Tuesday, July 31, 2007

जहां खत्‍म होती थी वहीं दुनिया शुरू होती..

ऊपर से देखने पर लगता घर छोड़कर भाग रहे हैं जबकि बच्‍चे जाग रहे थे. कुछ सांझ की उदासी में जग जाते तो कोई भरी दुपहरी अचानक बेचैन होकर बस्‍ता सजाने लगता. जूते, बेल्‍ट, राहुल द्रविड़ की फ़ोटो, पिंटु की चिट्ठी एडिदास के सस्‍ते झोला में डाल रोबिन और तृप्ति से मिलने जाता आख़ि‍री बार. फटी रहती घबराहट होती मगर शर्म का भूगोल उससे बड़ा बीहड़ और गहरा होता. सिर झुकाये बुदबुदाकर बोलता अब बहुत हो गया, यार. दोस्‍त से ज्‍यादा खुद को समझाना होता. माणिक बोलता पिंटु सब किछुइ मित्‍था लिखेछे, आमि जानिं ओर सोत्‍तो. तापस आंटी रोने लगतीं, गु‍ड़ि‍या को ताजुब्‍ब होता जा रहे हो सच्‍ची?

बस की खिड़की से छूटता शहर दीखता जैसे पहले कभी नहीं दिखा होता. पहचानी सड़कें, इमारत, लाल्‍टु की गुमटी और दुर्गापूजा का उजड़ा पंडाल. हमीद की टेलरिंग दूकान और मारवाड़ी मैरिज हॉल. हाई स्‍कूल के दास सर दिखते और स्‍कूटी पर चश्‍मा चढ़ाये संध्‍या. अर्से से बंद सिनेमा हॉल नैना हाथ हिलाके विदा करती दिखती.

गोकि दुनिया लाल मैदान और साल के जंगल पर जाकर खत्‍म हो जाती, पहली मर्तबा धड़धड़ाती रेल के उतरने में खत्‍म हुई दुनिया का फ़रेब खुलता. ठोंगे में मुंगफली खाते हुए नए पेड़ नए उजाड़ दिखते. नए पहाड़ दिखते. रेल के समानांतर भागती किसी पुराने मोटर के दूर पीछे छूट जाने पर सपनों के शहर का एक उत्‍तेजक बाइस्‍कोप जीवित हो उठता. और भूख, बेचैनी व घबराहट के बीच बार-बार दीखता.

Monday, July 30, 2007

टाइम ससुर जाता कहां है?..

मेरी तक़लीफ़ सुनने का ज़रा-सा टाइम है आपके पास? सीरियसली पूछ रहा हूं, सोच के जवाब दीजिएगा? थोड़ा?.. क्‍या? नहीं ना? जाने दीजिये. घबराइए नहीं. न शराफ़त में शर्माइए. दरअसल आपका जवाब मैं पहले से ही जान रहा था. आप टाइम होने की बात कहते तो मेरे लिए ज्‍यादा सरप्राइज़िंग होता! अपने साथ भी तो साली वही दिक़्क़त चल रही है (सभी के साथ चल रही है.. किस चिरकुट के पास टाइम है?).. और ऐसा नहीं है कि रोज़ विरार से चर्चगेट जाने के पीछू दो घंटा और सेठ का नौकरी में आठ घंटा मगजमारी करके टाइम नहीं बच रहा है. नहीं, वोई तो मज़ा है.. अक्‍खा बेरोज़गारी में भी नई बच रहा है! फिर जा किदर रहा है टाइम? सच्‍ची में मालूम नईं, बाप!

शाम को कहीं बीच ट्रै‍फ़ि‍क में फंसे किसी दोस्‍त ने अड़बड़-तड़बड़ सवाल किया कि क्रिकेट की पोज़ि‍शन क्‍या है? जल्‍दी स्‍कोर बता! मैंने चीख़कर जवाब दिया- कुत्‍ते, मैं यहां फालतू नहीं हूं कि टीवी के सामने बैठकर तेरा क्रिकेट स्‍कोर चेक करता रहूं! दोस्‍त सन्‍न रह गया. सन्‍न न भी रहा हो तो मैंने उसके सन्‍न होने की कल्‍पना की और फ़ोन पटककर सोचने लगा कि टाइम साला जा कहां रहा है? कोई उमराव या चमेली जान है नहीं जिसके लिए गजरा खरीदने और उसके मुजरों के पीछे मैं अपने दिन की टोंटी (और रात) खोलकर बहा रहा हूं! तो फिर बहा कहां रहा हूं?

न मैं इन दिनों आलोक पुराणिक या ज्ञानदत्‍त पांड़े का ब्‍लॉग पढ़ रहा हूं. अनूप शुक्‍ला और समीर लाल का तो नहीं ही पढ़ रहा. मोहल्‍ले में सब प्रगतिशील चीज़ें ही चढ़ती हैं तो उसमें मेरी वैसे भी दिलचस्‍पी नहीं. रवीश कुमार की दिल्‍ली वाली लड़कियों में बची है, मगर उनको देखते हुए ध्‍यान आता है कि देखने के लिए अभी मुंबई में भी इतनी लड़कियां बची हुई हैं, और फिर दिल्‍ली वालियों तक को देखने का सारा क्रम गड़बड़ा जाता है! चंदू ने त्रिलोचन की तारीफ़ में उन्‍हें याद करते हुए उनके कवित्‍व पर कुछ बड़ी सटीक पंक्तियां लिखीं, जवाब में हमारे अंदर भी कुछ काव्‍य-साव्‍य वाला प्रेम उमड़ आया, दो घंटे खराब कर के उनकी प्रतिनिधि कविताओं का टिनहा संकलन खरीदकर लिये आए, मगर हाथ-गोड़ पटकने के बावजूद उन्‍हें पढ़ने का समय नहीं मिल पा रहा है?

सचमुच हद है. पता नहीं कहां किस चीज़ की मारामारी है कि टाइम एकदम भर्र-भर्र भागा चला जाता है! पता ही नहीं चलता भागकर गया कहां! किताब, फ़ि‍ल्‍म, लड़कियां सबका देखना एकदम्‍मे अटका पड़ा है (फ़ोन मत कीजिएगा, उठाऊंगा नहीं?). दाढ़ी बनवाना मुश्किल है, तीन दिन से शैंपू नहीं की है, अंडरवीयर बदलना रह ही जा रहा है! इस तरह ये सब कब तक चलेगा? चल पायेगा? दुनिया आख़ि‍र जा कहां रही है? मैं कहां जा रहा हूं? कहीं जा रहा हूं? इट्स सो फ़किन फ़्रस्‍ट्रेटिंग! पहले ऐसा नहीं था! हाथ में बारहसौ पेजी पोथा लेकर सपरकर पैर फैलाये लेट जाते थे, और पोथे के निपटान के साथ ही उठते थे, अब तो ऐसा भारी पोथा देखकर ही सांस छूटने लगती है! खड़े-खड़े माथा घूमने लगता है. लिखनेवाले बारहसौ पेज लिख कैसे पा रहे हैं? डेरलिंपल ‘द लास्‍ट मुग़ल’, सुकेतु मेहता ‘द मैक्सिमम सिटी’ आख़ि‍र लिखे ही? उसके बाद मार्केंटिंग भी करते रहे! यार, इन लोगों को कहां से ये सब करने का टाइम निकल जाता है?.. अपन राम एक ब्‍लॉग को ही संभालने में टें-पें हुए जा रहे हैं!

आसपास की हर चीज़ इतना डिमांडिंग क्‍यों हुई जा रही है? डिस्‍ट्रैक्‍शन के इस लगातार के आक्रमण से बचने के लिए क्‍या बद्रीनाथ-ऋषिकेश जाये बिना छुटकारा नहीं? कि हो सकता है छुटकारा? यही सोचकर दो दिन पहले पढ़ने योग्‍य सारी किताबें बिछौने के नीचे छिपा और मोबाइल की बैटरी को सुला, मैं माथे को हाथों में बांधे बंद टीवी को तकता सोच-सोचकर बोर हो रहा था कि बीच मुंबई में भी रहते हुए डिस्‍ट्रैक्‍शन से छुटकारा है!

बोरियत से बचने के लिए सोचा पांच मिनट टीवी खोलकर हनीफ़ मियां का ज़रा अपडेट देख लें. टीवी खोल तो लिया.. मगर उसके बाद बंद करना बड़ा मुश्किल!.. सीएनएन पर ऑस्‍ट्रलियन पुलिस की बेवकूफ़ी की ख़बर थी, बीबीसी बैंगलोर से बाइट दे रही थी, आजतक वाले कुछ बता रहे थे तो साजतक वालों का भी कुछ कहना था. कोई पत्रकार हनीफ़ के घर घुसा था तो कोई उसके मामा का दुख समझा रहा था! सब केंकें-पेंपें करके दुनिया को अपडेट कर रहे थे, और मैं जाने किस अव्‍यक्‍त अपराध-बोध में ढाई घंटे तक अपडेट होता रहा. टीवी बंद करते-करते शाम ढल चुकी थी, और मैं पिचके हुए खाली बिसलेरी की बोतल-सा महसूस कर रहा था..

अलबत्‍ता रहस्‍य अभी भी रहस्‍य था कि टाइम ससुर जाता कहां है?

Sunday, July 29, 2007

संडे के फंडे और भगवानजी का अज्ञान..

नौकरी नहीं करता इसका ये मतलब नहीं कि मेरे लिए संडे नहीं. छै दिनों के इंतज़ार के बाद आख़ि‍र एक इतना-सा संडे आता है. आदमी आराम और शांति चाहता है. अधिकार से चाहता है. वही ले रहा था, अधिकार से. मगर ये बेवकूफ़ औरत (पत्‍नी) दे नहीं रही थी. गोड़ अड़ाये थी. चिल्‍ल-बिल्‍ल मचाये थी. सुबह से सुन रहा था. और चुप था. संडे की शुरुआत ही जली चाय पिलाके की. देख रहा था. हज्‍जाम का संडे का फिक्‍स्‍ड रहता है. तो हज्‍जाम मियां आये. खटिये के ओरचन पर बैठकर मैंने हजामत बनवायी, उलटे लेट कर देह तोड़वायी (यह सब पुण्‍य पत्‍नीजी उठाने से तो रहीं!), सरसों के तेल से मालिश करवायी. सोच रहा था हज्‍जाम के बहाने चाय का दूसरा दौर हो जाए तो देह की राह संडे का सच्‍चा तृप्‍तभाव आत्‍मा में उतरकर तन-मन धन्‍य-दीप्‍त कर दे, मगर इस औरत की कुड़कुड़-गुड़गुड़ खत्‍म हो नहीं रही थी! सब्र की सीमा होती है. मैंने देख लिया मेरी वाली पीछे छूट चुकी है. टहलता हुआ अंदर गया, बद्तमीज समझी समझौता-वार्ता के लिए आया हूं. मैंने तड़ से झोंटा खींच के ज़मीन पर पटक दिया, खुलके फ़्रीस्‍टाइल दस लात लगायी. हर लात के साथ सवाल करता रहा- मांग, मांग? अब क्‍यों नहीं मांगती वॉशिंग मशीन?

भले बेवकूफ हो, लतखोरी के समय साइलेंस का महत्‍व समझती है. अभी समझ रही थी. इसीलिए जवाब में वॉशिंग मशीन-वॉशिंग मशीन नहीं की. खीझकर मैंने फ़ाईनल वाली एक और लगायी, लात, और भुनभुनाता हुआ बाहर चला आया.

शादी सचमुच जी का जंजाल है. ये है कि बैठे-बिठाये दो वक़्त का खाना मिल जाता है, और लेटे-लेटे दूसरी चीज़ें भी मिलती रहती हैं (अगर मन में औरत के प्रति मितली न पैदा हो रही हो), मगर ज्‍यादा समय तो इसका चिल्‍ल-बिल्‍ल चलता ही रहता है. सत्‍यनरायन की कथा. चुप्‍पै नहीं रहती. गूंगी होती ज्‍यादा अच्‍छा होता?

ख़ैर, लात चलाते हुए जूतों का ध्‍यान हुआ. जूतों को बाहर किया.. उनकी मस्‍त पॉलिश में जुट गया. इसकी कुड़कुड़-गुड़गुड़ फिर उठना शुरू हुई तो बैठे-बैठे चीख़कर कहा- चुप रह, बदकार, न तो आके वो थूरेंगे कि एकदम्‍मै बराबर हो जाएगी!

कभी-कभी मेरे चीख़ने के बावजूद बेवकूफ़ रिस्‍क लेके बक‍बकियाने लगती. आलस में मैं भी असमंजस में महटियाया रहता कि फिर संडे को औरत के पीछे कौन हाथ-गोड़ दुखाये. मगर आज कुछ ख़ास स्‍फूर्ति का अनुभव हो रहा था. टेलीपैथी में मैसेज पायी होगी. अलबत्‍ता साइलेंट हो गयी. मैं फ़्रेश माइंड से ‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हंसीं’ गुनगुनाता मस्‍त पॉलिशिंग करने लगा. सोच रहा था आज किसी दोस्‍त को पकड़ने की बजाय, बोतल घर ही लेकर आऊं और शाम पवित्र करके गुलज़ार करूं. कि तबतक मेरी आवाज़ में ‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हंसीं’ किसी और के मिला के गाने की आवाज़ आने लगी. गाते-गाते ही मैंने सिर उठाया.. तो भगवानजी दीखे! एकदम से गाने की धुन गड़बड़ा गयी और हाथ का जूता छूटकर नीचे गिर गया!

भगवानजी मुस्‍कराके गाने लगे, ‘दुनिया ओ दुनिया तेरा जवाब नहीं’. अबकी मैंने स्‍वर में स्‍वर नहीं मिलाया, बस उनको उज़बकी में देखता रहा.

भगवानजी फट काम की बात मतलब अपने धंधे पर आ गए. प्रैक्टिकली पूछे- और गुरु? हमारी याद-वाद करते हो कि नहीं? लास्‍ट टाईम मंदिर कब गए थे?

मैंने हकलाकर जल्‍दी-जल्‍दी में कहा- आज शाम को ही जाने की सोच रहा था, सर! हमेशा उसीकी चिंता में तो दुबला हो रहा हूं?

भगवानजी खटिया पर फैलकर बैठ गए. उत्‍साहित होकर गाने लगे- ‘मेरा मन तेरा प्‍यासा’.. फिर लंबी सांस छोड़कर बोले- मोहम्‍मद रफ़ी में लेकिन बात थी. ये हिमेश-टिमेश क्‍या हैं उसके आगे?

कुछ नहीं हैं!- नॉर्मल होकर मैंने वापस जूतों पर ब्रुश रगड़ना शुरू किया.

संगीत का स्‍तर बहुत नीचे चला गया है- भगवानजी चिंतित स्‍वर में बोले, फिर डूबकर गाने लगे- ‘सुहानी रात ढल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे’..

उत्‍साह में भगवानजी की आवाज़ ऊंची उठ गयी होगी जभी पत्‍नी धम्‍म-धम्‍म करती बाहर आयी- देवता-ईश्‍वर होंगे तो देखेंगे इस घर में कौन दुख पा रही हूं!

भगवानजी की एकदम से घिग्‍घी बंध गयी. भागकर बाथरुम के दरवाज़े के पीछे छिपे. आंखों में रिरियाहट कि यार, सुबह-सुबह औरत की दिक्‍कत माथे मत चढ़ाओ! मेरे बस की नहीं, तुम्‍हीं हैंडिल करो इसे!

मैंने सहमति वाले अंदाज़ में चुप्‍पे मुंडी हिलायी और आंखें तररे पत्‍नी को देखा कि अभी मन भरा नहीं तेरा.. दो और खायेगी तब चुप होगी?

पत्‍नी चुपचाप अंदर लौट गयी. भगवानजी सहमे-सहमे बाहर आए. मैं मस्‍त होकर गाने लगा- ‘वो तेरे प्‍यार का ग़म इक बहाना था सनम’..

भगवानजी चौंककर पूछे- ये रफ़ी का कौन-सा गाना है?

मैंने मुस्‍कराकर कहा- मुकेश का है. शशी कपूर की एक चिरकुट फ़ि‍ल्‍म आयी थी ‘माई लव’. समझे हुए था शंकर जयकिशन का है, यूनुस ने अपने ब्‍लॉग पर चढ़ाया तो पता चला किन्‍हीं दानसिंह का म्‍यूज़ि‍क था..

अच्‍छा? देखो, मुझे भी ख़बर नहीं थी! कितने सारे गाने हैं अभी तक दिमाग से छूटे हुए हैं- भगवान उज़बकों की तरह सिर खुजाते रहे. मैं गाता मस्‍त जूते पे ब्रुश घुमाता रहा..

Saturday, July 28, 2007

दोपहर में फ़ंतासी

खुद से आंख बचाकर चुपके रोज़ निकल जाता हूं पहाड़ि‍यों के पार किसी छोटे गांव. या रियु द सविन्‍यॉं से निकलती है जो पगडंडी पकड़े हुए उसे आगे दूर किसी ग़ुमनाम ठांव. धीमी दुलकी चाल चलते गदहे पर धंधे का माल ढोये जाता किसान. वेर्गा की कहानियों से बाहर चली आयी काली-सफ़ेद सीपिया किसी छूटी तस्‍वीर-सी धुंधली. प्‍यात्‍ज़ा सांता मारिया के सूने चौक के आख़ि‍र में उतरते कुम्‍हलाये मैदान और दूर-दूर तक ऑलिव के खेत. आंखों पर हाथ धर तकता आगे समुंदर के पार वहीं कहीं होगा त्रिपोली-दामासकस-माराकेस. हहराती पानियों में डोलती पुरानी नाव, जाने तीन दिन कि तेरह दिन के सफ़र के बाद. किसी ऊबे अधेड़ अरब को समझाता होगा मलाबारी मलयाली छोकरा अपने गांव की कोई बेमतलब-बेतरतीब कहानी. मैं डेक पर पैर पसारे सुलगाता होऊंगा हुक्‍का गुड़गुड़ गुड़गुड़. या पत्‍थरों पर दौड़ता, रेत पर भागता बच्‍चे की शक्‍ल में देखता होऊंगा खुद को हुक्‍का गुड़गुड़ाते. सुनकर ताजुब्‍ब करते बांसुरी बजाते.

