उसिना चावल और गुड़ से बनी खीर या ताज़ा बियाई गाय के फेनुस दूध को औंटा के बनी छेने की मिठाई की महक में मैं और मनोज बहकने लगते. खवनई के ऐसे मौकों पर अम्मा की कही हर बात का हम भाग-भागकर पालन करते. मनोज गाय की सानी में चोकर मिलाने जैसे गंधाते काम के लिए भी बिना सोचे-समझे हां कर देता, जबकि मुन्नी इस समूचे मुंह-माया से एकदम अनछुई बनी रहती. मुन्नी का हिसाब-किताब ही अलग था. अम्मा को परात में आटा निकालते देख ही उसका चेहरा उतर जाता. पैर पटकती वह जाकर बिछौने पर पट लेट जाती. अम्मा के बगल पीढ़ा पर बैठी फुआ पुरईन जैसे बुदबुदाती कि ये लइकि को रोटी सुहाता नहीं है. फूफा मज़ाक में छेड़ते इसका नाम मुनिया नहीं भातकुमारी होना चाहिए था, का रे, मुनिया? मुन्नी जवाब में कुछ नहीं बोलती, बिछौने पर चुप्पा ताने बुलके चुवाती पड़ी रहती. अम्मा नाराज़ होकर भुनभुनातीं एकदम भात से परिक गई है, बदमाश! अभिये कानी उमेठ के चार लप्पड़ लगाएंगे, सब भात भूल जाएगी!मगर मुन्नी भात भूलती नहीं थी. रात के ही समय नहीं, सुबह नाश्ते के वक्त़ भी जब मनोज सूजी के हलुवा के लिए पैर पटकता और मैं अम्मा से चिरौरी करता कि अम्मा, परौठा और भिंडी का भुजिया बना दे ना, मुन्नी बेशर्मी से रात का बचा भात कटोरी में तरकारी से मीस-मीसके ऐसे खाती जैसे भैया कभी मकुनी वाले सतुआ में चावल सान के खाते और आनंद में गोड़ हिलाते रहते. भात और गुपचुप (गोलगप्पा, फुचके) के सिवा मुन्नी को दुनिया में और किसी खाद्य पदार्थ से लगाव नहीं था. बाहर कहीं खाने को जाएं तो मुन्नी को सबसे पहले यही बेचैनी होती कि गुपचुप खाएंगे कि नहीं.
थाली में भूले से भी आलू के सिवा कोई दूसरी तरकारी डल जाए तो मुन्नी एकदम हाथ-पैर फेंकने लगती, मानो थाली में सेम और बरबट्टी नहीं गिरगिट और बेंग देख ली हो! जबकि मनोज भी सिर्फ आलू खाता मगर थाली में दूसरी तरकारी पाकर इस तरह घर सिर पर नहीं उठाता था. नाक चढ़ाए, मुंह बनाकर एक बार दीदी और अम्मा को देखता, फिर तरकारी में से बीन-बीन कर आलू अलग करता और बकिया को एक ओर करके धीमे-धीमे खाना खत्म कर लेता. ऐसा न हो खाना बनाते बखत दूसरे कामों में बझी अम्मा भूल जाएं, मुन्नी हमेशा उनको चोखा के लिए दाल के अदहन या चूल्हे के राख में आलू डालना मन पड़वाती. भैया तक मुन्नी के इन नखरों से आजिज़ आकर कभी-कभी फूट पड़ते कि बहुत फुटानी चढ़ा है तुमको, जिस दिन चोटी पकड़कर झा सर के सामने खड़ा कर देंगे, दन्न देना लाईन पर आ जाओगी! झा सर और सांप दुनिया में दो ऐसी चीज़ें थीं जिनका नाम भर सुनकर मुन्नी रुंआसी हो जाती. सबके खा चुकने पर अंत में थाली में चार कौर सजाकर दीदी अम्मा साथ खाने बैठतीं तो थोड़े असमंजस के बाद दीदी आखिर कह ही देतीं कि अभी मुनिया को डरा रहे थे और खुद्दे एक बेर आलू के बिना अन्न घोंटाता नहीं था वो दिन भुला गए? दीदी की बात पर अम्मा को ऐसी हंसी छूटती कि मुन्नी का रुंआसापन भी उड़नछू हो जाता और वह भागकर भैया की उनको कमज़ोरी का क़िस्सा सुनाकर हें-हें करती दांत चियारती उन्हें चिढ़ाती रहती.
