Thursday, May 31, 2007

खवनई: एक संस्मरण

उसिना चावल और गुड़ से बनी खीर या ताज़ा बियाई गाय के फेनुस दूध को औंटा के बनी छेने की मिठाई की महक में मैं और मनोज बहकने लगते. खवनई के ऐसे मौकों पर अम्मा की कही हर बात का हम भाग-भागकर पालन करते. मनोज गाय की सानी में चोकर मिलाने जैसे गंधाते काम के लिए भी बिना सोचे-समझे हां कर देता, जबकि मुन्नी इस समूचे मुंह-माया से एकदम अनछुई बनी रहती. मुन्नी का हिसाब-किताब ही अलग था. अम्मा को परात में आटा निकालते देख ही उसका चेहरा उतर जाता. पैर पटकती वह जाकर बिछौने पर पट लेट जाती. अम्मा के बगल पीढ़ा पर बैठी फुआ पुरईन जैसे बुदबुदाती कि ये लइकि को रोटी सुहाता नहीं है. फूफा मज़ाक में छेड़ते इसका नाम मुनिया नहीं भातकुमारी होना चाहिए था, का रे, मुनिया? मुन्नी जवाब में कुछ नहीं बोलती, बिछौने पर चुप्पा ताने बुलके चुवाती पड़ी रहती. अम्मा नाराज़ होकर भुनभुनातीं एकदम भात से परिक गई है, बदमाश! अभिये कानी उमेठ के चार लप्पड़ लगाएंगे, सब भात भूल जाएगी!

मगर मुन्नी भात भूलती नहीं थी. रात के ही समय नहीं, सुबह नाश्ते के वक्त़ भी जब मनोज सूजी के हलुवा के लिए पैर पटकता और मैं अम्मा से चिरौरी करता कि अम्मा, परौठा और भिंडी का भुजिया बना दे ना, मुन्नी बेशर्मी से रात का बचा भात कटोरी में तरकारी से मीस-मीसके ऐसे खाती जैसे भैया कभी मकुनी वाले सतुआ में चावल सान के खाते और आनंद में गोड़ हिलाते रहते. भात और गुपचुप (गोलगप्‍पा, फुचके) के सिवा मुन्नी को दुनिया में और किसी खाद्य पदार्थ से लगाव नहीं था. बाहर कहीं खाने को जाएं तो मुन्नी को सबसे पहले यही बेचैनी होती कि गुपचुप खाएंगे कि नहीं.

थाली में भूले से भी आलू के सिवा कोई दूसरी तरकारी डल जाए तो मुन्नी एकदम हाथ-पैर फेंकने लगती, मानो थाली में सेम और बरबट्टी नहीं गिरगिट और बेंग देख ली हो! जबकि मनोज भी सिर्फ आलू खाता मगर थाली में दूसरी तरकारी पाकर इस तरह घर सिर पर नहीं उठाता था. नाक चढ़ाए, मुंह बनाकर एक बार दीदी और अम्मा को देखता, फिर तरकारी में से बीन-बीन कर आलू अलग करता और बकिया को एक ओर करके धीमे-धीमे खाना खत्म कर लेता. ऐसा न हो खाना बनाते बखत दूसरे कामों में बझी अम्मा भूल जाएं, मुन्नी हमेशा उनको चोखा के लिए दाल के अदहन या चूल्हे के राख में आलू डालना मन पड़वाती. भैया तक मुन्नी के इन नखरों से आजिज़ आकर कभी-कभी फूट पड़ते कि बहुत फुटानी चढ़ा है तुमको, जिस दिन चोटी पकड़कर झा सर के सामने खड़ा कर देंगे, दन्न देना लाईन पर आ जाओगी! झा सर और सांप दुनिया में दो ऐसी चीज़ें थीं जिनका नाम भर सुनकर मुन्नी रुंआसी हो जाती. सबके खा चुकने पर अंत में थाली में चार कौर सजाकर दीदी अम्मा साथ खाने बैठतीं तो थोड़े असमंजस के बाद दीदी आखिर कह ही देतीं कि अभी मुनिया को डरा रहे थे और खुद्दे एक बेर आलू के बिना अन्न घोंटाता नहीं था वो दिन भुला गए? दीदी की बात पर अम्मा को ऐसी हंसी छूटती कि मुन्नी का रुंआसापन भी उड़नछू हो जाता और वह भागकर भैया की उनको कमज़ोरी का क़िस्सा सुनाकर हें-हें करती दांत चियारती उन्हें चिढ़ाती रहती.

भैया आलू के सिवा कब और कुछ नहीं खाते थे इसकी मुझे, मनोज या मुन्नी किसी को याद नहीं है. क्योंकि हमलोग भैया और बाबूजी को हमेशा बिना शिकायत सबकुछ खाते देखते. फुआ के छत से बतिया लौकी या किसी दोस्त के बगान से अरवी का पत्ता लिए भैया घर लौटते और रसोई में हल्ला करने लगते कि ताज़ा लाए हैं, ताज़ा बनाओ सब. अम्मा सब काम छोड़कर रसोई में ऐसे लग जातीं मानो घर में मेहमान आनेवाले हों, और थोड़ी देर में-अभी भैया चखें उसके पहले ही- मनोज और मैं हाथ में लौकी का गरमा-गरम बजका और अरवी की पकौड़ी चीख-चीखकर धन्य होने लगते. बाबूजी हाथ में छाता लिए गाय का सानी-पानी देखते हुए घर में दाखिल होते और बिना किसी के बताये ही जान जाते कि आज घर में अरवी की मसालेदार पकौड़ीवाली तरकारी बनी है. ऐसे मौकों पर बाबूजी हमेशा एक मुट्ठी ज्यादा भात खा जाते. अम्मा और दीदी ही नहीं समझतीं, मुन्नी भी ताड़े रहती कि बाबूजी आज मुट्ठी भर ज्यादा खाएंगे. जबकि मैं और मनोज ज्यादा खाने के लिए आलू के परौठे और सेवई वाले खासमखास डिनर भोज की राह तकते. या जिस दिन दीदी गोभी, टमाटर, मटर डालकर मसालेवाली पानीदार खिचड़ी बनाती उस दिन का.

गाजर, मूली का अचार दीदी चुटकी बजाने में तैयार कर लेतीं मगर उससे ऊपर के एरिया पर अम्मा का विशेषाधिकार था. अजवाइन, पंचफोरन और सिल-बट्टे पर मसालों के मेल की ढेरों चीज़ें थीं जिसकी तैयारी में दीदी लाचार होकर अम्मा का मुंह जोहने लगतीं, और जबतक अम्मा आकर राह न दिखायें, दीदी बे-राह कातर बनी अटकी पड़ी रहतीं. दीदी के छोटा बन जाने के इन क्षणों में मुन्नी भी होशियार बन जाती और दीदी के रास्ते आने से बचती, क्योंकि तब दीदी का गुस्सा एकदम सातवें आसमान पर रहता. हर बार अम्मा के किये का गौर से अध्ययन करते रहने के बावजूद कुछ ऐसा रह ही जाता कि अगली दफे दीदी हारकर भुनभुनाती अम्मा को आवाज़ लगाने को मजबूर हो जातीं. लेकिन ढेरों ऐसे आइटम भी थे जिनमे अम्मा का हाथ ही न चलता और दीदी खुलकर उस्तादी झाड़तीं. जैसे चने की घुघनी और साबंर-डोसा जैसा दीदी बनातीं, अम्मा का उनसे दूर-दूर का भी मुकाबला न होता.

अभी डोसा तावा से उतरता भी नहीं कि मैं और मनोज हंसते-हंसते- क्या टाप क्लास बनाई हो, दीदी- करके उसे चट कर जाते, और इतना-इतना खा लेते कि दीदी डर जातीं कि बाकी लोगों के लिए बचेगा भी या नहीं. घबराहट में हमलोगों की तरफ छनौटा फेंककर मारतीं कि एकदम्मे दलिद्दर हैं सब हरामी!

यही हाल दीदी के बनाये खिचड़ी के साथ भी होती. सड़-सड़ पीकर पेट भर जाता लेकिन आत्‍मा की इच्‍‍छा नहीं भरती. मैं और मनोज इतना खा जाते कि देह में उठने की ताक़त नहीं रह जाती. भैया आकर बरजते कि उठते हो तुमलोग कि लगाएं एक लात? हारकर थाली का पानी पीते डकारते, पादते हें-हें करके अंतत: हमारी खिचड़ी खवाई खत्म होती.

दीदी सबकुछ इतने चाव से बनातीं मगर खुद उनको इन चीज़ों का चाव नहीं था. दरअसल दीदी मुंह की चटोर नहीं थीं. पक्का चटोर घर में केवल मैं और बाबूजी थे. दीदी की बस एक कमज़ोरी थी. बाहर सड़क पर गुपचुप के ठेलावाले के गुजरते ही दीदी बेचैन होने लगतीं, उनको लगता वह काम में बझी रह जाएंगी और ठेलेवाला निकल जाएगा. बहुत बार ये होता ही कि दीदी सुबह से अम्मा को सुनाती रहतीं कि आज मालूम नहीं क्‍या है आज गुपचुप खाने का बड़ा मन हो रहा है और गुपचुपवाला आकर निकल जाता और दीदी को खब़र ही न लगती. मनोज भी दीदी की बेचैनी जानता था. रास्ते में दोस्तों के साथ हरमपने में लगा जैसे ही मनोज की गुपचुप के ठेलेवाले के आने पर नज़र जाती वह घर की तरफ मुंह घुमाकर ज़ोर से आवाज़ लगाता, गेट पर गुपचुपवाला आ रहा है!- और दीदी सुनकर सावधान हो जाती. बीच-बीच में ऐसा भी होता कि बाबूजी घर पर सोए हों और भैया साइकिल लेके अपनी हीरोगिरी पे निकले हों तो दीदी चुप्पे से मुन्नी को साथ लेकर डेली मार्केट निकल जातीं और तीन रुपये का गुपचुप या मद्रास कैंटीन में मसाला डोसा खाकर- बाकी के पैसे से अम्मा के लिए पैक कराकर- चुप्पे लौट आतीं. सारा समय घर पर रहनेवाली दीदी को मगर डेली मार्केट में इसकी ठीक-ठीक जानकारी रहती कि रामधनी के ठेले पर अच्छा गुपचुप मिलता है कि जैपरकाश के. फटी बांहवाले सोफे पे बैठे जूते का फीता बांधते भैया अम्मा या दीदी किसी को गुपचुप खाते देखते तो मुंह बनाके कहे बिना उनका जी नहीं मानता कि एकदम्मे देहाती है तू लोग! गुपचुप से भरे मुंह से उस समय दीदी के मुंह से कुछ नहीं निकलता मगर भैया के घर से निकलते ही दन्न से बोलतीं- बड़का अपने को शहराती समझते हैं!

भैया का शहरातीपना माछ, मुर्गी और सूअर का मांस खाने में छिपा था. बाबूजी भी मीट का ज़िक्र होते ही भावुक हो जाते. जबकि अम्मा एकदम-से भड़क जातीं कि मीट-सीट करना है तो बाहर जाओ सब, हमरे रसोई में ई सब कुकर्म न होगा! बाबूजी हारकर दांतों के बीच जीभ दबाए चिढ़कर कहते बड़ पगलेट औरत है, जी?- और फिर उनका और भैया का कुकर्म घर के पिछवाड़े आम के पेड़ के नीचे छै ईंटों को जोड़ एक टेम्पररी चूल्हे पर मिट्टी की हंडी और एक पुराने अलमुनियम की करियल देगची में अंज़ाम दिया जाता. प्याज़ काटते हुए, मसाला कूटते हुए जिस प्रेम और सहोदरभाव से भैया और बाबूजी खस्सी का मीट बनाते, उस अनोखे प्रेम की झांकी देखने के लिए आंगन का दरवाज़ा खोल दीदी और अम्मा भी मुंह पर साड़ी रखे दस हाथ की दूरी पर आकर खड़ी हो जातीं.

मुन्नी और मनोज अलमुनियम की देगची के इतना करीब झुक-झुक कर देखते रहते कि दस हाथ की दूरी पर रहने के बावजूद अम्मा को घिनाइन-घिनाइन-सा महसूस होने लगता. यह कहने की बजाय मगर अम्‍मा यह कहकर हल्‍ला करतीं कि आज गोड़ जारे बिना तू लोग को चैन नहीं पड़ेगा क्‍या?.. भैया इतनी तल्लीनता से रंधाई करते कि लगता जैसे कॉलेज के पहले साल में अपने फेल होने का प्रायश्चित कर रहे हों.

अम्मा ही नहीं फिर दीदी भी मुन्नी को मीट खाता देख हैरान होतीं कि जाने कैसी बीमार लड़की है कि बैंगन तक मुंह में जाने पर उल्टी कर देती है, और मर्दों के बीच हबर-हबर आलू दम जैसे मीट खा रही है!

मैं हर बार ईंटों पर हंडी चढ़ते ही मन ही मन अंदर हिम्मत बटोरता कि इस बार मीट खा लूंगा, मसाले की महक लेता खुश होता लेकिन अलमुनियम की थाली में मीट परसते ही मेरे हाथ-पांव फूलने लगते. दो मिनट इंतज़ार करने के बाद भैया चिढ़कर बोलते अब खा क्यों नहीं रहा है, चिरकुट? चार काटा खा चुकने के बाद बाबूजी के चेहरे पर चरम तेज चला आता, स्वर्गीय आनंद की तरन्नुम में झूमते हुए वह समझाइश देते- खा लो, खा लो, बेटा, बड़ा उत्तम परसाद है! इसके पहले कि भैया के हाथों मैं और ज़लील होऊं, थाली एक ओर ठेलकर मैं अंदर अम्मा और दीदी की जनाना शरण में भाग आता. दीदी मेरी तारीफ करने की बजाय चीखतीं कि चलके साबून से हाथ धोके आ पहले, जा!

शायद चुमकी के घर किसी पूजा-सूजावाला भोज था. मुन्नी, दीदी, अम्मा सब आई हुई थीं. खूब हुड़दंग मचा हुआ था. लड़कियों की जमघट की वजह से भैया भी वहीं जमे हुए थे. और इससे और उससे ऐसी-ऐसी छेड़खानी कर रहे थे कि दोस्तों के बीच अंताक्षरी में फंसे होने के बावजूद मुझे भैया के वहां होने से शर्म महसूस हो रही थी. दूसरी ओर मनोज का हरमपना चालू था; दो-तीन आवारा लड़कों की संगत में वह ऊंचे जामुन पेड़ की इतनी ऊंचाई पर चढ़ गया था कि अम्मा देख लेतीं तो खड़े-खड़े बेहोश होके गिर पड़तीं. मैं ताड़े हुए था कि मुंह सिये रखूं और एक बार नीचे आ जाए हरामी तो जमके कुटूं. मगर फिर पता नहीं अंताक्षरी का टेंशन था या क्या, बात एकदम ध्यान से उतर गई. स्कूल के सेक्शन बी की रंजना मैक्सी में आई थी मैं कनखियों से उसको देखता उलझा रह गया, और फिर औरतों के हल्ला करने पर बाकी लोगों के साथ मैं भी भुक्खड़ों की तरह खाने पर टूट पड़ा. अभी मुंह में तीन-चार कौर ही गए होंगे कि पता नहीं कहां से भैया आ खड़े हुए और मुस्कराकर पूछा- कैसा लग रहा है? तबतक इतनी थकान हो गई थी कि ये भी नहीं समझ आया किसकी बात कर रहे हैं. मैंने कहा- क्या कैसा लग रहा है? भैया इधर-उधर लड़कियों को देखकर और मुस्कराने लगे- अरे, वही चिरकुट, जो चाभ रहे हो- सूअर का मांस- कैसा लग रहा है?

हाथ की प्लेट हाथ ही में जम गई. मैं सबके बीच स्‍टैच्‍यू बनके जड़ हो गया.. इतनी हिम्मत भी नहीं हुई कि देखूं प्लेट में वह किस आकार-प्रकार की क्या चीज़ थी जिसका अजीब-सा स्वाद मैं अब जाकर मुंह में महसूस कर रहा था. नहीं, मुझे एकदम-से उल्टी नहीं हुई (वह घर लौटकर हुई और अगले दो दिनों तक जाने कितनी दफे हुई). अचानक मन बहुत भारी हो गया और आंखों में बरबस आंसू चले आए. देह में ताक़त होती तो उस दिन मैंने भैया की हत्या कर दी होती. मगर भैया बचे रहे और लड़कियों के बीच नौटंकी कर-करके खूब मज़ा लेते रहे...

शब्‍द गाढ़ा एक प्‍यार..

चिलचिलाती धूप में बीचोंबीच सड़क के निपट नंगा खड़ा हूं. पसीने में तरबतर धड़धड़ाती रेल गुजरती है सामने. और रेल के बाद लोगों का रेला चीरता है उत्‍कट घमासान युद्ध हो जैसे. एक लड़की का हाथ रिक्‍शे से बाहर निकल खरीदता है चमेलियों का गजरा पीछे जलता है शहर.

मेरे अवचेतन में चिटकता है शब्‍द गाढ़ा एक प्‍यार और फिर पैसे की कर्णभेदी चीख़ में डूब जाता है. कोई हूक-सी उठती है मैं फुसफुसाकर कहता हूं धीमे एक-एक अक्षर दोहराता- दोस्‍त. हवा में दूर ऊपर तक ढेरों चिंगारियां उड़ती हैं. चिटक-चिटक कर लपटों में झुलसता चुकता जाता है शहर.

मेरे साथ मेरी बेबसी की एक हाथगाड़ी है भिखारी का पुराना अल्‍युमिनियम का कटोरा हो जैसे. कुछ किताबें कुछ चिट्ठि‍यां. एक लड़की के आंसू और चिथड़े हुए थोड़े स्‍वप्‍न. हाथगाड़ी मेरे होने को खींचती भीड़ में चरर्र-मरर्र निश्‍शब्‍द. तैरती झिलमिलाती जलती छवियों के बीच गिनता मैं अपने दिन.

Wednesday, May 30, 2007

आप लिंक्‍ड हैं कि नहीं?..