एक क्रांतिचेता पत्रकार का आत्‍मकथ्‍य..

हां, हां, मैं क्रांतिकारी हूं, मेरी फैमिली में है, और इसे स्‍वीकार करने में मुझे शर्म नहीं है! मैं और मेरी वाइफ दोनों पत्रकारिता में हैं. वह प्रिंट में है, मैं इले‍क्‍ट्रोनिक में हूं. वह घर पंद्रह ला रही है, मैं चालीस पा रहा हूं. तीन बसों की बदली और डेढ़ घंटा लगाकर ऑफ़ि‍स पहुंचती उसे शायद ख़बर नहीं, लेकिन ऑफ़ि‍स की एसी वैन में आराम से फैलकर और समूचे रास्‍ते ज्‍योतिका को जोक सुनाते व फैलकर फ़्लर्ट करते हुए मुझे इसकी चेतना ज्‍यादा है कि कैसे और क्‍यूं हम एक क्रांतिकारी जीवन जी रहे हैं! गणेशशंकर विद्यार्थी और पराड़कर को याद करते हुए जो चिरकुट अतीत का मर्सिया गा-गाकर माहौल खराब कर रहे हैं, मैं इन पुरातन-पोंगापंथियों से सिर्फ़ एक ही बात कहना चाहता हूं- कि अबे, तब तुम जाओ न फिर, रहो वहीं बनारस-कानपुर में? निकालते रहो खराब छपाई का आठपेजी और पौने सात हज़ार की कमाई में पाओ अस्‍थमा और तपेदिक, अबे, हमारी महफ़ि‍ल क्‍यों खराब कर रहे हो? साले, रिविज़निस्‍ट, भैण..., बात करते हैं? हमको सिखाओ नहीं, मैंने देखी है पराड़कर टाइप पत्रकारिता!

सहारनपुर में हमारे एक चचेरे चाचा किया करते थे, अपने को बहुत लगाते थे, एक दिन घर के दरवाज़े पर ट्रैक्‍टर की ट्रॉली में लादकर छोड़ गया कोई. ऐसी कुटाई हुई थी कि घर का कुत्‍ता तक पास आने से बच रहा था! अस्‍पताल के इलाज तक के लिए घर में पैसे नहीं थे? चाहते हो हम उसी चाचाराह पे जाकर अपना क्रियाकर्म करवा लें? उससे मन शीतल हो जाएगा, क्रांति हो जाएगी तुम्‍हारी? अबे, किस दुनिया में रहते हो तुमलोग? घर में बाप नहीं है? आपस में डिस्‍कशन नहीं होता? मैं जब बाईस हज़ार पर ट्रेनी नियुक्‍त हुआ था तब पापा कितना डिप्रैस हुए थे कि किस लाइन में जॉब लिये हो जहां ऊपर की कमाई नहीं है! और तुम, साले, हमें पराड़कर, विद्यार्थी समझा रहे हो? अबे, अपने बाप से जाके पहले एक बार बात करो न?

आख़ि‍र लोग इतना भोले और बेवकूफ़ कैसे हो सकते हैं! वो भी आज के टाईम में? इन्‍हें मालूम नहीं है दुनिया चलती कैसी है? इस देश को मनमोहन सिंह चलाते हैं या सोनिया गांधी ये देख नहीं रहे? तीन दिन पहले किरण बेदी को सुपरसीड करके उनके जूनियर को ऊपर के पद पर आसीन किया गया, अब उखाड़ ले जो जिसे उखाड़ना है! कोई कुछ नहीं उखाड़ेगा, सब चार दिन में भूलकर हिमेश का नया गाना सुन रहे होंगे! क्‍योंकि आज किरण नहीं, हिमेश हीरो है! कितने लोग किरण को सुनना चाह रहे हैं? जबकि हिमेश को हर कोई क्‍या मैं और मेरी वाइफ भी सुन रहे हैं! और ये रो रहे हैं कि गिरेबान में झांको?

अबे, तुम झांकों अपने गिरेबान, गर्दन और जहां-जहां झांकना है! सबसे पहले अपने बैंक अकाउंट में झांकों, सारी सच्‍चाई वहीं भर्र-भर्र बाहर आ जाएगी? हो सकता है बच्‍चा तीन महीने से रो रहा हो और तुम उसका जूता खरीदने से भाग रहे हो! क्‍यों भाग रहे हो ज़रा अपने पराड़कर टाइप पॉकेट में झांककर पूछना! जबकि मैंने लास्‍ट वीक ही ज्‍योतिका को एक स्‍वॉच वॉच गिफ़्ट किया है. सैंट्रो की बुकिंग करवायी है. बॉस की वाइफ के लिए एक चायनीज़ डॉगी चूज़ किया है और ऑफ़ि‍स में मेरा क्‍लोज़ेस्‍ट योगेश पाल है जिसके पामटॉप में दिल्‍ली के सारे इम्‍पोर्टेंट नंबर्स हैं! मेरे चचेरे चाचा तीन जेनरेशन रगड़वाते तो भी उन्‍हें वैसी लाइफ़ नसीब नहीं होती जो मैं और मेरी वाइफ जी रहे हैं! सोनी का लैपटॉप लेना है लेकिन साल के आख़ि‍र-आख़ि‍र तक उसका भी जुगाड़ सोच रखा है मैंने!

मेरा पीसी तब असीमा यूज़ कर सकेगी, बहुत ही क्रांतिकारी वाइफ है. मुझे ख़बर भी नहीं लगने दी और पब्लिशर सेट करके अगले साल के शुरू में अपने मेमॉयर ‘चोट खायी लड़की के दुर्दिन’ छपवा रही है! मेरे पीसी में मेरे भी काफी सारे पोयम्‍स हैं जो मैंने स्‍ट्रगल के टाईम में लिखे थे (आठ हज़ार की एक सड़ी हुई स्ट्रिंगर की नौकरी थी, और ऐसी मरवाई वाली नौकरी थी कि याद करूं तो रोंयें खड़े हो जाते हैं!), असीमा का पब्लिशर पट गया तो मैं भी जल्‍दी ही ‘भागलपुर से भागे हुए लड़के’ छपवाऊंगा.

आसपास कितनी तेजी से चेंज हो रहा है. कंटिन्‍युअस हैक्टिक एक्टिविटी है. अगले महीने हो सकता है बॉस के साथ मैं भी यूके के टुअर पर जाऊं (पर्सनल असिस्‍टेंस और कंटिन्‍युअस प्रेज़ के बिना बॉस की सांस अटकी रहती है. आयम डैम कंविस्‍ड दैट द बास्‍टर्ड उड टेक मी अलोंग!). मैंने पहले से सोच रखा है यूके पहुंचते ही क्‍या स्‍टोरी करूंगा. स्‍टोरी होगी- क्‍या यूरोप सुखी है? और फिर यूरोप की ऐसी-तैसी करने वाली इमेज़ेस अरेंज करके और इंडिया के धांसू होने की एक झकास स्‍टोरी तैयार करके सारे चिरकुटों को चकित कर दूंगा. हो सकता है एचआरडी या आईएंडडी मिनिस्‍ट्री से कोई अवॉर्ड-सवार्ड भी मिल जाए?

सो, डोंट टीच युअर पराड़कर शिट टू मी. बिकॉज़ आई हैव टू गो टू प्‍लेसेस, कैरी आऊट सो मेनी वर्क. नॉट सिट एंड क्रिब लाइक यू एसहोल्‍स आर डुईंग ऑल द टाईम! चैटरिंग क्रांति, क्रांति.. यू आर नॉट.. इट्स मी हू इज़ रियल क्रांतिकारी! टेक इट!

Friday, July 27, 2007

ब्रूस चैटविन और द सॉंगलाइन्‍स..

कोई भूमिका नहीं लिखूंगा. दुनिया के बड़े भूगोल पर काफी सारी घुमाई करते हुए उनचास वर्ष की कमउम्री में जिस तरह का लेखन ब्रूस चैटविन ने संभव बनाया, उसकी स्‍केची भूमिका लिखना मेरी समझ व बूते की बात नहीं. दिलचस्‍पी बनेगी तो इतनी जानकारी मेरे दिये लिंक से खोज-निकालकर आप पढ़ ही डालिएगा. फ़ि‍लहाल चर्चा का संदर्भ ये है कि 1987 में छपी उनकी “द सॉंगलाइन्‍स” को दुबारा पढ़ते हुए एक्‍साइट हो रहा था. तो उसका एक छोटा-सा हिस्‍सा मूल, सरल अंग्रेजी में आपके लिए जस का तस रख रहा हूं. छोटे-छोटे चैप्‍टर्स व रोचक संवादों-वृतांतों से भरी इस अनोखी किताब के तीसरे अध्‍याय का एकदम शुरू का प्रकरण है:

Arkady ordered a couple of cappuccinos in the coffee- shop. We took them to a table by the window and he began to talk.

I was dazzled by the speed of his mind, although at times I felt he sounded like a man on a public platform, and that much of what he said had been said before.

The Aboriginals had an earthbound philosophy. The earth gave life to a man; gave him his food, language and intelligence; and the earth took him back when he died. A man’s ‘own country’, even an empty stretch of spinifex, was itself a sacred ikon that must remain unscarred.

‘Unscarred, you mean, by roads or mines or railways?’

‘To wound the earth’, he answered earnestly, ‘is to wound yourself, and if others wound the earth, they are wounding you. The land should be left untouched: as it was in the Dreamtime when the Ancestors sang the world into existence.’

‘Rilke’, I said, ‘had a similar intuition. He also said song was existence.’

‘I know’, said Arkady, resting his chin on his hands, ‘“Third Sonnet to Orpheus.”’

The Aboriginals, he went on, were a people who trod lightly over the earth; and the less they took from the earth, the less they had to give in return. They had never understood why the missionaries forbade their innocent sacrifices. They slaughtered no victims, animal or human. Instead, when they wished to thank the earth for its gifts, they would simply slit a vein in their forearms and let their own blood spatter the ground.

‘Not a heavy price to pay,’ he said. ‘The wars of the twentieth century are the price for having taken too much.’

द सॉंगलाइन्‍स, ब्रूस चैटविन, विन्‍टेज क्‍लासिक्‍स, 2003

रात में बाघ

अख़बार की छपाई, पैकेजिंग कैसी है रोज़ दिखता. ख़बरों के बीच की ख़बर देखें इसकी कहां रहती फुरसत. हेडलाइनों तक की नहीं रहती. दिखता पीकर रखा हुआ अधूरा चाय का गिलास, बैंक का स्‍टेटमेंट, शैम्‍पू की नयी बोतल व उंगलियों पर इकट्ठा देह का मैल. एक काम में फंसे रह जाने की झल्‍लाहट दिखती. धीरे-धीरे चढ़ रहा गुस्‍से का पारा और हदसकर निकल भागने की धुंधली कामनायें दिखती, रास्‍ता नहीं दिखता. फांदते-गिरते उतर चलता दिन उसका आततायी अंत दिखता, अपने सोगहग संभावनाओं में समूचे का समूचा दिन नहीं दिखता. सीढ़ि‍यों पर बच्‍चों का शोर चढ़ता-उतरता, कानों में बजती बिजली वाली करकराती आरी. पड़ोस में मजूर धम्-धम् चलाता हथौड़ा तैरती बेचैनियां ज़ेहन में, तनी रहतीं, अचक्‍के दिख गयी बाघ की फ़ोटो में उसके देह की लकीरें दिखतीं, जलती-चमकती आंख का आग नहीं दिखता. लम्‍बी रातों का पसरा बेतरतीब विस्‍तार दिखता, इमारतों की छायाओं पर टंगा अंधेरे में लिपटा आसमानी सूनसान दिखता, सुलगती बाघ की आंखों-सा चकमक कोई उद्दंड सितारा प्रचंड प्रज्‍जवलित नहीं दीखता.

Thursday, July 26, 2007

शहर में शहर से बाहर..

पटना रहा हूं मोना टॉकीज़ से निकलकर गांधी मैदान में मूंगफली खायी, डाकबंगला सड़क पर बेमक़सद टहलते रहे, कभी ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी नहीं गया. कहते हैं इस्‍लाम पर हस्‍तलिखित पांडुलिपियों की यह दुनिया का सबसे अमीर किताबख़ाना है! इमारत से लगी सड़क की तंगहाली के दृश्‍य देखे, किताबों की अमीरी खने से रह गयी. जैसे इलाहाबाद में श्‍याम बीड़ी के होर्डिंग देखे, ब्रिज के बाद विश्‍वम्‍भर सिनेमा व दारागंज की तंग गलियां व टूटे छतों से रिसता काई का जल देखा, संगम की नाव से, ओह, डोलता इलाहाबाद न देख सके.

दो दोस्‍त और चार किताबों से बाहर दुनिया फैलती है लेकिन मन व संस्‍कारों की गरीबी से पार पाना बड़ा उलझा, पेचीदा काम है. इच्‍छाओं के गुलगुले फूलते भी हैं तो उसका नक़्शा जाने क्‍यों दो कौड़ी की छपाई वाला होता है.

पान-तंबाकू की गुमटी में जैसे सजी हो फॉर स्‍क्‍वॉयर की खाली डिब्बियां एक पर एक और दुकानदार भूल गया हो वैसे ही भूले रहते हैं अपने होने में हम. जीते हैं शहर में, अपनी समूची संभावनाओं में मगर शहर हममें नहीं जीता. चंद सड़कें, कोई पुलिया, अस्‍पताल, डिपो, रिक्‍शे से दिखा कलक्‍टर का बंगला, एक पार्क यादों में उकेरता है शहर इतिहास से बाहर.

लोग कहते हैं तो याद पड़ता है अरे, हम भी तो रहे शहर में..

Wednesday, July 25, 2007

देशकाल के परे..

दौलतपुर, नीमतरा, हरहरा क्‍या जगहें थीं जहां रुक जाता बेमतलब. साइकिल अड़ाकर तकता उजबकों की तरह टहलता कौन लोग हैं कैसे बात करते हैं. झबरे मूंछ व पोपले मुंह वाला एक बूढ़ा हंसता बुदबुदाता कातिक-अगहन. कोई औरत दौरी उतारकर रखती ज़मीन पर, साड़ी के किनारे से पोंछती श्‍याम चेहरा, देखती ललियांही राह, थकित-चकित बूझती मन ही मन अभी और कितना आगे जाना होगा पत्‍ते में जामुन और नून सजाकर खोजने गाहक चार कौड़ी कर कमाई बास्‍ते. नंग-धड़ंग एक बच्‍चा घिसटता-दौड़ता चला जाता, कोई मुर्गी फुदकती झाड़ि‍यों से बाहर चेहरा करती जैसे बीच काम देखने आयी हो बाहर के हाल.

अभाव व दुरव्‍यवस्‍था की बड़ी-काली मक्खियां ताड़ व बांस के पत्‍तों पर गोल बांधे भिनभिनातीं, घूमतीं करियाई पुरानी मटकी पर. लगता सदियों पहले का कोई दृश्‍य हो लगता देश-काल से परे में जाने कहां घुसी चली आयी साइकिल.

Tuesday, July 24, 2007

कितनी मुद्दत बाद मिले हो किन सोचों में ग़ुम रहते हो..

पत्‍नी क्‍या करती, उसे प्रेम हो गया था. पति से नहीं, न. उनसे तो चौदह साल पहले हुआ था.. अब तो उसका ख़्याल और ओवर कंज़प्‍शन दोनों एक-सा भय जगाते थे. जो लगी वह नयी आग थी. और इसलिए नहीं लगी थी कि पत्‍नी ने कहीं किसी दीवार या इश्तिहार में ‘प्रेम बिना जग सूना’ या ‘प्रेम सकारथ करि जइंहैं’ जैसी लाइन पढ़ ली थी, और चौकन्‍नी हो गयी थी. प्रेम के बारे में तो कितने वर्ष निकल गए थे पत्‍नी ने सोचा तक नहीं था. आगे भी कहां सोचती अगर उस दुष्‍ट रंजना ने मन में तोड़-फोड़ पैदा न कर दी होती! कितना अजीब था मन में रंजना के हुआ और तोड़-मरोड़ पत्‍नी के जीवन में चला आया! शायद इसीलिए पति पत्‍नी के रंजना से हमेशा लहे रहने के ख़ि‍लाफ थे. भला आदमी समझता रहा होगा (और परिस्थितियों ने साबित किया भी कि सही ही समझ रहा था!) कि औरतें इतना कान और मुंह सटा रही हैं ज़रूर गड़बड़ करेंगी. वही हुआ. गड़बड़.

आपस में नहीं, न. रंजना लेस्बियन नहीं थी, और पत्‍नी क्‍या थी इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण पाने वाली स्थिति आजतक उत्‍पन्‍न नहीं हुई? असल मामला यह हुआ कि बात कहीं की कहीं निकल गयी.. कहां निकली? अरे, अच्‍छे आदमी (या बुरे?), सुनिए तो, वही तो बता रहा हूं!..

