नौकरी नहीं करता इसका ये मतलब नहीं कि मेरे लिए संडे नहीं. छै दिनों के इंतज़ार के बाद आख़िर एक इतना-सा संडे आता है. आदमी आराम और शांति चाहता है. अधिकार से चाहता है. वही ले रहा था, अधिकार से. मगर ये बेवकूफ़ औरत (पत्नी) दे नहीं रही थी. गोड़ अड़ाये थी. चिल्ल-बिल्ल मचाये थी. सुबह से सुन रहा था. और चुप था. संडे की शुरुआत ही जली चाय पिलाके की. देख रहा था. हज्जाम का संडे का फिक्स्ड रहता है. तो हज्जाम मियां आये. खटिये के ओरचन पर बैठकर मैंने हजामत बनवायी, उलटे लेट कर देह तोड़वायी (यह सब पुण्य पत्नीजी उठाने से तो रहीं!), सरसों के तेल से मालिश करवायी. सोच रहा था हज्जाम के बहाने चाय का दूसरा दौर हो जाए तो देह की राह संडे का सच्चा तृप्तभाव आत्मा में उतरकर तन-मन धन्य-दीप्त कर दे, मगर इस औरत की कुड़कुड़-गुड़गुड़ खत्म हो नहीं रही थी! सब्र की सीमा होती है. मैंने देख लिया मेरी वाली पीछे छूट चुकी है. टहलता हुआ अंदर गया, बद्तमीज समझी समझौता-वार्ता के लिए आया हूं. मैंने तड़ से झोंटा खींच के ज़मीन पर पटक दिया, खुलके फ़्रीस्टाइल दस लात लगायी. हर लात के साथ सवाल करता रहा- मांग, मांग? अब क्यों नहीं मांगती वॉशिंग मशीन?
भले बेवकूफ हो, लतखोरी के समय साइलेंस का महत्व समझती है. अभी समझ रही थी. इसीलिए जवाब में वॉशिंग मशीन-वॉशिंग मशीन नहीं की. खीझकर मैंने फ़ाईनल वाली एक और लगायी, लात, और भुनभुनाता हुआ बाहर चला आया.
शादी सचमुच जी का जंजाल है. ये है कि बैठे-बिठाये दो वक़्त का खाना मिल जाता है, और लेटे-लेटे दूसरी चीज़ें भी मिलती रहती हैं (अगर मन में औरत के प्रति मितली न पैदा हो रही हो), मगर ज्यादा समय तो इसका चिल्ल-बिल्ल चलता ही रहता है. सत्यनरायन की कथा. चुप्पै नहीं रहती. गूंगी होती ज्यादा अच्छा होता?
ख़ैर, लात चलाते हुए जूतों का ध्यान हुआ. जूतों को बाहर किया.. उनकी मस्त पॉलिश में जुट गया. इसकी कुड़कुड़-गुड़गुड़ फिर उठना शुरू हुई तो बैठे-बैठे चीख़कर कहा- चुप रह, बदकार, न तो आके वो थूरेंगे कि एकदम्मै बराबर हो जाएगी!
कभी-कभी मेरे चीख़ने के बावजूद बेवकूफ़ रिस्क लेके बकबकियाने लगती. आलस में मैं भी असमंजस में महटियाया रहता कि फिर संडे को औरत के पीछे कौन हाथ-गोड़ दुखाये. मगर आज कुछ ख़ास स्फूर्ति का अनुभव हो रहा था. टेलीपैथी में मैसेज पायी होगी. अलबत्ता साइलेंट हो गयी. मैं फ़्रेश माइंड से
‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हंसीं’ गुनगुनाता मस्त पॉलिशिंग करने लगा. सोच रहा था आज किसी दोस्त को पकड़ने की बजाय, बोतल घर ही लेकर आऊं और शाम पवित्र करके गुलज़ार करूं. कि तबतक मेरी आवाज़ में
‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हंसीं’ किसी और के मिला के गाने की आवाज़ आने लगी. गाते-गाते ही मैंने सिर उठाया.. तो भगवानजी दीखे! एकदम से गाने की धुन गड़बड़ा गयी और हाथ का जूता छूटकर नीचे गिर गया!
भगवानजी मुस्कराके गाने लगे,
‘दुनिया ओ दुनिया तेरा जवाब नहीं’. अबकी मैंने स्वर में स्वर नहीं मिलाया, बस उनको उज़बकी में देखता रहा.
भगवानजी फट काम की बात मतलब अपने धंधे पर आ गए. प्रैक्टिकली पूछे- और गुरु? हमारी याद-वाद करते हो कि नहीं?
लास्ट टाईम मंदिर कब गए थे?मैंने हकलाकर जल्दी-जल्दी में कहा- आज शाम को ही जाने की सोच रहा था, सर! हमेशा उसीकी चिंता में तो दुबला हो रहा हूं?

भगवानजी खटिया पर फैलकर बैठ गए. उत्साहित होकर गाने लगे-
‘मेरा मन तेरा प्यासा’.. फिर लंबी सांस छोड़कर बोले-
मोहम्मद रफ़ी में लेकिन बात थी. ये हिमेश-टिमेश क्या हैं उसके आगे?
कुछ नहीं हैं!- नॉर्मल होकर मैंने वापस जूतों पर ब्रुश रगड़ना शुरू किया.
संगीत का स्तर बहुत नीचे चला गया है- भगवानजी चिंतित स्वर में बोले, फिर डूबकर गाने लगे-
‘सुहानी रात ढल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे’..
उत्साह में भगवानजी की आवाज़ ऊंची उठ गयी होगी जभी पत्नी धम्म-धम्म करती बाहर आयी- देवता-ईश्वर होंगे तो देखेंगे इस घर में कौन दुख पा रही हूं!
भगवानजी की एकदम से घिग्घी बंध गयी. भागकर बाथरुम के दरवाज़े के पीछे छिपे. आंखों में रिरियाहट कि यार, सुबह-सुबह औरत की दिक्कत माथे मत चढ़ाओ! मेरे बस की नहीं, तुम्हीं हैंडिल करो इसे!
मैंने सहमति वाले अंदाज़ में चुप्पे मुंडी हिलायी और आंखें तररे पत्नी को देखा कि अभी मन भरा नहीं तेरा.. दो और खायेगी तब चुप होगी?
पत्नी चुपचाप अंदर लौट गयी. भगवानजी सहमे-सहमे बाहर आए. मैं मस्त होकर गाने लगा-
‘वो तेरे प्यार का ग़म इक बहाना था सनम’..
भगवानजी चौंककर पूछे- ये रफ़ी का कौन-सा गाना है?
मैंने मुस्कराकर कहा- मुकेश का है. शशी कपूर की एक चिरकुट फ़िल्म आयी थी
‘माई लव’. समझे हुए था शंकर जयकिशन का है,
यूनुस ने अपने ब्लॉग पर चढ़ाया तो पता चला किन्हीं
दानसिंह का म्यूज़िक था..
अच्छा? देखो, मुझे भी ख़बर नहीं थी! कितने सारे गाने हैं अभी तक दिमाग से छूटे हुए हैं- भगवान उज़बकों की तरह सिर खुजाते रहे. मैं गाता मस्त जूते पे ब्रुश घुमाता रहा..