आप कहीं लिंक्‍ड हैं कि नहीं? अरे, मैं आपके लिंकित मन की बात नहीं कर रहा, भई.. आपका ब्‍लॉग कहीं लिंक्‍ड है या नहीं? आपके ब्‍लॉग पर दूसरों के ब्‍लॉग्‍स के तमगे सजे हुए हैं कि नहीं? दरअसल, लिंकित ब्‍लॉग से एक तरह का घरेलूपन, एक होलसमनेस का अहसास चला आता है. लगता है आभासी दुनिया के किसी अजाने-बेगाने द्वीप पर नहीं खड़े, बल्कि शर्माजी, सुशोभन, संतोष, पांडियन और पार्थसारथीजी से बतियाते, लड़ि‍याते, अंतरंगियाते खड़े हैं. ऐसी सामाजिकता में लिसड़े-घिसड़े, अंड़सते खड़ा होके बड़ा अच्‍छा-अच्‍छा-सा लगता है. कालिदास या काफ्का का लिंक चढ़ा दीजिए, लोग फट्ट से आपको कालिदास और काफ्का का बाप समझने लगते हैं! बाप न भी समझें, बेटा तो मान ही लेते हैं. तो लिंकित ब्‍लॉग के बड़े फ़ायदे हैं.. मगर नुकसान भी है!

इस विषय पर मौलिकता से हमीं सोच रहे हों, ऐसा नहीं है, आपने भी सोचा होगा. ज्ञानदत्‍तजी दोपहर का लंच लेते हुए आज यही सोच रहे थे. रवीश कुमार कलकत्‍ता से लौटते समय इसी चिंता में अनमने थे कि क्‍या लिंकित रखें और किसका लिंक तोड़ दें. कुछ अनोखा नहीं कर रहे थे. इस दुविधा से वही नहीं, आप-हम रोज़ सोच-सोचकर हलाकान हुए रहते हैं. सीधा प्रत्‍यक्ष उदाहरण देता हूं. मान लीजिए आपने चहकते हुए अपने ब्‍लॉग पर वहीदा रहमान और सुचित्रा सेन का लिंक चढ़ा दिया. घंटा भर नहीं बीतता कि वैजयंतीमाला फ़ोन दनदनाने लगती हैं कि क्‍यों, हमको क्‍यों छोड़ दिए? हमारा रंग ज्‍यादा सांवला है, या हम भरतनाट्यम ठीक से नहीं नाचतीं? या करीना कपूर को डालिए, फिर देखिए, प्रियंका और मल्लिका शेरावत कैसे आपके बाल नोंचने को छटपटाती ही नहीं नोंचने भी लगती हैं! लड़कियों वाला लिंक डेंजर है. उत्‍साह में उमड़ते हुए अपने ब्‍लॉग पर साटने के पहले ज़रा दो बार नहाकर ठंडे मन से विचार कीजिएगा तभी अगला कदम उठाइएगा. पर्सनल एक्‍सपीरियेंस से कह रहा हूं. ऐसे ही नहीं है कि लड़कियों वाले लिंक्‍स से बचता हूं. हमारे यहां ऊपर से नीचे छान जाइए, एक्‍को लेडी लिंक न पाइएगा..

मगर मेल लिंक में मज़े-मज़ा है ऐसा सोचना भी ग़लत सोचना होगा. मान लीजिए, गोरखपुर के बारे में सोचकर लड़ि‍याते हुए आपने बाबू हरिशंकर जी तिवारीजी का लिंक जोड़ लिया. अभी लिंक चढ़कर ठीक से सूखा भी नहीं कि दूसरे एंड पर मुख़्तार अंसारी बमगोला होकर फटने लगेंगे! उनसे निपटिए तो जेल से शहाबुद्दीन बाबू छिनकते मिल जाएंगे कि ससुर, देख रहे हैं बहुत फुदक रहे हो! सारा फुदकपना एक्‍के दिन छोड़ा देंगे, बूझ लो, हां?

मगर ये सिर्फ़ दूनंबरी और दसनंबरिया लोगों की ही बात नहीं है, यार-दोस्‍त सबके साथ पंगा है, जी! आज के ज़माने में वैसे भी यार कौन और दोस्‍त कौन? सब लुच्‍चे और स्‍वार्थी! हमको क्‍या समझाइएगा, सबसे बड़े स्‍वार्थी तो हम, फिर? हम जानते नहीं हैं? अजी, सामाजिकता-टामाजिकता ठीक है, मगर बहुत झमेला है लिंकित होने में.. आज मुंहकाटा का रिश्‍ता है, कल बकोटा-बकोटी वाला हो गया, तब? सारा लिंकिंग फेल होकर रह जाता है. देखकर तक़लीफ़ होने लगती है कि यह अपना ही ब्‍लॉग है या पराये आकर कब्जिया लिए हैं!.. पुराने फटही कुरता की तरह लिंक लटका रहता है पासंग.. हटाते बनता है न चटकाते! लिंक ही क्‍यों, आप ही लटके रहते हैं. बेमतलब. बड़ा कैसा-कैसा तो लगता है.. आपको नहीं लगता?..

अइसा बानी बोल के हमरे हिरदय में चीरा मत लगाइए, परान-प्रानेस्‍सर!

नैहर से बेबी का पति रामजीत राय को पत्र..


पराननाथ, मोरे मन मंदिर के देबता, चरन इस्‍पर्श करें! देखिए, आपको झुठले लगता है कि सगरे संसार मौज-मजा कर रहा है अउर एक आपे अकेले हैं जो दुख का सागर में बूड़ रहे हैं! आप सोच कइसे लिए कि आप बिरह-बेदना में कलपेंगे-तड़पेंगे अउर हम हिंया दलपूड़ी अउर कटहल का तरकारी का आनंद लेंगे? आपका प्रति अइसा अनादर, एतना बड़ अन्‍याय हमसे जीते-जी होगा, जी? मन में अइसा ही गलत-सलत भाव सजाने का खातिर आप हमरा मां‍गी में सेनुर भरे थे? कोहबर में मन्‍नु मौसी का चांदी का गिलासी में हमरे हाथ से दूध पीके जलम-जलम साथ रहने का परन किये थे? आप केतना निरमोही, निरदयी पुरुस हैं? हिंया अइसे ही सबका टीका-टिप्‍पनी से करेजा जरता रहता है (कि बारह महीना निकल गया, बबुनी का पेट अभी ले वइसे ही सपाट लौक रहा है! पाहुन जी में कवनो ऐब-सैब नै न है? दीपनरायन का पतोहु- जौन सात साल का बियाह का बाद अबहीं तलक बांझ है- ऊहो लबर-सबर कर रही थी! मन त किया जाके झोंटा नोंच लें छिनाल का फिर आपका इज्‍जत का बात सोच के खून का घूंटि पीके पटाये रह गए!) अउर आप हैं कि अपना ब्‍यंग बान छोड़ के अलग से हमरा आत्‍मा मथ रहे हैं!

दूसरा बात, कटहल-सटहल कुच्‍छो नै बचा है ए हालि. हफ्ता भर बास्‍ते मन्‍नु मौसी का मझलकी बेटी आई थी. बतिया-पाकल सब कटहल कटवा के बोरा में भरवा के ले के गई कुलच्‍छि‍न! साथ में देवर लेके आई थी, दोनों बखत ओकरा बास्‍ते घी में चभोर-चभोर के परौठा बनाती थी, अउर हमलोगन का बास्‍ते छूच्‍छे सूखल रोटी! लाज न सरम, सबका आंखि का आगे देवर का संगे रिस्‍का में सिनेमो देख के संझा आठ बजे घरे आई! अउर मन्‍नु मौसी कुछ बोलबो नहीं कीं! एतना बेसरम छोकरी है कि आपो से कहते हुए हमको लाज लगती है! अउर अभी आगे का सुनिए! जौन दिन जा रही थी महरानी, हीं-हीं, ठीं-ठीं करके सूरन का अचार वाला दोनों बयामो रख ली! बोली, हिंया कौन खानेवाला है, हम लेके जाते हैं नहीं त खराब हो जाएगा! हम त माथा पीट लिए कि भगवानजी, कवनो महतारी का पेट से अइसा छौंड़ी मत जनना! सीताराम-सीताराम!

अउर आप समझ रहे हैं हम हिंया इन्‍नरसभा में बइठे हैं! छप्‍पन भोग खाय रहे हैं! अरे, घर में बचल होगा तब न सूरन का अचार अउर कटहल का तरकारी खायेंगे, जी? बगानी में साग-फागो नै है! अउर पीर मोहम्‍मत वाला मेला भी ए साल कैंसिल हो गया है! पिछलका दफा आए थे त चाची का पतोह सुनीता संगे हाट-बजार टहलियो आते थे, ए बार उहो दुभर हो गया है. (अब नदान बन के ई मत पूछिये कि काहे! सुनीता रानी छौ महीना का गरभ से है अउर काहे ला? भगवानजी सबका गरभ पूर रहे हैं, खाली एक हमहिं पापीन हैं जेकरा ऊपर उनका किरपा का दिरिस्टि नै जाय रहा है! अब इसको अपना ऊपर मत लीजिएगा, हं! हम अपना को दोस दे रहे हैं- आपका पुरसत्‍त का भेद गांव का कौनो छौंड़ी-मेहरारु से छुपल थोड़े है.. खाली हमहीं नहीं, इमिरिति, नैना, नेहा कुमारी सब आपका नामी उचरने पर आह छोड़ती है! त पुरसत्‍त का बारे में त आपको मुंह फुलाने का दरकार नहींये है).

बाकी ई रतजग्‍गा वाला आदत खतम करिये, आप नहीं सूत के अपना नीन नहीं हमरा जिन्‍नगी बरबाद कै रहे हैं!.. हमरा जिन्‍नगी से खिलवाड़ करे का आपको कौनो हक नै है, हां!.. अउर नवकरी का बारे में पांड़े जी का किये, हमको पूरा डिटेलिन से खबर कीजिए, जल्‍दी! ओकरा बास्‍ते हिंया हम माता का बरत किये हैं (गरभ बास्‍ते सेरपेटली कर रहे हैं!).

आपका चरनों का दासी और धूलि,
बेबी कुमारी राय

Tuesday, May 29, 2007

नाक में उंगली का राष्‍ट्रीय हितवाद: एक अप्रगतिशील श्रद्धा

पूरी तरह से लोकतांत्रिक और सर्वदेशीय चीज़ है ये. कन्‍याकुमारी से कोहिमा चले जाइए (कश्‍मीर मत जाइए, ना. क्‍यों विवाद खड़ा करेंगे, प्‍लीज़), अहमदाबाद से आसनसोल- सर्वत्र आपको यह लुभावनी झांकी देखने को मिलेगी. प्रचुर मात्रा में मिलेगी. सड़क, रेल, खेत-खलिहान, बाज़ार, मंदिर, दफ़्तर, सिनेमा, अदालत, बेडरूम आप कहीं भी घुसकर चेक कर लीजिए, शर्तिया उपस्थिति मिलेगी. बात करते-करते आदमी ने अचानक कान में उंगली डाल ली और ज़ोर-ज़ोर से हिलाने लगा! या फिर नाक में. अब ज़ोर-ज़ोर से नहीं हिला रहा (उसमें खतरा है) मगर इस बार प्रवृत्ति खोजी है. नाक में उंगली घुमाते हुए जैसे कुछ खोया हुआ हो, साहब बहुत देर तक खोज रहे हैं. फिर वह प्राप्‍त भी होता है. तो तर्जनी पर सजाकर भावावेश से उसका अवलोकन भी करते हैं, कि अरे, इस अनोखे रत्‍न के हम ही जनक हैं? बहुत बार अनोखा रत्‍न नहीं मिलता, मगर उसकी खोज जारी रहती है. खोज के दरमियान अचानक अवरोध उत्‍पन्‍न हो गया, माने मित्र, पत्‍नी, पिता चले आए तो फट से उंगली नाक से छूटकर बाहर चली आती है और खोजकार्य तात्‍कालिक तौर पर स्‍थगनावस्‍था में चला जाता है.

आख़ि‍र ये ऐसा क्‍या विशेष रत्‍न है जिसके अनुसंधान में आदमी इतनी एकाग्र गंभीरता से जुटा रहता है? और उसे पाने के बाद तर्जनी और अंगूठे के बीच दाबे देर तक स्‍पर्श सुख लेता रहता है, और अंत में इस अनोखे रत्‍न का संचय करने की बजाय उसे परदे, पुराना अख़बार, दराज़ के कोने कहीं चिपकाकर मुक्‍त भी हो लेता है? नाक में उंगली डालकर खोजते हुए और अंतत: उस खोजे को प्राप्‍त करके आदमी के मन में जिन भावों का संचार होता है, उस भावदशा की ठीक-ठीक संज्ञा क्‍या है? इस खोज से प्राप्‍त होनेवाले सुख की प्रकृति संसारी, शरीरी है या आध्‍यात्मिक? क्‍या बुद्ध ने अपनी जातक कथाओं में कहीं इसका ज़ि‍क्र किया है? या सेंट भरता या मिस्‍टर कालिदास ने? इस सहज, स्‍वास्‍थ्‍यकारी, सुशोभनीय प्रवृत्ति का अपने जातीय इतिहास में हम कब से परिचय पाते हैं? यह विशिष्‍ट सांस्‍कृतिक उत्‍पाद हमारी अपनी खुद की रचना है.. या ह्वेन सांग और अलबेरुनी के साथ चीन और अरब से होते हुए हमारे मुल्‍क में आई? मैक्‍समूलर या रोम्‍यां रोला इस विषय पर प्रकाश डालकर गए हैं या अभी तक यह अंधेरे में पड़ा हुआ है. विज्ञजन जो इंदिरा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय व मानव संसाधन विकास मंत्रालय से इस और उस चिरकुट विषय पर सेमीनार सजाकर मुफ़्ति‍या डिनर जीमते रहते हैं, उनको इस महत्‍वपूर्ण सवाल पर भी चिंता करनी चाहिए. क्‍योंकि मलेच्‍छों से लेकर मैडागास्‍कर तक जहां कहीं भारतीय संस्‍कृति की चर्चा होगी, नाक में उंगली के इस विरले सांस्‍कृतिक, स्‍वास्‍थ्‍यकारी उपादान व धरोहर को हम अनदेखा नहीं कर सकेंगे. हम कर भी दें, बाकी दुनिया न कर सकेगी. इस मोहक राष्‍ट्रीय पहचान में हम हिन्‍दु हैं न मुसलमां. स्‍त्री हैं न पुरुष. हम विशुद्ध-अशुद्ध भारतीय हैं.

तो आइए, इस अनूठे राष्‍ट्रीय विरासत के स्‍मरण में हम सभी सुबह-सुबह अपनी-अपनी नाकों में उंगली डालें और अनोखे खोज में जुट जाएं. बड़ा लालित्‍यमय अनुभव बनेगा. एक ही क्षण समूचा राष्‍ट्र सुर में धीमे-धीमे साथ-साथ हिलोरे भरेगा. अहाहा!

Monday, May 28, 2007

गांव: एक संस्मरण

अम्मा के चेहरे से लगता बाबूजी उनको गांव नहीं काला पानी भेज रहे हैं. जबकि बाबूजी घूम-घूमकर सबके बीच इस तरह इत्तिला करते मानो गांव भेजकर फैमिली में इनाम बांट रहे हों. बाबू रिपुदमन सिंह जी से कहते, 'अरे, महीना-डेढ़ हुंवा ज़रा सपर के रहेगा सब, एहंवा शहर में कौनो जिन्नगी है, जी?' बाबू रिपुदमन सिंह आंख बचाकर पंजे पर तड़-तड़ खैनी ठोंकते और बाबूजी की हर बात स्वीकारते हुए मुंडी डोलाते. दो दिन तक अपने सारे तर्कवाणों के इस्तेमाल के बाद अन्तत: अम्मा मुरझाये मन से अपना पक्ष हार जातीं और तय हो जाता कि बाईस तारीख को हम गांव जा रहे हैं. दीदी तक से बिना कुछ बताये अम्मा चुपचाप अपनी क्‍लोज़ेस्‍ट सहेली रिनू की मां से मिलने चली जातीं और लौटकर इस तरह गुमसुम सिर झुकाये पड़ी रहतीं मानों उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी गई हो. ऐसे क्षणों में दीदी भी अम्मा का मुंह लगने की कोशिश नहीं करती. घंटा आध निकल जाता तो मां के घुटने के पास आकर ख़ामोशी से बैठ जातीं मानो अम्मा के सिर पर दु:ख का जो पहाड़ गिरा है दीदी ज़ाहिर कर रही हों, वह उसमें अम्मा के साथ बराबर की साझीदार हैं. अम्मा चेहरे पर आंचल खींचकर चोट खाई आवाज़ में फट पड़तीं कि इस आदमी से व्याह कर नाना ने उनको नरक भेज दिया. दीदी धीमे से बुदबुदातीं कि बाबूजी से बहस करके कभी कुछ हासिल हुआ है? अम्मा आंचल हटाकर रोने लगतीं कि हमेशा अपनी मन की करते हैं, इनको ज़रा भी अपने परिवार की चिंता नहीं है. दीदी कहती कि केवल दो हफ़्ते की बात है और इस बार पिछले साल जितनी गर्मी भी नहीं है. घर के सारे कामों को आधे में छोड़ दीदी-अम्‍मा का गोलमेज़ कांफरेंस तबतक ज़ारी रहता जबतक रो-गाकर अम्‍मा आख़ि‍रकार‍ गांव जाने का मन नहीं बना लेतीं.

अम्मा के मनते ही दीदी सबसे पहले मनोज को रोमा स्टोर भेजकर हिमालय पावडर का चार सौ ग्राम वाला डिब्बा और कियो कारपिन की नई शीशी मंगवा लेती. मैं शेखर, बापी, खोखोन, राजू, तेजिंदर सबको दु:खी मन से खब़र करता कि यार, तुमलोग `काला सोना` अकेले देख लेना, अपन फैमिली के साथ गांव जा रहे हैं.

गांव जाने की बात भैया ऐसे सुनते जैसे किसी और परिवार के गांव जाने की बात सुन रहे हों और उनके चेहरे पर गांव जानेवाले मुसाफ़िर की रेल के धकमपेल वाली कोई भी संभावित तस्वीर नहीं बनती. लाल टीन वाली पेटी और अम्मा के अगड़म-बगड़म बक्से की सारी तैयारी देखते हुए भैया इतमिनान से बोलते कि सब गांव चले जाएंगे तो यहां घर कौन देखेगा? घर अगोरने के लिए किसी का यहां रहना रहना ज़रूरी है कि नहीं?..