हुआ यह कि पत्‍नी दोपहर के हेवी भोजनोपरांत दो डकार लेने और एक लघुवाली हवा छोड़ने के बाद अलसायी, देह तोड़ती सोफे पर उठंगी टीवी देखने की जगह फ़ोन पर मुज़फ्फरपुर वाली मौसी का नंबर लगाने लगी, मगर उधर लाइन में गड़बड़ी थी या क्‍या था, नंबर न लगने पर पत्‍नी ने हारकर या कंफ़्यूज़न में रंजना का नंबर ट्राई किया और छठवीं घंटी बजते ही बदमाश ने फ़ोन उठा लिया और गड़बड़ी हो गई! पत्‍नी बचपन की सखी वाले अंदाज़ में ठुनकते हुए बोली- इतनी देर से घंटी बज रहा था, उठायी क्‍यों नहीं? मुझे मालूम है क्‍यों नहीं उठायी!

पत्‍नी अपनी समझ से मज़ाक कर रही थी मगर रंजना के घड़ी भर चुप रहने से उसे लगा शायद उसका अनुमान, महज़ हवाई अनुमान नहीं था.. तबतक दूसरी ओर से रंजना का ठुनकता स्‍वर आया- काश कि तेरा शक़ सच होता! इतनी मेंहदी-नेल पॉलिश करती हूं मगर कोई देखनेवाला नहीं. छेड़नेवाला नहीं? इसके पहले कि बाल सफ़ेद होने लगें मैं तो सच्‍ची चाहती हूं इधर-उधर कोई चक्‍कर चल जाए! रियली, यार, विदाउट लव लाइफ़ इज़ सो डल एंड बोरिंग?

पत्‍नी लिप्सटिक, मेंहदी, नेल-पॉलिश वाली नहीं थी.. मगर उसका दिमाग उड़ गया! बाल अभी उड़ना शुरू नहीं हुए थे लेकिन उनके रंगों के उड़ने में ज्‍यादा समय नहीं बचा था. पत्‍नी घबराने लगी कि कहीं ऐसा न हो कि जीवन में फिर प्रेम न हो और उसकी रेल निकल जाए? कहीं इधर-उधर चक्‍कर चलाने और दिल लड़ाने जैसे फेटल एक्‍सी‍डेंट के लिए पत्‍नी मचलने लगी. पति पूछते क्‍या बात है, आजकल तुम्‍हें हुआ क्‍या है तो पत्‍नी के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगती.. घबराहट में पैर चटाई में उलझ जाता या कड़ाही में छौंक के लिए तेल की जगह दूध डाल देती. पति को सूझ नहीं रहा था बेचैनी क्‍या है इसलिए उन्‍होंने बेचैन होकर अलीगढ़ से अपने पुराने मित्र अब्‍बास को बुलवा लिया. अब्‍बास को देखते ही पत्‍नी उनके प्रेम में पड़ गई.. और दिन-रात ज्‍यादा बेचैन रहने लगी. नतीजतन अब्‍बास भी बेचैन होने लगे और जवाब में पांचवे दिन अलीगढ़ में उनकी बेग़म बीमार पड़ गईं. मामला जब हद से गुजरने लगा तो एक दिन किसी को बिना बताये अब्‍बास भोर की बस से अलीगढ़ भाग गए. पत्‍नी को सुबह पौने नौ बजे ख़बर हुई तो उसके होश उड़ गए.. वह घर के एक कोने से दूसरे कोने भागती रही लेकिन अब्‍बास मियां का कहीं पता नहीं चला.. आखिर में हारकर बेचारी सोफे की उस गहराई को खड़ी तकती रही जिस पर अब्‍बास के नितम्‍बों के निशान की गहराई की अब भी कल्‍पना की जा सकती थी.. कल्‍पना में उस पर हाथ फेरा जा सकता था..

पत्‍नी वही कर रही थी.. हाथ फेर रही थी जब जांघ खुजाते व कान मलते पति ने इसे नोटिस किया और चिढ़ी आवाज़ में बोले- जो है नहीं उसे क्‍या सहलाना.. सामने है उसी में सुखी रहो.

पत्‍नी नहीं हो सकी. सुखी. भागकर किचन गई.. दरवाज़ा ढांपकर रोती रही.. साथ ही गैस पर दूध का गरम होना देखती रही.. दूध जब खौलने-खौलने को हुआ तो पत्‍नी ने नाक सुड़ककर गैस व रोना दोनों बंद कर दिया.. दरवाज़े से चेहरा निकाल कर पति से पूछी- चाय पीजिएगा कि कॉफ़ी?..

क्रांति के एक परम-चरम शिखर का अवसान..

एक पतनशील श्रद्धांजलि..


गहरे शोक का विषय है क्रांतिकारी कवि ब्रह्मशंकर गोस्‍वामी अब हमारे बीच नहीं रहे. उनकी कविताएं रहेंगी. माने जिन प्रकाशकों को कवि ने मां-बहन की गालियां नहीं दीं वे निश्चित ही उनकी कविताओं को जीवित रखेंगे. ढेरों वैसी कविताएं भी हैं जो सिर्फ़ मां-बहन की गालियां हैं, वे तो वैसे भी पाठकों की ज़बान पर चढ़ी रहेंगी. प्रकृति व पौराणिक कविताओं के बारे में अलबत्‍ता शंका बनी हुई है. इनके बारे में फ़ि‍लहाल यही कहा जा सकता है कि समाज में प्रकृति व पुराण बच गए तो संभवत: कविताएं भी बच जायें. मेरी धारणा में पुराण अब भी समाज से गहरे आबद्ध हैं, और आनेवाले पचास वर्षों तक ‘सुमिरन सभा’, ‘यज्ञवर्ण शुद्धि समाज’ जैसी संस्‍थाएं भारी डोनेशन पर जबतक ज़ि‍न्‍दा हैं, पुराणों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. जेन्‍युइन खतरा प्रकृति को है. कवि की कल्‍पनालोक से बाहर उनका अस्तित्‍व शायद ही बचे. ऐसे में गोस्‍वामीजी की प्रकृति संबंधी कविताएं निश्‍चय ही आश्‍वस्‍त नहीं कर पातीं!

लेकिन जो ऐसी धारणा के प्रचार में लगे हैं वे भूल रहे हैं कि गोस्‍वामीजी ने आश्‍वस्ति-श्रावस्‍ती गान कभी नहीं किया. मृत्‍युपर्यंत वे क्रातिगान ही करते रहे और वही उनका मूल स्‍वर था. यह गोस्‍वामीजी की विलक्षण प्रतिभा ही थी कि वे क्रांति के पारंपरिक खांचों में फिट होने से बचते रहे. या प्रतिभा की विलक्षणता उन्‍हें फिट होने से बचाती रही. क्रांतिकारी दल राजनीतिक मुखपत्रों में इस और उस बहाने से गो‍स्‍वामीजी की कविताएं छापकर उन्‍हें अपनी नकेल से बांधने की कोशिश में जुटे रहे, जबकि क्रांतिचेता कवि बार-बार इस नकेल को तुड़वाकर अराजनीतिक विमुखपत्रों में छपता व अपनी जगह सुरक्षित किए रहा. ये दो ऐसे मूल्‍य थे जिनकी रक्षा में कवि ने आजीवन लोमहर्षक संघर्ष किया. जैसे वे समाज में क्रांति लाने के मर्मांतक पक्षधर थे उसी तरह अपने छपने व जगह की रक्षा में उन्‍होंने कोई कसर उठा न छोड़ी. जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि की तर्ज़ पर निहायत मारामारी वाली जगहों में भी गोस्‍वामीजी अपने लिए जगह बनाने में सक्षम होते रहे थे. यही वजह है ढेरों कवि व प्रकाशक उन्‍हें अपनी कविता, सविता, संध्‍या, रात्रिगंधाओं से मिलवाने में हिचकते थे (कविता एक वरिष्‍ठ कवि की बड़ी बेटी का नाम था, जबकि संध्‍या उनके यहां काम करनेवाली बाई थी). क्रांतिकारी कवि के बारे में किंवदन्‍ती थी कि वे आम तो आम गुठली के दाम भी नहीं छोड़ते. गुठली से आशय संभवत: घर की नौकरानियों से था. यथास्थितिवादी ताक़तों के भ्रांत प्रचार से अलग इसे समाज के पददलित-शोषित समुदाय के प्रति कवि के अतिशय, कोमल जुड़ाव के बतौर देखा जाना चाहिए. ‘सात शहरों में सात बार’, ‘मैं था मैं नहीं था’ जैसी मर्मस्‍पर्शी रचनाएं इसका सजीव प्रमाण हैं. सुधी पाठक याद करें इन उद्दि‍प्‍त रचनाओं में सेक्‍स संबंधी सारे विहंगम दृश्‍य निम्‍नवर्ग के चरित्रों के इर्दगिर्द ही बुने गए हैं, जबकि किंवदन्‍ती नहीं अकाट्य यथार्थ था कि कवि उन दिनों शिमला में किसी निम्‍नवर्ग की स्‍त्री नहीं, एक धनाढ्य बिधवा में फंसे हुए थे, और वापस गोरखपुर अपनी देहातन स्‍वकीया के पास लौटने की बजाय फ्रांस या अमरीका निकल उड़ने के मंसूबे बांध रहे थे.

उनके बाकी समकालीन जबकि दिल्‍ली में रहते हुए पहाड़गंज व पड़पड़गंज की ही बातें करते रहे, गोस्‍वामीजी ने गोरखपुर के सुदूर देहात में भी अपने लिए फ्रांस व अमरीका को संभाव्‍य बनाया. बाकी कवि बिहारी, अष्‍टछाप व गोरखपंथी लीक पर रचनाएं उगलते रहे जबकि क्रांतिचेता कवि ने रिवियेरा, पॉल वेलरी व मोंतेन की बातें ही नहीं कीं, उनके हिज्‍जे तक सही-सही लिखकर अंतर्राष्‍ट्रीयता की पहचान की एक नयी लीक स्‍थापित की.

भयानक शोक का विषय है कि ऐसा उदीयमान युवा कवि इतनी अल्‍पायु में चल बसा. माने नेपाल की ओर बसने के लिए चला था लेकिन जाने क्‍यूं रास्‍ते में बस से उतरकर अपनी मौत की ओर चला गया. दिल्‍ली के कतिपय गैरक्रांतिकारी हलकों में यह बात उड़ायी जा रही है कि कवि के बीच रास्‍ते बस से उतरने की वजह एक कमनीय स्‍त्री का वहीं उस स्‍टॉप पर उतरना था. गोस्‍वामीजी ने स्‍त्री को तो ठीक-ठीक पहचान लिया, लेकिन स्‍त्री के संगी पुरुष को पहचानने से वे रह गए. कविता पर विमर्श करते हुए जिसे अंत तक वह नेपाली कवि माने रहे, वह वर्गशत्रु माने गोरखपुर का मशहूर गुंडा दिवाकर तिवारी निकला. पहचान की यही मामूली चूक जाजल्‍व्‍यमान क्रांतिकारी संभावनाओं के मर्मांतक मार्मिक मर्डर में परिणत हो गई.

क्रांति के अग्रिम दस्‍ते के ऐसे सुलगते अग्निशिखर को हमारा अंतिम नमन.

गोस्‍वामी तुम जाओ. हम तुम्‍हारी कविता को बचाकर रखेंगे?

Monday, July 23, 2007

दुनिया को कैसे देखें?..

फिर बाइस्‍कोप के अंदर एकदम अंधेरा उतर गया.. जैसे गुलाब जामुन रखने से मुंह में खुशी उतरती है.. या पैरों के नीचे से सांप गुजर जाए तो भय की झुरझुरी उतरती है, ठीक वैसे ही. बाइस्‍कोप ने अपना शीशा मला.. सुनील ने अपनी आंखें.. मगर अंधेरे की छतरी वैसी ही तनी रही. काली. घटाटोप. सब शांत. पिनड्रॉप साइलेंस. घड़ी के बाद घड़ी के बाद घड़ी के बाद कितनी तो घड़ी बीत गई. घड़ि‍यों का समय बीतता चला, घड़ि‍यों का रंग नहीं.. भोले मन को अलबत्‍ता उम्‍मीद बनी रही.. लगा अब बात बदलेगी, अचानक कोई हल्‍ला करता गिरेगा, जोकर हंसता हुआ घुलटी मारकर इस खिड़की से झांककर उस दरवाज़े से बाहर आएगा.. लेकिन नहीं आया.. न कोई न जोकर.. फिर जैसे सिनेमा हाल के घुप्‍प अंधेरे में अचानक प्रोजेक्‍शन शुरू हो जाए, कुछ उसी तरह दृश्‍यों की बरसात होने लगी.. पुराने ज़माने के युद्ध में तीर बरसते हों वैसे.. सांय-सांय, सुर्र-सपाक्! चीन, जापान, फिनलैंड, उज़बेकिस्‍तान.. सब जैसे दृश्‍यों में आगे रहने का रेस दौड़ रहे हों जैसे! सुनील ने देखा और उसे हंसी छूट गई..

मगर सुनील की हंसी सुनकर दृश्‍य शर्मिंदा होकर ठहरे नहीं, भागते ही रहे.. अच्‍छा मज़ाक है, सुनील ने सोचा. यह मैं हक़ीक़त देख रहा हूं कि टेलीविज़न? सुनील के मुंह में चुईंग गम होता तो वह चुईंग गम चुभलाते हुए इस सवाल पर सोचता. फ़ि‍लहाल चुईंग गम के अभाव में वह यूं ही जबड़े घुमाता सोचता रहा.. तभी वह आवाज़ सुनाई दी.. करकराती.. किसी टेढ़े-मेड़े मशीन से दबकर निकली टेढ़ी-मेड़ी आवाज़ हो जैसे.. करकराती आवाज़ ने कर-कर-कर करते कहा- कोई फ़रक बचा है दोनों में? पहले हमारे ज़माने में ऐसा नहीं था.. मगर अब हक़ीक़त देखने के लिए लोग हक़ीक़त में कहां देखते हैं? टेलीविज़न पर जो दिखता है उसी को हक़ीक़त मानते हैं.. टेलीविज़न से बाहर जो दिखता है उसे लोग सिनेमा या सपना समझते हैं! फिर तू ऐसे उल्‍टे सवाल क्‍यों कर रहा है? तेरी उमर के बच्‍चे जो करना भूल गए हैं, तू उस रस्‍ते क्‍यों उतर रहा है?..
तब जाकर वह दिखी! करकराती आवाज़ की मालकिन.. चेहरा भी वैसा ही करकराता.. सीधे हैरी पौटर के फ़ि‍ल्‍म से निकलकर आई हो जैसे! यही कहा भी शरारती सुनील ने..

- आप फ़ि‍ल्‍म के सीन से निकलकर आई हो?

करकराती आवाज़ वाली बुढ़ि‍या हंसने लगी.. माने खरखराती-सी कुछ आवाज़ निकली जिसे और कुछ कहने की बजाय हंसी कहना ही बेहतर होगा.. फिर अटकती हुई करकराहट में बोली- मैं समझी तू समझदार है, होशियार है.. लेकिन गलत थी! तू भी मुझे वैसे ही देख रहा है जैसे हॉरर की चार किताबें और तीन फ़ि‍ल्‍म देख लेने वाला कोई भी बच्‍चा देखता! मैं कोई टीवी के परदे पर दिख रही खल-कुटिल शैतान की खाला थोड़े हूं.. रोज़ थोड़ी-थोड़ी बुढ़ा रही बुढ़ि‍या हूं, बस?

सुनील को विश्‍वास करने में दिक़्क़त हो रही थी.. लेकिन खुद को समझदार, होशियार न माने जाने से और दिक़्क़त होती.. गाल पर हाथ धरे वह जिम्‍मेदार बच्‍चे की तरह बु‍ढ़ि‍या के नज़दीक खिंचा चला आया..

बुढ़ि‍या बुदबुदाकर धीमे-धीमे बोलती रही- आसपास की दुनिया को देखने का तरीका होता है, बेटा.. आसपास की दुनिया को तुम टीवी के परदे की हक़ीक़त की तरह देख सकते हो.. और चाहो तो उस हक़ीक़त के बीच खुद को खड़ा करके देखो.. फिर हक़ीक़त टेलीविज़न का दृश्‍य नहीं रहेगा.. उसके मतलब बदल जाएंगे.. और उस मतलब के बीच खड़े तुम भी खुद और दुनिया के लिए बदल जाओगे!

- आपकी बातें बड़ी टेढ़ी हैं.. सुनील ने शिक़ायती लहजे में कहा..

बुढ़ि‍या खों-खों करके हंसने लगी.. सुनील ने देखा उसके मुंह और आंखों से फूल झड़ रहे हों जैसे.. टेलीविज़न के शो वाले तरीके से नहीं.. असली, सच्‍ची के जैसे!

(जारी..)

एक मासूम-सी निर्मम याद..

स्‍मृतियों में खोजती है लड़की किताब. किसने लिखा था छपी थी कहां कभी बहुत पहले पढ़ा था, मुखपृष्‍ठ पर था चारकोल का रेखांकन है बस इतने की धुंधली-सी याद. बस की जगर-मगर में रास्‍ता बनाती, इस शोहदे से बचती उस बुज़ूर्ग को बचाती, एक सीट के ज़रा-से लोहे का टेक लेती ज़ोर देकर याद करने की कोशिश करती लड़की, याद क्‍यों नहीं पड़ रहा आख़ि‍र कब की बात है. तब हज़ारीबाग़ में ही थी कि जमशेदपुर में बीमारी के दिन थे वे लम्‍बे. मन रखने के लिए अम्‍मां रहने लगी थी साथ, सुशांत ने फ़ैसला सुना दिया था क्‍या फ़ायदा अब हमारे मिलने का. मगर तब कहां कुछ पढ़ रही थी, पेपर देखने तक से मन उखड़ जाता था. घबरायी आंखें मूंदे बार-बार उन्‍हीं मचलन-हुमस भरे रंगीन फ़ीतों को देखती मन के परदे पर तब सब कितना सुहाना था बीत गया था जो अब. आंखों के खोलने पर कुछ नहीं दिखता, कमज़ोरी लगती प्‍यास से हलक सूखता बदन टूटता-सा रहता.

