सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान का सुख भी फिर जेनुइन साहित्य की झोली में ही बना रहेगा. मंगलेश डबराल व वीरेन डंगवालों की बेमतलब बकवास सुनने की जगह हम दूतावास की दारु के साथ-साथ हिमेश रेशमिया को भी सुन रहे होंगे. कैलाश खेरों के मुंह से घड़ी-घड़ी सूफियाना सुनना भी फिर अटपटा नहीं रहेगा. म्‍यूजिक टुडे के लिए ही नहीं, साहित्‍य अकादमी की ओर से भी मुज़फ्फर अली को सूफी संगीत सभा के आयोजन के लिए आमंत्रित किया जा सकेगा. उषा उत्‍थुप का भी स्‍वागत होगा. और आह्लादित होकर सिर डुलाने के एक्‍सप्रेशंस एक्टिंग नहीं फिर ऑथेंटिक और जेनुइन होंगे. समकालीन साहित्‍य के संपादकत्‍व से भी अरुण प्रकाश को हटाकर मुझे स्‍थापित किया जा सकता है. और कवर पर करीना और शाहिद की तस्‍वीर डालकर उसकी बिक्री हिंदी आउटलुक के बराबर की जा सकती है. तरुण तेजपाल भी अपने भंडाफोड़ तहलका में करने की बजाय साहित्यिक मंचों पर करने का फायदा उठा सकेंगे. न केवल उनकी छपाई का पैसा बचेगा बल्कि लुच्‍चे लोग उनकी आलोचना को व्‍यंग्‍य वाली श्रेणी में सुनकर हंसते हुए उड़ा देंगे और समाज में सौहार्दपूर्ण शांति बनी रहेगी.

इस नये आंदोलन की सोचकर मैं बहुत एक्‍साइट हो रहा हूं. मन में आभार भी अभीतक बचा हुआ है. आशा है आप सुधी पाठक अपनी अप्रगतिशील कविताओं, कमेंटों से आंदालन की आग को प्रज्‍वलित करेंगे.

Sunday, March 25, 2007

पराठे में भिंडी लपेटकर खाता मामूली आदमी

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: पंद्रह

मानता हूं तीन झटकों के असर में था फिर भी इस तरह के बेहूदा सवाल का क्‍या जवाब देता? कहता कि दीपशिखा की शादी में हमलोग पंडाल के पीछे जाकर साथ-साथ रोये थे! कि पुलिस जब इनको दारागंज की कोठरी से टांग के ले गई थी हमारी पत्‍नी के सगे मामा ने इनको अपने रसूख से छुड़वाया था? क्‍या फायदा वह सब याद दिलाने का. मुंह से कुछ निकालेंगे, उसका इस्‍तेमाल करके बाद में हमारे ही खिलाफ़ केसा खड़ा कर देगा. वैसे भी मुकेश और कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन जैसे गानों का अब कोई मतलब नहीं रहा. शालीनता की एक्टिंग ठेलते हुए मैंने फ्रॉड को फ्रॉड से मात किया. मुस्‍कराकर कहा- हां, शायद मेले-ठेले में कहीं भेंटाये हों.

रघुराजरुपी फ्रॉड ने बहुत ही गौर से मेरी बात सुनी. एकटक मेरी ओर देखते रहे मानो मैंने मेले में मिलने की बात नहीं कही हो, इराक से चीनी फौजों की निकासी और शांति का बीस सूत्री समाधान उनके हाथ में रख दिया हो! थोड़ा बेचैन होकर सुराही तक गए. कांसे के गिलास में पानी ढाला और कटे हुए तरबूज, पपीते के फांकों की तश्‍तरी लिए पास चले आए. मेरी ओर बढ़ाकर बोले- लीजिये, आपको भूख लगी होगी!

भूख से ज्‍यादा चिंता लगी है. किस नौटंकी के किस खंड का कौन पार्ट खेला जा रहा है! मगर उसका तो यह पाजी जवाब देगा नहीं. माथे पर तेल चुपड़े इसे आनंद के बाबू मोशाय वाला चरित्र निभाने की चढ़ी है. अपने ब्‍लॉग पर यहां-वहां से उड़ाई फोटो के ऊपर एक हेडिंग डाले रहता था- क्‍या रंग है ज़माने का. उसी तर्ज़ पर अभी कहने की इच्‍छा हुई क्‍या गंध है ज़माने का. हाथ हवा में लहराकर और मुस्‍कराकर कहा- नहीं, नहीं, तकल्‍लुफ की बात नहीं. हम यूं ही मज़े में हैं.

रघुराज बाबू हमें ऐसी चोट खाई नज़रों से देखते रहे मानो हमने दिल चीरनेवाला काम कर दिया हो. बुदबुदाकर बोले- आश्‍चर्य हो रहा है. क्‍योंकि मेला तो आजतक हमने देखा नहीं. हमारी मुलाकात निश्‍चय ही कहीं और हुई होगी. न्‍यूज़पेपर के दफ्तर, किसी इंटर-कॉलेजियेट फेस्टिवल में... फिर अचानक जैसे याद पड़ा हो मेरी ओर पलटकर कहा- कहीं आप टीके मिश्रा की गणित कक्षा में तो नहीं थे?...

यह आदमी पपीता और तरबूज खाकर बहक गया है या मुझको दुखी करके चोर-पुलिस के खेल का अपना शौक पूरा कर रहा है. अपने गाल पर पड़ा तमाचा अभी भूला नहीं था. उठकर एक हाथ मैं भी लगाऊं कि इनकी सारी बहक झड़कर बाहर आ जाए! लेकिन अगरबत्‍ती और दीवारों पर गोबर का असर रहा होगा, भावुकता में मुंह से निकला- तो आपको याद है! गणित की कक्षा में आप टॉप आया करते थे सुनंदा सेकेंड हुआ करती थी और मैं... हमेशा रोता रहता था.

अबकी दफा रघुराज मियां हंसने लगे. अचक्‍के में मेरी ओर आए, कंधे पर थपकी दी- वही सोच रहा था चेहरा जाना-पहचाना लग रहा है. पहले बताया क्‍यों नहीं?

कब बताता. जब भले आदमी ने फर्श पर लाश बिछा दी थी, या मेरे गाल को अपने भारी हाथ से नवाजा था? कि जब इनकी जापानी चेलियां हाथ-पैर बांधकर मुझे सोफे पर पटक गई थीं? लेकिन यह सब टेढ़े सवाल पूछकर इस मनभावन प्रकृति की छटा को खराब क्‍यों करता.

- तब तो आपको मनोहर की भी याद होगी? और संदीप की?... रघुराज बच्‍चे-सा खुश होकर चहकने लगे- संदीप चौबे कितना भावुक था याद है? बाद में वह आईपीएस में चला गया... बेचारा...

- और आप उसके हॉस्‍टल के कमरे में रात के एक बजे उसे पीटने गए थे! चीख-चीखकर उसे गद्दार और जनता का दुश्‍मन कहा था!...