दरअसल भैया को गांव जाने में कोई तुक ही नहीं लगता. गांव में उनका इस्त्री किये हुए कपड़ों में घर से बाहर निकलना गांववालों से ज्यादा खुद भैया को बेमतलब और हास्यास्पद लगता. फिर गांव में ऐसा कोई बाज़ार भी नहीं था जहां भैया अदा से गुजर सकें और आसपास गुजरती लड़कियां उनकी अदाओं पर रीझकर आपस में बेचैन होकर फुसफुसाने लगें. दरअसल गांव में सिर्फ़ बच्चे थे. खैनी और हुक्का गुड़गुड़ाते बूढ़े, मेहनत करती औरतें, गप्प लड़ाते और ईख व कचरी चुराते स्कूल के मोर्चे पर पूरी तरह फेलियर हो चुके लौंडे थे; धूल उड़ाती सड़क, कांसे के बरतन और खरबूजे का मोलभाव करते बाबा थे- लड़कियां नहीं थीं. कुएं का वह पानी था जिसके करियाये, चिपटे बाल्टी में बाहर निकलते ही मुन्नी घबराकर एक कदम पीछे हट जाती कि हम अंदर बेंग फांदते देखे थे, हम ये वाला पानी नहीं पियेंगे! मनोज हाथ में पेड़ की कोई टहनी लिए कुएं के मुहाने की ईंटोंवाली फिसलन पर बेबात इसपे और उसपे हंसता रहता जबतक कि अचानक गीली मिट्टी से कोई बिच्छू न निकल जाए. बिच्छू दिखते ही मनोज मियां की सारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती और फिर वह शरीफ बच्चे की तरह जाकर बाबा के पैताने खटिया के ओरचन पर बैठ जाते. कुएं पर पानी भरने आई औरतें आपस में बात करतीं कि फलाने के घर के बच्चे हैं, शहर से आए हैं और इनके बड़ मज़ा है.

मनोज और मुन्नी को सचमुच बड़ा मज़ा रहता. ईया बाबा से छिपाकर मनोज को झोले में और मुन्नी को फ्रॉक के आंचल में अनाज भर-भर कर ठेलकर उन्हें पीछे वाले दरवाज़े से रमेसर के दुकान भेज देती. रमेसर की दुकान से अनाज के एवज़ में लकठो, सूखे हुए लड्डू और इमली की मिठाई, घटिया लेमनचूस पाकर मनोज और मुन्नी ऐसे उड़ते रहते मानो चिरकुट मिठाई नहीं पाए हों, खज़ाना जीत लिया हो. ईया रात में मुन्नी को अपने बगल लिटाकर फुसफुसाकर कहतीं कल बाबा जब खरहाटार बैदजी के यहां जाएंगे तू अनाज के लिए हमसे याद दिलाना! मुन्नी मुंह पर उंगली रखे हिसाब करती कि कितने अनाज से वह कितने लेमनचूस पाएगी. जबकि मनोज कितना भी अनाज पाये हो ज़मीन पर पैर फेंकता ज़िद किये रहता कि ईया, इतने अनाज में रमेसर कुछ नहीं देगा!

सकल नरायन चाचा का नौकर और सुनरकी फुआ की पतोहु का भाई झोला भर-भर आम छोड़ जाते. इतना आम चला आता कि मुन्नी परेशान होने लगती कि इतने आम को बाल्टी में बुड़ोयेंगे कैसे. मुन्नी के भोलेपन से ईया ही नहीं बाबा को भी हंसी छूट जाती और फिर मुन्नी को समझाया जाता कि हिंयां राक्षस थोड़ी बैठा है कि एक्के हाली सारा आम खा जाएगा, जितना बाल्टी में आएगा उतना भिगा दे, जा! इतने सारे आमों के बीच बाबूजी की ज़रूरत की संगत में बाबूजी से कहीं ज्यादा मुन्नी प्रसन्न रहती. बाबूजी जबतक मन भर खाकर हाथ खड़े नहीं कर देते मुन्नी उनके माथे चढ़ी रहती थी कि वह इशारा करें और वह भागकर कांसे की थाली में चार आम और ले आए! गांव में चाकू से काटने की बजाय पैर के नीचे पाया दबाकर हंसुए से आम के फांके कटते. मुन्नी हाथ से ऐसे दूरी बनाकर हंसुआ लाकर दीदी को देती मानो पाया पकड़ने से भी उसे लोहे से कट जाने का डर हो! जबकि दीदी को डर नहीं होता, वह हंसुए से कटहल, भतुआ, लौकी ऐसे काटती मानो सारा जीवन हंसुए से ही तरकारी काटती रही हो.

लकड़ीवाले चूल्हे से जूझते हुए हालांकि दीदी बीच-बीच में हार जाती और भुनभुनाकर शिकायत करती कि पता नहीं लोग इसमें खाना कैसे बनाते हैं... हमसे ये सब नहीं होगा, हां! और फिर थोड़ी देर में अम्मा के रसोई में घुसते ही दीदी हल्ला करने लगतीं कि अम्मा आखिऱ साबित क्या करना चाहती हैं. और फिर इतना अच्छा खाना बनता कि ईया भी गांव की औरतों के बीच दीदी की तारीफ़ किये बिना नहीं रह पातीं कि एकदम्मे सुघड़ छौंड़ी है और जौन घरे जाएगी सकल सकारथ कर देगी. जबकि अम्मा के बारे में सकल सकारथ करने की बात ईया कभी नहीं करतीं. हां, औरतों के बीच अम्मा कभी शहर के दुखों की चर्चा छेड़ दें तो ईया टोके बिना नहीं रह पातीं कि बड़ पुरनियन के बीच ज्यादा बड़र-बड़र करे के दरकार नहीं है. अम्मा एकदम्मे चुप लगाकर उठ जातीं और उस दिन रात में कभी कोई उनके मुंह से दबी आवाज़ में ज़रूर सुनता कि पांच बच्चा पैदा करके इस घर को दे दिया तब्बो बुढ़िया को सन्तोख नहीं है!

दीदी को जैसे ही दो घड़ी की फुरसत मिलती, पड़ोस के ओझाजी की बेटी सुनीता और जेवनचा की लड़की फुलमति उसे घेर लेतीं और फुसफुस करके पता नहीं क्या-क्या सवाल करके दीदी को हलकान किये रहतीं. फिर दीदी रमेसर की दुकान से एक सस्ता कापी मंगवाकर फुलमति से गवा-गवा कर वो सारे गाने नोट करतीं जो अलग-अलग मौकों पर गांव-बिरादरी की औरतें समूह में गातीं और जो गाने लाख चाहने के बावजूद दीदी के मुंह पर कभी स्वाभावित तरीके से चढ़ नहीं पाते. और उन्हें आजतक ठीक से सीख नहीं पाने की खीझ में बेमतलब दीदी का पारा चढ़ता रहता.

दोपहर के खाने के बाद नीम के पेड़ के नीचे खुली हवा में बाबा और बाबूजी के साथ बैठते ही मुक़दमे और पेशी की बात छिड़ जाती. ये ऐसी पेशियां और ऐसे मुकदमे होते जो आजीवन काल से चले आ रहे होते और आजीवन काल तक चलते जाने वाले थे. इनका रहस्य बाबा और बाबूजी के सिवा और किसी के पल्ले थोड़ा-सा भी नहीं पड़ता. भैया तक ने उन्हें समझने से हार मानकर माथा पीट लिया था.

दोपहर के सन्नाटे में जब दीदी से ढील दिखवाने के बाद अम्मा झपकी ले रही होती और ईया मनोज और मुन्नी को अपने मां के ज़माने का दस रुपये का दस इंची वाला बड़ा नोट दिखाकर लगभग पागल बना रही होतीं, मैं सबसे नज़र बचाकर ईया की लकड़ीवाली बड़ी पेटी खोलकर सारा अगड़म-बगड़म उलट पुलट करता चकित होता रहता. संदूक में पता नहीं किस ज़माने की एक गोटेवाली चुनरी थी, एक नक्काशीदार सरौता था. तकिये के बसाते खोल और एक जूते की जोड़ी थी जिसके पहने जा सकने की कल्पना किसी के भी लिए अकल्पनीय होती. फिर कुछ बहुत ही पुराने टाइप प्रेस वाले अक्षरों में छपे जासूसी उपन्यास और चाचा के स्कूल की किताबें थीं. अंकगणित व नगर-विज्ञान की किताबों को इधर-उधर खंगालने पर उनके बीच स्कूल से भागकर सिनेमा गए चाचा की दुष्‍टताओं की कहानी खोलता सिनेमा के टिकट का आधा टुकड़ा ज़रूर मिल जाता.

बीच रात मसहरी हटाकर मैं पेशाब करने के लिए उठता और खटिये से बाहर के खुलेपन की निबिड़ वीरान सन्नाटे में चौंककर खड़ा एकटक चारों ओर तकने लगता. लगता सारी आवाज़ें बंद हो गई हों और सिर्फ बहती हवा की आवाज़ सुन पड़ रही हो. इतनी प्रचुरता में सब कहीं सब तरफ हवा होती कि लगता चाहें तो उसे छू, सूंघ सकते हैं. आसमान का नीला रंग और तारों की झर्र-झर्र रोशनी सब कहीं सब तरफ गिरती होती. कभी भावुकता की मदहोशी में इच्छा होती भागकर सबकुछ अपने हाथों में भर लें! और तभी चार हाथ की दूरी पर बाबा की खटिया से बरर्र-ठां पाद की आवाज़ गूंजती और सारा जादू तहस-नहस हो जाता...

मुसीबत में किधर देखें?..

हाथ का पैसा चुक जाए और मन का उत्‍साह तब किधर देखें? दाल-भात का सवाल जब लातों की बरसात के रुपक में बदल जाए तब किस प्रभु के पैर पड़ें, किस अवतार की याद करें? या चंद्रमोहन की तरह प्रभुओं की मार्मिक चित्र उकेरना शुरू करें! वह सही ठहरेगा या प्रभु कहेंगे बच्‍चा ग़लत, पाप के मार्ग पर जा रहे हो? मगर क्‍या मालूम.. शायद प्रभु दो पैसे का भाव न दें लेकिन धरा के प्रभुपंथियों की भावनाएं ठेसित हो जाएं, लातों की बरसात का रुपक, रुपक ही न बना रहे, वास्‍तविकता में बदलकर तक़लीफ़ों के हमारे संज्ञान.. हमारी संवेदना को और पैना कर जाए! अब तक़लीफ़ों का एक नया झोला बढ़ाकर हम क्‍या करेंगे? जब भात-दाल ही न होगा उसका अचार भी न डाल सकेंगे!

फिर क्‍या करें? मुसीबत में किधर देखें? मंदिर से निकलते भक्‍तों को देखें या बैंक में घुसते अभ्‍यर्थियों को? कृपा किसकी तरफ से आएगी? पुलिसवाले को देखें या पुलिसवाला जिसके पीछे है उसको? 'जनसत्‍ता' देखें या 'नवभारत'? रवीश का मनमोहन के कहे पर व्‍यंग्य देखकर अपनी आंखें फोड़ लें? या फुरसतिया का आनं‍द देखकर हर्षित-उल्‍लसित लड़ि‍याने लगें? या ब्‍लॉक पर कोई नया ब्‍लॉग आया है जाकर उसकी झांकी लें और आत्‍मा शीतल करें या अपने यहां पॉडकास्‍ट चढ़ाकर कलेजा ठंडा कर लें, बताइये. या कंप्‍यूटर उठाकर ज़मीन पर पटक दें और अपनी फूटी तक़दीर के टूटे टूकड़े देखकर चैन पा जायें और हर्षातिरेक में झूमकर जय निर्मलानंद का जाप दोहराने लगें? हमारा माथा नहीं चल रहा! राह सुझाइए, कोई नज़रिया बताइए.. हमारी मदद कीजिए, प्‍लीज़?

चांद को देखें? या चांद पर लिखी बाबू सुमित्रानंदन की कविता! उससे फ़रक पड़ेगा या हमारी कूड़ास्थिति जस की तस बनी रहेगी? नामवर का ‘नए कविता के प्रतिमान’, उससे? वो कहीं ले जाएगी, या ऐसे ही यहां-वहां घुमाएगी? कहीं मुक्ति का मंत्र नहीं फूंका जा रहा? हटिया, दानापुर, कोडरमा, बांसडीह? किसी हाशिए पर उम्‍मीद की एक किरण बची हो कहीं? नहीं?..

फिर किधर देखें, यार?.. यार को देखें? यार की नज़र तो कटार है! वह हमें देख-देखकर थक गई है और अब हमें नहीं कहीं और देखना चाहती है! फिर क्‍या मालूम देखने-दिखाने से अलग यार की अपने रगड़े-लफड़े वाली मुसीबत का बटुआ भी हो? मुसीबतों का बारह सौ पेज़ी उपन्‍यास हो, फिर?..

बाप को देखें? मगर वहां से तो पहले ही से नज़रें फेरे हुए हैं कि हम क्‍या देखेंगे, बाप हमारी ओर देख रहा है. जितनी दफ़ा नज़रें चार होती हैं, बुदबुदाकर कहता है कुछ भेज नहीं रहे हो? कब भेजोगे, उठ जाऊंगा उस दिन भेजोगे?

टीवी पर बीएससी की ख़बरें देखने लगें? या आस्‍था चैनल पकड़कर झूल जायें? या एक्‍स्‍टोर्शन सेल में फ़ोन करके पता करें कि हमें भी कहीं लगवाओ, साठे साब.. कुछ कमाई-धमाई करवाओ, बाप? कि नागार्जुन की पंडा-बंडा कविता बांचने लगें और बुदबुदायें ओम् शांति: शांति:? उससे मुसीबत कम होगी? आप कह नहीं रहे मुसीबत में किधर देखें? कुछ बोलिए, माई-बाप?

Sunday, May 27, 2007

अच्‍छा होता..

ये बेमतलब के अख़बार हर पल पीछे छूटती घड़ी की टिक-टिक चुपचाप सन्‍नाटे में चाय पीना क्‍या अच्‍छा है. वही लोग वही सड़कें हमेशा वही पथरीली उदासी और रोज़ का भय कि कल क्‍या होगा कुछ भी तो अच्‍छा नहीं इसमें. बैंक के क़ागज़ ये पुर्ची वो बिल हर घड़ी की बिलबिलाहट ख़ाक साली ये ज़ि‍न्‍दगी है.

अच्‍छा होता आज सहरसा कल नंदीग्राम होते. कॉमरेड अमूल्‍य से सवाल करते चीन में हो क्‍या रहा है, कॉमरेड. साथी ज्‍वालाजी से पूछते हर क्रांति का अंत विकसित पूंजीवाद में क्‍यों इसे समझाइए साथी. दिमाग़ की धूल झाड़कर फिर से संकरी गलियों में उतरते समझते गांधी, लोहिया, चीन और कश्‍मीर. डफली पर सुनते ककर्श कोई जनवादी गीत पगुराते जाने क्‍या-क्‍या चैन से बंसी बजाते बेचैनी की.

मगर ज्‍यादा अच्‍छा होता सीखते हम थोड़ी तरतीब, चीखने से पहले खुद से सवाल करते. सीखते खुद से सवाल करना क्‍या होता है समय संसार समाज सीखने की तहज़ीब क्‍या होती है. जैसा किसी कवि ने ठीक ही कहा है दुनिया रोज़ बनती है. बम फेंककर तो एक दिन में कतई नहीं बदलती दुनिया.

Saturday, May 26, 2007

शूटआउट एट लोखंडवाला

लोहा नहीं मिलता लोखंडवाला में. सभ्‍यता के कादो में फंसा छूटा रहा गया हो कोई इमारती बेड़ा जैसे. पानी, बताशे, रंगीन झंडियां, सस्‍ती चूड़ी और गुड़ की भेली नहीं मिलते. कॉफ़ी, करिश्‍मा, कूल और महंगी गाड़ि‍यों की कतारें मिलती हैं. प्रेमियों के आंसू और टूटते सपनों की क़ागज़ी फूल-पत्तियां मिलती हैं.

कपड़ों के लाल पीले नीले हृदयहीन सजावटी बंजर में खोजती है एक लड़की अपना खोया वर्त्‍तमान. एक मुर्गी अपने समूचेपने में फड़फड़ाती है गरदन मरोड़े जाने के पहले आख़ि‍री बार चीखकर बताती है कि वह अपने मारे जाने का विरोध कर रही है. दो बिल्‍डर गुफ़्तगू करते हैं कि दुनिया से भरोसा उठ गया है. काला चश्‍मा लगाये एक बुढ़ि‍या खरीदती है आइसक्रीम. दिन पिघलता है क़ागज़ों में कोन में बारिस्‍ता के नशीले आलस्‍य में एक लड़की खिलखिलाकर हंसती है. एक हत्‍यारा हंसकर फ़ोन पर बताता है उसने पढ़ी किताब. झींकता है करोड़पति पुलिसवाला कि इस शहर में ज़ि‍न्‍दा रहना कितना मुश्किल हो गया है. एक चालू कवि और असफल कलाकार खोजता है सस्‍ती चाय की दुकान. स्‍कूल से लौटते दो बच्‍चे रहस्‍य भेदते हैं आपस में परतें खोलते हैं आग, इच्‍छा और प्रियंका चोपड़ा के देह की.

फट गया है माथा या गोली से घायल है आवारा है आतंकवादी है जाने कौन है, आंख खुलते बुदबुदाता है आदमी- ओ मां की आंख, एक सिगरेट पिलाना, बे!

मोटा आदमी

रोज़-रोज़ लोकल में चढ़ता है आख़ि‍र कैसे चढ़ता है मोटा आदमी. कौन सहृदय बैठने को अपनी सीट का कोना छोड़ देता है कौन लड़की जगह देती है मोटे आदमी को मन में. गणित के सिद्धांतों की पुस्‍तक हाथ में लिए लीन डूबा हो तब भी सब यही समझते हैं खुशवंत सिंह का जोकबुक पढ़ रहा है मोटा आदमी. मोटा आदमी भी जानता है मोटा आदमी होना मज़ाक नहीं है. नसीब का मारा रिक्‍शेवाला भी ऐसी सवारी बिठाने के पहले सोचता है चार दफ़े और फिर सारे रास्‍ते अपनी क़ि‍स्‍मत को रोये जाता है. मोटा आदमी हमेशा मोटा था ऐसा किसी किताब में नहीं लिखा लेकिन आगे हमेशा मोटा ही रहेगा उसकी आत्‍मा में गर्म लोहे से दर्ज़ हो गया है. कितनी सारी तो चिंतायें रहती हैं कि हर घड़ी चिंता में छिटकता रहता है मोटा आदमी. भूख की आकुलता घेरे रहती है, जानते हुए कि वह खाना नहीं खाना उसे खा रही है फिर भी खाते रहना चाहता है मोटा आदमी. खाने के पहले ही खा चुकने की थकान से खाने को देखता लम्‍बी सांसें भरता है मोटा आदमी. कपड़े अंड़सते हैं मन अंड़सता है नहाना तक चैन से नहीं हो पाता. मकान की लिफ़्ट खराब हो तो एकदम-से बेचारा बेदम होने लगता है मोटा आदमी. बहस में उसकी राय नहीं पूछते लोग. रेल की खिड़की वाली जगह के लिए बच्‍चा झगड़ता नहीं मोटे आदमी से. आंदोलन और औरतों से दूर चुपचाप ज़ि‍न्‍दगी गुजार देना चाहता है मोटा आदमी. रोने की बात पर बेवजह हंसता रहता है मोटा आदमी.