कैसा मुश्किल समय था और कितना तो लम्‍बा समय था. भैया गुस्‍से में कांपते बरसते देखो इस नालायक़ को और मैं इसे समझदार लड़की कहता था! अम्‍मां कहती ठीक है, तुमने किया जो भूल गए, तुम्‍हारी समझ के रास्‍ते चलकर ही यहां आयी. कितने वर्षों बाद सुशांत दिखा था फिर किसी किताब की ही दुकान में. कैसा तो अचकचा गया था साथ की पत्‍नी लिहाज में सकुचा रही थी. शायद तभी उठायी थी किताब जाने तो क्‍या नाम था कि उफ़्फ़, इतनी कोशिशों पर भी याद नहीं पड़ता!

Sunday, July 22, 2007

सीखो, सीखो, जल्‍दी और ज्‍यादा सीखो!

‘अक्‍वायर्ड बिहेवियर’.. आपने पहले कभी सुना था? मैंने भी नहीं सुना.. या सुना था तो पहले गौर नहीं किया. काफी दिनों बाद मिले आज एक मित्र के मुंह से सुन रहा था. बच्‍चो के बारे में बातें हो रही थीं. मित्र बता रहे थे बड़े शहरों में आजकल बच्‍चों के जीवन का बहुलांश समय जिन दो जगहों में व्‍यतीत होता है, वह घर और स्‍कूल है. घर अब स्‍कूल का विलोम नहीं, स्‍कूल की ही दुनिया का विस्‍तार है. मां बच्‍चे की तरक़्क़ी को लेकर सांस रोके हर वक़्त चौकन्‍नी बनी रहती है. कड़ाही में छनौटा घुमाते हुए भी अधूरे होमवर्क की चिंता में टेंस. बच्‍चे तक बार-बार रिमाइंडर का सिगनल भेजती रहती है. इस कहानी के बीच में ही दूसरी अन्‍य कहानियों के ताने-बाने जुड़ते चलते हैं. होमवर्क के निपटते ही बच्‍चे को कराटे का क्‍लास अटैंड करना होता है, फिर टेनिस.. बच्‍ची हुई तो कत्‍थक सीख रही है, संगीत का ट्यूशन लगा हुआ है. उससे फारिग हुई तो पापा उंगली पकड़कर बरजते हुए जिमनास्टिक सिखलाने लिए जा रहे हैं. माने एक के बाद एक शिक्षण की एक अनवरत की कड़ी बनी-तनी रहती है! बच्‍चे को वह सब कुछ सिखाते रहने की बाध्‍यता रहती है, जिसके न जानने पर बच्‍चे के अन्‍य बच्‍चों से पिछड़ जाने का ख़तरा तना रहेगा. मालूम नहीं यह पेरेंट्स के अंदर घर की असुरक्षा है, या अजाने उनकी अपनी उम्‍मीदों का बच्‍चों में निवेश की रोज़-बरोज़ की हिंसा!

घर और स्‍कूल पर बिताया हुआ शिक्षा का यह समूचा समय बच्‍चे का ‘अपना’, सहज-स्‍वत:स्‍फूर्त समय नहीं होता.. न बच्‍चा अपने आचरण, व्‍यवहार में ‘सामान्‍य’ रहता है.. इसी दरमियान के उसके आचरण के बारे में मित्र ‘अक्‍वायर्ड बिहेवियर’ की संज्ञा का इस्‍तेमाल कर रहे थे. स्‍कूल व स्‍कूल रूपी घर से बाहर आसपास की दुनिया व अन्‍य बच्‍चों के बीच जब बच्‍चा अपने को इस अपेक्षाकृत ‘अक्‍वायर्ड बिहेवियर’ के बरक्‍स, ‘नैचुरल’ तरीके से अभिव्‍यक्‍त करे, उसकी अवधि इस ‘शैक्षिक’ समय के दबाव में और-और कम हुई जा रही है..

बड़े शहरों में जीवन के नित नए बढ़ते उलझाव की बात करते हुए मित्र ने फिर पिछले दिनों घटी एक छोटी-सी कहानी याद की.. जिस बिल्डिंग में वह रहते हैं, उसके बाहर की थोड़ी खुली जगह, जहां गा‍ड़ि‍यां पार्क होती हैं, वहीं बिल्डिंग के बच्‍चों के कुछ खेलने-कूदने का जुगाड़ था. पिछले दिनों पता चला बिल्डिंग-सोसायटी के सेक्रेट्री ने उसे बंद करवा दिया है. वजह ये थी कि बच्‍चों की गेंद से एक कार का शीशा चटक गया था, तो भविष्‍य में कारों की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए बच्‍चों को यह सबक देना ज़रूरी समझा गया कि निर्देशित जगहों से बाहर उनके खेलने के क्‍या नुकसान हैं!

तो फिर क्‍या करेंगे बच्‍चे? खेलेंगे नहीं? या उन्‍हीं तयशुदा जगहों व तरीकों से खेलेंगे जो बड़ों की सुविधा, सहूलियत में सही समझा जाएगा?.. स्‍वस्‍थ्‍य है ये? हेल्‍दी पेरेंटिंग है?..

मालूम नहीं इस तरह की शिक्षा से हम कैसे बच्‍चे तैयार कर रहे हैं.. कैसा समाज बना रहे हैं..!

Saturday, July 21, 2007

भोर में अकेले...

मुंह पर साड़ी ढांपे उन्‍नीस वर्ष की मां माधवी है सोयी. सात गांव की पुरोहिताई की थकान में थके सोये बाबू सीताकांत, नया-नया पिता बने पिताबोध की जिम्‍मेदारी की बोझ से दबे. रेंगनी पर खोंसे कपड़े, दीवार पर शंकरजी का कलेंडर और आईने पर साटी टिकुली सोयी. फूलदार टिन के बक्‍से पर धरा सिंगारदान सोया चुपचाप और सिंदूरदान सोया. तीन पैर वाली कुरसी का पंचांग, और कांटी पे टांगा अंगौछा और बरामदे का खड़ाऊं व हवाई चप्‍पल सब सोये. चूल्‍हे से टिका के धरा चिमटा और धुले-चकमक बरतन सोये कैसी नींद में खोये. आंगन का अमरूद और पीपल के डुलडुल डोलते पत्‍ते ऊपर ओढ़े चांदनी की चुनरी, किस कदर शांत एकदम निष्‍प्राण.

छै महीने का ढुनमुन चिंहुक कर आंख खोलता है. और फिर जगा, दूध की साफ़-सफ़ेद आंखों तकता-निरखता रहता भोर का नीलापन, निश्चिंत-आत्‍मनिर्भर अपने अकेलेपन में.

Friday, July 20, 2007

आपने कभी नाक सटाया है?..

गमक, महक, बास, गंध.. उभरता है कुछ दिमाग़ में.. या कहें नाक की परिधि में? अपने में क्‍या विविधताओं भरा एक पूरा परतदार संसार होता है.. नहीं? कुत्‍ते को नाक ऊपर उठाकर एक दिशा में ध्‍यानमग्‍न आपने ज़रूर देखा होगा. बिल्‍ली भी खिड़की के चौखटे पर, रसोई के दरवाज़े की ओट में चौकन्‍नी ताड़ती अड़ी रहती है.. दरअसल तब आपको सूंघ रही होती है. आदमी सूंघने के लिए इस तरह नाक ऊपर नहीं करता, न पीछे पुलिस आ रही है वाले अंदाज़ में चौकन्‍ना होता है.. पल भर को ठिठककर राज़दारी वाले स्‍वर में मुस्‍कराकर कहता है- रामलखना के हिंया बेसन का हलुवा बन रहा है! जवाहरलाल अपने जाकिट में पता नहीं सूंघकर गुलाब सजाते थे या नहीं, हमारे बाबूजी अभी भी, जब तक मौसम रहता है, गोद में आम धरे, बीच-बीच में उसे नाक तक ले जाकर सूंघते रहते हैं. अब अम्‍मा नहीं है, जब थी तो उसके घूर के देखे जाने पर बाबूजी का मासूम जवाब हुआ करता- बहुतै गमकौवा दसहरी है!

कितने सारे तो महक हैं, नहीं? जितनी बड़ी व गहरी आपकी अनुभूत दुनिया, वैसा ही फैला आपका गमकदार संसार! फल, फूल, तरकारी.. पत्‍ते.. जंगली, बागान के.. मुरझाये, सूखे पीपल के.. हरे-ताज़ा पान के पत्‍ते! देखकर आंख हरी हो जाए.. जैसे लहलहाता हरा-भरा खेत! बरसात के बाद जैसे किसी जंगल से गुजरते ताज़ा हवा की महक.. या सीली, बसाइन हवा.. अस्‍पताल की स्पिरिट की तीखी गंध में नहायी.. गराज की पेट्रोल व मोबिल की बदबू.. उसके बारे में आपकी क्‍या राय है? सबको वह बदबू नहीं लगती है.. बहुतों को हमने गराज के बाजू नाक उठाकर रस लेते देखा है.. ऐसे गुनीजन भी देखे हैं जो पेशाब के लिए गराज का पिछवाड़ा ही मुफ़ीद मानते हैं. इसके पीछे मानसिकता क्‍या काम करती है? कि वहां अपने रासायनिक दुर्गंध से आदमी गराज की बदबू मार देगा?.. वैसे असली बदबू तो कॉलेज के लैब में उठती है.. याद आया? एक से एक रसायनों वाली फिज़ा बनी रहती है.. कोई लड़की नाक पे चुन्‍नी डाले काम कर रही है, तो कोई नाक साटे..

आप गांव में रहे हैं तो आइडिया होगा बस अड्डे की, कचहरी, थाना की जैसी होती है, गांव की भी एक अपनी महक होती है.. गांव से बाहर रहने में और, तो गांव के अंदर पैर धरते कुछ और!.. गांव के भीतर भी अलग-अलग दिशाओं की.. नदी के तरफ की एक तो खेत के तरफ की और.. ओसारा, आंगन, रसोई की कुछ और तो भीतर अंधेरे में भंडारघर की कुछ और! जानवरों की सानी-पानी और बांधनेवाली जगह पर गोबर-पेशाब का एक दूसरा ही महकलोक होता है.. जैसे खस्‍सी व मछली बाज़ार में.. जहां खानेवाले इतरा के चलते हैं और न खानेवाले बचके-बचाके, नाक दबाके चलते हैं!

आप मुंह के रसिया हैं.. नहीं हैं तब भी.. महकों से मुंह बनाने.. या दिल लगाने की एक पूरी दुनिया सजती-बनती रहती है.. ख़बर हो जाती है पड़ोस में मेथी का छौंक पड़ा है, या अदरक और प्‍याज़ वाला आलूदम तैयार हो रहा है! दूध औंटा रहा है.. या बेकरी में फ़्रेश-फ़्रेश ब्रेड गिना रहा है!

कागज़, किताब, अख़बारों की महक.. नए और पुराने.. कोई मोटा-सा पोथा खोलकर मध्‍य भाग में मुंह डालके देखिए क्‍या सुगंधि छूटती है.. पोथा ज्‍यादा पुराना हुआ और आपका अदबी इश्‍क कमज़ोर.. तो हो सकता है सुगंध उड़ता न मिले, हाथ में किताब थामे आपका मन गंधाइन-गंधाइन होने लगे.. जैसे ताज़ा-ताज़ा बच्‍चा जने घर की हर चीज़ जॉनसन बेबी पावडर, दूध, हल्‍दी के उबटन व बच्‍चे के उत्‍सर्जन की महक में नहायी रहती है.. ओह, कितने सारे तो कहां-कहां के गंध हैं.. ज्‍यादा गहरे उतरूंगा तो आप नाक सिकोड़ने लगेंगे कि देखो, कितना पतनशील हो रहा है!..

फ़ि‍लहाल पीसी से नाक सटाकर पतनशील हो रहा हूं.. महक ले रहा हूं.. लेकिन सिर्फ़ प्‍लास्टिक की आ रही है.. ब्‍लॉग की नहीं..

इसका रास्‍ता अभी खोजना है कि ब्‍लॉग की कैसे लें.. गमक!

Thursday, July 19, 2007

आंख की किरकिरी नीली छतरी..

प्रत्‍यक्षा

ब्‍लॉग की पहाड़ी पर अपनी ब‍करियां खुद ही चरानी चाहिए. मेरा ऐसा ही विश्‍वास है. आपको ख़बर रहती है टुन-टुन बजती ढेरों काठ की घंटियों में कौन वाली घंटी किस बकरी की है.. किसके पीछे डंडी का ठोंहका लगाना है.. और किससे निश्चिंत होकर पेड़ की छांह में गोड़ पसारे बांसुरी बजाने की घटिया प्रैक्टिस करनी है.. मगर हमारा यह सुख आज हमसे छिना जाता है! डंडी से हमें एक ओर ठेल, पहा‍ड़ि‍यों पर फुदकती हुई आज प्रत्‍यक्षाजी चढ़ गई हैं.. टूटी देह में हमारे एक ओर गिरे रहने का फ़ायदा उठाते हुए आज छोकरे की छतरी के नीचे बकरियों को चराने का सुख आज हम नहीं, वह प्राप्‍त कर रही हैं.. छतरी का आनंद आज आप उन्‍हीं के साथ प्राप्‍त कीजिए:

जोकर का चेहरा लाल भभूका हो गया. बच्‍चू को ख़बर हुई हवा में वाकई तीन घुलटियाँ मुश्किल काम था. डाह में सुनील लाल लालमलाल. एक कोशिश की पर आधी घुलटी पलट कर गिरा गई. फिर गिरा देखकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी. बेशर्म बदतमीज़ घुलटी. रुँआसे चेहरे को कहाँ छिपायें. इधर-उधर तलाश कर ही रहा था कि नीली छतरी दिखी. अहा, कित्‍ती तो सुंदर. कोनों पर फुदने बँधे हुये थे.. फुदनों पे सजी नीली-पीली-लाल नन्ही-मुन्नी बत्तखें.

नीली छतरी की बत्तखों को देखकर रुँआसपना फुर्र हो गया. सुनील मियां छूटके हँसने लगे. हाथ ऊपर बढाया और एक बत्तख को हल्के से घुमा दिया. बत्तखें टल्‍ल-टर्र चलने लगीं! एक के पीछे एक! तेज़ तेज़ और तेज़.. पहले हौले-हौले वाली बयार बही.. फिर सां-बां की तेज़ हवा.. और पीछे, ये ल्‍लो, एकदम्‍म भूचाल आ गया! आसपास की सब-सारी चीज़ें गोल-गोल घूमने लगीं.. कागज़ के चिन्दे, ईरानी गलीचे, आबनूसी मूर्तियाँ, नक्काशीदार सुराहियाँ, रंगबिरंगे अफ़रीकी मुखौटे, हंगरी की तुरही और नाईजीरियन तंबूरा. हवा में गोल-गोल.. ऊपर और ऊपर. बवंडर हो जैसे!.. और इस ऊपर उड़ते पिरामिड के सबसे ऊपर फुनगी पर टिका था हँसता हुआ जोकर! वाह, बेट्टा.. जिसकी हँसी की आवाज़ को पकड़ कर सुनील अब भी टिका हुआ था जमीन पर! ज़ोर लगाए, जी से, जान से.. छाती से सटाये उस आवाज़ को. सर के ऊपर छतरी अब भी घूम रही थी चकरघिन्नी..

और ऐन वक्त पर जोकर की हँसी बन्द हो गई एकदम अचानक! सुन्‍न सन्नाटा, घुप्प अँधेरा.. भँवर के ठीक बीच का हिस्सा.. ज्वालामुखी फूटने के पल भर पहले!.. सुनील की छाती से आवाज़ जो छूटी उखड़ गये पैर, बन्द हो गई आँखें. अब जो आँख खुली तो कोई पीला सफ़ेद बर्फ़ीला फिसलन भरा ये चौड़ा मैदान! खडा जो हुआ तो अजीब सी हुँकार भरी टुनटुनाहट. चुप दमसाधे तो साँय-साँय आवाज़.. आँधी जैसी. कहीं दूर कोई चमकता काला भूरा सितारा. और एक चिल्लिबिल्‍ली जंतु तक आसपास नहीं.. जोकर न महक की पँखुड़ी कुतरके ज़ि‍न्‍दा रहनेवाला चूहा.. एकदम निपट-निपट अकेला.. हां!

मेले में भोलू बुढिया के बाल खा चुका था, गोलगप्पे फुचके चाट खा चुका था. आलू के चाट का दोना नीचे गिरा कर रुपये बरबाद कर दिये की गाली सुन चुका था. चकरी पर बैठकर उलटी कर चुका था और अंत में दो रुपये की नीली छतरी खरीदवा कर परम आनंद में लोहमलोट हो चुका था.. कि आँधी आई, छतरी की नीली बत्तखें हिलीं और छपाके से कोई चीज़ आँख में पड़ी.. जानलेवा किरकिरी.. भोलू लोरोझोरो हुआ. आँखें लाल हुईं. पानी डाला, गरम फूँक मार के गमछे के कोने से आँख की सिंकाई हुई, लेकिन किरकिरी निकली कहाँ.. जोकर पिरामिड पर बैठा पीले दांत दिखाता हँसता रहा. बदतमीज़ कहीं का. सिर्फ किताब कुमारी सुनील की बेहाली पर डिक्‍शनरी से ये शब्‍द निकाल और वो शब्‍द ढूढ़ चुप्‍पे-चुप्‍पे आँसू बहाती रही. शब्द तरतीबी से बाहर आते-से लगते.. फिर बेतरतीब होकर यहां-वहां गिरते पडते रहे. पर सिर्फ रोने से सुनील आँख से निकल जाता तो निकल जाता अब तक. रोना तो भोलू को था. किताब कुमारी माथे पर हाथ दिये सोचने लगी. अब तक आँधी थम चुकी थी. नीली छतरी टूटी-फूटी कमानी की खपच्चियों की चोट खायी बदहाली के बीच बेचारी धूल-ग़र्द में सनी लावारिस पड़ी रही.