मुझसे रहा नहीं गया. भावावेश में उत्‍तेजित होकर उठ खड़ा हुआ. रघुराज फटी आंखों देखते रहे. इच्‍छा हो रही थी खींचकर एक हाथ लगाऊं इस नमूने को. मगर हाथ का गुस्‍सा मुंह से छूटकर निकलता रहा- क्‍यों नौटंकी कर रहे हो? किसके लिए कुशवाहा कांत का ये सस्‍ता उपन्‍यास खेल रहे हो! मेरे लिए? कि मैं भूल जाऊंगा थोड़ी देर पहले तुमने कितना और कैसा क्रांतिकारी पार्ट अदा किया? राक्षस की तरह लोगों से पेश आके यहां राजा हरिशचंद्र खेल रहे हो! और हम चूतिया हैं दांत चियारे कॉलगेट वाली मुस्‍कान देकर दाद देते रहें कि सही है, गुरु? बड़े अच्‍छे हो, इंसानियत के अवतार हो?...

घबराहट और शर्म से रघुराज कांप रहे थे. फिर कुछ चटका. बिजली के दो नंगे तारों को एकदम-से जोड़ दिया गया हो जैसे. फिर ‘गम्‍म्‍म्’ की एक भारी आवाज़ हुई. मानो सिनेमा हॉल में बीच फिल्‍म के दौरान प्रोजेक्‍टर बैठ जाए! ऐसे क्षणों में सिनेमा हॉल में रोशनी हो जाती है, यहां अंधेरा हो गया. ‘गम्‍म्‍म्’ की दूसरी आवाज़ के साथ रोशनी लौटी. और इस बार झरने का स्‍वर, अगरबत्‍ती की खुशबू और गोबर-लिपी दुनिया का कहीं कोई पता नहीं था. उसकी जगह सेटिंग बदलकर एक बड़े गोदाम में परिवर्तित हो गई थी. और कोने के एक मामूली ऑफिस टेबल पर एक मामूली-सा दिखता आदमी अखबार में लिपटा पराठा तोड़-तोड़कर टिफिन की भिंडी की भुजिया के साथ खा रहा था. पहचानने पर इस असाधारण-मामूली आदमी को देखकर मेरे माथे में खून चढ़ने लगा. किसी जापानी मांगा का चरित्र होता तो माथे की नसें अब तक चटक चुकी होती. मगर इस बेशर्म के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. मुझे देखकर रवीश मुस्‍कराये, पराठे की पैकिंग मेरी ओर सरकाकर कहा- खाओ, खाओ. एकदम घर का है.

(जारी...)

Saturday, March 24, 2007

फुरसत के रात-दिन नहीं बस एक सुबह

योगिता बाली सुबह से कुछ ज्‍यादा ही फुदक रही थी. चाय लेकर आई चुप थी. अख़बार देकर गई चुप थी. नाश्‍ते की मेज़ पर भी कनखियों से देखकर मुस्‍की मार रही थी और चुप थी. चूंकि मैंने गाना सुना है चुप-चुप खड़े हो ज़रुर कोई बात है समझ गया ज़रुर कोई बात है. पूछ लिया कौन बात है कि सुबह-सुबह फोन पर महाराजगंज की मौसी से रोने और चायल की चाची से हंसने की बजाय मुझे कनखियों से देखती मुस्‍की मार रही है. जवाब देने की जगह योगिता रानी हमारा हाथ पकड़कर कंप्‍यूटर तक ले गई और फुरसतिया जी का पोस्‍ट दिखाकर हंसने लगी. सरसरी तौर पर पोस्‍ट पर एक नज़र मारते हुए मैंने कहा इसमें ऐसा क्‍या लिखा है कि तुम्‍हारे पेट में इतना बल पड़ रहा है.

हंसी में देह पर काबू नहीं रहा के आड़ में वह हमारे ऊपर गिर क्‍या गई, लगभग हमें भी गिरा दिया. मैंने झिड़कते हुए परे किया- होश में आओ. मालूम है हंसते हुए कितनी अनोखी हो जाती हो!

बुरा मान गई हूं वाली नज़रों से मुझे देखती योगिता सोफे तक चली गई. आंखों के आगे गृहशोभा तान, मुंह फुला कर बैठ गई. मुंह फुलाये-फुलाये ही बोली- दूसरे कहें तो कुछ नहीं, और हम कहें तो दुश्‍मन!

मैंने कहा- बुझव्‍वल में बात करना है तो सखी-सहेलियों का नंबर मिलाओ, हमारा वक्‍त मत खराब करो!

- आंख की जगह बटन लगा है तो हम क्‍या करें? यही तो कह रहे हैं फुरसतिया जी कि बहुत वक्‍त वाला लगाते हो तुम लोग अपने आप को!, चीढ़कर योगिता बोली.

- तुम लोग? यहां और कौन-कौन देख रही हो मेरे साथ? या तुमको भी यही लगता है कि हम पत्रकार हैं?.. किसी अख़बार से आजतक डेढ़ सौ का भी चेक आया है इस घर में?..

- तुम्‍हारे मुंह बजाने से क्‍या होगा! दुनिया कह रही है तो किसी वजह से कह रही है. शराबी-कबाबी के बीच बैठनेवाले को लोग शराबी-कबाबी ही कहेंगे! हमने कहा तो हमको बाहर कर दिये थे अब उनको जाके भी बाहर करो.. कह तो रहे हैं कि रवीश कुमार की कहानी शायद बीस बरस बाद समझ में आये.. जाओ, जाके कराओ चुप?.. मौसी-चाची काहे तुमसे बतियाती नहीं? काहे कहती हैं बबुनी को फोन देना? इसीलिए कि समाज में बनाकर चलना तुम्‍हें नहीं आता. मीठा बोलने में कलेजा फटता है! लगता है अदालत में खड़ा करवा के सबका मुकदमा पढ़ रहे हो! अपने को लगाने से अलग और क्‍या आता है?.. चार पैसा कमा के कभी हमारे हाथ में नहीं दिये.. जिंदगी निकल गई इस घर में रोते-रोते लेकिन आज तलक...

योगिता बाली लाईन पर आ गई थी. बिना वास्‍तव में डाले लेकिन मानकर कि कान में रुई डाल लिया है के अंदाज़े से मैं बाहर वाले कमरे में चला आया, अख़बार पर नज़र डाली. इंडिया श्रीलंका से हार कर विश्‍व कप से बाहर हो चुका है. अच्‍छा है. पागलपन की जुनूनी हवा से कुछ राहत हुई. चैपल साहब पता नहीं कितनी राहत महसूस कर रहे होंगे. मेरे पास उनका नंबर होता तो फोन करके कहता- हुज़ूर, होटल के कमरे में अकेले मत सोइयेगा, और सोना ही पड़े तो तकिये के नीचे एक पिस्‍तौल रखकर सोइयेगा.