Friday, May 25, 2007

गरमी: एक संस्‍मरण

तपते चेहरे के साथ मनोज घर में ऐसे दाखिल होता मानो बेहोश होकर गिर पड़ेगा. दांत के बीच जीभ दाबे बाबूजी भी लकड़ी वाला काला छाता बंद करके ऐसे अंदर आते जैसे युद्ध से लौट रहे हों. मुन्नी भागकर सुराही से लोटा भर पानी लेकर लौटती. दीदी मुन्नी को बरजतीं कि अभी पानी मत दे, सर्दी लग जाएगी. बाबूजी पंखे के नीचे हारे हुए निढाल पड़ जाते और सिर झुकाए फुसफुसाते कि थोड़ा बेल वाला शरबत मिल जाता तो शांति हो जाती. अम्मा जूटवाले झोले में तरकारी भरे लौटतीं और पंखे के नीचे बैठने की बजाय नंगे फ़र्श पर चित्त लेट जातीं. मनोज हें-हें करता अम्मा के बगल लेट छेड़खानी करता कि अब बुझाया न, केतना गर्मी है बाहर! अम्मा मनोज की थेथरई का जवाब देने की बजाय फटी आंखों से उसे देखतीं कि उन्हीं के पेट का जना उनसे कैसा निर्मोही मज़ाक कर रहा है, फिर चेहरा घुमाकर पल्लू से खुद को हवा करते बुदबुदातीं कि आग लगे ऐसे घर में जहां थोड़ी सी हवा नहीं है. मुन्नी भागी हुई बेना लाकर इतनी जिम्मेदारी से अम्मा को हवा करने लगती कि इतनी गर्मी के बावजूद भी अम्मा का मन ऐंठ जाता और वह भावुक होकर मुन्नी का गाल चूम लेतीं. यह नज़ारा देखकर बाबूजी से कहे बिना रहा नहीं जाता कि देख लो, महारानीजी का ठाठ! गांव चलके रहना पड़े तब खुलेगी इनकी बुद्धि!

बाबूजी की ऐसी टिप्पणी से अम्मा ही नहीं दीदी का भी मन खराब हो जाता. सब जानते थे गांव के नाम से अम्मा को बुखार चढ़ता है फिर भी गांव की बात कहे बिना बाबूजी का मन नहीं मानता था. दरअसल ऐसी चुस्की लेकर बाबूजी को मज़ा मिलता. वह गांव की बात छेड़कर अम्मा का चेहरा देखते कि देखें कैसा असर पड़ा है. अम्मा भी जानती थी कि बात बोलकर ये चेहरा देखेंगे इसलिए गांव की चर्चा होते ही वह आंचल खींचकर चेहरा ढंक लेतीं. बाबूजी के उकसावे पे मनोज हरमपना करता और चुपके से सरककर अम्मा के चेहरे से तड़ से साड़ी खींच लेता. अम्मा तमककर बोलती एकदम हरामी छोकड़ा हो गया है और मनोज को गाली देकर बाबूजी से अपना बदला चुका लेतीं. बाबूजी बुरा मानने की बजाय मुस्कराते हुए पंजे से नाक का छोर सहलाते-सहलाते अपने कमरे लौट जाते.

अभी सुबह का नाश्ता खतम भी नहीं हुआ होता कि आठ बजे बिजली चली जाती. मनोज कहता अच्छा हुआ, अब हम एक ही बार सीधे दुपहरिया में नहायेंगे! दीदी कहतीं फिर लात खानेवाला काम न करे, चुपचाप चलके नहाये, वो दिन भर कपड़ा-लत्ता के फेर में बैठी नहीं रहनेवाली. मनोज फिर भी तबतक महटियाये रहता जबतक भैया सचमुच उसे एक लात लगाकर नहानघर में ले जाके खड़ा न कर आते. सिर पर दो लोटा पानी गिरा दिये जाने के बावजूद मनोज नहानघर में चुपचाप खड़ा रहता मगर प्रतिवाद में नहाता नहीं. मुन्नी एक नज़र देखकर आती और फुसफुसाकर सबको खब़र करती कि नहाया नहीं है. दीदी कहतीं कि बिना चार लात खाए हरामी का कोई काम थोड़े होता है. मगर प्रतिवाद में पांच मिनट तक गुमसुम खड़े रहने के बाद मनोज थक-हारकर नहा लेता और लजाया-लजाया सबसे छिपता तेजी से भागकर अंदरवाले कमरे में घुस जाता. दीदी मुन्नी का हाथ खींचकर उसे एक ओर कर देतीं कि अब तुम दांत मत दिखाना, हां! मगर मुंह पर हाथ ढके खी-खी किये बिना मुन्नी का जी नहीं मानता.

दिन भर पंखा, कूलर और बाबूजी का भुनभुनाना चलता रहता कि बिजली का बिल लालमोहर सिंह आके नहीं भरेंगे! अम्मा चुप पटाये रहतीं, फिर बाबूजी का बुदबुदाना तब भी बंद नहीं होता तो कहे बिना रह नहीं पातीं कि अजीब आदमी हैं इनसे किसी का सुख नहीं देखा जाता. बाबूजी कहते बिजली आसमान से नहीं गिरती, उसका बिल भरना पड़ता है. अम्मा चिढ़कर कहतीं कि तब क्या करें, आपके बिल के पीछे आगी में झोंक दे अपने को? बाबूजी कहते आदमी को सर्दी गर्मी हर चीज़ का आदत होना चाहिये और चुपके से पंखे का स्विच बंद करके बाहर निकल जाते.

मनोज कूलर से जाके ऐसे सट जाता मानो कूलर के अंदर घुसना चाहता हो. कूलर में पानी भरने की भी सबसे ज्यादा उसीको उतावली रहती. मुन्नी के सिर पे थप्पड़ जमाके बोलता देख नहीं रही है पानी खतम हो रहा है! मुन्नी कहती कि नहीं अभी पानी है तो मनोज चीखकर कहता बहस मत कर, बदमाश, चुपचाप बाल्टी में पानी ला, जा! शायद यही उतावली होगी कि हर दूसरे महीने कूलर खराब हो जाता, फिर भरी दुपहरी में भैया गंजी निकालकर पसीने में तरबतर स्क्रूड्राइवर और सोल्ड्रिंग लिए पप्पू इलेक्ट्रिशियन के साथ कूलर पे भिड़े रहते. मनोज उछलता-कूदता यहां से वहां ऐसे भागता मानो कूलर भैया और पप्पू नहीं उसकी वजह से ठीक होनेवाला हो. गर्मी से ओट लिए अपने कमरे में पंखा झलते बाबूजी रिपुदमन सिंह और चंद्रमा सिंह को भैया की तरफ देखकर इशारा करते कि बड़ा ही लायक लड़का है. कल ही चार किलो केसर लेके आया कि बाबूजी, बहुत गर्मी है, खाइए आम. जबकि सच्चाई यह होती कि भैया नहीं बाबूजी केसर लेकर आए होते और चार नहीं दो किलो जिसे शाम को बाल्टी के पानी में बुड़ो के बाबूजी के सामने सजाकर रख देने का जिम्मा मुन्नी के ऊपर होता. बाल्टी में बुड़े आम को बाबूजी चुपचाप निहारते रहते, फिर धीरे-धीरे सारा आम अकेले चट कर जाते. जब मन भर जाता तो कहते अरे, सब हम अकेले थोड़े खायेंगे? लो, तुम लोग भी चख लो.

आम के मामले में बाबूजी राखी के पैसोंवाली दीदी से भी गए गुजरे थे.

शाम के कुछ घंटों से अलग सुबह दस के बाद सड़कों पर एकदम वीरानी छा जाती. लगता कोई भयानक दुर्घटना हुई है और लोग शहर छोड़कर भाग गए हैं. मैं आग बरसाती गर्म दुपहरी में चुपचाप साइकिल लेकर शेखर के घर निकल जाता. फिर हम उसके गेट के बाहर गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़े बात करते कि हमारी तरफ बहुत गर्मी है जबकि सेक्टर फाइव और सेक्टर टू में इतने छांहदार पेड़ हैं वहां के लोगों की मस्ती है. इधर-उधर की बकवास के बाद थककर हम राजू के घर का रुख करते और रेडियो पाकिस्तान सुनते हुए कैरम खेलकर गर्म दोपहरों का मुंह बंद कर देते. कभी तेजिंदर अचानक उत्साह में भरके बोर्ड की सारी गोटियां गड़बड़ कर देता और चीखकर कहता यार, क्यों हमलोग इस तरह से दिन खराब कर रहे हैं, सेक्टर टू चलते हैं, मज़ा आएगा!

तीन साइकिल पर पांच लोग लदे हम चिलचिलाती धूप में हांफते-कांखते सेक्टर टू पहुंचते और मज़ा एकदम नहीं आता. शेखर, राजू, बापी, मैं सब शिकायत करते कि तेजिंदर पागल है और हमारी इस मुसीबत की सज़ा उसे हम सारे लोगों को एक फ़िल्म दिखाकर उतारनी चाहिए. तेजिंदर एकदम-से साइकिल से उतरकर पागलों की तरह हमलोगों को देखने लगता. फिर हम सेक्टर फाइव में किसी घने पेड़ की छांह में खड़े होकर आइसक्रीम खाते और आइसक्रीम वाले से दिल्लगी करते कि वह सेक्टर फाइव की लड़कियों को ज़रूर आइसक्रीम मुफ़्त में देता होगा. उसके बाद साइकिलों पर घिसटते हुए हम सेक्टर फाइव की सड़कों पर दीवाना बने यहां-वहां भटकते होते. दीपक और कोणार्क सिनेमा की दीवारों पर आनेवाली फ़िल्मों का पोस्टर देखने और उनके अच्छे-बुरे होने का फ़ैसला सुनाने के बाद तेजिंदर के पागलपने से भरे ज़िद पर हम कोर्णाक सिनेमा की पीछे वाली पहाड़ियों पर चढ़ जाते. पहाड़ी की अद्भुत नीरव शांति पर खड़े होकर ऊंचाई से नीचे अपने शहर को देखते रहते.

इतने दूर से अपने शहर को देखना अनोखे, विस्मयकारी अनुभव में बदल जाता. लगता हम पराक्रमी देवदूत हैं जो नीचे झुलसते अपने गांवनुमा शहर को किसी तरह ज़रूर बचा लेंगे.

एक अप्रगतिशील प्रेमपत्र

रामजीत राय का नैहर गई अपनी पत्‍नी बेबी को..

डारलिन, मेरा दिल मेरा जिग़र बेबी जी, मैं आनंद से हूं, और कामना करता हूं कि तुम भी आनंद से होगी. पानी-बिजली का टेरजिडी हइये नै है हुंवा, संधा-सकाले मनोरमा मौसी और मम्‍मीजी का हाथ का सूरन का अचार और कटहल का तरकारी भेंटा रहा होगा त आनंद काहे ला नै होगा! हलांकि हम उतने आनंद से नहीं हूं जैसा ये कलम हमसे झूट्ठे लिखा रही है! मगर हमको बिस्‍सास है कि कलम का जबान के पार तुम हमारी आत्‍मा का जबान पढ़ लोगी.. और वेस्‍टेज में तुमरे आगे अपने दर्दनाक दर्द का एक्‍सप्‍लेनिन का हमको दरकार नहीं है!

एक तो ससुरी आग माफिक दिन बना रहता है (मन का नहीं, मौसम का बात कर रहा हूं.. मन तो क्‍या दिन क्‍या रात चौबीसों घंटे आगी में भक्‍क-भक्‍क जल रहा है!), बिजली कब्‍बो रहती ही नहीं है कि आदमी टेबल पंखा छाती से साटके सीतल मन कुछु सोच-बिचार करे. इलैट्रिसि कब नहीं रहती है का बजाय कब आती है का कोस्‍चन पूछो त जादा मतलब है. कल रात को एतना दुखी-दुखी लग रहा था कि पूरा रतजग्‍गे हो गया (पास में रहो तब रतजग्‍गा, दूर रहो तब्‍बो रतजग्‍गे, ये तो बड़ नाइंसाफी है, मैलॉर्ड!), भोर में जाके आंख लगा तब्‍बे ससुरी बिजली आ गई! हमको पत्‍ते न चला! सकाली में पापाजी डंडा खोदके उठाए कि जल्‍दी-जल्‍दी झाड़ा-पानी कै लो, बिजली आय रही है तब जाके खबर हुई! आंख मलके उठके देखते हैं कि हम हिंया महायानी मुद्रा में पड़े हैं और लुंगी जो है साला पलंग का दूसरका छोर पर लहराय रहा है! एतना तो गुस्‍सा पड़ा कि का बोलें! पापाजी पे नहीं, डारलिन, इलैट्रिसि डेपाटमेंट पे! (वइसे पापाजी पे भी पड़ते रहता है, कहां तुम सुबहे-सुबहे गाल पर दांत का मीठा काटा काट के उठाती थी, और पापाजी हैं कि सीधे डंडे खोदते रहते हैं!)

सच्‍ची में, डारलिन, जब से तुम गई हो, दुखै-दुख है. न घर में मन जोड़ाता है नहिंये बहरी. कलै का सुनो. मम्‍मीजी एतना दिन बाद डोसा और कोंहड़ा का सुखलका तरकारी बनाई थी, और हम बहुत चाव से खाइयो रहे थे, लेकिन पापाजी उंगली खोदके पूछै दिये कि दहेज का हीरो-होंडा दरवाजा पे खड़ा है तब काहे ला मुंह चोथा जइसा बनाये हुए हो? अब आत्‍मा का दर्द मम्‍मीजी का डोसा और कोंहड़ा खाके थोड़े छुप सकता है, बेबी जी, बोलिये आप? लेकिन पापाजी को तो सच्‍चो बताइयो नहीं सकते! अच्‍छा है कि मम्‍मीजी बरज के उनको चुप करा दीं, नहीं तो ई आदमी का खोदा-खोदी एक बार सुरू होके कभी खतम होता है?

कल डाकदरजी का हिंया भी गए थे. ऊ बोलते हैं जनाना साथ में लाइये तब जाके ठीक से चेकिन होगा. और पेर्गनेंसी का प्रोबलम जानने बास्‍ते आपका नहीं जनाना का चेकिन करना होगा! जी में त आया कि हरमखोर को वहिंये घुमाय के एक लप्‍पड़ लगायें! तुमरा पेट और हेयर-ओहर केने-केने पाजी टोयेगा और हम चुप्‍प पटाये रहेंगे? फिर नौकरी वाला सवाल भी जो है अभी ले लटके पड़ा है! पापाजी टेंट से बीस हजार बहिरिया रहे हैं और पांड़े जी बोलते हैं बीस हजार में तो आजकल गदहा का पखाना नहीं मिलता! सब चूतिये समझता है हमको! गदहा का पखाना बीस हजार में मिलता है, जी? मगर अभी उनसे नौकरी पाने का स्‍वारथ है तो काहे ला फोकट का जिरह करने जाते! मगर मन जो है, डारलिन, सच्‍चो में एकदम खिन्‍नाय गया है! तुमरे बिना दुनिया-जहान का कौनो चीज अब अच्‍छा नहीं लगता (कल मन मारके दू रुपिया वाला आइसक्रीमो लिये लेकिन मजा नहीं आया!)! मोबाइल का लिये मम्‍मीजी का नाक में दम किये हुए हैं. ऊ बूझ नहीं रही है कि आज का जमाना में कितना इम्‍पोरेंट साधन है. एक हाली आ गया तो ऐस रहेगा मगर तब तलक हम एक चिट्ठी का दूरी पे हइये हैं! पांड़े जी के हिंया से एक टिरिप मारके आते हैं त फिर तुमको नवका लेटर लिखेंगे!

जाने का पहिले एक बात बोलो लेकिन.. हमरी तरह तुमरा भी रात-दिन बिरह में जीना हराम है कि नहीं, सच्‍ची बात बोलना, डारलिन?

तुम्‍हारा हिरदय सम्राट रामजीत

Thursday, May 24, 2007

एक देशभक्‍त की विदेश यात्रा उर्फ़ एक मार्मिक संभावना का त्रासद अंत

बाबूलाल साव की मां रीमला छोटी थी अपनी मौसी की शादी में रांची गई थी, बाबूलाल नहीं गया था. रांची, नेतरहाट, दुमका, लोहरदगा, हज़ारीबाग़, बोकारो, कोडरमा, गुमला कहीं भी जा सके, बाबूलाल के जीवन में ऐसा अवसर उपस्थित नहीं हुआ था. चांडिल के पड़ोस के रेलवे लाइन पर तरकारी का झौवा इस गाड़ी से उस गाड़ी चढ़ाता दिन भर कुली बना पसीना बहाता बाबूलाल. उसे दुनिया घूमकर कोलम्‍बस नहीं बनना था. कोलम्‍बस की कहानी उसके लिए मतलब नहीं रखती थी. बाप माधो और मां रीमला मतलब रखते थे, और उनके मतलब का जीवन जीता बाबूलाल साव झारखंडी अर्थव्‍यवस्‍था में योगदान करता सुखी बना हुआ था. सफ़ेद कपड़ों वाला कोई बिहारी बाबू अगर उसे डांटकर कहता झारखंड झूठ है, सत्‍य बिहार व बंगाल है तो इस सत्‍य को मुंडी हिलाकर मंज़ूर कर लेने में बाबूलाल को ज़रा तक़लीफ़ न होती.