(जारी..)

द गेरेस्‍ट लभ इस्‍टोरी अफ माई लैफ..

रामजीत राय व्‍याहता बेबी को ओल्‍ड लभ प्रेम प्रकाश का पत्र..

बेबी, माई इसवीट सेक्‍सटीन! (मालूम है कि अब नहीं हो.. उमिर सेक्‍सटीन से ऊपराके चल रहा है.. मगर हमरा खातिर तुम हरमेसा सेक्‍सटीने रहोगी.. और इस्‍वीटो भी!). कौनो खबर है तुमरा हाथी से केतना बड़ पाप हुआ है? ना, हम न बतायेंगे! खुदे से केस्‍चन करो, अऊर खुद ही अलसर करो? बुझाया, कौची का बात कर रहे हैं? हंअ, वहिये चइली जो तुम खींचके हमरा ऊपिर फेंकी.. आंखि अऊर नाकी का नेसाना पड़ जाता तब? केतना का नोस्‍कान होता कौनो अंजाद है तुमको? कौनो एल्‍सोरेंसो कंपनी ओतना नोस्‍कान का पेरमेंट करते-करते हग देती! अऊर हमरा कौनो नुस्‍कान से सकलदीप अऊर अनवर बाद में तोहरा संगे कौन सलूक करते, ओकरा बारे में एक्‍को हाली सोची थी? समझती हो जौन हरामी नंबर वन अनवरवा है, ओहसे तुमको तुमरी मनु मौसी बचातीं?.. तहसीलदार, डिस्टिक मजिस्‍टेक अऊर थानादार बाबू चल आते तब्‍बो तुमको कौनो ऊ पाजी से बचावेवाला नै होता! अईसही खचड़ई में अनवरवा का में जिल्‍ला भर में नाम नै है!..

अऊर तुम आगा-पीछा जिन सोचे चइली फेंक रही थी? काहे ला, बेबिया? एही बास्‍ते कि हम पीछे ले आके दन्‍न देना दूनो हाथी से तोरा पेट चांप लिये थे? कौनो पहिलका हाली चांपे थे रे, छौंड़ी? पीर मोहम्‍मत वाला मेला में चांपा-चापी का सब खेला एत्‍ता जल्‍दी भुला गई? तब त हमरा जुल्‍फी में हाथ फेर के सलम-सलम बोल रही थी? अऊर एतने टैम में हम चइली खवैया हो गए?..

सोच के हमरा करेजा फट रहा है.. मन करता है चक्‍कू निकाल के कौनो के पेट में घोंपके साला का लैफ खलास कै दें!.. अरे, लभ-सभ का कौनो कीमते नै है, जी?..

तुम गवना का बाद पहिलका हाली गांव लौटी त दसरथ, सीपरताप सगरे हल्‍ला किये कि बेबिया का डेरवली होवे वाला है.. तुमको मालूम नहीं जहेल का भीतरी हमरा कौन कंडीसन हो रहा था! जेतना हाली सोचते थे कि तुम बेवोफा हो गई, उतना हाली मुंह से भर्र-भर्र उल्‍टी फेंका रहा था! हमरा कनेस्‍सन वाला सीएन जादव जेलर साहेब का कोर्ट में मामला चल रहा था, नै त तबहिंये हम बहरी आके तुमरे डेरवली वाला केस्‍चन किलियर करते? अंदर झगरा में बयंका गोड़ टूट गया था नै त जेहलो से भागके तुमरा ले मुलाकात खातिर बाहिर आते.. मगर बाहिर आने के बाद दसरथवा अऊर सीपरताप को खूब तोड़े.. सीपरतपवा अब्‍ब ले लंगरा-लंगरा के चलता है!

तुमरा बियाह के बाद हमरा मोहब्‍बत का कौन-कौन गजन हुआ, तुमको अब का बतायें, माई लभ? न रामपिरिया का मझिलका छौंड़ी में मन लगता था, न बलेसरा का भौजी से आत्‍मा को सांति भेंटाता था! गोड़ में तकिया चांपके सगरे-सगरे रात तोहरी लभ का याद में कराही छोड़ते रहते थे? लैफ में एतना टुरचर अऊर कब्‍बो नै हुआ है! मोती सलीमा में पप्‍पुआ अऊर उसका गुंडा लोक गंड़ासा, तरवाल लेके जब हमरा पे अटेकिन किया था, तब्‍बो हम एतना टुरचराये नै थे.. जेतना तुमरा पियार हमको लैफ में अवारा-बेचारा बना के छोड़ा है? अऊर हमरी मोहब्‍बत का इलाम तुम चइली फेंक के देती हो?

जिकर में बहुतै चोट लगी है, डारलिन.. डारलिन बोल रहे हैं काहे ला कि हम जनम जल्‍मांतर ले तुमसे मोहब्‍बत करता रहूंगा.. तुम भले चार छौड़ा-छंवरी का डेरवली कै लो! अब त पहिलका जइसन कंगालियो नहीं है, भड़भड़ वाला बुलेट है, थानादार जी अपना फैमिली मेंबर समझते हैं.. गांव से कोर्ट ले तोहरे प्रेम परकासे का रुतपा है.. अऊर तू अइसा मोहब्त का ऊपरी चइली फेंक दी? काहे ला, बेबी?

फर एभर एंड एभर योर वोनली,
गेरेस्‍ट मजनू प्रेम परकास

Wednesday, July 18, 2007

आदमी जानवर..

मोटर की फुंसी निकल आई थी. बैल के नहीं थी. उसकी गोड़ पर घाव चढ़ा था. रहते-रहते पैर फटकता, हारकर झुक जाता, कांपता घाव चटता. नहीं तो दुर्दिन भूले हुए था. खिजियाया कुत्‍ता देखकर डर रहा था, गों-गों के ऊंचे सुर में रोना किये बदहवाशी में मर रहा था. औरत मरी नहीं थी. कनपटी पर ताज़ा बड़ा काला निशान लिए दोनों नन्‍हीं बेटियों का हाथ थामे गली में तरकारी खरीदने निकल रही थी. बेटियां जनकर अब तक सीखी नहीं है, मौका मिलते ही पति को सिखाने लगती है. आज सुबह वही किया पति की खिंचाई का तिलमिलाकर जवाब दिया. जवाब में जमकर कूटी गई जूते खायी. हालांकि गली में सौम्‍या की मम्‍मी के पूछने पर बात बदल धीमे से बस मुसकरायी.

मर मैं भी नहीं रहा था. बिल्‍ली चौंकन्‍नी फिराक में थी, हंसुए से कटते मछली की आस में कदम आगे दाबे दम साधे डटी थी. मैं उस फोड़े को तक रहा था जो मुझसे ज़रा दूर मेरी क़ि‍स्‍मत पर बैठा मज़े में पक रहा था.

Tuesday, July 17, 2007

विषयाभाव का झूठ व अज़दक द्वारा प्रस्‍तावित कतिपय उपचार..

अपने पुराने मित्र विमल लाल को हम ब्‍लॉग लिखाई के लिए कुहनियाते रहते हैं. इस इतवार से उनका ख़ून कुछ ऊपर चढ़ना शुरू भी हुआ है, मगर हमारे कुहनियइनों पर लाचारी में चेहरा लटकाये उनका हमेशा का एक बंधा-बंधाया जवाब रहा है.. कि ससुर, तुम ‘पढ़वैया’ टाइप हो, बाथरूम में पेशाब के लिए भी जाते हो तो दो हाथ दूर से भी दिख जाता है कि ‘बुद्धिजीवी’ पेशाब कर रहा है.. और सिर्फ़ वही नहीं कर रहा.. साथ-साथ अगले पोस्‍ट का मसाला भी सोच ले रहा है!.. जाने कहां-कहां से उड़-उड़ के विषय दिमाग में चले आते हैं, तड़-तड़ टिपटिपाने लगते हो.. जबकि हमको लड़-लड़ के टिपटिपाना पड़ता है, और विषय तो उड़-उड़ के रहने ही दो.. कांख-कांख के भी नहीं आते! विषयों का सोचते ही दिमाग को क़ब्ज हो जाता है.

तस्‍वीर का यह पहलू विमल लाल का पेंट किया है. तक़लीफ़ के बयान से ज्‍यादा ब्‍लॉग के झंझटों, टंटों से बचने, बचे रहने की यह विमलीय अदा है. क्‍योंकि विमल की बतायी ज्‍यादातर बातें बकवास हैं. न उड़-उड़ के मेरे दिमाग पर मौलिकता की चिरैया बीट छोड़ती जाती है, न तड़-तड़ टिपटिपाने का अपने पास कौशल है.. और जहां तक विषयों की बात है, उनकी विमल को कमी नहीं है.. किसी को नहीं है.. जितेंदर चौधरी अपनी खरीदी नई गाड़ी पे लिख सकते हैं तो आप भी खेत में बैठकर पी गई ताड़ी पे लिख सकते हैं.. हो सकता है ताड़ी का असर गाड़ी पाने के असर से ज्‍यादा ही हो!.. जो पीसी के सामने अनुपस्थि‍त विषयों के बारे में सोचते हुए लात खाये बुद्धिजीवियों-सा चेहरा लटकाये हों, उन सभी दिग्भ्रमितों को मेरी सुझाइश है कि भाई मेरे, विषयों का सचमुच ऐसा अकाल आ गया है? नहीं आया है. आंख खोलकर आजू-बाजू देखिए.. और आंखें कमज़ोर हों तो मूंद लीजिए और कल्‍पना की टोंटी खोलकर हरहरा के धार बहने दीजिए.. और फिर इतमिनान से अंजुरि-अंजुरि लोप कर ब्‍लॉग पर डालते रहिए!.. अब भी आप सोच ही रहे हैं? हद हैं, यार, सोचने तक के लेवल पर फेलियर हैं? डालिए, डालिए, ज़ोर डालिए, दिख रहा है विषय?..

वीकिपीडिया में थोड़ा खोज-खंगाल करके अंडमान-निकोबार की काल्‍पनिक यात्रा कर डालिए.. पोस्‍ट का मसाला तैयार है! या अरमान और ऊंचे हुए तो हिन्‍दी वाले चार पोस्‍टों का ज़रा महीनता से अंदाज़ लेकर एक ऐसा पोस्‍ट लिख मारिये जो आपसे न्‍यूऑर्क का आंखों देखा हाल बुलवा रहा हो.. न्‍यूऑर्क से होते हुए पेरिस व वेनिस की भी कुछ रसीली पोस्‍ट्स तैयार कर डालिए.. फिर देखिए, बिना कहीं गए कैसे लोग आपको भाव देने लगते हैं. कवियत्रियां आपके यहां कमेंट छोड़ने के लिए किस तरह सिर-फुटव्‍वल करने लगती हैं! काल्‍पनिक एडवेंचर तक से आपकी रूह फ़ना होती हो तो ठीक है, मत जाइए कहीं, वेनिस की तंग गलियों में टहलने की जगह यहीं के ओवरफ्लोइंग गटर की सड़ांध का आस्‍वादन लेने लगिए और कोई ऐसा मार्मिक पोस्‍ट लिख डालिए जो गटर की नाली व जाली पर नए सवाल खड़ी करे! आपके सिवा सबको कटघरे में खड़ा करके सवाल पूछती फिरे- क्‍या हमारे बच्‍चों का भविष्‍य गटर का पानी पी जाएगी? कल के शहर क्‍या सिर्फ़ दुकान के शटर और नाली व गटर होंगे? या फिर- शहर चलानेवालो, तुम सड़क बना रहे हो या खोअअअद रहे हो?..

या फिर सामाजिकता के गंद से हटकर अंतरंग लोक की कोमलता को सहलाना शुरू करें.. पत्‍नी, पत्‍नी की नई सहेली के बारे में कोई आयो कहां से घनश्‍याम टाइप पोस्‍ट चढ़ा दें! सोसायटी के उस स्‍वीमिंग पुल के बारे में लिखें जिसकी सहूलियत देखकर ही आपने सोसायटी में फ्लैट बुक किया था, लेकिन जिसके अंदर आपका एक बार भी उतरना अभी बाकी है! या फिर ज्ञानदत्‍त पांडे, आलोक पुराणिक पर ही पोस्‍ट लिख मारिए.. या मोहल्‍ला को ख़बरदार करता पोस्‍ट कि मुहल्‍लेवालो, बंद करो, साहित्‍य के नाम पर ये फ़रेबी बहस!

विषय इफ़रात हैं. विषयों के अभाव की बात बकवास है. फिर भी आपका असमंजस जा न रहा हो तो मैं आपको अपने ऊपर पोस्‍ट लिखने के लिए आमंत्रित करता हूं. हेडिंग डालिए- क्‍या अज़दकी कांटा इन दिनों कहीं फंसा हुआ है?.. आगे- हमारे ताज़ा सूत्रों से ताज़ा-ताज़ा पता चला है..

बुरा आइडिया नहीं है.. एक ट्राइ मारके देखिए..

आम के रेशे पर कुछ फुटकर विचार..

कल्‍पना कीजिए पत्‍नी या प्रेयसी को छह दिन के विरह की कीमत पर मरे मन से आप विदा करने एयरपोर्ट पहुंचे हैं. पत्‍नी- या प्रेयसी (प्रेयसी वाला इमेज़ ज्‍यादा अफ़ेक्टिव है. प्रेयसी ही मानकर चलते हैं!) लड़ि‍या-लड़ि‍याकर हिन्‍दी फ़ि‍ल्‍मों वाली भावुकता के भर्र-भर्र बुलके चुवा रही है.. हाथ में हाथ लिए, पंजे में नाख़ुन गड़ाकर आपके मन में काम- संबंधी कैसे-कैसे तो भाव पैदा कर रही है.. कंधे पर सिर रखकर आंसुओं से आपका नया शर्ट खराब कर रही है.. आप भी हैं कि बुरा मानने व ठेलकर उसे दूर करने की जगह, भावुकता की बहक में उसके होंठ चूमने के लिए झुकते हैं.. मगर अचानक तबतक नज़र की रेंज में एक पुलिसवाला चला आता है.. और गड़बड़ाये फ़ोक़स में प्रेयसी के ओष्‍ठद्वय की जगह खुद को उसकी नाक का रसपान करता पाते हैं.. और आवारा पुलिसवाले के गुज़रते के साथ प्रेम के इन हाइटेंड क्षणों को दुबारा करेक्‍ट किये जाने की भूमिका बना ही रहे हैं.. कि अचानक चेतना मसूड़े व दांतों के बीच फंसे एक मामूली रेशे से जनित एक ग़ैरमामूली असुविधा का आपको सिगनल देने लगती है.. डेढ़ घंटा पहले खाये दसहरी के सौजन्‍य से आपने यह प्रसाद प्राप्‍त किया था!

आपको ख़बर भी नहीं होती और आप प्रेयसी के होंठ भूलकर अपने ही होंठों के अंदर जीभ घुमाते हुए- रेशे के अनुसंधान में- जाने क्‍या-क्‍या किसका रसपान करने लगते हैं. करते रहते हैं. अचुंबित होंठोंवाली प्रेयसी अचुंबित ही बनी रही क्लियरिंग से होती हुई जहाज ही नहीं, अपने गंतव्‍य तक पहुंच जाती है.. फ़्रेश होकर मोबाइल से आपको मिस करने की ऑलरेडी तीन-तीन कॉल भी दाग़ चुकती है! लेकिन आप जीवन में उपस्थित हो गए उस पीड़ादायी, दुर्निवार खालीपन के बारे में तब भी नहीं सोच रहे होते, सवाल ही नहीं उठता, आपका तो सारा ध्‍यान अब भी दसहरी के उसी शैतानी रेशे पर केंद्रित होता है.. जो घर के छोटे-बड़े सब आईनों को इस्‍तेमाल में बरत लिए जाने, दांतों के भीतरी भूगोल को दस एंगिल से देख चुकने व आलपिन से चार जगह मसूड़ा घायल करने के बावजूद अभी तक भीतर से अपनी कांटी निकालने से इंकार कर रहा.. जड़ा-अड़ा और अभी तक अपनी जगह वैसे ही साबूत खड़ा बना रहता है.

लंबी-लंबी सांसें छोड़कर इस बीच आपने सत्रह दफ़े प्रण किया हो कि यह इस बार वाली आख़ि‍री, फ़ाईनल, फ़ाईनलिस्सिमो कोशिश है.. इसके बाद दो कौड़ी के टिनहे रेशा के बारे में नहीं सोचेंगे, जब निकलना होगा खुदै निकलेगा ससुर.. और ऑलमोस्‍ट दो मिनट के लिए अपनी प्रेरणा व प्रण मान जीभ को जीभ की ही जगह रहने भी दिया होगा.. मगर तीसरे ही मिनट फिर वही शाम, वही ग़म वाली कहानी में उलझ, अझुरा रहे होंगे.. और चिढ़े हुए, झींकते-हांफते नामुराद रेशा समेत दांतों का ही कुछ कर डालने की भयानक कल्‍पनाओं को आग व अनाज देने लगे होंगे कि तभी.. बेचारा मासूम आधे नाख़ुन भर का रेशा भल्‍ल से बाहर आ निकलेगा!.. और तर्ज़नी की नोक पर उस अनूठे रत्‍न को सजाये आपको यकीन करने तक में परेशानी होगी कि इस टिल्‍ली चीज़ ने चार घंटे से आपका जीना हराम कर रखा था?..