भैया आलू के सिवा कब और कुछ नहीं खाते थे इसकी मुझे, मनोज या मुन्नी किसी को याद नहीं है. क्योंकि हमलोग भैया और बाबूजी को हमेशा बिना शिकायत सबकुछ खाते देखते. फुआ के छत से बतिया लौकी या किसी दोस्त के बगान से अरवी का पत्ता लिए भैया घर लौटते और रसोई में हल्ला करने लगते कि ताज़ा लाए हैं, ताज़ा बनाओ सब. अम्मा सब काम छोड़कर रसोई में ऐसे लग जातीं मानो घर में मेहमान आनेवाले हों, और थोड़ी देर में-अभी भैया चखें उसके पहले ही- मनोज और मैं हाथ में लौकी का गरमा-गरम बजका और अरवी की पकौड़ी चीख-चीखकर धन्य होने लगते. बाबूजी हाथ में छाता लिए गाय का सानी-पानी देखते हुए घर में दाखिल होते और बिना किसी के बताये ही जान जाते कि आज घर में अरवी की मसालेदार पकौड़ीवाली तरकारी बनी है. ऐसे मौकों पर बाबूजी हमेशा एक मुट्ठी ज्यादा भात खा जाते. अम्मा और दीदी ही नहीं समझतीं, मुन्नी भी ताड़े रहती कि बाबूजी आज मुट्ठी भर ज्यादा खाएंगे. जबकि मैं और मनोज ज्यादा खाने के लिए आलू के परौठे और सेवई वाले खासमखास डिनर भोज की राह तकते. या जिस दिन दीदी गोभी, टमाटर, मटर डालकर मसालेवाली पानीदार खिचड़ी बनाती उस दिन का.
गाजर, मूली का अचार दीदी चुटकी बजाने में तैयार कर लेतीं मगर उससे ऊपर के एरिया पर अम्मा का विशेषाधिकार था. अजवाइन, पंचफोरन और सिल-बट्टे पर मसालों के मेल की ढेरों चीज़ें थीं जिसकी तैयारी में दीदी लाचार होकर अम्मा का मुंह जोहने लगतीं, और जबतक अम्मा आकर राह न दिखायें, दीदी बे-राह कातर बनी अटकी पड़ी रहतीं. दीदी के छोटा बन जाने के इन क्षणों में मुन्नी भी होशियार बन जाती और दीदी के रास्ते आने से बचती, क्योंकि तब दीदी का गुस्सा एकदम सातवें आसमान पर रहता. हर बार अम्मा के किये का गौर से अध्ययन करते रहने के बावजूद कुछ ऐसा रह ही जाता कि अगली दफे दीदी हारकर भुनभुनाती अम्मा को आवाज़ लगाने को मजबूर हो जातीं. लेकिन ढेरों ऐसे आइटम भी थे जिनमे अम्मा का हाथ ही न चलता और दीदी खुलकर उस्तादी झाड़तीं. जैसे चने की घुघनी और साबंर-डोसा जैसा दीदी बनातीं, अम्मा का उनसे दूर-दूर का भी मुकाबला न होता.अभी डोसा तावा से उतरता भी नहीं कि मैं और मनोज हंसते-हंसते- क्या टाप क्लास बनाई हो, दीदी- करके उसे चट कर जाते, और इतना-इतना खा लेते कि दीदी डर जातीं कि बाकी लोगों के लिए बचेगा भी या नहीं. घबराहट में हमलोगों की तरफ छनौटा फेंककर मारतीं कि एकदम्मे दलिद्दर हैं सब हरामी!
यही हाल दीदी के बनाये खिचड़ी के साथ भी होती. सड़-सड़ पीकर पेट भर जाता लेकिन आत्मा की इच्छा नहीं भरती. मैं और मनोज इतना खा जाते कि देह में उठने की ताक़त नहीं रह जाती. भैया आकर बरजते कि उठते हो तुमलोग कि लगाएं एक लात? हारकर थाली का पानी पीते डकारते, पादते हें-हें करके अंतत: हमारी खिचड़ी खवाई खत्म होती.