बाबूलाल अशिक्षित नहीं था. मगर नौवीं तक की भूगोल, इतिहास, गणित, भाषा की शिक्षा का उसके अपने जीवन से कभी कोई संबंध नहीं बना. नेहरू के भाखड़ा-नांगल या पड़ोस के हिराकुद बांध के ऐतिहासिक महत्‍व से बाबूलाल का परिचय न हो सका. न ही उत्‍तर-पूर्वी प्रांतों का अंदरूनी असंतोष या दक्षिण में कावेरी के पानी बंटवारे के विवाद के बारे में बाबूलाल की कोई सम्‍यक जिज्ञासा निर्मित हुई. इस देश में लड़ाइयां लड़ी गई हैं इसका धुंधला अहसास उसे ज़रूर था लेकिन चीन और पाकिस्‍तान किस चिड़ि‍या का नाम हैं, इस संबंध में वह निश्चित ही पूरी तरह बोदा था. दरअसल बाबूलाल का समस्‍त समाज विज्ञान गांव से शुरू होकर चांडिल के पड़ोस के हाट-बाज़ार व मेलों पर आकर चुक जाता था. उसने स्‍कूल से बाहर कभी हाथ में किताब लेकर नहीं देखी थी, न उसे कंप्‍यूटर जैसी किसी चीज़ के अस्तित्‍व में होने की ख़बर थी. प्‍लास्टिक का अविष्‍कार, चीनी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा, नेशनल हाइवे की महात्‍वाकांक्षी योजना, ग्‍लोबल वॉर्मिंग या ग्‍लोबलाइज़ेशन ऐसे विषय थे जो बाबूलाल साव के लिए उतना ही बुझौव्‍वल थे जितना अमरीकी राष्‍ट्रपति जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश के लिए बिहार की छठ पूजा.

इसे भारी दैवी संयोग ही कहेंगे कि पुलिस की चंगुल से छूटकर भागा ख़ूंखार आईएसआई एजेंट बहादुर ख़ान बाबूलाल के झौवे से टकराकर न केवल बीच सड़क पर गिरकर होश खो बैठा, बल्कि तबतक होश खोये रहा जबतक पीछे भागती बदहवाश पुलिस ने आकर उसे बेड़ि‍यां न पहना दीं. डीआईजी पुलिस व स्‍थानीय विधायक दोनों ही बाबूलाल साव के बहादुर करतब से प्रभावित हुए और राज्‍य सरकार की ओर से बाबूलाल के लिए इनाम की प्रस्‍तावना की. बाबूलाल के हर्ष का पारावार न रहा. उसके लिए सरकारी इनाम इतना महत्‍वपूर्ण नहीं था जितना रांची जाकर अपनी मां के हासिल के बराबर खड़ा हो लेने की उपलब्धि. इस अनोखे संयोग व उत्‍सव योजना से बाबूलाल ही प्रसन्‍न नहीं हुआ, बाप माधो व मां रीमला भी आपा खोकर अस्‍वाभाविक हो रहे थे. नए हवाई चप्‍पल और उधारी की चालीस रुपये वाली कमीज़ में जब बाबूलाल सरकारी जीप में सवार हुआ, तब उसे ख़बर नहीं थी कि मात्र दो घंटों के अंतराल में एक दूसरा दैवी संयोग घटेगा. नेतरहाट के जंगली रास्‍ते गिरे हुए पेड़ के अवरोध पर सरकारी जीप न चाहते हुए भी ठहरने को बाध्‍य हुई.. और फिर अचानक जिस अघटित की आशंका थी वही हुआ!

झाड़ि‍यों में छिपे एमसीसी के आतताई हमले का बाकी लोग शिकार होने से बच गए, मगर भावना के अतिरेक में सड़क के बीचोबीच भागते बाबूलाल साव ने देसी तमंचे की एक गोली खाकर अपनी जान संकट में ज़रूर डाल ली.

रांची सिर्फ़ बाबूलाल साव की देह ही पहुंच सकी. प्राण रास्‍ते में ही देह का साथ छोड़ चुके थे!

Wednesday, May 23, 2007

लड़की और लड़के की बातचीत

देर तक चुप रहने के बाद लड़की ने कहा मैं तुम्‍हें जानती नहीं. उस कहने में सब जान चुकने का दंभ और न जान सकने की झुंझलाहट छिपी थी. धूप और दिन की थकान में पिघलती ठहरकर पूछा लड़की ने आख़ि‍र तुम चाहते क्‍या हो. अकबकाये लड़के ने जहालतभरा जवाब दिया कोई, फिर हो गया गुमसुम. इस दरमियान पूछता रहा खुद से वह चाहता क्‍या है कितना जानता है. लड़की का हाथ पकड़कर किसी सस्‍ते-से बाग़ की छांह में टहलना चाहता है. या सड़क के उस पार खड़े होकर साथ-साथ देखना चाहता है साथ-साथ देखते हुए कैसा दिखता है शहर. ढलती दोपहर गोद में डाब लिए लड़की के कंधे पर सिर टिकाकर उसकी फुसफुसाती शिकायतें सुनना चाहता है. पूछना चाहता है इस रंग से क्‍यों रंगती है नाखून या उसके बालों व कंधे के बीच उठती महक का नाम क्‍या है. चुपचाप मुंह पर हाथ धरे सोते में उसकी सांसें सुनना चाहता है. या फ़ोन पर बात खत्‍म करके मुस्‍कराती पलटकर कैसे आती है लड़की उसकी तरफ देखना चाहता है. रूमाल से माथे का पसीना पोंछती लड़की भन्‍नाकर कहती है यही दिक्‍कत है तुम्‍हारे साथ, किसी बात का सीधा जवाब नहीं देते. नौकरी के इतने झंझट हैं, सांस लेना मुश्किल है और मैं तुम्‍हारे पीछे दिन खराब कर रही हूं. वैसे तुम अच्‍छे हो नेक़ हो भले हो, कल हाथ में सेब लिए आए थे कितना अच्‍छा लगा था मगर रोज़ इस तरह दिक करके हमें कहां ले जाओगे, खुद कहां जाओगे सोचा है. यह रोज़-रोज़ सेब नहीं खाती अच्‍छा होता. उस दिन तुम पास नहीं आते मैं किसी और रास्‍ते शहर चली जाती अच्‍छा होता.

एक लोहार की..

कल राह चलते एक पुराना दोस्‍त मिल गया. लंबे अंतराल पर मिल रहे थे सो हम हें-हें करते एक दूसरे की ओर लात फेंकने लगे. दोस्‍त ने कहा, घर चलो, कुछ अपनी कलाकारी दिखाता हूं! ये गुजराती दोस्‍त मुझे पसंद है. फ़ालतू की डींग नहीं हांकता, अपनी गाने की बजाय ज्‍यादातर सामनेवाले की सुनता है, और कहता है तो फिर गहरे मर्म की बात करता है. वही संबंध रोज़-बरोज़ की दिमाग़ी सफ़ाई, जीवन और उसके काम की व्‍यवस्‍था में भी झलकती है. स्‍पष्‍ट और व्‍यवस्थित. कहीं अनावश्‍यक कचड़ा नहीं. इसी लत ने आईआईटी की पढ़ाई के बाद अच्‍छी सुकूनदेह नौकरी छुड़वा दी, नये सिरे से एक दूसरा जीवन शुरू करवाया; और शायद स्‍पष्‍टता का यही आग्रह है कि लगभग ढाई शादियों से गुजर चुकने के बाद भी उसके जीवन में कड़वाहट का स्‍थान नहीं बना है. पेशे से कैमरामैन है मगर इन दिनों स्‍केचबुक रंगता यायावरी कर रहा है. इसी स्‍केचबुक के दर्शनार्थ हम न्‍यौते गए थे.

बीयर की ठंडक कलेजे में उतारने व तीन-चार डकारोपरांत हम कला के लिए तैयार हो गए. हमारे अपने छोटे-से मित्र-मंडल में पता नहीं कैसे इस ग़लतफ़हमी को हमेशा ज़मीन मिलती रही है (और आजतक मिली हुई है) कि कला-सला पर हमारी राय का विशेष अर्थ है. सो विशेष अर्थ भरने के लिए हमने दोस्‍त के स्‍केचबुक में रॉटरिंग की रेखाएं और क्रेयन के रंगाकारों की गंभीरता से जांच शुरू की. दोस्‍त गंभीरता से मेरी नज़रों को जांचता रहा. थोड़ी देर तक एक पेज़ से दूसरे में चिड़ि‍या, बत्‍तख, बिल्‍ली, काली-नीली रात, सांप, लैंपपोस्‍ट, आंखें, मुसाफ़ि‍र, नंगी औरतों के दोहराव को पढ़ने के बाद मैंने स्‍केचबुक बंद करके दोस्‍त से कहा- अच्‍छा है, प्‍लेफुल है.. मगर इसमें अंधेरी कहां है? तुम्‍हारे अपने जीवन की.. बाहर पड़ोस की थरथराहट कहां है? एक्‍सपीरियेंस की कॉम्‍प्‍लेक्सिटि, विविडनेस कहां है?

रात के डेढ़ बज रहे थे, बीयर के असर में मैं और भी बहुत कुछ बकता रहा होऊंगा, अब ठीक-ठीक याद नहीं है. दोस्‍त ने अपनी कला को डिफेंड करने की कोशिश नहीं की. चुपचाप मुझे सुनता, मेरी बातें समझने की कोशिश करता रहा. इसके बाद हमने और बीयर पी, हल्‍की-फुल्‍की छेड़ते आर्टी शेप का जैज़ सुनते रहे. नयी बोतल खोलते हुए अचानक दोस्‍त ने मुझसे सवाल किया कि मैं ‘डेथ’ के बारे में क्‍या सोचता हूं. चूंकि तरन्‍नुम में था ही, मैंने घनघोर आत्‍मविश्‍वासी हिंसा से कहा- किसी दिन आएगी और सब खतम हो जाएगा, इससे ज्‍यादा उसे क्‍या भाव देना. हां, तुम्‍हारी तरह नौजवान लोग जब उससे ऑब्‍सेस्‍ड और उसमें इंडल्‍ज करते दिखते हैं, तो मन होता है बोतल उठाके तुमलोगों के सिर पे दे मारूं! जीवन में थोड़ा तो समय है उसे इसपे खराब करते रहें कि एक दिन वह चुक जाएगा तो क्‍या?.. दोस्‍त मेरे जवाब पर हमेशा की तरह हंसने की बजाय चुपचाप सोचता रहा, मानो असहमति ज़ाहिर करके वह घर आए मित्र को दुखी करने से बच रहा हो. बीयर का घूंट भरते हुए फिर उसने संकोच से कहा- हमारा ये जो जीवन है.. हमलोगों के दुनिया में होने का क्‍या कोई अर्थ है, इस सवाल पर सोचा है तुमने? इस प्रश्‍न का मीनिंगफुल आनसर है तुम्‍हारे पास?

जिस अवस्‍था को मैं प्राप्‍त हो चुका था, इस सवाल का क्‍या, दोस्‍त से युंग और लेवी-स्‍त्रॉस सब पर ज़ि‍रह कर सकता था. लेकिन की नहीं.. मुंह पर हाथ रखकर सभा समाप्‍त की और घर लौट आया.. आज सुबह आंख खुली तो दोस्‍त को यह पेज़ फॉरवर्ड किया.. पता नहीं उसकी चिंता का इसमें कितना समाधान है.. लेकिन ऐसी चिंताओं का कभी कोई समाधान हासिल हुआ है भला!

Tuesday, May 22, 2007

भैया की लड़कियां: एक संस्‍मरण

भैया के जलवे थे. हमलोगों के जीवन में एक छोर से दूसरे तक दलिद्दर का साम्राज्य था जबकि भैया का जीवन और दिल भरा-भरा रहता. एक भरपूर नज़र के मोह में हम भरी दोपहर साइकिलों पर आवारा भटकते खून जलाते जबकि भैया की घनेरी, शीतल छांहों में ऐश चल रही थी. हम दो जून की सूखी रोटी को तरस रहे थे और भैया छप्पन भोग की थाली वाली महफ़िल में बैठे थे. यकीन करना मुश्किल होता मगर सच्चाई यही थी कि भैया को लड़कियों की कमी नहीं थी.

चार नंबर या पंद्रह नंबर सेक्टर में हमारा झीरपानी सीनियर्स के अगेंस्ट सेमीफाईनल चल रहा होता. रंजन भौमिक के एक ओवर में तड़ातड़ दो विकेट लेने के बाद हमारे बॉलिंग की धुनाई चल रही होती और स्लिप, गली से लेकर थर्ड मैन तक समूचे फील्ड में एकदम-से घबराहट की हवा तन जाती. खोखोन मिड ऑन से भागा हुआ मेरी तरफ आकर चीखता, 'नेक्स्ट मैच में बापी को खिलाने की ज़रूरत नहीं. फोकट में तीन बाउंड्री दी, इससे अच्छा तो मेरे से बॉलिंग कराते!'.. और मैदान से बाहर सड़क से गुजरते साइकिल रिक्शे पर निगाह पड़ते ही खोखोन अपनी बात के बीच में अटक जाता... और फिर अचानक हड़बड़ाहट में छूटा खबर करता कि, 'देख, देख, तेरे भैया की हिरोइन जा रही है!' हड़बड़ में तेजी से भागकर मैं एक झलक ले पाता, फिर अगले कुछ पलों मैच-सैच सब भूलकर एकदम सन्न खड़ा रहता- यह भी?... कितनी लड़कियों का जीवन नष्‍ट किया है भैया ने?...

मुझसे एक क्लास सीनियर राजू जिस तरह अंजलि के पीछे दीवाना बना घूमता होता और अंजलि के पापा के रिटायरमेंट के बाद उनके महाराष्‍ट्र लौटने की बात आते ही गुमसुम हो जाता या दर्द में नहायी फुसफुसाहट में बात करता- भैया के साथ ऐसी तक़लीफ़ या चिंता नहीं थी. भैया चकाचक-मस्त रहते. क्योंकि उनकी एक नहीं जाने कितनी अंजलि थीं. फूफा की मझलकी लड़की की शादी के समय का क़िस्सा सुनिए. स्थान: बारिडीह, जमशेदपुर, समय: संध्याकाल. बारात अभी आई नहीं है मगर घर से लेकर गली तक में मारामारी और गदर मचा हुआ है. मैं और मेरा ममेरा भाई मोटुल बेहाल हैं कि नीले और हरे कपड़ों वाली किसी लड़की को अपनी चुटीली बात कहके प्रभावित कर लें. मगर अबतक न लड़की प्रभावित हुई है और न हम फुआ की आंख बचाकर भंडार से रसगुल्ला उड़ाके भकोसने का आनंदे पा पाए हैं. तबतक मोटुल मेरी कमीज़ खींचकर पंडाल के एक कोने गदर के एक नए तूफान की तरफ ध्यान आकर्षित कराता है. पहुंचकर देखते हैं हल्की हाथापाई वाली हवा के बीच शांति स्थापना की कोशिश चल रही है. हाथापाई को बेचैन हो रही पाल्टी में मोहल्ले के तीन-चार बड़ी उम्र के लड़के हैं और शांति स्थापना वाले दल के अकेले हीरो हैं आसमानी डॉग कॉलर पॉलिएस्टर शर्ट में अपने भैया जी. झगड़े की वजह ये है कि हाथापाई वाली पाल्टी भैया को आरोपों के कठघरे में खड़ा कर रही है कि वह भले मेहमान और घर के आदमी हों, लेकिन इससे उन्हें ये छूट नहीं मिल जाती कि मोहल्ले की लड़की के ऊपर बुरी नज़र रखें! जबकि भैया अपने सौहार्दपूर्ण पक्ष से समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन लोगों ने गलत समझा है, संगीता (मैं और मोटुल शाम से जिसे ज़ीनत अमान कह-कहके सिसकारी भर रहे थे) उन्हीं की नहीं, उनकी (भैया की) भी बहन जैसी है. और इलाहाबाद पॉलिटेकनीक के स्टूडेंट और भैया से उम्र में चार साल बड़े छोटके मामा की दखलंदाजी के बाद जब पाल्टियों के बीच हाथ मिलवाकर अंतत: शांति स्थापित हो जाती, उसके आधे घंटे भर बाद ही हम ज़ीनत अमान को भैया के मज़ाक पर मुंह पर हाथ धरे खिल-खिलकर हंसता और लजानेवाली अदा फेंकते देखते और बेतरह ताजुब्ब करते-करते बदहवाश बने रहते कि आखिर भैया के पास वह कौन-सी जादू की छड़ी है कि लड़कियां उनके पीछे लट्टू हो जाती हैं. जबकि हम इतनी कोशिशों के बावजूद हमेशा लड्डूलाल ही बने रहते हैं!

शादी की बारात हो, दुर्गापूजा का मेला हो, अस्पताल, स्कूल, सिनेमा हर कहीं भैया की लड़कियां फैली हुई थीं. बंगाली, बिहारी, सिंधी, मलयाली यहां तक कि एक आदिवासी लड़की तक से भैया का टांका भिड़ा हुआ था. एक क़िस्से का अभी अंत होता नहीं कि दूसरी गति पकड़ लेती. कभी-कभी तो भैया के रुपहले पर्दे पर दो नहीं तीन-तीन शो एक साथ चलते होते! और राजू या हमारी तरह कभी भी उनका मुंह लटका नहीं दिखता. चीप टाइप मार्केट के मॉडर्न टेलर के यहां से नई शर्ट-पैंट बनवाकर घर लौटते तो झट उनकी शोभा देखने के लिए पूरा परिवार उनके गिर्द घेरा बांधकर खड़ा हो जाता. दीदी भी कहे बिना रह नहीं पाती कि अच्छा है. मुन्नी तो ऐसे मचलने लगती मानो भैया का नया कपड़ा नहीं देख रही हो, राखी के दिन दीदी के हाथ में आया दस रुपये का नोट पा गई हो! जबकि मेरे और मनोज के नये कपड़े सिलने पर कभी घर में इस तरह का उत्सव नहीं होता. अम्मां बड़ी सुखाने में बझी होती और दीदी अपनी सहेली सपना मुखर्जी के घर चली गई होतीं. मुन्नी दरवाज़े से एक झांकी लेकर बोलती अच्छा नहीं है और इसके पहले कि मनोज उसे कूदकर पकड़ ले और कूटना शुरू करे, भाग जाती. हम तिरछा लगे आईने के अटपटेपन में थोड़ी देर तक अपने में जाने क्या-क्या अस्वाभाविक, असंभव देख लेने की कोशिश करते रहते, फिर हारकर पुराने कपड़ों में लौटकर नॉर्मल हो जाते. मैं तो समझदार होकर घर की बेरूखी का अभ्यस्त हो चला था, मगर मनोज बीच-बीच में घबरा जाता कि शायद कपड़े सचमुच अच्छे नहीं सिले, और बवाल करके घर इतना सिर पे उठा लेता कि अम्मां भी आज़िज आके कह देतीं कि जाने दे, बाबू, अगली दफा अच्छा सिलवा लेना!