Friday, March 23, 2007

राग्रा बीईंग कंसिडर्ड अगेंस्‍ट नाअग्रा

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: चौदह

हाथ उठाकर सेनापति को चुप कराने के बाद रघुराज टहलते हुए जन के करीब आ गए. एक-एक कर चेहरों का अंदाज़ लेने लगे मानो ‘अनटचेबल्‍स’ का कप्‍पोने अपने गद्दार की पहचान कर रहा हो. सभा में एक ठंडी लहर दौड़ गई. सेनापति भी दो कदम पीछे चले गए. मुंह पर पट्टी चढ़ी थी लेकिन नज़रों से मुस्‍कराकर मैं जापानी लड़कियों को रिझाने लगा.

शायद सिर्फ असर पैदा करने की गरज से रघुराज ने जेब से पिस्‍टल निकालकर हाथों में ले लिया, खिलौने की तरह खेलने लगे. सभा में एकदम सन्‍नाटा छा गया. मान्‍या हितेश भाई के कंधे से लगकर रोने लगी. रघुराज ने बोलना जारी रखा- रवीश रिसोर्सेस इंक ने अगर नाअग्रा के पोर्टल को सीज़ कर लिया है तो इसलिए नहीं कि आप कोई क्रांतिकारी साहित्‍य छाप रहे थे और हमें आपसे कोई भय हो रहा था. नहीं. नाअग्रा हमने बंद किया तो इसलिए किया क्‍योंकि हमारी नज़र में उसका कोई मतलब नहीं था...

- आप ऐसा नहीं कह सकते, सर!... पीछे से चीखने वाले ये शशि सिंह थे. इन्‍हें खबर नहीं थी मुन्‍ना भाई खेलने का यहां नतीजा क्‍या हो सकता था. उसी क्षण खबर हो गई.

समुराइयों के वेश में दो भारी देहवाले बाबू शशि सिंह पर कूदे और टांगकर कमरे के बाहर लिये गए. प्रतिरोध में किसी ने चूं तक नहीं किया.

इसके बाद आप और हम ही नहीं शशि सिंह के परिवार के लोग भी शशि सिंह की आवाज़ नहीं सुनेंगे. लिट्टी चोखा की दुनिया शांत और उदास हो जाएगी. ऐसा ही कुछ शोक संदेश ब्‍लॉग पर चढ़ाऊंगा, अगर ब्‍लॉग की वापसी हुई तो. फिलहाल पिनड्रॉप साइलेंस में रघुराज की हुई.

- एब्‍सोल्‍यूट नॉनसेंस. दैट्स व्‍हॉट आई वुड कॉल द कंटेंट सर्कुलेटिंग ऑन नाअग्रा. पर्सनली आई अम एगेंस्‍ट एनी काइंड ऑव सेंसरशिप, बट आई डोंट सी एनी प्‍वॉयंट डिफेंडिंग नाअग्रा. बिकॉज़ इट्स सिंपली जस्‍ट बुलशिट.

थोड़ी देर तक हिंदुस्‍तानी में सुर बांधते रहने के बाद रघुराज एकदम-से क्‍लासिकी चायनीज़ में चले गए. लेकिन असर दोनों का लगभग बराबर था. सभा सन्‍न थी. बीस वर्ष पहले यहां अविनाश होता तो इस शोकज़दा हतप्रभता का भी मोहल्‍ले में इस्‍तेमाल करने की तरकीब भिड़ा लेता. गनीमत है इस मुश्किल घड़ी में हम सभी उससे मुक्‍त थे. रघुराज फिर फैज़ाबादी सुरीली हिंदुस्‍तानी में लौट गए- नाअग्रा को भूल जाईये आपलोग. वह पोर्टल अपना जीवन जी चुका और अब इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए फ्रीज़ हो चुका है. आपकी शादी-व्‍याह की खबरों, गली-मोहल्‍ले की बहसों की मुझे चिंता नहीं. आपको है तो उसका एक उपाय है हमारे पास.

अनामदास समेत बाकी सबका चेहरा ताड़ने के बाद दुष्‍ट ने बात पूरी की- रवीश रिसोर्सेस इंक के नाम पर नाअग्रा नहीं लेकिन राग्रा हम शुरु कर सकते हैं. आप सभी को आपका ब्‍लॉग दुबारा वापस मिल सकता है.

इतने में बम छूटा. एक दो नहीं चार, या शायद पांच. भारी धमाके. खिड़की से लगी हवा लेती वीनस की नंगई के परखचे उड़ गए. भगदड़ मच गई. लोग एक-दूसरे के ऊपर गिर रहे थे. दोनों जापानी लड़कियों में कोई भी मेरे ऊपर आकर नहीं गिरी. दो-तीन धमाके और हुए. ये बिल्डिंग के बाहरी हिस्‍से में हो रहे थे. रघुराज का कहीं कोई पता नहीं था. सिगरेट छोड़ने की नौटंकी से लोकप्रिय होने के सस्‍ते खेल के बाद यह पहला मौका था जब मैं अभय से जेन्‍यूनली नफरत कर रहा था. धुंआ छंटते ही फर्श पर चार-पांच लाशों के चिथड़े दिखे. मैंने राहत की सांस ली क्‍योंकि उनमें जापानी लड़की कोई भी नहीं थी. जापानी लड़की दिखी मगर वह बेतहाशा भागती हुई मेरी ओर आ रही थी. मैंने उसे समूचे लाड़ से अपनी ओर आने दिया. मगर पास वह प्‍यार करने नहीं आई थी. जो करने आई थी उसने किया. मैं जापानी जानता होता तो भी बात करने की हालत में नहीं था. कंधे पर पंजे की चोट खाकर इतनी चेतना थी कि मुझे किसी ने कंधे पर लादा है, और धुंए और लोगों के शोर-तमाशे के बीच से गुजारा जा रहा हूं. तीखे स्‍वर में साइरन लगातार बजता रहा. उसके बाद आंख लग गई.

***

आंख खुली तो वह रवीश की दुनिया का पहचाना लैंडस्‍केप नहीं था. हवा भी एसी कंट्रोल्‍ड नहीं प्राकृतिक लग रही थी. पड़ोस में झरने का स्‍वर और अगरबत्‍ती की महक थी. हाथ फिराकर देखा तो नीचे इटैलियन मार्बल या ऑस्‍ट्रेलियन टर्फ नहीं सचमुच की मिट्टी थी. ये क्‍या माजरा है? मैं कहां आ गया हूं? क्‍या फिर किसी तकनीकी खेल ने मुझे बीस वर्ष पहले के किसी रमणीक तमिलनाडु के गांव में फेंक दिया है? लेकिन कोई तमिलियन लड़की तो मुझ पर जान लुटा नहीं रही थी. जापानी लड़कियों पर मैं लुटा रहा था. वो अपने को बचा रही थीं.