दीदी सबकुछ इतने चाव से बनातीं मगर खुद उनको इन चीज़ों का चाव नहीं था. दरअसल दीदी मुंह की चटोर नहीं थीं. पक्का चटोर घर में केवल मैं और बाबूजी थे. दीदी की बस एक कमज़ोरी थी. बाहर सड़क पर गुपचुप के ठेलावाले के गुजरते ही दीदी बेचैन होने लगतीं, उनको लगता वह काम में बझी रह जाएंगी और ठेलेवाला निकल जाएगा. बहुत बार ये होता ही कि दीदी सुबह से अम्मा को सुनाती रहतीं कि आज मालूम नहीं क्या है आज गुपचुप खाने का बड़ा मन हो रहा है और गुपचुपवाला आकर निकल जाता और दीदी को खब़र ही न लगती. मनोज भी दीदी की बेचैनी जानता था. रास्ते में दोस्तों के साथ हरमपने में लगा जैसे ही मनोज की गुपचुप के ठेलेवाले के आने पर नज़र जाती वह घर की तरफ मुंह घुमाकर ज़ोर से आवाज़ लगाता, गेट पर गुपचुपवाला आ रहा है!- और दीदी सुनकर सावधान हो जाती. बीच-बीच में ऐसा भी होता कि बाबूजी घर पर सोए हों और भैया साइकिल लेके अपनी हीरोगिरी पे निकले हों तो दीदी चुप्पे से मुन्नी को साथ लेकर डेली मार्केट निकल जातीं और तीन रुपये का गुपचुप या मद्रास कैंटीन में मसाला डोसा खाकर- बाकी के पैसे से अम्मा के लिए पैक कराकर- चुप्पे लौट आतीं. सारा समय घर पर रहनेवाली दीदी को मगर डेली मार्केट में इसकी ठीक-ठीक जानकारी रहती कि रामधनी के ठेले पर अच्छा गुपचुप मिलता है कि जैपरकाश के. फटी बांहवाले सोफे पे बैठे जूते का फीता बांधते भैया अम्मा या दीदी किसी को गुपचुप खाते देखते तो मुंह बनाके कहे बिना उनका जी नहीं मानता कि एकदम्मे देहाती है तू लोग! गुपचुप से भरे मुंह से उस समय दीदी के मुंह से कुछ नहीं निकलता मगर भैया के घर से निकलते ही दन्न से बोलतीं- बड़का अपने को शहराती समझते हैं!
भैया का शहरातीपना माछ, मुर्गी और सूअर का मांस खाने में छिपा था. बाबूजी भी मीट का ज़िक्र होते ही भावुक हो जाते. जबकि अम्मा एकदम-से भड़क जातीं कि मीट-सीट करना है तो बाहर जाओ सब, हमरे रसोई में ई सब कुकर्म न होगा! बाबूजी हारकर दांतों के बीच जीभ दबाए चिढ़कर कहते बड़ पगलेट औरत है, जी?- और फिर उनका और भैया का कुकर्म घर के पिछवाड़े आम के पेड़ के नीचे छै ईंटों को जोड़ एक टेम्पररी चूल्हे पर मिट्टी की हंडी और एक पुराने अलमुनियम की करियल देगची में अंज़ाम दिया जाता. प्याज़ काटते हुए, मसाला कूटते हुए जिस प्रेम और सहोदरभाव से भैया और बाबूजी खस्सी का मीट बनाते, उस अनोखे प्रेम की झांकी देखने के लिए आंगन का दरवाज़ा खोल दीदी और अम्मा भी मुंह पर साड़ी रखे दस हाथ की दूरी पर आकर खड़ी हो जातीं.
मुन्नी और मनोज अलमुनियम की देगची के इतना करीब झुक-झुक कर देखते रहते कि दस हाथ की दूरी पर रहने के बावजूद अम्मा को घिनाइन-घिनाइन-सा महसूस होने लगता. यह कहने की बजाय मगर अम्मा यह कहकर हल्ला करतीं कि आज गोड़ जारे बिना तू लोग को चैन नहीं पड़ेगा क्या?.. भैया इतनी तल्लीनता से रंधाई करते कि लगता जैसे कॉलेज के पहले साल में अपने फेल होने का प्रायश्चित कर रहे हों.अम्मा ही नहीं फिर दीदी भी मुन्नी को मीट खाता देख हैरान होतीं कि जाने कैसी बीमार लड़की है कि बैंगन तक मुंह में जाने पर उल्टी कर देती है, और मर्दों के बीच हबर-हबर आलू दम जैसे मीट खा रही है!