भैया के सारे गुप्त भेद (जिसे वह दुनिया को पढ़वाना चाहते) एक पुरानी लार्सन एंड टूब्रो की डायरी में बंद थे, जिसके पहले पृष्‍ठ पर भैया के नाम के इनिशियल्स के बाद बड़े-बड़े अक्षरों में भैया का उपनाम- 'आवारा' दर्ज़ था. दीदी के प्रोत्साहन पर मैं बीच-बीच में भैया का डायरी चुराके ले आता और उसमें 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'सारिका', 'धर्मयुग' और जाने कहां-कहां से उड़ाकर टांकी शेरों को पढ़ते हुए मैं और दीदी ताजुब्ब करते कि ऐसी बेहया और गंदी चीज़ों से डायरी भर कर भैया आखिर साबित क्या करना चाहते थे! दीदी मुंह बनाकर कुछ और भी बोलना चाहतीं, फिर मेरी हैरानी ताड़कर एकदम-से चुपा जातीं, डायरी फेंककर कहतीं, 'इसको हटा यहां से!'

दीदी के गुस्से का भेद मैं कभी समझ नहीं सका. प्रेम और कामना के बारे में अगर दीदी के कोई विचार थे तो उसे हमतक ज़ाहिर करने के लिए दीदी ने अपनी कोई डायरी बनाकर नहीं रखी थी. दीदी का जो भी था वह लाल रंग की एक रेक्सीन की पेटी में था. सिलाई-कढ़ाई की चीज़ों से अलग बोरोसिल, बोरोप्लस के ट्यूब्स थे, 'मनोरमा' के दो कढ़ाई विशेषांक थे, डायरी कोई नहीं थी. हालांकि गांव में खाना बनाते ईया (दादी) की साड़ी में जब भक्क से आग लग गई और अफरातफरी में उन्हें गांव से लाकर बड़े अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट में रखा गया तब दीदी का जिम्मा बना था सारे दिन अस्पताल में उनकी देख-रेख का. एक दिन स्टैंड में साइकिल पर ताला चढ़ाकर मैं वॉर्ड में पहुंचा तो देखता हूं ऊपर से नीचे तक सफ़ेद बैंडेज में लिपटी ईया बेड पर अकेले पड़ी हैं, मगर दीदी का आसपास कहीं पता नहीं. थोड़ी देर में दीदी लौटीं तो हाथ में मुमताज के कवर वाला 'फ़िल्मफ़ेयर' था और मुझसे बात करने की बजाय देर तक वही उलटती-पुलटती रहीं. यह बात दो दिन बाद खुली कि तीन कमरे पार सांस की बीमारी से ग्रस्त रीज़नल इंजीनियरिंग कॉलेज का एक स्टूडेंट एडमिटेड है, और दीदी बीच-बीच में उसकी खोज-खबर लेने जाती है. एक बार हंसते हुए दीदी ने मुझे यह भी बताया कि बहुत ही अच्छा और शरीफ़ लड़का है, फिर थोड़ी देर बाद सोचकर बोलीं भैया या अम्मां से मुझको ये सब बकने की ज़रूरत नहीं है.

लगभग महीने भर की कोशिश के बावजूद ईया को बचाया नहीं जा सका. जबकि इंजीनियरिंग कॉलेज का स्टूडेंट सही-सलामत ही नहीं रहा, ठीक होकर अपने कॉलेज भी लौट गया. और उसके साथ-साथ 'फ़िल्मफ़ेयर' की वो सारी कापियां भी जो दीदी ने पढ़ने के लिए उससे मांग रखीं थीं, और जिसे भैया और अम्मां सबसे छिपाकर वह अकेले में पढ़ते हुए पता नहीं किस आनंद में भरी-भरी रहतीं..

आम पर कौन लिखेगा?..

इतने दिन निकल गए लेकिन देख रहा हूं अभी तक किसी ने लिखा नहीं. सब साहित्‍य और समाज ठेले पड़े हैं, आम पर कोई नहीं लिख रहा. कितनी किस्‍में हैं, आगा-पीछा की कहानी क्‍या है, कहां की खास है, कहां की ‘ऐसे ही’ है, ग्‍लोबलाइज़्ड बाज़ार में भारतीय आमों की हस्‍ती क्‍या है- कितनी तो बातें हैं करने को, लेकिन कोई कर नहीं रहा. हापुस, केसर, दसहरी, लंगड़ा, मलीहाबादी पांच नाम गिनाने से ज्‍यादा मुझे जानकारी होती तो मैं मुंह ज़रूर खोलता. मगर मुंह खोलने के बाद उससे हवा ही निकलेगी, ज्ञान नहीं फूटेगा, इसलिए मुंह और मन मारकर- कोई और बंधु या सखिनी- पहलकदमी लेंगे इसकी राह तकता बैठा हूं. नुक्‍कड़ के ठेले पर भाव साठ से गिरकर पचास और अब पैंतीस रुपए होने को आया मगर किसी की लेखनी अभी भी सप्राण नहीं हुई है.

ताजुब्‍ब की बात है. ब्‍लॉगजगत में ज्ञान के सामुदायिक आदान-प्रदान का इससे रोचक व रसीला विषय क्‍या होता, मगर जो है कि, चुप्‍पी तनी हुई है. ज्ञानी जी पांडे जी रोज़ नए-नए विषयों की वैतरणी में उतरते रहते हैं मगर बगल में सजी, पानी में डूबी, बाल्‍टी भर-भर जिसके स्‍वाद व आह्लाद से इतनी वैचारिक खुराक पा रहे हैं, उसकी महिमा का गान करें, इसका विचार अब तक न आया. अभय ने एलोपैथी की कमर पे लात लगाई, घी का महात्‍म्‍य गाया, आम की फांक रोज़ तश्‍तरी में सजाकर धन्‍य हो रहे हैं मगर उसकी महात्‍म्‍य चर्चा में जाएं, इसका आलस्‍य अभी भी तोड़ नहीं पाए हैं.

शाम को अविनाश को फ़ोन करके मैंने पूछा- आम के बारे में तुम्‍हारी क्‍या राय है? तीस सेकेंड की ख़ामोशी के बाद अविनाश ने स्‍वर भारी बनाकर जवाब दिया- फिलीपीन के साथ-साथ हमारे यहां भी राष्‍ट्रीय फल है. दक्षिण एशिया में हमेशा से धूम रही है. वेदों में इसे देवताओं का फल कहा गया.. कालीदास ने इसकी प्रशस्ति गाई, सिकन्‍दर और चीनी यात्री ह्वेन सांग इसके मुरीद रहे, लखीबाग़ के नाम से अकबर ने दरभंगा में आम के लाख पेड़ लगवाए थे.. मैंने कहा ठीक है, ठीक है ये सब तुम मोहल्‍ले पर लिख सकते थे, लेकिन लिखोगे नहीं. बकिया लोग आम पे लिखें या नहीं, पहले क्लियर कर दो, बाद में कहोगे फिर पतनशील चर्चा हो रही है! अविनाश ने कहा सोचकर जवाब देता हूं, रात के साढ़े तीन हो रहे हैं, अभी तक जवाब नहीं आया है..

ख़ैर, ये तो भइया, हमारा आपस का असमंजस है.. अनामदास जी का ताज़ा पोस्‍ट पढ़कर हम आम (जन) और ख़ास (राज्‍य) के एक दूसरे ही पेंच में सुबह-सुबह उलझ रहे हैं.. मगर आपलोग जो मुंह में गूदा डाले धन्‍य और मगन बने पड़े हैं, भला आप किस वजह से चुपाये हुए हैं? हमारी ही तरह इस विषय में अज्ञान का अंधेरा है, पर्याप्‍त जानकारी का अभाव है? इतिहास, भूगोल व बाज़ार के आंकड़े दुरुस्‍त नहीं हैं?

भाई, गांठ में जितना है उतना ही खोलिए! चुप मत रहिए, आम इतना बोल रहा है, आप भी आम के बारे में बोलिए!

Monday, May 21, 2007

शहर में कवि: मंगलेश डबराल की दो कविताएं



अपनी तस्‍वीर

यह एक तस्‍वीर है
जिसमें थोड़ा-सा साहस झलकता है
और ग़रीबी ढंकी हुई दिखाई देती है
उजाले में खिंची इस तस्‍वीर के पीछे
इसका अंधेरा छिपा हुआ है

इस चेहरे की शांति
एक बेचैनी का मुखौटा है
करुणा और क्रूरता परस्‍पर घुलेमिले हैं
थोड़ा-सा गर्व गहरी शर्म में डूबा है
लड़ने की उम्र जबकि बिना लड़े बीत रही है
इसमें किसी युद्ध से लौटने की यातना है
और ये वे आंखें हैं
जो बताती हैं कि प्रेम जिस पर सारी चीज़ें टिकी हैं
कितना कम होता जा रहा है

आत्‍ममुग्‍धता और मसखरी के बीच
कई तस्‍वीरों की एक तस्‍वीर
जिसे मैं बार-बार खिंचवाता हूं
एक बेहतर तस्‍वीर खिंचने की
निरर्थक-सी उम्‍मीद में.

1993, हम जो देखते हैं संग्रह से




पैरों के पीछे

एक दस्‍तक़ सुनकर
मैं हड़बड़ी में दरवाज़ा खोलूंगा
और तुम भीतर आओगे
दिन भर की ख़बरों / थोड़ी-सी हवा
और चुप्‍पी के साथ
थकान की तरह अपना कोट उतारकर
आईने में कुछ देर
तुम अपना चेहरा देखोगे और मुस्‍कराओगे
कमरे में हलकी-सी धूल उड़ेगी
और चली जायेगी
खिड़की से बाहर

इस तरह सब कुछ
बीतता जाता है रोज़
उसी रास्‍ते आना-जाना / थकान
किताबें / नींद / बहसें और उनके बाद
आने वाली पथरीली उदासी
सब कुछ बीतता जाता है
हमेशा हम बचे रह जाते हैं
किसी स्‍वप्‍न के भीतर दुबके हुए
अपनी बची-खुची ज़ि‍न्‍दगी बचाते हुए
सोचते हुए कि एक दिन
कोई विस्‍फोट होगा और ज़ि‍न्‍दगी बदलेगी

मेज़ पर गंभीरता से झुके हुए
हम किसके प्रतिनिधि हैं
किस घटना की ख़बर हैं हम
कौन हैं वे लोग हम जिनकी आवाज़ हैं
भूख से भर्रायी हुई
हम उन्‍हें जान पाते / कोई हथियार
दे सकते उनके हाथों में
हम उनसे पूछ सकते क्‍या वे अपने साथ
लाये हैं अपनी आग
कविता से पूछे जाने थे
सारे सवालों के जवाब
पूरी सदी / पूरे ख़ून का हिसाब

भारी दिमाग़ और कांपते पैरों से
हम एक दिन चल देते हैं
बिना किसी यात्रा के / बिना उद्देश्‍य के
बिना प्रेम किये / बिना लड़े
चलते हुए हम अपने साथ
ले जाते हैं अपने शब्‍द
पैरों के पीछे ख़ामोशी छोड़ते हुए.

1977, पहाड़ पर लालटेन संग्रह से

Sunday, May 20, 2007

छूटी हुई किताब.. या मन पर चढ़ती धूल..

युवान गोयतिसोलो (स्‍पेन) के बारे में जानने पर एकदम-से उसे पढ़ लेने की क्‍या हुमस चढ़ी थी. पीटर बुश वाला अनुवाद ‘द मार्क्‍स फैमिली सागा’ बंबई की दुकानों में हाथ नहीं लगी तो रोते-गाते, पैसा बहाते किताब को बाहर से मंगवाया. उसकी महक ली, दस एंगल से देखकर उसे बहकते रहे. सोचा कवर और अच्‍छा हो सकता था. अंदर की छपाई और सुधड़ हो सकती थी. मगर सिटी लाइट्स बुक्‍स, सैन फ्रांसिस्‍को के बूते शायद यही इतनी ही उत्‍पादकता थी. बहरहाल, करीने की जिल्‍द चढ़ाकर निहारते रहने और अब और तब करके बीस पन्‍ने पढ़ने के बाद- छै महीने से ऊपर हो चले, किताब धूल खाकर पुरानी हो रही है.. मगर अभीतक पढ़ी नहीं गई है!

यह नई बीमारी है, अदा है, जाने क्‍या है, मगर जीवन में धीरे-धीरे धंस रही है. उत्‍साह में किताबें बटोर कर लाई जाती हैं, फिर इस और उस कोने छूटी रहती हैं. सही समय की आस तकती कि उनकी साज-संभाल भर नहीं होगी, अच्‍छे फल की तरह उन्‍हें चखा भी जाएगा! उनसे दोस्‍ती गांठी जाएगी, मन में उन्‍हें गुना जाएगा. पता नहीं यह क्‍या है- समय की किल्‍लत, मन के डिस्‍ट्रैक्‍शंस, या बेवजह की बेचैनी जो कहीं भी, किसी भी चीज़ में तरतीब से उतरने और पूरी तरह डूब जाना असंभव बनाये रखती है. और सीधे-सादे सहज तरीके से एक वक़्त में एक काम करना तो ऐसी गांठ पैदा करता है, मानो इसे करते हुए जो बाकी सब छोड़ा हुआ है (जिसको कर ही लेके जाने क्‍या गजब हो जाएगा, लेकिन नहीं करते हुए उसके नहीं करने की भारी तक़लीफ़ का बिल्‍ड-अप होता चलता है) उसे छोड़े रखना जाने कैसा संगीन अपराध हो जाएगा! यह संकट महानगरीय निजी पेंच है या हमारे समय-सभ्‍यता का संकट, इसे चार काम साथ-साथ करते हुए समझने की कोशिश कर रहा हूं, और जहां तक युवान गोयतिसोलो के लेखन और ‘द मार्क्‍स फैमिली सागा’ का लुत्‍फ उठाने की बात है, वह अभी भी सुदूर भविष्‍य की किसी बिंदु के लिए स्‍थगित छोड़ दी गई है. इंशाअल्‍लाह, किसी दिन सचमुच पढ़ ली जाएगी.

पढ़ी जा पाएगी?

शहर में लड़कियां



[1]
सड़क पार करती टॉप्‍स और ट्राउज़र्स में लड़की वही नहीं है जो ऊपर से दीख रही है. अजी, लैस है भारी जिरह बख्‍तर में. मौका बनते ही देखिए, बजती है बिजली के माफ़ि‍क. बम-गोला की तरह छूटती है, बन्‍दूक की गोली-सी दग़ती है कैसे दन्‍न-से.

[2]
यह जो मेज़ पर फ़ाइलों में झुकी व्‍यस्‍त है, करती है पिछले सात वर्षों से. और वह जो आई है अभी-अभी पीछे पति के, काम का हसरत लिए. देखती हैं एक-दूसरे में अपनी खोई-पाई छवियां.

[3]
नया-नया ख़ून का स्‍वाद चढ़ा है नसों में. रेणु, रंजु, रोमा, रुख्‍साना अम्‍मी जी को धता बता रही हैं. पापा जी का माथा घूम रहा है. लड़कियां अजनबी संगतों में रोज़ शहर जा रही हैं.

[4]
दल बांधकर निकली हैं लड़कियां. चकमक, चकाचक. एक ज़ोर का चीखती है, दूसरी ठठाकर हंसती है. पुलिस का ठुल्‍ला ठिठककर ताकता है. ठेलेवाला भी हैरान है. एक साहब लड़ते-लड़ाते बचे अपनी फटफटिया. अरे, ये क्‍या गजब करने निकली है लड़कियां. होश में हैं सबको बेहोश कर रही हैं लड़कियां.

Saturday, May 19, 2007

चोरियां: एक संस्‍मरण

मेरे लिए यह बात हमेशा रहस्य बनी रहती कि भैया अपनी जरूरतें कहां से पूरी करते हैं. मसलन फ़िल्म की टिकट के पैसे, जूतों की पालिश वाली डिबिया या लौंड्रीवाले को पैसे चुकाने की उन्हें जरूरत पड़ती होगी मगर इन ज़रूरतों के लिए मैंने भैया को कभी अम्मां से पैसे मांगते नहीं देखा. बाबूजी से पैसा मांगने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि बाबूजी से कोई पैसे नहीं मांगता था. सब जानते थे कि बाबूजी पैसे नहीं देते. बाबूजी सचमुच पैसे नहीं देते थे. महीने के हिसाब के लिए भी अम्मां को पैसा सौंपते समय वे इसी तरह हाथ से पैसा निकालते जैसे उनकी चोरी हो रही है.

बीच बीच में जब बाबूजी का मन दिल्लगी करने को होता तो वे धोने के लिए पुरानी गंजी उतारते हुए मनोज को छेड़ते कि जा, हमारे लिए गुल की डिब्बी ले आ, आठ आने इनाम दूंगा. मनोज चिढ़कर जवाब देता हमें इनाम नहीं चाहिये. मनोज भी जानता था कि बाबूजी दिल्लगी कर रहे हैं. ऐसा पहले कई दफे हो चुका था कि बाबूजी के वादे के धोखे में फंसकर मनोज गुल की डिब्बी खरीदकर लाया और इनाम की मांग की बेजा ज़िद के लिए उसे भैया की मार पड़ी. तब बाबूजी के अन्याय के प्रति मनोज रोने-धोने का नाटक करता, बाबूजी चबूतरे पर बेशर्मी से हंसते हुए अपने सांवलेपन को सरसों के तेल से मलते हुए तराशते रहते. थककर अम्मां बाबूजी की दुष्‍टता पर बुदबुदती हुई मनोज का मन रखने के लिए उसके हाथ में एक चवन्नी रखकर उसे अपने साथ अंदर ले जाती. इस सीधेपन से बाबूजी के हाथों मनोज के ठग लिए जाने पर मुन्नी को भी हंसी आ जाती थी. हाथ में एक बार अम्मां की चवन्नी आ जाने के बाद मनोज मुन्नी के तमाचा जड़कर भैया की मार का अपना बदला चुका लिया करता. मुन्नी समझदार थी. वह मनोज के तमाचे के जवाब में रोने की बजाय उस पर चिल्ला कर संतुष्‍ट हो लिया करती थी. मुन्नी को मालूम था वह मनोज की मार का बदला उसे पलटकर मारकर चुका सकने में असमर्थ होती. अम्मां मनोज को डांटने की बजाय मुन्नी को डांटकर बरजती कि उसे लड़की होने का सऊर कब आएगा.