मैं घबराकर उठ गया. झटका नंबर टू. बिस्‍तरा फ्रेंच मेक की बजाय खालिस फैजाबादी प्रॉडक्‍ट था. मतलब मैं खटिये पर लेटा हुआ था और पाटी के नज़दीक कटोरी में सरसों का तेल रखा हुआ था. कमरे की दीवार गोबर से लिपी थी और एक ओर लाल कपड़े में लिपटे ग्रंथ के ऊपर बांसूरी सजी थी. फोन-सोन या अन्‍य एलेकट्रिकल गजट कहीं कुछ भी नहीं. ये किस तरह का मायाजाल है? किसी गहरे सुरंग में उतार कर मैं किसी पराये मुल्‍क में तो नहीं भेज दिया गय? शायद सच्‍चाई नहीं यह कोई स्‍वप्‍न हो. और तरकीब लगाकर मैं इस दु:स्‍वप्‍न से बाहर निकल आऊं. मैं चिंता कर रहा था क्‍या हो सकती है वह तरकीब कि झटका नंबर थ्री की एंट्री हुई.

गोबर पुते संसार में रघुराज चले आए. मुंह में चुरुट और थ्री पीस सूट नहीं देह पर इस दफा धोती-कुर्ता था. और आंखों में आनंद का नशा मानो एकदम कृष्‍णमूर्ति के प्रवचन से लौट रहे हों. मुझको देखकर किंचित असमंजस में गए फिर हंसते हुए सहज हो गए. बांसूरी उठाकर किसी धुन का रियाज़ करने लगे. मानो प्रैक्टिस बीच में छोड़कर कृष्‍णमूर्ति जी को सुनने गए थे अब लौटकर वहीं से शुरु कर रहे हों. मुझे बड़ा गुस्‍सा आ रहा था लेकिन हैरानी भी हो रही थी. ये आदमी किस तरह का फ्रॉड खेल रहा है? द्वंद्वात्‍मक भौतिकवाद का स्‍टडी सर्किल चलाने के बाद चिरकुट बहुरुपियेगिरी के लेवल तक गिर आया है! आस-पास स्‍कॉच की बोतल होती तो मैं ऐसे ही नीट चार-छै घूंट हलक के नीचे उतार लेता. मगर इस अगरबत्‍ती लोक में स्‍कॉच का होना थोड़ा अस्‍वाभाविक लग रहा था. अपना होना भी लग रहा था. तभी रघुराज जी लाल किताब (माओवाली नहीं) पर बांसूरी रखकर खड़े हो गए, आनंद और नशे वाला एक्‍सप्रेशन कंटिन्‍यू किया और ठेठ फैजाबादी में बोले- बंधुवर, लगता है पहले भी कहीं हमारी मुलाकात हुई है!

(जारी...)

रघुराज का रंग और जापानी लड़कियां

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: तेरह

रघुराज के कमरे में घुसते ही एकदम-से सन्‍नाटा छा गया. दो जापानी लड़कियां भागती हुई आईं, मुझे टांगकर कोने के एक सोफे पर फेंक दिया. मैं चाहता था वे मेरे आजू-बाजू ही रहें मगर वो रवीश की व्‍यवस्‍था में अपनी नियत जगह पर ही खड़ी रह सकती थीं. माने भागकर वापस रघुराज के पीछे खड़ी हो गईं. इस पहलू पर मैंने पहले गौर नहीं किया था. अब गौर करके रघुराज की नौकरी से रश्‍क करने लगा था.

श्रीकुमार, शशि ने ही मुझे नहीं भुलाया, नाअग्रा के बाकी चिट्ठाकार भी मुझसे नज़रें फेरकर अपने-अपने ब्‍लॉगों की व्‍यवस्‍था पर फोकस होने लगे. मुझसे संबंधित दिखकर कोई भी रघुराज के आगे अपना इंप्रेशन खराब करना नहीं चाहता था. मैं उनकी दिक्‍कत समझ रहा था लेकिन बहुत पीड़ा हो रही थी कि किसी ने मेरी दिक्‍कत समझने की कोशिश नहीं की. खासतौर पर जापानी लड़कियों ने.

फुसफुसाहटें हुईं, किसी ने किसी को धक्‍का दिया, फ्लैश की रोशनी में दो-तीन तस्‍वीरें खींची गई लेकिन नाअग्रा के पैदल सिपाहियों में से किसी ने मुंह नहीं खोला. सेनापतियों की मैं ठीक-ठीक पहचान नहीं कर पा रहा था लेकिन वो भी इतना लंबा पॉज़ दिये रहे कि झुंझलाकर रघुराज को जेब में हाथ डालना पड़ गया. मैं सोफे में अंदर धंसा हुआ था एकदम-से ऊपर उठ गया. नहीं चाहता था कि बड़े स्‍तर पर यहां तारंतिनो का कोई दृश्‍य मंचित हो और जीवन के आखिरी फोटो में मैं सोफे पर निठल्‍ला आराम करता पाया जाऊं. रघुराज से किसी पैरवी की मैंने उम्‍मीद छोड़ दी थी. अगर यहां इस कमरे के भीतर जालियांवाला बाग ही खेला जाना है तो मैं बैठे रहने की बजाय बाहरी संसार की स्‍मृति के रिफरेंस के लिए अपने को प्रतिरोधी मुद्रा में दिखाना चाहता था. अलग नहीं अपने को जनता के बीच पाना चाहता था. मगर नाअग्रा की जनता मुझे अपने बीच होने से रोक रही थी. ऐसे ही क्षणों में इतिहास रचा जाता है. असल जननायकों की पहचान होती है. अबतक सारे मौके गंवाते रहकर मैं इस आखिरी मौके को भी नाली में बहाने का रिस्‍क नहीं ले सकता था.

सोफे से कूदकर मैंने रघुराज को ललकारा- हम तुमसे नहीं रवीश से मिलने आये हैं!

नायकत्‍व पर जैसी जन-प्रतिक्रिया होनी चाहिये थी वैसी हुई नहीं. सब चुपचाप निरपेक्ष खड़े रहे मानो आलमपनाह के कॉस्‍ट्यूम में रामावतार धोबी की असलियत जानते हों और घटिया नाटक की हिस्‍सेदारी से बच रहे हों. मुझे धोबीनुमा कैटेगरी में मानते हुए रघुराज भी एक हत्‍या के पाप से बचे रहे. अलबत्‍ता जापानी लड़कियां ज़रुर सक्रिय हुईं, उनका सक्रिय होना प्रीतिकर भी लग रहा था, कुछ ही पलों में मेरे हाथ मेरी पीठ पर बंधे थे और मुंह पर ताइवानी टेप की चिप्पियां चढ़ी थी. हाथ-पैर चलाता थोड़ी देर तक मैंने नायकत्‍व वाले सीन को स्ट्रेच करने की कोशिश की मगर मान्‍या तक को अपनी एक्टिंग में दिलचस्‍पी लेता न देख, मैंने हार मान ली. माने सोफे पर आराम से पसर गया. मंच से कटकर दर्शक दीर्घा में हो गया. तसल्‍ली से नाअग्रा के सिपाहियों का नज़ारा लेने लगा.