शाम प्रेयसी को यह बताते समय कि उसके चले जाने के इन आठ घंटों के दरमियान जीवन कैसे तिल-तिलकर मारता प्रतीत हो रहा है, आपको इस बात की याद भी नहीं रहेगी कि अभी कुछ देर पहले तक एक अदद रेशे ने आपका क्‍या रेशा-रेशा किया हुआ था!

Monday, July 16, 2007

हर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्‍या है..

मालूम नहीं अंग्रेज़ी में वह क्‍या करता है. हिंदी समाज में लेकिन वह बहुत सक्रिय पाया जाता है. उसकी फ़ोनबुक में सभी महत्‍वपूर्ण लोगों के नम्‍बर और घर का पता-ठिकाना मौज़ूद होता है. मैटर करनेवाले सभी नामी-गिरामियों के साथ उसने पहले ही चाय पी रखी होती है, उनके लतीफ़ों पर हंस चुका व उनके स्‍वास्‍थ्‍य के अंतरंग रहस्‍य अपनी जेब में लिए टहलता होता है. वह हमेशा चहकता, कौतुक व सत्‍ता की अनगिन कहानियों से सबको चकित करता, मूलत: राजधानी के फैलाव और संभावनाओं में डूबता-उतराता दिखता है.. मगर कभी-कभी उसके पंख राजधानी से बाहर दूसरे शहरों में भी पंजा मारने को उड़ते हैं.. लेकिन बहुत दूर निकलकर भी वह राजधानी से बहुत दूर कभी नहीं होता.. और किसी बड़े राजकीय जलसे या ईनाम के मौके पर हंसता, सबको हंसाता.. निर्विवाद तरीके से वापस राजधानी में ही पाया जाता है! राजधानी में उसका न होना, हो पाना उसके जीवन के सबसे शोकपूर्ण दिन होते हैं.

अक्‍सर उसकी पैदाइश, परवरिश छोटे शहर से हुई होती है. छोटे-छोटे सधे कदम भरकर फिर अकस्‍मात वह बड़ी राजधानी में आ धमकता है. विनम्र व छोटा दिखने की उसके पास ढेरों लुभावनी अदाएं होती हैं, मगर छोटा वह कतई नहीं होता. जल्‍दी ही अपने को बड़ा व तोपख़ां समझने वाले ढेरों जोकरों के पंख कुतर, उन्‍हीं के कंधों में पैर धंसाता, तेज़ी से सफलता के मीनार चढ़ रहा व बढ़ रहा होता है. आजू-बाजू घायलों व तक़लीफ़ में कराहती, गालियां बकती एक पूरी पल्‍टन होती है; जिनकी तरफ पलटकर वह एक बार नहीं देखता, न ही उसके चेहरे पर कोई शिकन आती है.

साहित्‍य, समाज व सभ्‍यता हर वक़्त उसकी ज़बान पर रहते हैं. एक जेब में परम्‍परा तो दूसरी में वह आधुनिकता की सबसे पैनी कुंजियां लिए मैदान में मचलता उतरता है. बहुत बार वह आश्‍चर्यजनक रूप से मार्मिक कविताएं लिखता है.. ओजस्‍वी गद्य या वैसे ही वक्‍तव्‍य देता है.. या फिर आलोचना में हुआ तो उभरती कवियत्री या कथाकारा का हाथ अपने हाथ में लेकर रचना को ऐसी ऊंचाइयों तक ठेल देने की सामर्थ्‍य रखता है जहां अभी भी बाकी लोग अंधेरे में दीवार टटोल रहे होते हैं. एक लेख देकर वह किसी मरी हुई लघु पत्रिका को पुनर्जीवन दे देता है.. या अपने मोह में अलसायी, इतराती बड़ी पत्रिका को अचक्‍के में ऐसी लंगी कि आनेवाले कई अंकों तक वह इसकी और उसकी सफ़ाई छापती फिरे!

वह सोते-जागते, उठते-बैठते-हगते हर वक़्त समाज और सिर्फ़ समाज का होने की कसमें खाता है.. मगर साथ ही वह समाज को ठेंगे और अंग विशेष पर रखने का कौशल भी जानता है. वह हंसते-हंसते तीन का तेरह और दो सौ का दो कौड़ी कर देता है. जो उसकी दो कौड़ी करते हैं उन्‍हें वह सारे जीवन भूल नहीं पाता, न माफ़ करता है.

वह अलग-अलग समयों व अलग-अलग मुल्‍कों में हमेशा ही पाया जाता रहा है.. इस तरह से उसका होना अपने में ऐसी कोई अनोखी ऐतिहासिक परिघटना नहीं.. फर्क़ बस इतना ही है कि एक बीमार समाज में उसके भोले चेहरे के धोखे में उसकी पहचान अर्से तक दबी-ढंकी रहती है.. ज़ोर-ज़ोर से और धारदार वक्‍तृता के भय से लोग सीधे उसके विरोध में बोलने से बचते हैं. किसी के मुंह खोलते ही वह सत्‍य और सभ्‍यता का भाषण बीच में स्‍थगित करके मां-बहन की नंगी गालियों पर उतर आता है.. और दूसरी सुबह चौदहवें माले की लिफ़्ट में फिर एकदम निर्दोष सूरत लिए बालसुलभ प्रसन्‍नता में चढ़ता दिखता है..

आप उसे पहचान रहे हैं? हो सकता है इस वक़्त वह आपके बच्‍चे को गोद में लिए, आप ही के घर बैठा, आपकी चाय पीता, आपको जूता मारने की रणनीति तैयार कर रहा हो.. या यह भी हो सकता है कि वह आपको जूता मारने तक के क़ाबिल न समझे.. मगर फिर भी आपके सावधान रहने में हर्ज़ नहीं है..

Sunday, July 15, 2007

जो ब्‍लॉगर्स मीट नहीं था..

इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय वाले दिनों में विमल हमारे रूममेट हुआ करते थे. बाहर समाज की बड़ी हिस्‍सेदारियों में हम साथ-साथ के भागीदार थे, वही भावुकता हमसे रूम भी बंटवा रही थी. जब भी मौका बनता है, विमल उन दिनों की राजनीतिक सक्रियता के ढेरों सांस्‍कृतिक चुटकुले मज़ा लेकर सुनाते हैं.. हो-हो करके हंसी भले आए मगर हर बार मुझे ताजुब्‍ब होता है कि कैसे विमल को सब बातें याद हैं, जबकि मेरे अवचेतन में उस समय की कोई धुंधली स्‍मृति भी नहीं बची! कुछ टेढ़ी-मेड़ी लकीरें हैं.. बाकी सारी घटनाएं व अजीबो-गरीब चरित्रों का वह रंगदार मोंताज़ दिमाग से पुंछ गया हो जैसे! कल फिर ऐसा वाक़या हुआ कि यह मोंताज़ जीवित हो उठा और उनके याद आने की मेरी हैरत पर अभय का जवाब था कि स्‍मृतियां सिस्‍टम से डिलीट कभी नहीं होतीं.. रीसायकल-बिन में पड़ी रहती हैं..

पुराने दिनों के दोस्‍तों से गाहे-बगाहे मिलना होता रहता है लेकिन इकट्ठे चार लोगों का एक जगह बैठने की घटना बहुत दिनों बाद हो रही थी. विमल, अभय, अनिल और मैं सब ब्‍लॉग लिखते हैं, लेकिन विमल के बार-बार छेड़ते रहने के बावज़ूद यह ब्‍लॉगर्स मीट नहीं थी.. अभय के यहां जब वह हुई थी तब अनिल या विमल उसमें शामिल होने के लिए अपनी नौकरी छोड़कर नहीं आए थे. कल अनिल के नए और खुले घर में हमलोगों का इकट्ठा होना ब्‍लॉगर्स मीट से ज्‍यादा आर्ट ऑव लिविंग की गैदरिंग समझी जानी चाहिए. रोज़मर्रा की अपनी-अपनी बेचैनियों को अलग-अलग जीते, पुरानी संगत की अंतरंग समझ व चमक में, हम अपना-अपना प्राणायाम सीखने की कोशिश कर रहे थे. न जानने की शर्म व जान चुकने के दंभ की सामाजिक धकमपेल से मुक्‍त, बहुत दिनों बाद, घंटों हम एक-दूसरे की सा‍मयिक समझ के अपडेट को शेयर कर रहे थे.. एक-दूसरे के अंधेरों में छोटे-छोटे लालटेन जला रहे थे, पगडंडिया खोल रहे थे..

बातें सुनते हुए उत्‍साह में कई मर्तबा लगा कि मेरी जेब में पैसे होते तो कल ही अभय और अनिल को तीन-चार किताबों के लिए कमीशन करके मैंने साइन कर लिया होता. अभय आज सुबह टीवी की किसी चिरकुट लिखाई के लिए कंप्‍यूटर के सामने बैठने की जगह अपनी किताब का खाक़ा लिखने बैठे होते जिसमें साफ़ किया जाता कि आख़ि‍र क्‍या वजह है कि पंचमेली तत्‍वों के रेसिपी से तैयार श्रीमद्भगवतगीता हिन्‍दुओं के बीच इतना महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखता है.. असंख्‍य हिन्‍दू देवी-देवताओं की समाज में स्‍थापना व शंकर के हीरो होने की पीछे की असल पेंचदार कहानियां क्‍या हैं.. और लगभग प्रभुत्‍व व अपना मतलब खो चुके ब्राह्मणों ने भारतीय समाज को वापस कैसे जीता..

दिलचस्‍प किताब बनती या नहीं? शायद इतिहास का ऑथेंटिक टेक्‍स्‍ट नहीं होता लेकिन इतिहास संबंधी हमारी बनी-बनायी मान्‍यताओं को क्‍वेश्‍चन करने की एक ले-मेन वाली लोकप्रिय रीडिंग ज़रूर होती.. लेकिन फ़ि‍लहाल अभय उसे लिख नहीं रहे हैं.. टीवी वाली लिखाई करके इस महीने के बिलों का पैसा इकट्ठा कर रहे हैं..

जैसे अनिल भी अभी वह किताब नहीं लिखने बैठे जो इस सवाल के गंभीर अन्‍वेषण में जाए कि आख़ि‍र क्‍या वजह है कि समाज में आमूल-चूल परिवर्तन की बात करनेवाले नक्‍सली दल मोस्‍टली समाज के हाशिए पर ट्राइबल्‍स के बीच ही सेंटर्ड हैं.. किसानों तक से कटे हुए.. समाज की हर मैटर करनेवाली ताक़त से कटे हुए दिल्‍ली जीतने के उनके सपने किस हद तक रूमानी, फूहड़ व फ़रेबी हैं.. आर्थिक इकाईयां काम कैसे कर रही हैं.. ग्रासरूट लेवल पर उनके नियंत्रण व जवाबदेही के लिए.. कल के सुनहले भारत के लिए.. किन-किन स्‍तरों पर सार्थक पह‍लकदमियां ली जा सकती हैं आदि-आदि..

एक किताब का ख़ाक़ा मेरे पास भी है.. लेकिन फिर.. मुसीबत वही है कि मेरे माथे भी दस तरह के बिलों के भुगतान के लिए पैसों के बारे में लगातार सोचने की चिंता है!..

विमलजी अलबत्‍ता हो सकता है कल की मीट से इस कदर रीचार्ज़ होकर लौटे कि घर लौटते ही उन्‍होंने तीन पोस्‍ट दाग़ दिया!

(ऊपर तस्‍वीर में इलाहाबाद के दिनों के पुराने चेहरे: खड़े हुए सबसे बायें विमल, नीचे बैठे हुए बीच में दांत दिखाता मैं, सबसे दायें अनिल. अभय नहीं हैं.. तस्‍वीर से बाहर वह एक लड़की के पीछे घूम रहे थे, तस्‍वीर में खड़े होकर फ़्रेम होने की उन्‍हें तब फ़ुरसत नहीं थी..)

Saturday, July 14, 2007

तू दूसरा का अमानत है, बेबिया!..

प्रेम परकास प्रेयसी बेबी कुमारी राय को सखी सकीना का पत्र..

हमरी हलुवा, लौंगलता, हमरी तिलकुट.. रंगनाथ हेयर सैलून वाली गली के अख़ि‍र में ठेला की चटख़ घुघनी माफिक हमरी दिलअज़ीज़ बेबी! केतना तो तेरे को मिस करते हैं, रे? रोज़-रोज़ केतना हाली तो तोहरे बहाने घर-दुआरी का काज छोड़के बतकुट्टन का बाती बाले रहते हैं- कल्‍ले डेराइबर साहेब पूछ रहे थे कि अपना बेबी से मिटिन कब्‍बे करवाइएगा?- और तू कहती है तेरे को मन से उतार दिये! तोहरा को मन से उतार देंगे तब ई मन में कौची बचेगा, छौंड़ी? छुच्‍छल, निरजन, सूनसानी को तोहरे सिवा दुनिया में और कोई पूर नहीं सकता, बेबी.. सच्‍चो, तोहरा किरिया खाके बोल रहे हैं!..

हमरा बारे में जाने कहंवा से तुम एतना ख़याली खीर रांधते रहती हो.. अरे, हिंया बइठा कौन है चुनरी के नजीक.. मथवा का गमक लेने को जेकरा बास्‍ते तेल-सैंपू और लिपिस्टि करेंगे? इनको तो घर आए छौ दिन हो रहा है! जब ले भट्टा वाला काम धरे हैं, घर में गोड़ धरे का सुभीते नहीं रहता.. कल डेराइबर साहेब को देखके त हमरा चेहरे उतर गया! खबर किये कि काम का बहुत मारामारी है, ई हफ़्ता घरे आये वाला सूरत नै बनेगा! इंहवा रहते थे तब्‍बो ई नहीं था कि सगरे दिन हमारा गोड़ गोदी में लेके आलता रंग रहे हैं.. हमरे बास्‍ते पाज़ेब और कनफूल बना रहे हैं- जइसा तू मने-मने, बदमाश, बाना बुन रही है!

जब से ऊ पतंगवाला काम छूटा, रोज़ इफ़्तार चचा के हिंया जाके चिलम लेके बइठे रहते थे! दस बेर तो खुद हम्‍म बोले होंगे कि ऊपर खुदा सब देखता है, मातम कै के किसका भला कीजिएगा.. ज़ि‍यादा टेंगसन है, त ठीक है, घरे मत रहिये, जाइए, जाके मज़ि‍द बैठिये.. त मुंह फुलाके दिन-दिन भर गायब रहते.. रतिया को लौटते त मुंह से दारु का अइसा दुर्गन्धि छूटता कि का बोलें! उल्‍टा-सीधा जइसो था एकरा तसल्‍ली तो रहता था कि मरद नज़र का सामने है! दू महीना हुआ ई भट्टा वाला काम भेंटाने के बाद त अब हमरी बुद्धिये काम नहीं करती कि ख़ुदा को शुक्रिया बोलें कि अपना किस्‍मत को रोवें! पांच-पांच, छै-छै दिन निकल जाता है, इनका पते नहीं रहता. पूछो तो गुस्‍साके रंडी-संडी का गाली बोलने लगते हैं. डेराइबर साहेब बता रहे थे सब जड़ कंटेट्टर है.. भट्टा पे काम करेवाला सब मजूरन का जीना हराम कै के रक्खे है!..

लेकिन डेराइबर साहेब बहुत नीमन आदमी हैं.. बीच-बीच में उनका कपड़ा-लत्‍ता का बदली और दूसरा ज़रूरत लेवे बास्‍ते चल आते हैं.. बहुते शरम-लिहाज़ वाला आदमी.. चाय पिलावे खातिर भी चिरौरी करनी पड़ती है.. हम्‍मो का करें.. बेशरमी से निहोरा करते हैं? कि केकरो से ज़रा दिल का बात कै लें!.. गलत करते हैं, सखी, त बोल?.. रोटी सेंक लिये, कपड़ा धो लिये, ओकरे बाद? अकेले दीवाल तकते-तकते जी घबराने लगता है! तोहरी बड़ याद आती है, बेबिया, सच्‍चो में?

डेराइबर जी पहले असम और गुजराती में बड़का साहब लोग का नौकरी में थे.. आठ महीना से इधर हैं.. ज़नाना-बच्‍चा का बारे में एक दिन पूछे तो शरीफ़ आदमी मुंड़ी नीचे कै लिए! एकरा कौची माने होगा, रे बेबी? हमको मगर बहुत अच्‍छा लगते हैं! ऊंचा कद-काठी है, महीन-महीन मूंछ है, ऊ जैसे पाकिज़ा वाले राजकुमार का नै है?

और ई तुम परेम परकास का उल्‍टा-सीधा कौची बोल रही हो? सहेली, एतना ही बोलेंगे कि सावधान रहना, हां! कौन त कह रहा था कि ई डकैती-सकैती में इबाल्‍व है? पुरनका दिन में जो गलती हुआ सो हुआ, अब तू दूसरा का अमानत है, बेबी!

तोहरे ललकी टिकुली वाले दमकते मुखड़ा को मन में बसाये बइठी..

तोहरी ज़ि‍न्‍दगानी की राज़दार,
सकीना

Friday, July 13, 2007

बिना रंगोंवाला जोकर..