अम्मां के हाथ अमूमन बंधे होते. मनोज या मुन्नी की छोटी मांगों पर दिक्कत नहीं होती थी मगर मैं या दीदी उससे कोई मांग करें तो अम्मां का चेहरा कातर हो जाया करता था. वह दबी आवाज़ में सवाल करती कि कितने से काम चल जायेगा या फिर मैं या दीदी कुछ दिन और इंतज़ार नहीं कर सकते. अम्मां को समझाना मुश्किल होता कि कुछ दिन इंतज़ार करने के बाद ही विवशता में हम उनके आगे अपनी मांग लाने को मजबूर होते थे. मामले की गंभीरता समझकर फिर अम्मां के आंचल से चाभी लेकर स्टील की बड़ी आलमारी खोली जाती और उनकी न पहनने वाली जार्जेट की साड़ियों के नीचे से मुड़े तुड़े कुछ रुपये बाहर निकाले जाते. ऐसे मौकों पर न चाहते हुए भी दुख और भावुकता का अजीब गोपनीय-सा माहौल तैयार हो जाता और जाने क्यों दीदी और मैं एकदम रुंआसे से हो जाते. हमें लगता कि हम अम्मां पर बोझ हैं और ख़ामख्वाह उनके लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं. दीदी बाद में मुझे बाज़ार भेजते हुए सख्ती से हिदायत देती कि जितने पैसे खर्च हों मैं उतने ही पैसे खर्च करुं और बाकी चुपचाप लाकर उसके हाथ में सौंप दूं. मैं जिम्मेदार भाई की तरह दीदी की आज्ञा का पालन करता और रास्ते भर के असमंजस के बावजूद तकरीबन सही-सही बचा पैसा उन्हें वापस सौंप देता. कभी-कभी अपनी नीचता से हारकर एक रुपया अपने लिए बचा लेता था. दीदी को मेरे हिसाब में संदेह हो तो उनके कुछ कहने के पहले ही मैं डांटकर उनका मुंह सिल दिया करता कि आइंदा अपनी खरीदारी खुद किया करें! दीदी चुप हो जाया करतीं मगर घंटे दो घंटे बाद यह कहने से खुद को रोक नहीं पातीं थीं कि घर में सब चोर हैं.

जबकि सच्चाई थी कि घर में सब चोर नहीं थे. चोर इकलौता मैं था. अपने हिस्से का हजम करके बची हुई मिठाई के फिराक में मनोज भी रहता मगर अपने अनाड़ीपन की वजह से उसकी चोरी हमेशा पकड़ी जाती. भैया और दीदी इतने बड़े थे कि उनकी चोरी का सवाल ही नहीं उठता था. रही मुन्नी तो वह इतनी छोटी थी और फिर उसके फ्रॉक में जेब भी नहीं था और न उसके अपना कोई बक्सा था जहां वह अपनी चोरी छिपा सकती. मुन्नी भोली थी, मुन्नी चोर नहीं थी. बहुत बार तो चोरी के श्‍ाक में भैया का थप्पड़ मनोज पर गिरता और डरकर मुन्नी रोने लगती. मैं भैया के थप्पड़ से बचकर चलता था इसलिए अपनी चोरियों में मुझे खास होशियारी बरतनी होती थी. खुल्लम खुल्ला रखे पैसों की तरफ मैं देखता भी नहीं था. और न अम्मां के सहेजकर रखे पैसों पर मेरी गलत निगाह जाती. मैं भरी दोपहर, उठंगे हुए बाबूजी की आंख के नीचे से पैसा उड़ाने में यकीन रखता था. और उतनी ही चोरी करता जितने से बाबूजी को तक़लीफ़ न हो. न जानकर उन्हें तक़लीफ़ तो न होती मगर कभी कभी पैसों की छेड़छाड़ का शक जरूर हो जाया करता. ऐसे मौकों पर मनोज का पिटना लाजिमी रहता.

अम्मां परेशान होकर कहतीं उनके घर में चोरी नहीं थी, जाने ये चोरी कहां से चली आई. बाबूजी मज़ाक करते कि चोरी अम्मां अपने पीहर से लेकर आई हैं. अम्मां बाबूजी की बात का बुरा मानकर एक वक्त़ खाना नहीं खातीं. रात को गुल की कुल्ली के लिए बाबूजी को पानी का जग देते हुए मुन्नी बाबूजी को सूचित करती कि अम्मां ने खाना नहीं खाया है. बाबूजी हाथ में जग लेकर सड़क के झिपझिपाते लैंप-पोस्ट को देखकर मन ही मन बुदबुदाते कि यह बत्ती फिर जाने वाली है, ऊपर मुन्नी से कहते, 'अच्छा?`

दीदी दरवाजे से झांककर उन्हें इत्तिला करती कि अम्मां पीहरवाली बात का बुरा मानकर नहीं खाई हैं. बाबूजी को तब अपने मज़ाक की बात याद आती. वे दीदी से कहते कि हम तो मज़ाक कर रहे थे. दीदी लौटकर अम्मां को बतातीं कि बाबूजी मज़ाक कर रहे थे. अम्मां तिलमिलाकर जवाब देतीं कि अपने लोग पर काहे मजाक नहीं करते? हमरे पीहर वालों पर ही इनको मजाक सूझता है और उस रात अम्मां नहीं ही खातीं थीं और दीदी को अकेले खाना पड़ता था. कई दफे बाबूजी के मज़ाक के विरोध में अम्मां के संग दीदी भी उपवास कर लेतीं.

मैं चोरी के पैसों को चोरी के पैसों की तरह खर्च कर देता. दीदी या मुन्नी के राखी के पैसों की तरह उनका ठीक ठीक हिसाब किताब कभी मेरे पास नहीं रहता. ज्यादातर पैसे फ़िल्म की टिकटों पर खर्च हो जाते या इंद्रजाल कॉमिक्स या मनोज पाकेट बुक्स पर. भैया की तरह लौंड्रीवाले का पैसा चुकाने का भार मुझ पर नहीं था. मैं और मनोज धोबी या दीदी के हाथ के धुले कपड़े पहनते थे. भैया का मानना था धोबी कपड़े खराब कर देता है. अम्मां, बाबूजी और दीदी का भी ऐसा मानना था कि धोबी कपड़े खराब कर देता है मगर इसकी वजह से वे अपने कपड़े लौंड्रीवाले को दें, ऐसा नहीं होने लगता. अलबत्ता बाबूजी भैया की टिप्पणी के जवाब में ये जरूर कहते थे कि भैया को बहुत लाटसाहबी चढ़ रही है. भैया भी जानते थे कि उन्हें लाटसाहबी चढ़ रही है मगर वे इसमें कुछ बुराई नहीं देखते थे. भैया को लगता था उन्हें बहुत आगे जाना है और इस आगे जाने के लिए उन्हें धोबी की बनिस्बत लौंड्री की सफाई अपने लिए अनिवार्य लगती. कभी कभी धुन में आकर वे साइकिल को एक लात लगाकर पीछे ठेल देते कि मन भर गया इस साली साइकिल से, अब तो अपने को एक बुलेट चाहिये.

मनोज हैरान होकर आंखें फाड़े भैया से पूछता, 'सच्ची में भैया?`

मनोज को विश्वास नहीं होता कि उसके अपने भैया उसके अपने घर में एक सचमुच का बुलेट ले आएंगे.

Friday, May 18, 2007

सिदो हैम्‍ब्रम और दुख की नदी: एक आधुनिक लोककथा

तैंतीस साल के छरहरे, सांवले सिदो हेम्‍ब्रम के जीवन में तंगी का संकट नहीं था. नवधनिक ठाठ नहीं थे मगर अच्‍छी नौकरी की कामचलाऊ ज़ि‍न्‍दगी थी. दो कमरों के साफ़-सुथरे घर में सुघड़ पत्‍नी की व्‍यवस्‍था थी. चाहता तो सब समय फ्रिज़ का पीना पी सकता, लेकिन मटकी के पानी और मटकी वाले हंड़ि‍या के बीच पले-बढ़े सिदो हैम्‍ब्रम को फ्रिज़ के बर्फीले पानी से असुविधा होती. लगता अपनी पहचान और नैतिकता से समझौता कर रहा है. जबकि गांव में पीने के पानी की एक गगरी के लिए औरतें चार कोस का रस्‍ता तय करती थीं, हाथ में ठंडा पानी लेकर वह उन सभी औरतों के साथ धोखा करेगा. ज्ञान की चेतना पाते ही पहली बात उसने समझी कि धोखेबाजी और रंगबाजी ही गांव में दुख का यथास्थितिवाद बनाये हुए हैं. सिदो हैम्‍ब्रम सुबह-शाम इस यथास्थितिवाद को तोड़ने की तरकीबें सोचता, मगर धोखेबाज बनकर उसका हिस्‍सा हो जाए, ऐसा अपराध तो उसे सपने में भी न सूझता.

राजधानी की खुशगवार सड़कों पर सस्‍ते शर्ट और सस्‍ते पैंट में पीठ के पीछे हाथ बांधे सिदो हैम्‍ब्रम सुखी नागरजनों के कौतुक देखता और मन ही मन विचार करता कि इनके जीवन में पानी है फिर उसके गांव में क्‍यों नहीं. क्‍या ये सही लोग हैं और उसके गांव की औरतें गलत? वर्त्‍तमान समय की कौन-सी तस्‍वीर सही और प्रामाणिक है. वह जो दिन-रात उसके दिमाग में खदबदाते भात की तरह खौलती रहती है, या वह जिसकी छाया वह नागरजनों की सुखी आंखों में देखता है? सिदो हैम्‍ब्रम देर तक विचार करता और अपने सवाल का सही उत्‍तर न पाकर घंटों उद्वि‍ग्‍न बना रहता. गांव-घर की पत्‍नी पूछती किस बात की चिंता है तो सिदो हैम्‍ब्रम ऊंची आवाज़ में उसके आगे अपनी चिंतायें बकता बेचारी सीधी औरत और पड़ोसियों की शांति में खलल बनता. ज़ि‍रह के पेंच और उलझते जाते तो सिदो हैम्‍ब्रम अचानक हंसने लगता. इस तरह अपनी उलझन व कुंठा जोर-जोर की हंसी के पीछे छिपाकर वह अपनी तक़लीफ भूलने की कोशिश करता.

सिदो हैम्‍ब्रम चाहता तो एक बड़ी छलांग मारकर दुख की नदी पार कर जाता. इतनी चेतना और राजधानी में रहकर इतनी चालाकी अर्जित कर ली थी उसने. मगर गांव के मोह से बंधा हुआ था. खुद को दुख से अलग करके वह गांव से अलग होने के अपराध का भागी होना नहीं चाहता था.

सिदो हैम्‍ब्रम ने बचपन से आदिवासी जीवन के दुख देखे थे. आदिवासी जीवन से बाहर आकर दुखों का एक वृहत्‍तर भूगोल देखा. बड़े गुनी-ज्ञानी लोगों की संगत में बैठकर दुख की इस नदी की वह ठीक-ठीक व्‍याख्‍या समझने की कोशिश करता. इतना शांत व समर्पित रहता कि लोग भूल जाते सिदो हैम्‍ब्रम ऊंची आवाज़ में बात करता है. और फिर इस खूराक़ से लैस होकर वह अपने सस्‍ते हवाई चप्‍पल में मीलों पैदल चलता. दिमाग में सवालों की व्‍यवस्‍था करता, नए ज़ि‍रह डिज़ाइन करता. और इस ख़्याल से उसे अपूर्व सुख की अनुभूति होती कि वह दुख का केवल अपने व अपने गांव के लिए ही नहीं, समूचे समाज का तोड़ पा लेगा, और उसकी कहानी का निजी सबक सामाजिक सबक के बतौर बरता जा सकेगा.

जितना सिदो हैम्‍ब्रम अपने को समझता था, उतना वह समझदार था नहीं. दरअसल भोला और बुद्धू था. क्‍योंकि जिस घड़ी वह इन सपनों में डूबा रहता, ठीक उसी वक़्त उसके दफ़्तर के सहकर्मी और शांत पड़ोसी उसके हल्‍ले के ख़ि‍लाफ़ पुलिस थाने में शिकायत लेकर बैठे होते. कुछ ही समय में फ़ैसला सुनाकर सिदो हैम्‍ब्रम से हमेशा-हमेशा के लिए दाल भात छीन लिए जाने की नीति रची जा रही होती.

आखिर में एक निजी चिंता. मैं सिदो हैम्‍ब्रम के साथ रहूं, या उसके शांत पड़ोसियों की शिकायत के साथ- इस प्रश्‍न को लेकर अभी तक असमंजस में हूं. मेरी मदद कीजिए- आप ही बताइए, क्‍या करना उचित व संगत होगा?

19वीं सदी के मध्‍य में ओड़ि‍सा की गंवई शिक्षा

फकीरमोहन सेनापति

शहर के बीच हर बड़ी बस्‍ती में और बस्‍ती छोटी हो तो दो-तीन बस्तियों में एक-एक प्राथमिक पाठशाला थी. संपन्‍न घरों में स्‍वतंत्र रूप से अध्‍यापक (अवधान) थे. गांव में ‘बाउरी’, ‘कंडरा’ आदि अस्‍पृश्‍य जाति के लड़के भी ऊंची जात वाले बच्‍चों से दूर बैठकर पाठशाला में पढ़ते थे... उस समय पढ़ाने के लिए अध्‍यापक कटक जिले से, विशेषकर कटक जिले के झंकड़ परगने से बालेश्‍वर जिले में आते थे. अध्‍यापकों के आने का समय था चैत का महीना. अध्‍यापक पहनावे से पहचाने जाते थे. घुटनों तक को ढकने वाली मोटी-सी धोती, सिर पर मटमैला गमछा, कंधे पर बंधी दो पोटलियां- एक ओर आधा सेर तक पकाने के लिए पतीली और एक हल्‍का-सा लोटा; दूसरी ओर दो-चार पोथियों के साथ एक जोड़ी कपड़ा. ये ही चीजें काम ढ़ूढ़नेवाले अध्‍यापकों की पहचान थीं. फागुन आधा बीतने से लेकर चैत तक अध्‍यापक गलियों में घूमते नजर आते थे.

इनमें अधिकांश कायस्‍थ होते थे. कुछेक माटिवंश ओझा (एक जाति, पढ़ाना जिनकी आजीविका का पारंपरिक साधन था) बालेश्‍वरवासी अध्‍यापक ज्‍योतिषी हैं. माटिवंश के ओझा प्रारंभिक शिक्षण में सबसे दक्ष होते हैं- ऐसी मान्‍यता थी. लोक-विश्‍वास था कि उन्‍हें ‘लीलावती सूत्र’ मालूम था. पाठ के बल से ओझा लोग पेड़ों के पत्‍ते और उड़ती चिड़ि‍या के पर तक गिन सकते हैं, यह बात मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं.

अध्‍यापक सिर्फ बालेश्‍वर ही में पाठशाला खोलकर बच्‍चों को पढ़ाते हों, ऐसा नहीं था. बालेश्‍वर के आस-पास के रजवाड़ों में, मेदिनीपुर जिले के दांतुण, पटाशपुर, महिषादल, कांधि, हरिपुर आदि इलाकों में भी उनका कार्यक्षेत्र फैला हुआ था.

पाठशाला में गैरकानूनी काम एक भी नहीं था. सब कानून के पाबंद थे. कार्यविधि का उल्‍लंघन करनेवाले के लिए दंड अनिवार्य था. अध्‍यापक के आदेश या उनसे अनुमति लिए बगैर उठना-बैठना तक छात्र के वश की बात नहीं थी. एक जगह बैठे-बैठे पैर दुखने लगे या झनझना उठे तो उसी तरह उसी जगह बैठकर प्रार्थना करनी पड़ती थी- “मास्‍टरजी, एक”, यानी पेशाब करने जाऊंगा. “मास्‍टरजी, दो”, यानी ‘टट्टी’ जाना है. “मास्‍टरजी, पांच”, यानी पानी पीने जाना है.. आदि-आदि.

पाठशाला की दंडविधि में कई तरह की सजाओं की व्‍यवस्‍था थी.
पहली- बेंत की मार.
दूसरी- ‘एक गोड़ि‍या’, अर्थात एक ही पैर पर खड़ा रहना.
तीसरी- ‘नाक और बाल’- एक हाथ से नाक और दूसरे से सिर के बाल पकड़कर खड़ा रहना.
चौथी- ‘आष्‍ठुगोपाल’, अर्थात घुटने के बल बैठकर, बायां हाथ सर पर रखकर, दायीं हथेली पर ‘खड़ी’ रखकर आगे हाथ बढ़ाए बैठे रहना.

उस समय बाइबिल के अलावा ओड़ि‍या में और कोई छपी हुई किताब नहीं थी. कटक मिशन प्रेस के अलावा और कोई छापाखाना भी नहीं था. बालेश्‍वर में पादरियों का एक स्‍कूल था. वहां ओड़ि‍या में लिखी बाइबिल के अलावा और कोई पढ़ाई नहीं होती थी. पर पादरी के स्‍कूल में छपी हुई किताब पढ़ने से जात चली जाएगी, इस डर से कोई हिंदू लड़का वहां पढ़ता नहीं था.