पृष्‍ठभूमि में थोड़ी देर खुदबुदाहट हुई, अंतत: सत्‍ता का सामने करने के लिए कोई सेनापति नहीं सामान्‍य सिपाही ही बाहर आया. अनामदास रुपी गुमनाम ये साहब चूंकि काफी वर्षों बाद स्‍वदेश लौट रहे थे चकमक धोती-कुर्ते की तैयारी में आए थे मानो किसी वैवाहिक समारोह में हिस्‍सा लेने आए हों. गला खखारकर इन्‍होंने तीन दफे सज़दे में देह टेढ़ा किया फिर मिश्री की मिठास में बोले- सर, मैं फ्रेंच, जर्मन, लैटिन, फारसी और संस्‍कृत पर अच्‍छा अधिकार रखता हूं लेकिन क्षमा करेंगे चीनी की तरफ मेरी गति अभी धीमी है. हां, अगली बार भेंट होगी तो आप निराश नहीं होंगे...

रघुराज ने हाथ झटककर अनामदास को अपने समय की कमी और असल बात पर आने का इशारा किया. एक जापानी लड़की भागती हुई, मेरी ओर नहीं रघुराज की तरफ गई और उनके होंठों में एक क्‍यूबन चुरुट सुलगाया. उन्‍होंने जल्‍दी-जल्‍दी कुछ कश लिये और हवा में धुंए के छल्‍ले छोड़ दिये. दूसरों की मुझे खबर नहीं (चिट्ठाकार समाज में अभय की देखा-देखी धूम्रपान निषेध एक नए छूत की तरह फैल रहा है और लोग इस बीमारी से पटापट चूहों की तरह मर रहे हैं) मगर मैं धुंए की महक में एकदम आत्‍म-विभोर हो रहा था. अनामदास ने पीठ पीछे खड़े सह-समाजियों को देखकर एक बार तसल्‍ली की फिर वापस अपनी मिठास में लौटकर बोले- सर, नाअग्रा हमारी भावनाओं का सामाजिक समुच्‍चय है. हमारा पवित्र गृहस्‍थान है, पूजा की वेदी है, मंदिर का प्रागंण है. आपके चरणों में विनती है, प्रभो, हमसे हमारा नाअग्रा न छीनें!

मुंह में चुरुट दाबे रघुराज ने अनमनस्‍क नज़रों से एक बार अनामदास की कोमलता का जायज़ा लिया, फिर टहलते हुए ऊंची फ्रेंच खिड़की के निकट वीनस की नंगी देह के नज़दीक जाकर खड़े हो गए. मैंने सोफे में धंसे कयास लगाया वीनस की निकटता का कहीं कोई प्रतीकात्‍मक अर्थ तो नहीं. निश्‍चय ही होगा. बिना प्रतीकात्‍मक उद्देश्‍य के रघुराज सड़क तक पार नहीं करते.

रघुराज ने मुंह खोलकर सिर्फ अनामदास को नहीं उपस्थित समूची सभा को संबोधित किया- भावुकता का प्रवचन सुनने मैंने यहां आपलोगों को इकट्ठा नहीं किया है.

एक सेनापति पीछे से बाहर आए- आप हमारे रोल को कम आंक रहे हैं, सर! टेक्‍नॉलॉजिकली अगर हमने...

- आपने टेक्‍नालॉजी खोजकर कोई एहसान नहीं किया. आपने नहीं तो किसी और ने खोज लिया होता. फुदकिये मत. बोलने को कहा जाए तभी बोलिये.

(जारी...)

Tuesday, March 20, 2007

फर्श पर ख़ून और नाअग्रा का विश्‍वासघात

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: बारह

रवीश की गुलामी स्‍वीकार करके किस तरह उन्‍होंने मेरे विश्‍वासों को कुचल डाला है, मेरी आत्‍मा को तहस-नहस कर दिया है- नज़रों से रघुराज को कुछ इसी स्‍केल के मैसेजेस कन्‍वे कर रहा था. वो रिसीव नहीं कर रहे थे. चल्‍ले-बल्‍लों को अपना मैसेज कन्‍वे करने में लगे हुए थे कि उनके दस बिलियन युआन के तेल करने से वे कैसे सुखी नहीं हैं. मगर दिन भर मुस्‍कराने की एक्टिंग करते और दस दफे डिज़ाइनर कपड़ों की बदली करते लौंडे संभवत: सुख और दु:ख की गंभीर परिभाषा भूल चुके थे. उन्‍हें लग रहा था लताड़ की नॉर्मल रुटिन है, थोड़ी देर में झमेले की कोई नई कड़ी खुलेगी और उनका कसूर भुला दिया जाएगा. मैं भी लगभग यही मानने लगा था जब रघुराज ने इतमिनान से जेब में हाथ डाला और एक छोटा पिस्‍टल बाहर किया. और इसके पहले कि कोई कुछ समझता गोली दाग दी और जो चल्‍ला सबसे ज्‍यादा चहक रहा था स्‍नानागार के खूबसुरत फर्श पर ढेर हो गया. रघुराज का यह रुप देखकर मैं बिना गोली खाये ढेर होने की अवस्‍था में था. नहीं हो रहा था तो सिर्फ इसका पुनर्साक्षात्‍कार करने के लिए कि जिंदगी बड़ी ज़ालिम चीज़ है. रघुराज ने बर्फ़ के से ठंडे चायनीज़ में कहा- टेक द बास्‍टर्ड अवे!

क्‍वेंटिन तारंतिनो की फिल्‍मों में जिस मात्रा में सेट पर लाल रंग का इस्‍तेमाल होता है कुछ उतनी ही मात्रा में यहां असल खून का इस्‍तेमाल हो गया था. और उतनी ही फुर्ती से सेट पर से गायब भी कर दिया गया. रघुराज हमेशा के नफीस, साफ-सुथरे रहे हैं. रवीश के सेटअप में भी उनकी बाहरी सुघड़ता को आंच नहीं आई थी. मुंह में गुटके की जुगाली के साथ विमल लौटे तो साफ-सफाई के नज़ारे को इस उदासीन भाव से देखा मानो फर्श पर लाश नहीं पान की पीक देखी हो. फुर्ती से साहब यानी रघुराज को प्रसन्‍न करने के काम माने क्‍लीनिंग ऑपरेशन में जुट गए. रघुराज ने उन्‍हीं बर्फीली नज़रों से मुझे भी देखा, लापरवाही से बोले- व्‍हाट्स यूअर केस?