किताब गुमसुम, खोयी-खोयी, ‘आह, कितना तो मैं दुखी हूं!’ वाली अदाओं में अपने आंसुओं के पुंछने की राह तक ही रही थी कि.. जाने क्‍या हवा चली, उड़ी.. कि कुछ का कुछ हो गया.. सब बदल गया! जो सामने था पीछे हो गया.. और जो कहीं नहीं था जाने कहां से आ गया, सब कहीं छा गया! मेले की-सी हवा बन गई.. रेले में कोई इधर रोने तो उधर गाने लगा.. किताब प्‍यारी छूटकर कहां तो पहुंच गई.. और सुनील ने आंख खोली तो अपने को घुप्‍प् अंधेरे में पाया! फिर सोचके चकराते रहे अरे, ये अंधेरा कहां से आया?

दरअसल आए तो वह थे.. अंधेरा तो पहले से ही जमा था.. वहीं, उस बाबा आदम के ज़माने की संदूक में.. अटरम-बटरम, टटरम-सटरम के कबाड़ी कंजास में! सुनील लाल को संदूकी सच्‍चाई की ख़बर मिलती तो शायद वहीं अंधेरे को अपने कै में नहला देते.. मगर चूंकि पहले से ही इतनी सारी महक में नहाए हुए थे, उनपर बक़्से के गंधाते भभके का वह जादुई असर न पड़ा जिसके चपेटे में अक्‍सर बड़े-बड़े खड़े-खड़े गिर जाते हैं! सुनील पहले से ही गिरे हुए थे.. फ़ि‍लहाल किताब के अकेलेपन का दुखड़ा-टुकड़ा सब भूलकर अपनी फजीहत सुलझाने में जुटे. यहां से पैर निकाला.. वहां हाथ डाले.. टोया-टटोला.. अभी ख़बर होनी ही थी कि कहां ढुके हैं.. तबतक खुद संदूक का ढकना उठ गया!

भक्‍क् से चमकती रोशनी भीतर आई.. और उस रोशनी में चिंहुककर सुनील के मुंह से निकला- आआआ! कुछ वैसी ही आवाज़ उस सुशील के मुंह से भी निकली जिसने संदूक का मुंह खोला था, और अब अपना खोले सन्‍न खड़ा था!

- हमारे बक़्से में क्‍या कर रहे हो?, सुनील की-सी ही ऊंचाई, मगर उम्र में उससे तक़रीबन पचास वर्ष बड़े भले बौने ने सवाल किया.

गुज़रे ज़माने की एक गोटेदार पगड़ी, मखमल का एक पुराना चिथड़ा रूमाल, चीन और ईरान के सिक्‍के, आबनूसी लड़की की काठ की एक मूरत, एक खराब पड़ी बंदूक, सुनहले काजवाला जूता, पशमिने का शॉल, हंगरी की एक तुरही, नाइजीरिया का तंबूरा.. क्‍या-क्‍या तो बक़्से में कंजास दबा पड़ा था. तबीयत दुरुस्‍त होती तो सुनील तसल्‍ली से एक-एक अनामत का मुआयना करता.. आंख बचाकर शायद दो-एक चीज़ गायब करके अपनी जेब के हवाले भी कर लेता.. मगर फ़ि‍लहाल अपनी जान की गरज थी. बौने की मदद से कूदकर बक़्से से बाहर आ गया! और बाहर आने के बाद, पहली बार, गौर से सामने खड़े नमूने का नुमायना किया.. नहीं, मुआयना किया.

बक़्से से बाहर आते ही सुनील बक़्से के अंदर पहुंचने की रामकहानी एकदम-से भूल गया.. हैरान आंखें फाड़े सामनेवाले को देखता आंखें न फाड़ने की कमज़ोर करतब करता रहा.. इसका पूरा यकीन था ऐसी बनावट और बुनावट वाले प्राणी को उसने पहले भी देखा है.. कहां देखा है इसका ध्‍यान नहीं आ रहा था.. मगर साथ ही यह भी ध्‍यान आ रहा था कि जब देखा था तो इनके मुंह पे रंग और नाक पर सफ़ेद टेबल टेनिस वाला बॉल हुआ करता था. हां, उसीके न होने से तो पहचानने में मुश्किल हो रही थी.. न पहचानकर चक्‍कर आ रहा था. अब पहचान लेने के बाद सवाल करने की बारी सुनील की थी.

किया सवाल- आपको मैं जानता हूं.. आप जोकर हो!

बौना था नहीं.. लेकिन एक मंजे जोकर की तरह हंसने हो-हो हंसने लगा. सुनील को लगा ये मिंया अभी हवा में तीन घुलटी खाकर फिर एक नया करतब दिखाएंगे..

(जारी..)

फिर-फिर तिनका जोड़ता..

इतनी सारी बातें कह देने की बेचैनी.. एक के बाद एक.. ताबड़तोड़.. बरसाती फिसलन भरे मैदान में सस्‍ता फुटबॉल लिए कोई लड़का जैसे ज़ि‍द में अकेला खेलने चला आए.. और बेसुध पैरों के बीच घंटों बॉल को ठुमकाता-उड़ाता दौड़ता बझा रहे! इतने सारे शब्‍द निकले चले आते हैं. उनके निकलते चले आने का.. क्रम में सजता चलते देखने का एक अपना सुख है.. शायद एक स्‍तर पर बच्‍चे का रेत में देर तक कलाकारी करके घर बनाने व कुछ दूरी से खड़ा होकर उसके आत्‍ममुग्‍ध अवलोकन से बहुत अलग नहीं.. जिसके बाबत अनूप शुक्‍ल के एक पोस्‍ट पर अभय ने कुछ दिनों पहले एक निहायत क्रूर, निर्मम टिप्‍पणी की थी. निर्मम थी इसीलिए ही गलत नहीं हो गई. शब्‍दों का अन्‍तरंग, विचारवान, उद्दि‍प्‍त लोक हमारे लिए मतलब रखता है तो बीच-बीच में ऐसी टिप्‍पणियों की समझ के ताप के नीचे से गुज़रते रहने की आदत सीखते रहनी चाहिए. आपकी ज्ञानात्‍मक संवेदना का हिस्‍सा होकर निजी समझ में जितनी जल्‍दी.. जितने गहरे यह चेतना घुस जाए, बेहतर. फिर किसी अभय की ज़रूरत ही न रहे.. आप ही अपनी तीसरी आंख हों.. अच्‍छा ख़्याल है, नहीं? पर यह सब क्‍या इतनी आसानी से होता है? हो पाता है?..

अपने रचे छायालोक का मोह! आह, कैसी, क्या-क्‍या तो उनके भीतर ज़ालिम अदायें छिपीं, गुंफित होती हैं.. कैसे-कैसे तो गुप्‍त, छल्‍लेदार आत्‍मालाप चलते हैं! निर्मम समझ के चश्‍मे की ताप के नीचे लाकर धड़ से एक ही मार में उन्‍हें ज़ि‍बह कर दिया जाए? संभव है? उचित होगा?..

ओह, जाने क्‍यों सोचकर सिर चकराने लगता है.. मानो अभी ठीक-ठीक चलना न सीखे ढुलमुलाते बच्‍चे के कमर पर पंजा मारके उससे उसका कौशल साबित करने की ग़ैरवा‍ज़ि‍ब मांग की जा रही हो!..

शायद मैं भावुक हो रहा हूं.. शायद लच्‍छेदार बुनावट के बावज़ूद मेरी सोच वैसी ही पोली हो जैसे अपनी कविता की आलोचना के डिफ़ेंस में निरंजन श्रोत्रिय देर तक अपनी सृजनत्‍माकता की बात करते दिखते हैं, उस सृजनात्‍मकता में उनकी ढेर सारी मेहनत भी दिखती है, लेकिन इतनी सारी मेहनत हमारे पहले से जाने हुए में कुछ, ज़रा-सा भी नया जोड़ नहीं जाती..

संभव है मैं भी बेकली की बहुत सारी मकड़जाल ही बुन रहा होऊं.. जो धुंधलकों में मुझे ढेर सारा यहां से वहां दौड़वा भले रही हो.. उस मेरे घुप्‍प् अंधेरों के भीतर कोई खिड़की तुड़वा नहीं रही हो.. हो सकता है.. मैं जानता नहीं.. अभी तो नहीं ही जानता.. शायद धीमे-धीमे की अनगिन ढेरों कोशिशों के बाद कभी, किसी वक़्त जानने लग जाऊं? मगर उसका भी दावा नहीं करता!..

लेकिन फ़ि‍लहाल.. ये जो यहां और वहां से बहते चले आ रहे इतने सारे सोते हैं.. कभी कुछ फुसफुसाके कानों में कह जाते हैं.. कभी बस यूं ही बहते चले जाते हैं.. निरर्थक, बेमतलब-से दिखते.. ऊबड़-खाबड़, बेतरतीब.. मेरे लिए उनके अंदर कहीं एक अप्रकट, सुप्‍त कलकल-छलछल छिपा-गूंजता पड़ा है.. बाजवक़्त बहुत मार्मिक ध्‍वनियां व अर्थों के कुहरीले मैदानों की एंट्री पॉयंट हो जैसे! अपने ख़ि‍लाफ़ भावुक, आत्‍ममुग्‍ध प्रलाप के आरोपों की क़ीमत पर भी अपनी यह पोटली मैं छाती से लगाये रखना चाहता हूं.. बिम्‍बों व विचारों के इस पेड़ से उस पेड़ फुदकते हुए नित नए उलझे, बेसिर-पैर के शब्‍दजाल गूंथते रहना चाहता हूं..

आपको कौतुक सूझे, छेड़न का आनंद आए तो भले आप गंदगी फैलानेवाला घोंसला मानकर इन्‍हें तहस-नहस करते फिरें.. मैं फिर-फिर तिनका जोड़ता उन्‍हें खड़ा करता दिखूंगा!..

Thursday, July 12, 2007

महानता की मार..

शाम की जवानी पीछे छूट चुकी है.. और मैं जो है अभी तक महानता को प्राप्‍त नहीं हुआ हूं. चंदू के कहेअनुसार शुरू में सकुचाते हुए, और थोड़ा रंग में आते ही- बेहद बेशर्मी से मैंने रम और व्हि‍स्‍की ढरकाया.. व्हि‍स्‍की बही है मगर महानता हाथ नहीं आई है. अलबत्‍ता हाथ से गई हैं. चीज़ें! मैं इधर महानता में उलझा रहा और पीठ पीछे किसी ने बाइक का शीशा और पुराना हवाई चप्‍पल मार दिया! किस हरामी का काम हो सकता है? सामने पड़ जाए तो महानता से नहीं, चप्‍पल-चप्‍पल मारूंगा! (हवाई से नहीं, वह तो खो गई.. वैसे भी पुरानी पड़ गई थी.. मगर पुरानी पड़ गई थी इसी से किसी को हक़ नहीं मिल जाता कि ले उड़े? हद है).. ऐसी कुटाई करूंगा कि बच्‍चू के अक़ल ठिकाने आ जाएगी!..

बहुत डाऊन-डाऊन लग रहा है. अरे, ये कोई बात हुई? हम यहां महानता का सोचके गुलगुला हुए जा रहे थे और कोई चिरकुट गोड़ का टुटही चप्‍पल गायब कर दे! आदमी इस देश में शांति से महान होने के बारे में भी नहीं सोच सकता? सो‍चते रहिए, पता चलेगा बैंक वाली लाईन में आपके पीछेवाले साहब आपको सोचता छोड़ आपसे आगे हो गए! या तरकारी वाला आपके चेहरे का खोया-खोयापन ताड़के झोला में तरकारी गिराते हुए दो सड़ा बैंगन गिरा दे? ऐसे में महानता का क्‍या तकाज़ा बनता है? घूमके उसके एक तमाचा जड़ि‍एगा, कि गांधीजी के माफिक मुस्कियाते हुए दूसरा खाली झोला आगे बढ़ाके कहिएगा- इसमें भी सड़ा डाल दो, भइया?..

भर गए ऐसी महानता से. कल महान नहीं थे लेकिन दिन इतना खराब नहीं था.. शाम को जलेबी भी खाए थे, जबकि आज चप्‍पल और शीशे का पता चलते ही मन ही एकदम-से उतर गया! जलेबी की तरफ देखने की भी इच्‍छा नहीं हुई. जलेबी की दुकान पर एक मैडम थीं उनको भी देखने की इच्‍छा नहीं हुई. फिर नोटपैड एक्‍साइटेडली कहती हैं कि मुंह बंद रखूं तो तुरन्‍त महान हो जाऊंगा? हद करती हैं, नोटपैडल जी, सबसे ज्‍यादा मुंह इस मुलुक का आदिवासी लोग बंद रखा है, कितना महान हुआ ऊ लोग, देख नहीं रही हैं? नहीं, नहीं, मुंह बंद रखनेवाले महानता में हमारा विश्‍वास नहीं है. आजकल सारी महानता तो टीवी पर बकर-बकर बोलके पाई जाती है.. जो टीवी पर नहीं पहुंचा उसका जैसे एक्‍ज़ि‍स्‍टेंसे नहीं है! तो जब टीवी पे जाके मुंहे न खोल सकेंगे तो ऐसी महनतई का करेंगे का? सर्टिफिकेट बनाके दीवाल पे टागेंगे, बात करती हैं!

सबसे ज्‍यादा गुस्‍सा रवीश पे आ रहा है! जवान तीन दिन बाद पत्रकारिता का बड़का अवार्ड पाने वाला है.. बदमाश से इतना तक कहते नहीं बना कि परमोद भइया, अपने बड़के के साथ आपो बास्‍ते महानता का एगो छोटका अवार्डी इंतज़ाम कै देंगे, मुंह मत गिराइए? ना, एक्‍को मर्तबा नै कहा.. हम यहां सुबह से छै पोस्‍ट चढ़ाके औ’ घरेलू प्रॉपर्टी चुरवा के बैठे हैं, और जवान का कहीं कोई पते नहीं है!

लंचब्रेक में प्रेमीद्वय के बीच कहासुनी..

मलयाली सुधा कुट्टी और बंगाली ओनिर्बन पालित दोनों एक ही दफ़्तर में काम करते थे.. इन दिनों एक-दूसरे पर भी कर रहे थे.. घर और अपनी पहचानी दुनियाओं से दूर अपरिचित-बेगाने शहर में इस नए काम के बनने.. और न बन पाने से अक्‍सरहा इन दिनों चिढ़े-चिढ़े से रहते थे.. ऐसे ही किन्‍हीं चिड़चिड़ाहटी क्षणों के बीच का एक कट..
ओनि- मेरा मोन नेंई क्‍या? खूब गुलो इच्‍छा.. मा खाली इच्‍छा निये किछु हॉय की? पाकिट में टाका-नोट का दोरकार!.. आमारो मोन हॉय छोबी-पिच्‍चेर जाने का.. तोमाय सोंगे निये जाबार मा कोरबो की बलो ना?..

सुधा- मेरे को कुच नई सुनने का.. तुमारा जो मेरजी केरो.. में कंप्‍लेन किया क्‍या?.. लेट मी हैभ माई लंच, प्‍लीज़?

ओनि- ऐई रोकोम कोथा बॉला जाय की? हामारा गोलती क्‍या, बोलो ने? हामको बी बड़ो गुलो इच्‍छा.. लेकिन हाम क्‍या पाइसा पैदा करेगा? सुदा, तुमि जानो ना? कतो टाका पाई आमि? कोथाय खरचो-टोरचो हॉय? आइसा कोथा-गुलो कोरके हामारा बीच आंढरस्‍टांडिंग की रोकोमे आशबे, बलो तो?

सुधा- ऐन्‍नोड बेंगालील समसारीकेंडा, चेत्ते (बंगाली में बात मत कर, हरामी!)!..

ओनि- की बलछो की?

सुधा- मेरे को मालूम नई! डेली वोई ट्राबल.. एक बी काम तुमसे टीक से होने का नईं.. आई एम स्‍सो मच्‍च टायर्ड!

ओनि- आमियो सुदो टायर्ड, सुदा? हामलोक को कोई सोलूशन खोजने का होगा किंतु?..

सुधा- तुम कोजो.. में कल से तेरा सात लांच नईं करने आती!..

महानता की चाह में..

शाहरुख़ महान नहीं लोकप्रिय है. पॉपुलर. पॉपुलर और महान में फ़र्क होता है. पॉपुलर पॉपुलर ही बने रहते हैं और महानता कहां से कहां उड़ जाती है. ग़लत.. बने भी नहीं रहते. पॉपुलर चार दिन की चांदनी है जबकि महान पूरी लाइफ़ का इंश्‍युरेंस है. उसके बाद का भी है. बाद वाले फेज़ में ही समाज महानता के गुण ज्‍यादा गाता है. जीते-जी महानता स्‍वीकारने में आनाकानी चलती रहती है. भाई लोग लंगी लगाते रहते हैं. एक ग्रुप कहता है महान हैं तो इम्मिडियेटली दूसरा ग्रुप विरोध में खड़ा होके हल्‍ला करने लगता है- परंपरा से पॉलिटिक्‍स खेलना बंद करो? महान आदमी के मर जाने के बाद ये सारे हल्‍लाख़ोर चुप हो जाते हैं. मन ही मन चुप न होते हों तो भी सार्वजनिक तौर पर शांत हो जाते हैं. कुछ नहीं भी होते हैं. मगर तब ये हल्‍लाख़ोर नहीं, लतख़ोर कहलाते हैं, और हर समाज में पाए जाते हैं, और इनका कुछ नहीं किया जा सकता. माने विमर्श की भाषा में नहीं, सिर्फ़ लात लगाकर ही इन्‍हें शांत किया जा सकता है.

लतख़ोरों की बात आते ही जाने क्‍यों मैं हमेशा एक्‍साइट होने लगता हूं. जबकि आज मैं एक्‍साइट किन्‍हीं अन्‍य वजहों से होना चाह रहा हूं.. सामने महानत्‍व का विषय है.. और विषय से एकदम सटा-खड़ा मैं हूं.. महान हो जाने के संबंध में विचार कर रहा हूं. अभी विचार कर रहा हूं, हो सकता है शाम तक हो भी जाऊं. फिर आपके पास कहने को रहेगा कि आपने महानता को निकट से देखा है. नहीं देखा है तो महसूस किया है. एक ही बात है!