फकीरमोहन सेनापति के 'आत्‍मजीवनचरित' से साभार.
अनुवाद: श्रीनिवास उद्गाता, प्रकाशक: नेशनल बुक ट्रस्‍ट

Thursday, May 17, 2007

हमारी बातें, उनकी लातें: एक अप्रगतिशील चिंतन

जम नहीं रहा हो तो इसको उलटकर भी पढ़ सकते हैं. हमारी लातें, उनकी बातें. निर्भर करता है आपका संवेदनात्‍मक धरातल क्‍या है. आप बातों में यकीन करते हैं या लातों में. जाने दीजिये, एक सीधी बात बताता हूं. बात और लात एक दूसरे से उतना दूर नहीं जैसाकि अक्‍सर समझा जाता है. समझिए, गहरे आबद्ध हैं. सरकार के पास आप नमकीन आंसुओं में लिपटी मीठी बातों की दर्दभरी कहानियां लेकर पहुंचते हैं, सरकार क्‍या करती है? पहले तो यह समझाती है कि आपको बात करने की तमीज़ नहीं है. उसके बाद भी आप तमीज़ ढूंढ़ते रहते हैं तो लातों से आपको ऊपर से नीचे तक नापना शुरू करती है. इतना नापती है कि तमीज़ तो क्‍या आपके पास बची-खुची कमीज़ भी नहीं बचती. बातों और लातों का जैसा आपसी हेलमेल है, सरकार के पीछे-पीछे (ब्‍लॉग) समाज में भी कुछ वैसा ही हिलने-मिलने का प्रचलन बढ़ा है. अभी कल ही का लीजिये. लाल्‍टू जी पुराने व गंभीर ब्‍लॉगिए हैं. चार हफ्तों के लंबे अंतराल पर आठ लाइनों की एक बात (पोस्‍ट) चढ़ाई, और अभी (पोस्‍ट की) स्‍याही सूखी भी नहीं थी कि (टिप्‍पणियों की) लातें बरसने लगीं. दूसरा केस देखिए, कल का ही मामला है: अविनाश अरुंधति को सामने रखकर संदेश लहरा रहे हैं- बातों की रातें बहुत हुईं, अब यह लातों की बरसातों का वक़्त है. स्‍वामी निर्मलानंद तत्‍काल मंतव्‍य हृदयंगम करके लात फेंकने भी लगे, जिसका अविनाश पर, जैसा मनोवांछित अनुकूल दार्शनिक उत्‍साहवर्द्धन वाला असर वह चाह रहे थे, पड़ने की बजाय धक्‍के और झटकों में असर पड़ने लगा, और ‘हां-हां, ना-ना’ करके अविनाश लातों की नहीं, शांति और अहिंसात्‍मक बातों का गाना गाने को मजबूर हुए! तो बात से लात और लात से बात माने इसके से उसके रूपांतरण में एक पोस्‍ट से भी कम का फ़ासला है. कभी-कभी तालाब को गंदा करनेवाली एक मछली की तरह, एक टिप्‍पणी सिर उठाती नहीं कि बहुत सारे ब्‍लॉगर बेचैनी में दिल्‍ली से देहरादून तक अपने-अपने पंक (टिप्‍पणी) में खड़ा होने लगते हैं. यकीन न हो रहा हो तो हसन जमाल प्रसंग में चौपट स्‍वामी से जाकर इसका स्‍पष्‍टीकरण लें.

लात ऐसे ही खलिहा लटके पड़े हैं और मैं बातें किये जा रहा हूं. क्‍यों कर रहा हूं? इसलिए कि आपही की तरह मैं भी बातों में यकीन रखता हूं (आप रखते हैं ना?). हो सकता है सचमुच रखते हों. शांतिप्रिय-विलासी व्‍यक्ति हों. मगर अनुकूल परिस्थिति न पा रहे हों? पत्‍नी आपकी बातों को भाव न दे रही हो. बच्‍चे पीठ पीछे ही नहीं सामने भी हें-हें कर रहे हों. खबरिया चैनल का बॉस आपको दो कौड़ी का पत्रकार समझता हो. बिदेसिया बंगलोरियन बाला आशिकवाली सारी नौटंकियों के बावजूद आपमें कुत्‍ता संभावना भी न देख पा रही हो. सात लाख शब्‍द टिपियाने के बाद भी ब्‍लॉगर समाज आपको बुद्धिदेव और बुद्ध मानने से कन्‍नी काट रहा हो, और फिर तारीफ़ करने पर पिल ही जाये तो भी आपको ‘गदहा’ ही बता रहा हो! इसकी चिरौरी और उसका मनुहार कर-करके आप बिक्षिप्‍तावस्‍था और मुर्च्‍छावस्‍था के बीच संक्रमण करते रहते हों. और अपनी कनवेसिंग में दो घड़ी की फुरसत पाने पर फलाने रवि आपका जीना मुहाल कर दें कि, ‘आपने हमारी कविता पर वैसे नहीं लिखा जैसे आपकी मेधा से अपेक्षित था!’, और यह शिकायत अभी थमी भी न हो कि ढिकाने कवि फोन करके आपके कान पर तबला पीटने लगें कि, ‘आपको तो ससुर, कविता की तमीज़ ही नहीं है? कैसे पढ़ कैसे ली आपने हमारी कविता? और पूरी पढ़ ली! उसपर टिप्‍पणी भी छोड़ दिये? अरे, आपकी मजाल कैसे हुई!’

ऐसे में आप क्‍या कीजिएगा? बातों की महीन डगर पर जान और लाज बचाकर चलिएगा? या गुंडागिरी में मर्दित होकर लात फेंकने लगिएगा? ठीक है, तो चलिए, नेक़ काम में देरी कैसी. अभी आसपास जो भी बैठा हो उसपर लात फेंकना शुरू कर दीजिए! देखिए, कितने समय तक फेंकते रह सकते हैं. कितने मिनट की कसरत हुई? बहुत समय तक नहीं फेंक पाइएगा. बदन में दर्द उठ रहा है? वहां-वहां से उठने लगेगा जहां से दर्द उठने की बात आप भूल चुके थे. सच्‍चाई यही है कि लात फेंकनेवाले भी एक दिन बात के गोलमेज़ सम्‍मेलन पर लौटते ही हैं!

वैसे एक तरह से लात खाये मुल्‍कों में लात की ही महिमा चलती रही है. आजतक. वक़्त आ गया है कि हम बात फेंकने के बारे में भी गंभीरता से विचार करें. बात फेंकने की ही बात की है अब आप फिर लात फेंकना न शुरू करें. कृपया.

Wednesday, May 16, 2007

बरसाती रिमझि‍म: एक संस्‍मरण

बरसाती रिमझिम की झड़ी लगते ही घर में अंधेरा भर जाता. कमर में चुन्नी खोंसे और हाथ में नारियल की झाड़ू लिए दीदी दिन भर खरड़-खरड़ पानी एक ओर से दूसरी ओर हटाने में बझी रहती. अम्मां अचारों के मर्तबान और गीले कपड़ों की साज-संभाल देखती. मुन्नी भाग-भागकर इस कमरे से उस कमरा किये रहती कि केंचुआ है! पिल्लू है! फिर उठंगी बैठकर घंटे-घंटे भर उनको निहारा करती, जबतक मनोज पीछे से आकर उसकी चोटी न खींचता और नारियल की झाड़ू की सींक से पिल्लुओं को उलटकर मुन्नी को दहशत और वितृष्‍णा से भर नहीं देता. अपने कमरे में बाबूजी साठ वॉट के पीले अंधेरे में तखत पर बैठे चिंता करते कि पता नहीं इस पानी में गांव के घर की क्या दशा हो रही होगी. रसोई की टुटही दरवाज़े के नीचे के ढर्र-ढर्र बहते पानी में चाय का भगोना मांजती अम्मां बुदबुदाती, 'हमारी यहां दस दशा हुई रहती है उसकी चिंता नहीं. बस गांवे का घर सूझता रहता है!'

मुन्नी चुपचाप सफेद स्कर्ट-ब्लाऊज पहनकर तैयार हो जाती मगर मनोज रोज़ नाटक करता कि इतनी बरसात में कोई स्कूल कैसे जाएगा. स्कूल जाके क्या फायदा जबकि स्कूल में कोई पढ़ाइये नहीं होगी. मिश्रा सर बरसात में गांव चले जाते हैं और झा सर का भरोसा नहीं ही रहता. लड़के टेबल पर कूदा-फांदी करते हैं या गलियारे में फिसला-फिसली खेलते हैं. हमको घर रहकर पढ़ाई करने दो, स्कूल भेजके हमारा टाईम वेस्टिंग मत कराओ! दीदी गीले कपड़ों को दरवाज़े, मशीन, ड्रम, रेंगनी, गोदरेज की अलमारी और गलियारे के साइकिल पर फैलाती हुई मुंह बनाती कि ऐसे थेथर और बेहया लड़के से मुंह लड़ाने का क्या फायदा. लातों के दूत बातों से नहीं मानते. अम्मां मनोज के पीछे चिरौरी करती घूमती कि वह लात खानेवाला काम न करे, अच्छे बेटे की तरह राजी-खुशी स्कूल चले जाये. मगर मनोज की नौटंकी तबतक चलती रहती जबतक भैया कहीं से भींजकर लौट नहीं आते, गाली देते कि साला, सब कपड़ा खराब हो गया और तब मनोज बिना तीन-पांच किए एकदम राजी-खुशी स्कूल चला जाता.

प्रीति और रंजु डेस्क पर बैठी जोड़-गुना खेलतीं, बाकी सब उधम में क्लास सिर पे उठाये रहते. बैनर्जी आंटी क्‍लास में घुसने पर हल्‍ला-गुल्‍ला देखकर कभी नाराज़ होतीं, बाकी आंटी या सर कुछ भी नहीं होते. अंगरेज़ी के परिडा सर अपनी कुर्सी पर बैठकर हमारी तरफ देखने की बजाय खिड़की से बाहर की झड़ी की तरफ देखते रहते और फिर पलटकर उदास होकर उड़ीया में बोलते ये क्‍लास में बैठने का नहीं घर में चदरी ओढ़ के चाय-पकौड़ी खाने का समय है. स्कूल में पढ़ाई सचमुच नहीं होती. मैं अपने क्लास में रहने की बजाय एक साल सीनियर तेजिंदर और श्‍ोखर के सेक्शन के दरवाज़े पर अड्डा जमाये रहता और हमलोग घंटों-घंटों भर देश और दुनिया के बारे में पता नहीं क्‍या-क्‍या बहस करते रहते. तेजिंदर कहता इस साल ज्यादा बारिश होगी. उसके जवाब में शेखर कहता 1961 में जैसी बारिश हुई वैसी पहले कभी नहीं हुई न बाद में होने का कभी चांस है. राजू भी बहस में शामिल होने चला आता मगर कनखियों से ध्यान उसका अंदर सहेलियों के बीच खड़ी हंसती हुई अंजलि में टंगा होता. अच्छी-खासी पिकनिक हो जाती. लगता ही नहीं स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं. इसीलिए भैया बाज मर्तबा मेरे किसी गलत काम पर फ़ैसला सुनाते कि स्कूल नहीं जाना है! देखता हूं आज स्कूल कैसे जाते हो! इस तरह की धमकियों से मैं सचमुच डर जाता. धीमी आवाज़ में अम्मां के आगे स्कूल न जाने के नुकसान गिनाता. अम्मां कहती अपने बाक-बखेड़ा में हमको मत उलझाओ. दीदी भैया के फ़ैसलों में यूं भी राय बनाने से बचती थी, दखल़अंदाज़ी का तो सवाल ही नहीं उठता था. सब कहीं से हारकर और भैया को दुनिया में अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानकर मैं इसकी तरकीब भिड़ाने में लग जाता कि कैसे भैया किसी दूसरी ज़िरह में फंसें और मैं उनकी नज़र बचाकर स्कूल भाग जाऊं. भागते में कभी दीदी की निगाह की पकड़ में आ जाता तो वह भैया से शिकायत नहीं करती. उल्टे मदद करती, फुसफुसा के बोलतीं, 'भाग, भाग! इधर नहीं देख रहे हैं, निकल जा!'

ऐसा भूल से भी नहीं होता कि मनोज साफ़-सुथरे कपड़ों में स्कूल जाकर साफ़-सुथरे कपड़ों में ही स्कूल से लौट आए! उसके स्कूल से लौटते ही दीदी माथा पीट लेती, 'देखो, हरामी को.. क्या गत करके लौटा है!' दीदी मनोज के बारे में नहीं उसके देह पर के कपड़ों पर टिप्पणी कर रही होतीं. दीदी का बोलने का हक बनता था क्योंकि घर के सारे कपड़े जो धोबी के यहां नहीं जाते थे, की सफ़ाई का भार दीदी के ही जिम्मे था. अम्मां बोलती जाने दे, बेटी, हरामी लड़का है, इससे मुंह क्या लड़ाना! मगर दीदी जाने नहीं देती थी, देर तक रसोई और अंदरवाले कमरे में झींकती रहती कि सबलोग उसे घर में नौकरानी समझते हैं! ऐसे मौकों पर मुन्नी चुपचाप जाकर दीदी के पास बैठ जाती और गुमसुम-गुमसुम दीदी को देखती रहती, मानो दीदी का अध्ययन करके अपने भविष्‍य का पाठ ले रही हो. जबकि मनोज चुप रहकर दीदी का दुख कम करने की बजाय ज़ोर-ज़ोर से मुंह बजाकर दीदी का दुख बढ़ाता रहता. दीदी को सुनाकर कहता हम बोले थे कीचड़-कादो है स्कूल मत भेजो तब कोई हमारा बात नहीं सुना! दीदी कहती चुप रह, हरामी, एक तुम्हीं दुनिया में स्कूल जाते हो? मुनिया नहीं जाती है? उसका कपड़ा काहे नहीं कीचड़-कादो होता? दीदी की बात सुनकर चुप लगा जाने की जगह मनोज पलटकर ज़िरह करता, 'तुमको क्या मालूम हमको कितना काम रहता है! भागादौड़ी करनी पड़ती है.. दास आंटी चॉक लाने स्टाफरूम भेज देती हैं! मुनिया जैसे एक जगह बैठे थोड़े रहते हैं? मालूम-सालूम कुछ नहीं, घर बैठे फलतुआ बकबक करती हैं!

जबकि सच्चाई यह होती कि अपने क्लास के लड़कों के साथ स्कूल से घर तक के रास्ते में सड़क के किनारे जमा हो गए भर्र-भर्र पानी में गोड़ डालकर छींटा उड़ाये बिना मनोज को चैन नहीं पड़ता था. या रिसेस के समय पानी के छींटें पड़ रहे हों तो वह अदबदाकर मैदान में दूसरों के पीछे-पीछे फुटबॉल खेलने उतरता और फुटबॉल पाने के चक्कर में दस दफा ज़मीन पर लोटे बिना उसे लगता ही नहीं कि वह फुटबॉल खेल रहा है! मनोज के लिए फुटबॉल खेलना और कीचड़ में लिसड़ाना एक ही बात थी.

जबकि मैं और श्‍ोखर शाम को पड़िया में फुटबॉल खेलते हुए कीचड़ से कपड़ा बचाकर फुटबॉल खेलते थे. राजू कहता यार, तुमलोग ठीक से खेल नहीं रहे हो! राजू और तेजिंदर का भी मानना था कि बिना कपड़ों को कीचड़ में लिसड़े फुटबॉल खेलने का तुक नहीं है. जबकि मेरा और श्‍ोखर दोनों का मानना था कि हम पैर के कमाल से फुटबॉल खेल लेंगे, हमें कीचड़ से कमाल करने की ज़रूरत नहीं. खेल के बीचोंबीच राजू अचानक पलटकर तेजिंदर या श्‍ोखर से कहता, 'जो मज़ा फुटबॉल में है वो मज़ा क्रिकेट में नहीं, सच्ची!' तेजिंदर तेज़ आवाज़ में सबको सुनाकर कहता कि क्रिकेट बकवास है! मगर बारिश के खत्म होते ही सबसे पहले तेजिंदर ही अपना विकेट और बैट बाहर निकालकर साफ़-सफ़ाई में जुटता. बहुत बार दूसरी ओर के लड़कों से हार जाने पर अलबत्ता राजू और तेजिंदर हमें उन्हीं नज़रों से देखते कि तुमलोगों का आधे मन से खेलना ही टीम की हार का कारण बना है. कभी-कभी ऐसा भी होता कि बारिश और कीचड़ की भागाभागी में मेरी नज़र जाती कि मनोज या भैया कम्युनिटी सेंटर की छत की ओट में खड़े हमलोगों का मैच देख रहे हैं तो ऐसे क्षणों में मुझमें एकदम-से जिम्मेदारी का भाव भर जाता, बेइंतहा जान लड़ाकर मैदान में यहां से वहां भागते हुए मैं अनावश्यक हल्ला मचाने लगता, 'अबे, तुमलोग ढंग से खेलोगे कि हीरोगिरी छांटने आए हो?' बॉल पर नियंत्रण की कोशिश में न केवल दसियों दफे भदभदाकर कीचड़ में गिरता, बल्कि बहुत बार तो घुटने या एड़ी में अच्छी-खासी चोट भी लग जाती.

शाम को खाना खाते में भैया मुझको सुनाकर मनोज से कहते, 'आज दिलिपवा फील्ड में कैसे भद्द- भद्द गिर रहा था रे, मनोज?'

मनोज उत्साह से सबको मेरे गिरने की नकल करके दिखाता. मुन्नी के साथ दीदी भी भात सना कौर बीच में रोककर हंसती और मैं सिर झुकाये मन ही मन तय करता कि अकेले में पकड़ आते ही मनोज बाबू को वो सबक सिखाऊंगा कि सारी ज़िंदगी हमारी नकल भूल जाएंगे!

मंगल की देर दोपहर बारिश शुरू होती तो बियफे रात तक मुसलाधार की झड़ी लगी रहती. रात में भद्द से धीमी आवाज़ होती तो भैया एकदम-से उठकर बत्ती जला देते. अम्मां नींद में कुनमुनाई बोलतीं का बात है, चूहा घुसा है? भैया थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद डंडा खोजकर निकालते और सबको अपनी जगह से न हिलने की हिदायत देके खबरदार करते कि चूहा नहीं, सांप है! सांप सुनते ही मुन्‍नी एकदम-से अम्‍मां से चिपट जाती. अम्‍मां मुन्‍नी को थप्‍पड़ मारकर अपने से अलग करती कि, 'क्‍या बुड़बक लइकी है, रे!.. गेंहुअन का कौनो बिष थोड़े होता है!' हालांकि असलियत यही होती कि सांप के पकड़ में आने तक सब कमोबेश मुन्‍नी वाली हालत में ही असहज, अस्थिर बने रहते.

शुक्रवार को आसमान एकदम-से साफ़ उजला हो जाता और लगता ही नहीं कि पिछले तीन दिनों ऐसी घनघोर बारिश हुई है. बाबूजी चबूतरे की धूप पर गुल की डिबिया लेकर अपना आसन जमाते और हंसते हुए सबको दिखाते कि देखो, गड़ही में कैसे बच्चा लोग खेला खेल रहा है! मुन्नी भागी हुई बाहर आकर बाबूजी के निकट खड़ी बच्चा लोगों का गड़ही में पानी उलीचने का खेल देखती. मगर खुद बच्चा लोगों के बीच जाकर पानी उलीचने का खेल खेल ले, ऐसा ख्याल उसे भूले से भी नहीं आता.