चीनी में बात करके यह व्‍यक्ति चालीस वर्षों की हमारी मित्रता का क्‍यों मज़ाक बना रहा है? बखूबी जानते हुए कि चीनी जब विश्‍वविद्यालय के गलियारों और पोस्‍ट ग्रेजुएट लड़कियों की आंखों तक में फैशनेबल था और बात-बात में लोग लाल किताब और लु शून का जिक्र छेड़ देते थे तब भी मैंने चीनी में दिलचस्‍पी नहीं दिखाई थी फिर भी यह मेरे सामने चायनीज़ फेंक रहा है! क्‍यों फेंक रहा है. इसीलिए कि व्‍यवस्थित तरीके से मेरे राजनीतिक आग्रहों को चिन्हित करके मेरे खिलाफ़ केस तैयार कर सके? और विमल लाल कह रहे थे अपनी नौकरी की पैरवी करुं! तत्‍काल मुझे भी तारंतिनो के सेट के किसी बेमतलब लाश में न बदल दें इतनी पैरवी करने की हिम्‍मत भी बची नहीं रह गई थी. अम्‍मां की पहली बरसी पर बाबूजी रुंआसे होकर बोले थे दुनिया में कोई साथ नहीं देता. अधिक से अधिक रघुराज को भी मैं इतना भर ही कह पाता. पता नहीं इस तरह की भावुकता वह अब कितना सुन या समझ पाते. विशालकाय स्‍नानागार में अपनी उपस्थिति मुझे भारी षड्यंत्र लग रही थी. यह महज़ संयोग नहीं है कि मेरे जैसा बेमतलब आदमी इस तरह की बेशकीमती इटैलियन संगमरमर के फर्श पर खड़ा है. इसीलिए खड़ा है कि साफ-सफाई और पानी की इमिडियेट एक्‍सेसिबलिटी है. और खड़े होने की जगह जब गिरा दिया जाऊं तो मुझको भी ठिकाने लगाने में वक्‍त न लगे. और इसके पहले कि मैं हकलाकर अपनी सिफारिश में कुछ कहूं- अभय को, ब्‍लॉग को, अपनी पॉलिटिक्‍स को (अगर वह कोई हो तो) डिसओन करुं- रघुराज फुर्ती से एक कदम मेरी ओर बढ़े. पिस्‍टल से मेरी छाती में गोली नहीं दागा, चेहरे पर एक झन्‍नाटेदार तमाचा जड़ा. कापी गंदा करने पर स्‍कूल में झा सर और घर में पैसा चुराने पर बाबूजी भी कुछ ऐसी ही इंटेंस मोहब्‍बत ज़ाहिर करते थे मगर रघुराज के तमाचे में मुझी से नहीं, खुद से भी नफरत छिपी होगी इसलिए कोई बचाव-पत्र पढूं इसकी जगह मैं फर्श पर ढेर हो गया.

***

आंख खुली तो सिर किसी स्‍त्री की गोद में था और वह मुझे ज्‍यूस पिला रही थी. चूंकि वह साहिब, बीवी और गुलाम की वहीदा रहमान नहीं थी हमने उसके ज्‍यूस को ज़हर समझा और मुंह का सबकुछ उसके स्‍कर्ट पर उगल दिया. वह ‘यू इडियट!’ (चायनीज़ में) बोलकर दो रास्‍ते के मुमताज़ की तरह नाराज़ हो गई और मेरे सिर के नीचे से अपना गोद खींच लिया, माने मुझे वापस फर्श पर पटक दिया. दर्द से कराहते आंखें खोलीं तो हाई एंगल फ्रेम में नाअग्रा के चिट्ठाकारों का पूरा जमावड़ा दिखा. फर्श पर लस्‍तम-पस्‍त पड़ा उनको देखकर मैं भावुक होने लगा. जैसे 2007 के वेस्‍ट इंडीज विश्‍व कप के पहले राउंड में हारने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम अपने को लेकर हो गई थी. जमावड़े में रवि और शशि दोनों थे और दोनों ही मुझे संदिग्‍ध नज़रों से जज कर रहे थे. रवि की बात समझ सकता था, मैंने कभी एमपी जाने का उत्‍साह नहीं दिखाया लेकिन शशि को तो मैं परिचित कह सकता था. दहिसर चेक नाके पर ही नहीं मीरा रोड में भी हमारी मुलाकात हुई थी. बीस वर्ष पहले लगे रहो मुन्‍नाभाई पर हमारी बातचीत तीखे बहस और हाथा-पाई की अंतरंगता में जाते-जाते रह गई थी. और यह आदमी मुझे ऐसे देख रहा है जैसे आज से पहले कभी देखा तक नहीं! सचमुच दुनिया में कोई साथ नहीं देता. बाबूजी की याद आ गई. बकरी की सी कातरता से मैंने शशि को एड्रेस किया- इस तरह हमें अकेला मत छोड़ो, बंधु, आपही की बिरादरी के हैं!

जवाब गुस्‍से में कांपते शशि की बजाय किसी श्रीकुमार ने दिया- बकवास बंद करो. अपने साथ जोड़कर हमें बदनाम मत करो. तुम ब्‍लॉगर हो, हम चिट्ठाकार है!

(जारी...)

सेज़: आर्थिक सुधार या सहूलियत का कारोबार?

अपने पिछले पोस्‍ट में हमने बिज़नेस स्‍टैंडर्ड के नितिन देसाई की सेज़ संबंधी आशंकाओं पर लिखे लेख का लिंक दिया था. कुछ बंधु होंगे जो संभवत: टिप्‍पणी के अंग्रेजी में होने की वजह से उससे परहेज़ करें. तो उनकी सहूलियत के लिए साथी अभय तिवारी नितिन के लेख का निचोड़ यहां हिंदी में प्रस्‍तुत कर रहे हैं:



सेज़ बाज़ार अनुकूल नहीं व्यापार अनुकूल हैं, और स्वस्थ प्रतियोगिता की आर्थिक नीति के खिलाफ़ काम करते हैं.

क्या फ़र्क है बाज़ार अनुकूल और व्यापार अनुकूल में? जैसे बाज़ार और व्यापार में फ़र्क है..बाज़ार अनुकूल सरकार और व्यापार अनुकूल सरकार में भी फ़र्क है. बाज़ार अनुकूल सरकार सभी क्षेत्रों, सभी व्यापारियों के लिये एक समतल मैदान और खेल के नियम मुहैय्या कराने का काम करती है जबकि व्यापार अनुकूल सरकार कुछ चुनिंदा व्यापारियों के साथ मिल कर चुने हुए काम करती है.

सेज़ की नीति साफ़ तौर पर बड़े घरानों के हितों की पूर्ति ही कर रही है..जो इस केक का पीस पाने के लिये गिरे पड़ रहे हैं. और वही सफल हो रहे हैं जो आर्थिक सुधारों के पहले कोटा लाइसेंस राज में धंधा करने और नेताओं को लुभाने और लपटाने के गुर और चालबाज़ियां भूले नहीं हैं.

तो क्या है सेज़ में जो इनकी लार इतनी टपक रही है:

ऐसी नीतियां जो देती हैं;

करों में भारी छूट ..

विदेशों से पैसा उठाने में ज़्यादा रियायत..

फिर पर्यावरण और श्रम क़ानूनों को ताक़ पर रखकर मनमानी करने की आज़ादी..

इस तरह के डेसपेरेट मेज़र्स का क्या मतलब है.. ऐसा लग रहा है कि किसी मरते हुये शाकाहारी को रेगिस्तान में ऊँट खाने के लिये तमाम किस्म के लालच दिये जा रहे हों.. गौर तलब है कि ये नीतियां बाज़ार की कमज़ोरी का नतीजा नहीं हैं. ये सरकार की कमज़ोरी का नतीजा हैं. ये नीतियां इस सोच से उपजी हैं कि सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास साथ-साथ नहीं हो सकता. और इस समझ पर पहुँचने के बाद सरकार सामाजिक न्याय की अवधारणओं को धता बताते हुये..फ़ैसला किस के हक़ मे कर रही है.. आर्थिक विकास के हक़ में नहीं.. चंद व्यापारिक घरानों के हक़ में..