मैं हर बार ईंटों पर हंडी चढ़ते ही मन ही मन अंदर हिम्मत बटोरता कि इस बार मीट खा लूंगा, मसाले की महक लेता खुश होता लेकिन अलमुनियम की थाली में मीट परसते ही मेरे हाथ-पांव फूलने लगते. दो मिनट इंतज़ार करने के बाद भैया चिढ़कर बोलते अब खा क्यों नहीं रहा है, चिरकुट? चार काटा खा चुकने के बाद बाबूजी के चेहरे पर चरम तेज चला आता, स्वर्गीय आनंद की तरन्नुम में झूमते हुए वह समझाइश देते- खा लो, खा लो, बेटा, बड़ा उत्तम परसाद है! इसके पहले कि भैया के हाथों मैं और ज़लील होऊं, थाली एक ओर ठेलकर मैं अंदर अम्मा और दीदी की जनाना शरण में भाग आता. दीदी मेरी तारीफ करने की बजाय चीखतीं कि चलके साबून से हाथ धोके आ पहले, जा!
शायद चुमकी के घर किसी पूजा-सूजावाला भोज था. मुन्नी, दीदी, अम्मा सब आई हुई थीं. खूब हुड़दंग मचा हुआ था. लड़कियों की जमघट की वजह से भैया भी वहीं जमे हुए थे. और इससे और उससे ऐसी-ऐसी छेड़खानी कर रहे थे कि दोस्तों के बीच अंताक्षरी में फंसे होने के बावजूद मुझे भैया के वहां होने से शर्म महसूस हो रही थी. दूसरी ओर मनोज का हरमपना चालू था; दो-तीन आवारा लड़कों की संगत में वह ऊंचे जामुन पेड़ की इतनी ऊंचाई पर चढ़ गया था कि अम्मा देख लेतीं तो खड़े-खड़े बेहोश होके गिर पड़तीं. मैं ताड़े हुए था कि मुंह सिये रखूं और एक बार नीचे आ जाए हरामी तो जमके कुटूं. मगर फिर पता नहीं अंताक्षरी का टेंशन था या क्या, बात एकदम ध्यान से उतर गई. स्कूल के सेक्शन बी की रंजना मैक्सी में आई थी मैं कनखियों से उसको देखता उलझा रह गया, और फिर औरतों के हल्ला करने पर बाकी लोगों के साथ मैं भी भुक्खड़ों की तरह खाने पर टूट पड़ा. अभी मुंह में तीन-चार कौर ही गए होंगे कि पता नहीं कहां से भैया आ खड़े हुए और मुस्कराकर पूछा- कैसा लग रहा है? तबतक इतनी थकान हो गई थी कि ये भी नहीं समझ आया किसकी बात कर रहे हैं. मैंने कहा- क्या कैसा लग रहा है? भैया इधर-उधर लड़कियों को देखकर और मुस्कराने लगे- अरे, वही चिरकुट, जो चाभ रहे हो- सूअर का मांस- कैसा लग रहा है?
हाथ की प्लेट हाथ ही में जम गई. मैं सबके बीच स्टैच्यू बनके जड़ हो गया.. इतनी हिम्मत भी नहीं हुई कि देखूं प्लेट में वह किस आकार-प्रकार की क्या चीज़ थी जिसका अजीब-सा स्वाद मैं अब जाकर मुंह में महसूस कर रहा था. नहीं, मुझे एकदम-से उल्टी नहीं हुई (वह घर लौटकर हुई और अगले दो दिनों तक जाने कितनी दफे हुई). अचानक मन बहुत भारी हो गया और आंखों में बरबस आंसू चले आए. देह में ताक़त होती तो उस दिन मैंने भैया की हत्या कर दी होती. मगर भैया बचे रहे और लड़कियों के बीच नौटंकी कर-करके खूब मज़ा लेते रहे...
