अगर सरकार इन नीतियों को सही समझती है तो लागू करे इन्हे देश भर में.. और अगर सेज़ सिर्फ़ क़ानूनों को बाईपास करने का एक प्रपंच है तो देर सवेर जनता इनके खिलाफ़ सर उठायेगी.. आज किसान अपनी ज़मीन के लिये कहीं लड़ रहे हैं, कहीं रो रहे हैं.. कल को पर्यावरण और मज़दूर सम्बंधी मामलों में भी गहरे आन्दोलन खड़े हो सकते हैं..

सेज़ हर स्तर पर भेद भाव को बढ़ायेगा.. घरेलू उत्पादकों के बीच.. और सेज़ के अपने अन्दर भी उत्पादकों के बीच.. हर केस में नियम और नीतियां बदलेंगी.. और ये सब राजनेताओं और नौकरशाहों और उनके दलालों का एक घिनौना गठजोड़ बन के रह जायेगा.. और भारतीय बाज़ार का 1991 के पहले वाले समय में पतन हो जायेगा..

लब्बे लुबाब ये है कि आज हमें एक ऐसी आर्थिक नीति की ज़रूरत है जो पूरे अर्थतंत्र में प्रतियोगिता, नवीनता, और विकास को बढ़ावा दे. एक ऐसी शहरी नीति जो सब लोगों के जेबों के मुताबिक घर और दूसरी सुविधायें प्रदान कर सके. एक ऐसी सामाजिक नीति जो सभी इलाक़ो और वर्गों के लिये बराबर के अवसर प्रदान कर सके. और एक ऐसी राजनैतिक नीति जो उदार पूँजीवाद के हौवे से खौफ़ खाये लोगो और सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों के समर्थकों के बीच पुल का काम कर सके.. मगर सेज़ ऐसी किसी नीति के दायरों मे तो नहीं ही आता बल्कि उलटा ऐसी नीतियों के खिलाफ़ काम करता हुआ नज़र आता है..

सेज़ का रास्‍ता और नंदीग्राम हिंसा के वीडियो लिंक्‍स

देश में सेज़ (स्‍पेशल इकॉनॉमिक जोन) रुपी विकास की धारा पर हमने पिछले दिनों कुछेक टिप्‍पणियां की थी. उस पर हम फिर-फिर लौटते रहेंगे. आर्थिक विषयों पर विशेषज्ञता का हमारा दावा नहीं है. सो निश्‍चय ही उसमें कमियां रही होंगी. नंदीग्राम जैसे मौके उसमें भावना का पुट भरकर शायद उसकी दृष्टि सीमित भी करें. हम मानते हैं वह हमारे व्‍यक्ति और हमारे तंग साधनों की सीमा है. उसका हमें एम्‍बैरेसमेंट नहीं. हमारी असल चिंता तो यह है कि इस देश के आमजन के बतौर हम उस प्रक्रिया और बदलाव के नक्‍शे को ठीक-ठीक समझ सकें जो आनेवाले वर्षों में हमें इस देश के आर्थिक परिदृश्‍य में दिखना शुरु होगा. और जैसी तस्‍वीर उभर रही है सेज़ की चर्चा किसी न किसी शक्‍ल में निरंतर उस दायरे के इर्द-गिर्द रहेगी. हमारी कमअक्‍ली की सीमाओं से परे देखिये एक व्‍यावसायिक आर्थिक पत्र (बिज़नेस स्‍टैंडर्ड) के टिप्‍पणीकार नितिन देसाई भला सेज़ के बारे में क्‍यों आशंका व्‍यक्‍त कर रहे हैं.

साथ ही यू-ट्यूब पर डाले वीडियो का एक लिंक दे रहे हैं. वीडियो से तस्‍वीर मिलती है नंदीग्राम में सरकार कैसी ख़ून की होली खेल रही थी.

(दोनों ही लिंक इंडियनइकॉनमी डॉट ऑर्ग से साभार)

Monday, March 19, 2007

रवीश का चरम रघुराज का पतन

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: ग्‍यारह

मालूम नहीं था आसमान से गिरकर खजूर में अटकेंगे. खजूर भी होता बात थी, नीचे बैंगन-भांटा का बगान था. माने पूरा अक्षरग्राम था. वही जाने-पहचाने चेहरे, मतलब नाम. शुक्‍ला, शक्ति, समीरन, सुदेव, शंकित, रतन, रवि, रंजीत, दीपक, दिवाकर, देवेन, दीक्षा. नारे लगाते. गलत हिज्‍जोंवाली दफ्तियां लहराते. बीच-बीच में ठिलते ऐसा व्‍यंग्‍य उछालते जिसका नमूना देखकर ज्ञान चतुर्वेदी और श्रीलाल शुक्‍ल रोने लगते. मगर उसपर बाद में. पहले वहां चलता हूं जहां ट्रेन से उठाकर सीधे पहुंचा दिया गया था. जिस तामेझामे और सुरक्षा कवचों के बीच से मुझे गुज़ारा गया बात साफ हो गई कि नकाबपोश अभय नहीं रवीश के दल-बल से हैं और मैं कितना बडा बेवकूफ हूं. और रवीश बाद में डालेगा अभय से अपने संबंधों की बात खोलकर अपने को मैंने खुद कितने बडे राजनीतिक गड्ढे में डाल लिया है. अलबत्‍ता जहां आंख की पट्टी खोली गई वह गड्ढा नहीं रवीश के कामकाजी राजमहल का स्‍नानागार था. उसके आकार-प्रकार को देखकर मैंने दांतों तले उंगलिया दबा ली, मतलब कुछ वैसा ही हतप्रभ महसूस किया जैसा पहली दफा हाथ में मुक्तिबोध की कविता लेकर कल्‍पना के संपादक वात्‍स्‍यायन जी हीरानंद ने अनुभव किया होगा. इतनी जगह बाबूजी कब्जियाये होते तो स्‍नानागार की बजाय अभी यहां हमारा ददिहाल बसा होता. खून खौलकर मेरी आंखों में चला आया कि ऐयाशी का ऐसा अकूत भंडारण और अंतर्राष्‍ट्रीय प्रैस में प्रचार यह किया जा रहा है कि शहरों से बाहर लोग इस लिए खदेड़े जा रहे हैं कि शहर में जगह की कमी है! कोई अंतोनेल्‍ला बुकारेल्‍ली को टांगकर लाये और खिंचवाये उससे इस बेहया स्‍नानागार की फोटो? शहर में हम जैसे भिखारियों के लिए स्‍थानाभाव हो जाता है बीस वर्ष पहले भी सुब्रत सहारों को नहीं था आज रवीश कुमारों को नहीं है! हद है. अच्‍छा हुआ अंदर ही रहा खौलकर खून आंखों से बाहर नहीं आया. पीठ पीछे हाथ बांधे देह डोलाते पुराने संगी विमल वर्मा आते दिखे. उनको यहां पाने में कुछ भी आश्‍चर्य नहीं था. पहले सहारा में थे अब रवीश रिसोर्सेस इंक में. कुछ बदला था तो सिर्फ बीच में बीस वर्ष का समय. हमको देखकर विमल हंसने लगे. कहा- अरे, तुमको भी टांग के ले आये?

मैं चाहता नहीं था लेकिन हुआ वही. मैंने गिडगिडाकर कहा- विमल, कुछ करो, यार. लगता है मुझे भी बाडे-वाडे में डाल देंगे. जानते हो मुझे भूखे रहने की आदत नहीं है, तुम तो साथ रहे हो, बस एक बार रवीश से मिलवा दो, यार!

विमल लाल एकदम खिन्‍न हो गए. गंभीर होकर बोले- सुब्रत राय से मिलवाया था पहले कभी! फिर रवीश कुमार से कहां से मिलवायेंगे? हमारे यार लगते हैं वो? हमारी औकात क्‍या है. सहारा में भी कुत्‍ते थे यहां भी वही हैं! समझदार होकर असंभव फरमाइश करते हो. रघुराज जी आते हैं तो उनसे कहो. उनकी रवीश तक पहुंच है...

मुझे झटका लगा. जो चीज़ दबे स्‍वर में कैजुअली कहती दिखनी चाहिये थी वह चौंके हुए अंदाज़ में प्रकट हुई- रघुराज रवीश की नौकरी कर रहे हैं? मुक्तिबोध का भक्‍त रवीश का एजेंट हो गया?

विमल दुबारा सहज होकर हंसने लगे. वैसे ही जैसे बीस वर्ष पहले सहारा के लोअर परेल दफ्तर में मेज़ पर एक पैर डाले कंप्‍यूटर पर फ्री-सेल खेलते हुए रहा करते थे. बोले- सब तुम्‍हारी तरह भूखों मरने का शौक थोडी पाले हैं. घर-बार का जिम्‍मा है. नौकरी जाने के बाद मैं भी आजमगढ में बेकार बैठा था. घूंसी, बस्‍ती, आजमगढ में लोग पकड-पकडकर ट्रकों में बाहर भेजे जा रहे थे. डरकर हमने शाम को छत पे जाना छोड दिया था. बीवी कह रही थी इलाहाबाद चलो, वहां सेफ्टी है. हमने तकिये में सिर छिपाके कहा चुप करो, कहीं सेफ्टी नहीं है. जो टीम इलाहाबाद में धर-पकड कर रही थी उसी में से किसी ने रघुराज का मैसेज देकर हमें यहां बुलवाया. अब आराम है. धर-पकड होती है लेकिन हमारी नहीं दूसरों की होती है. बेटी को पढ़ाई के लिए शंघाई भेज दिया है. खर्चा कंपनी उठा रही है. अपन अब मस्‍त हैं. तुम देखना चार दिन बाद अभय मियां भी बम-बंदूक का खेल छोडकर काम मांगने यहीं आयेंगे. इससे अलग और जायेंगे कहां? मैं तो कहता हूं रघुराज जी से तुम भी पैरवी करो यहीं कहीं तुमको भी सेट करवायें. उनके लिए इंपॉसिबल नहीं है. बाकी पहले गुटका खिलाओ. साला, यही मुश्किल है यहां, गुटका बैन है. क्‍यूबा का चुरुट बैन नहीं है, पान और गुटका बैन है. रवीश बाबू के यहां भी सब वही सुब्रत सहारा वाले लक्षण है. रक्‍खे हो कि नहीं?

मैं गुटका की नहीं सोच रहा था. रघुराज की सोच रहा था और सोचकर सन्‍न था. व्‍यक्ति के पतन की कितनी गहराई है! क्‍या सीमा है? रघुराज अगर यहां तक पहुंच सकते हैं तो मेरा बचे रहना मात्र संयोग ही है! विमल के जवाब में मैने ना में सिर हिलाया और स्‍नानागार की ऐयाशी के बीच किसी भिखमंगे की अजनबीयत में खड़े रहा. विमल ने मेरा कंधा थपथपाके इशारा किया कि वह कहीं से गुटके का प्रबंध करके लौटता है.

स्‍नानागार के ऊंचे छत के एक कोने मतीस की कलाकारियों के पर्दों से सजे थे. मैं सोचने लगा इतने सारे डुप्लिकेट्स के पीछे रवीश को कितने का खर्चा पड़ा होगा. या क्‍या मालूम डप्लिकेट नहीं ऑरिजनल हों! मतीस का अंत मोतिहारी के एक गुंडे के महल में होना लिखा था सोचकर मेरा दिल बैठ गया! आखिर क्‍या मूल्‍य रह गया है आज कला की सामाजिकता का जब सब रवीश कुमारों के ही कब्‍जे में है?

स्‍नानागार के लंबे छोर से इस वक्‍त जो व्‍यक्ति दाखिल हो रहा था उसे मैं पिछले चालीस वर्षों से पहचान रहा था. कहना चाहिये पहचानने के मुगालते में था. क्‍योंकि साहबी लिबास और रौब में जो रघुराज मुझे विशालकाय हॉल में अपनी ओर आते दिख रहे थे उन्‍हें पहचानने की बात कहना वैसा ही हास्‍यास्‍पद था जैसे बीस वर्ष पहले सचिन तेंदुलकर को अपना यार कहना होता.

रघुराज के साथ तीन-चार ऊंची हैसियत के चल्‍ले-बल्‍ले थे जिनके साथ रघुराज का व्‍यवहार कुछ उसी तरह था जैसे हमारे छोटे शहर के सिनेमा हॉल के बाहर टिकट ब्‍लैक करनेवालों के साथ पुलिस का. ज़रुरत मुताबिक लताड़ और उसी में छिपा प्‍यार. खीझ और गुस्‍से में खौलते कुछ शब्‍दों से अंदाज़ हुआ वजह भारतीय क्रिकेट टीम के चीन में जाकर जीतने की है जिसके अंतर्राष्‍ट्रीय परिणाम बहुत सारे स्‍तरों पर रवीश के विपरीत जा सकते हैं. और जैसा रघुराज के शब्‍दों से ज़ाहिर हो रहा था चीन में जाकर भारतीय टीम इसलिए नहीं जीत गई थी कि उसने अच्‍छा खेला था. चल्‍ले-बल्‍लों की असावधानी में असल भारतीय टीम की जगह बांग्‍लादेशी टीम की डबल मैदान में पहुंच गई थी, जिसे स्‍टॉक मार्केट में पटाये रवीश के सौदों की भनक तक नहीं थी, और जिसने अपना नॉर्मल खेल खेला और चीन की घटिया राष्‍ट्रीय क्रिकेट टीम को आसानी से हरा दिया था. बेवकूफों को अंदाज़ नहीं था कि अपनी बकवासी खेल भावना में उन्‍होंने रवीश रिसोर्सेस इंक का न केवल दस बिलियन चायनीज़ युआन का नुकसान करवाया था बल्कि चीन में धीरे-धीरे बन रहे उसकी छवि को भी एक बड़ा धक्‍का दिया था...

(जारी...)