महान होना पाप नहीं है. अपराध नहीं है. मुझे नहीं लगता मार्शेल प्रूस्‍त, योआन सेबास्तियन बाख़, नोबोकोव या कालिदास ने महान होकर कोई पाप किया. पाप किया होता तो पापी कहलाते, महान नहीं. पापी मेरे मामा हैं. महानता की चाह में गांव में स्‍कूल खोलना चाहते थे. मगर गांववालों से पहले मामी ने ही उनकी सारी योजना तेल कर दी, गांव भर में घर फूंकनेवाला, जल्‍लाद और पापी-पापी का हल्‍ला फैला दिया. मामा की महानता धरी रह गई, उनका ज़ि‍क्र उठते ही पापी-पापी की फुसफुसाहट शुरू हो जाती. मैं ऐसा टंटा नहीं चाहता. कि महानता की गड़ही में चाहना लेके उतरे और अंत हो गया पाप के पोखरे में. ना ना. मैं नीट और क्‍लीन महानता चाहता हूं. एटीएम के चमकते शीशे के दरवाज़े और गूगल के होम पेज जैसा साफ़. गांववालों को चाहता ही नहीं हूं. ऐसे चिरकुटों के नज़दीक रहने से कुछ का कुछ हो ही जाता है. गांव के गंदो दूर रहो! हरियाणा के निकट दिल्‍ली वाली महानता भी नहीं.. सीधे पैरिस और न्‍यूऑर्क वाली ही चाही जाए.. धड़ से न्‍यूऑर्क टाइम्‍स में हेडलाईन बनके छा जाऊं कि इनसे मिलिए, हमारे समय के एक और संशयात्‍मा- महात्‍मा! मैं भीड़ की तरफ हाथ हिलाता डायस पर पहुंचूंगा.. नीची नज़रों से गला खखारकर उपस्थित जनसमुद्र के बीच अपनी महानता के प्रभाव ताड़ूंगा.. और फिर धीमे-धीमे महीन व सधी हुई आवाज़ में अपनी महानता का रंग जमाना शुरू करुंगा.. जनसमुद्र मुझे सुनेगी और सुनती रह जाएगी. माने दंग रह जाएगी. मैं भी रह जाऊंगा. कि बैठे-बिठाये अंतत: मैं महान हो ही गया!..

आपको बात पच नहीं रही? क्‍यों नहीं पच रही.. कुछ गड़बड़ी है? वही होगी.. सीधे, फ़ीके और सामान्‍य होंगे इसीलिए घोंटने में दिक्‍कत हो रही है. ऐसे मूढ़जन महानता तो क्‍या, महानता के सपने देखने के औकात को भी प्राप्‍त नहीं होते. तेल-नून-तरकारी में ही फंसे रह जाते हैं.. महानता बगल में खड़ी थक-ऊबकर कहीं और किसी सच्‍चे गुणग्राही की खोज में निकल जाती है! आपको इतनी-सी बात समझ नहीं आ रही कि महानता प्राप्‍त होते ही कैसे आप तेल-नून-तरकारी के चक्र से बाहर निकल आएंगे? इतना सीधा फ़ायदा नहीं समझ में आ रहा?.. संभवत: नारद-टारद ओर रोज़-रोज़ के गारद से भी बाहर निकल आएं! आपको ऐसे मुक्‍त जीवन की चाह नहीं? कैसे आदमी हैं आप? या औरत? या जो कोई भी और?..

फालतू में दिमाग चाट गए. सुबह-सुबह. जबकि शाम तक मैं महानता प्राप्‍त कर लेने के फ़ि‍राक में था. अब लगता है एक दिन और इंतज़ार करना होगा! फ़ि‍लहाल सोच रहा हूं इस नामुराद महानता को प्राप्‍त करने के लिए सेटिंग कौन वाली खेली जाए! आपके दिमाग में कोई एक्‍साइटिंग आइडिया हो तो बताइएगा. जल्‍दी!

दौड़ती बारिश में एक टुकड़ा..



फिर जग गया दिन भर गई सड़क
निकल आए जगर-मगर लोग
भों-पें-घों का हल्‍ला उठातीं बेसुरा गातीं
बमबम हुईं बेदम करती गा‍ड़ि‍यां
कूदकर लांघ गया कोई गली सफल हुआ
एक औरत अचक्‍के चपेटे में आ गई
जाने सोच रही थी क्‍या गुमसुम
भाव तरकारी का मन का या भूल गई थी
बंद करना छाता खोयी हुई थी किसमें
एक कबूतर साइनबोर्ड की आड़ में भीगे पंख
झाड़ रहा था अपनी भटकन ताड़ रहा था
मन से कि तन से ज़रा भीगे हुए
नयी नौकरी के कुछ नए लड़के
पांयचे उठाकर हंस रहे थे, एक अदद
कटिंग चाय पीके बहक रहे थे

एक टुकड़ा दिन का फिर कटकर निकल
आया था. दौड़ती बारिश अभी-अभी
कुछ पल सांस लेने को थमी थी.

दिन न रात उलझी-सी बात..

चूहेराजजी को होश नहीं था कि हो-हो करके जो हंस रहे थे, अपने ही किये में फंस रहे थे! क्‍योंकि इधर उन्‍होंने हंसना किया और उधर गर्जना की निकल गई हवा! महक की पंखुड़ि‍यां टूंगते चूहेराज का फिर पता ही न चला कि गए किधर! कहीं तो गए ही होंगे मगर सुनील बाबा की आंखों से ओझल हो गए. गर्जना की हवा निकलने के साथ शैतान सुनील की गति भी गोते खाने लगी. बच्‍चू को बूझ नहीं रहा था कि आ रहे थे या जा रहे थे.. सारा जोड़-गुणा गड़बड़ा गया. सुनील के साथ-साथ बाइस्‍कोप भी सकपका गया था. बाइस्‍कोप के हिलने के साथ सूराख़ से सटी आंखें भी एकबारगी हिल गईं. नहीं हिलीं? ठीक है फिर.. एक बार ज़रा ढंग से देह-बदन हिला लीजिए, तब नए सिरे से सटाइए छेद में आंख और खोजिए अपने लल्‍लन-लुभावन हवालीन असुशील सुलीन लाल को! हां, हां, मालूम है हमने सुनील नहीं, सुलीन लिखा है.. मगर जान-बूझकर नहीं लिखा .. ऐसे ही ‘लिखा’ गया.. जैसे आपसे जाने कौन-कौन से काम ‘ऐसे ही’ हो जाते हैं.. होते रहते हैं.. जिसके बारे में सोच-समझकर पहले से आपने तय किया हुआ नहीं होता है.. नहीं? याद नहीं आया? याद कीजिए, याद कीजिए.. क्‍योंकि हम बताना शुरू करेंगे तो जाने कितनी बड़ी लिस्‍ट तैयार हो जाएगी.. जिसे देखकर आप ही नहीं आपका कुत्‍ता और कुत्‍ते के सड़कछाप दोस्‍त सब आपके लिए शर्मिंदा होंगे. छोड़ि‍ए, जाने दीजिए, आइए, सुनील बाबा की ख़बर लेते हैं..

वो रहे महाराज! मगर हैं कहां? ज़मीन में कि आसमान में? कि अंतरिक्ष के सुनसान में? कहना मुश्किल है.. कहने से ज्‍यादा समझना.. खुद सुनील की समझ में सबसे कम आ रहा है कि वह कौन-सी बला है जो उसकी ओर आ रहा है चला! चौकोर, भारी-भारी, भई भला यह चीज़ है क्‍या?.. किसी के पास दूरबीन है? ठीक है, ठीक है, चश्‍मा चढ़ाकर ही देखिए!..

अरे, यह तो किताब है, भाई! इत्‍ती-सी बात समझ में नहीं आ रही थी? मगर धरती-पाताल, जादुई टकसाल जो-जैसी भी ये जगह है यहां किताब कहां से आ गई? और आ ही गई है तो ऐसे पाजी की तरफ क्‍यों जा रही है जो हमेशा किताबों से दूर भागता रहा है? ज़रूर भेद की कोई बात है..

छोटे-छोटे भारी डेग भरती किताब कुमारी घबराये, सकुचाये सुनील कुमार के पास पहुंची तो जल्‍दी ही भेद खुला.. किताब रानी उदास थीं.. इसलिए कि अकेली थीं, कोई उनका पढ़वैया न था.. और सुनील बाबू भी उन्‍हें हाथ में लेने के ख़्याल से बहुत उत्‍साहित नहीं ही लग रहे थे. किताब मोटी जितनी भी हो, बुद्धू नहीं थी.. लुकाते-छिपाते भी सुनील का संकोच खुल ही गया.. और पहले से ही उतरा (कवर नहीं!) किताब का चेहरा और भी उतर गया!

किताब भागी-भागी गई और एक कोने कवर के भीतर अपना मुंह छिपाकर बैठ गई. धीमे-धीमे उदासी व दुख में घुले आंसू ढुलकाने लगी कि अच्‍छा ज़माना है! एक वक़्त था लोग मेरी एक नक़ल पर कितना दीनार लुटाते थे, मुझे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के पहले वज़ीर और सुलतान का दस्तख़त हासिल करना होता था!.. क्‍या ओहदा, कैसा रुतबा था मेरा?.. और आज.. आज तुम्‍हारे जैसा मामूली छोकरा तक मुझसे आंखें चुराता है! ऊपरवाला ऐसे बुरे दिन किसी को न दिखाए! सुबुक-सुबुक.. सुबुक-सुबुक..

अपने को मामूली छोकरा पुकारे जाने से हालांकि सुनील के दिल को ठेस पहुंची.. मगर मोटी किताब के आंसू बहता देख वह भावुक भी होने लगा.. टेलीविज़न पर जैसा उसने देखा था, उसी अंदाज़ में सुनील आगे बढ़कर किताब के आंसू पोंछ देना चाहता था.. लेकिन इसके पहले कि वह ऐसा कुछ करता, एक और ही अनहोनी हो गई..

(जारी..)

हिरदय से पुरनका परेम का परकास मेटाना असान काम है, जी?..

प्रेम परकास प्रियतमा बेबी कुमारी राय का सखी सकीना को पत्र..

हमरे मन की मलकिनी, प्‍यारी, दुलारी सकीना, कइसी हो, सखी? न खत, न कवनो खोदा-बंदगी, कवन बात है कि हमसे आंखी मोड़ ली हो?.. कवनो गलती हुआ, कि पिछलका चिट्ठी में हम कवनो ऊंच-नीच लिख लिये थे? गलती होइए गया था त माफ़ नै करोगी? ई कवनो इमली का गाछ का नीचे ढेला फेंक के इमली खाने वाला दिन नै न है, जी.. कि सकाली में हमरे व्‍योहार से तुम रुस जाओगी अउर संझा बेला हम दूनो जने मिट्ठी कै के लभली अउर अनितवा का संगे अंगना में डाक्दर-नरस खेलेंगे! अब त एक हाली कुच्‍छो छोटका टुंग-टांगों हो जाता है त ओकरो फरियाये में बीस दिन गये पोखरी में.. नै? अब मनु मौसिये का केस लो.. हाथ का एचमीटी घड़ी तनकी सा पानी पी के बन्‍न हुआ, अभिये ले बंदे पड़ा है! अपना शादी का बेर से सुन रहे हैं कि रिपेनरिन बास्‍ते सहर जाने का जोजना है, मनु मौसी का घड़ि‍या अब ठीक हुआ त तब ठीक हुआ.. मगर घरे सब जानता है कि ऊ घड़ी अब ई लैफ़ टैम में कब्‍बो ठीक नै होगा. आजकल केकरा काजे फुरसत है, सखी.. छौ साल का लइकियो का लग्‍गे फीता-रिबन का टैम नहीं है.. हाथ-गोड़ फेंकने लगती है! तब्‍ब? हम झुट्ठे थोड़े बोल रहे हैं? सब ओर भागाभागी मचा है.. त ई भागाभागी में तुहू हमको भूल जा त कवन ताजुब्‍ब!..

सच्‍ची बता सकिनिया, कवन बात है, रे? काहे मुंह में जोरन डालके चुपाये बइठी है, मुंहजार? कि मियां जी का नेह-दुराल में तोहरा मोहलते नई भेंटा रहा है! सच्‍ची बोलना, मुंहजार, नै त आके चइली-चइली पीटेंगे अउर सब तोहार मेंहदी वाला केस में आगी जार देंगे, तब बूझेगी, हां?..

कवन बात का एतना लम्‍मा खमोसी है, बोल ना रे! अइसन सारू खां हैं तोहरे नूर मुहम्‍मत कि हमरा खोजो-खबर नै ले रही हो? केतना जोड़ी चानी का पैजेब अउर झुमका बनवा दिये हैं खसम मियां कि जनम-जल्‍मांतर का सहेली को भुलाय गई हो? मगर ऊ भलमानस का कवनो कसूर नै है.. तूहिये हरमेसा की पुरुस-प‍रकिनी है.. जरा-सा नेह भेंटा गया त झट्ट देना फूलके लाल कोंहड़ा हो गई! झोंटा खोलके तेल-सैमू करने लगी.. अलता-लिस्‍टीक का लाली बहरियाने लगी, हम तेरा नस-नस पैचानती हूं, चोट्टी?

सकिनिया रे, मस्‍ती-मजाक एक कोना, अब एगो सीरियस बात है, सखी! मन का राज तोहरा आगे खोल रहे हैं, खोदा कसम केहियो से नै बोलोगी! अपने मियां जीओ से नै, हां, तोके हमरी कसम?..

बात ई है कि सकाली-सकाली टूब बैल पे हम कपड़ा-लत्‍ता धो रहे थे कि जाने कहां से ई चहुंप गए! अरे, हमरे ऊ नै, न बुड़बक.. परेम परकसवा, रे? अब हमको का मालूम कि बम्‍मास गांवे में लुकाया हुआ था अउर अकेले में हमको घेरे का मवका देख रहा था! बड़ नीच इरादा से हमरे काजे आया था, हम अड़ देखे न तड़, नजीके में एगो चइली पड़ा था, खींचके मारे मुंहजार को! तब्‍बो बेसरम बाज नै आया अउर फुरफुस-फुरफुस जाने कौ-कौची बोलते गया.. हम डेरा के मनु मौसी का हल्‍ला किये तब कहीं ले ऊ चोट्टा भागा!

भागे-भागे हम्‍मो घरे आए मगर मम्‍मी जी से का बोलते? बात का कवनो लीकेज होता त मौसी जी अउर मम्‍मीजी हमहीं को लेच्‍चर पिलातीं! रात में खायो का भी मन नै किया.. अकेले में चुप्‍पे चदरी ताने जाने पोराना दिन का यादी का सब सिलेमा देखते रहे.. का मालूम परकास को चइली मारके ठीक किये कि गलत.. ऊ बेचारा का कवन कसूर? हो सकता है अबहीं तलक हमरा से परेम करता हो? हिरदय से पुरनका परेम का परकास मेटाना कवनो असान काम है, जी?..

हम सही किये कि गलत, तू ही फैसला बोल, सखी!

तुमरे जलम-जलम की सहेली,
बेबी कुमारी राय

Wednesday, July 11, 2007

लंगीवाले का गीत..



घोड़े पे चढ़ गाड़ी में आ
लंगी वाले लंगी लगा
कुछ लूट ले थोड़ी फूंक ले
फिर इसको दे उसको सुना
मां-बहन और क्‍या..
रोतों को और रुला
हारों का दुख कर हरा
लंगी वाले लंगी लगा..

बच्‍चों के बस्‍ते गोल कर
दोस्‍तों का तू मोल कर
खिड़की पर पेशाब कर
मेरी सुबह खराब कर
झूल जा मस्‍त रह
दे झन्‍नाटा एक हाथ घुमा
हंसते-हंसते दस लात जमा
लंगी वाले लंगी लगा..

सूने गर्दी में रंग जमाने आ जा
पिटे हुओं का फिर पीट ले
रंग दे बजा जा थोड़ा बाजा
सब तेरा नाम सुनायेंगे
जाने के बाद भी गाएंगे
पुलिस करेगी घंटा
बस अपना होगा टंटा
गुटका खा धन्‍य रह
कर जीना सबका हराम
धांय कर सबको टांय कर
जो बचते हैं
उनको तलवार पे उठा
लंगी वाले लंगी लगा..

शैतान का नाना और भूखा चूहा दीवाना..

आप चाहें तो अपनी पसंद अनुरूप श्‍वेताभ, व्‍योमकेश, रूद्रांशु जैसा तत्‍सम, आज के वक़्त का कोई फ़ैशनेबल नाम दे लें, मगर बच्‍चे का अपने लिए जो नाम था वह बड़ा सीधा-सादा था.. सुनील था. हालांकि वैसा वह था नहीं. न सीधा-सादा, न सुशील. पक्‍का शैतान था. शैतान का नाना था. शैतान का और-और जो भी हो सकता था वह सभी था. उससे भी कहीं ऊपर था. इसलिए फ़ि‍लहाल नीचे जा रहा था! ऐसा बच्‍चा ऊपर कहां जाएगा, नीचे ही जा सकता है ना?.. अब यह मत पूछिए नीचे कहा? ज़रा उलझी कहानी है.. नीचे गए हुए की नीचता, निचाई की कोई थाह है भला? फिर भी आइए, हम उस थाह में डंडी डालकर हिंड़ोरते हैं.. बाइस्‍कोप के गोल सूराख़ से सुनील-लीला के क़ि‍ले के अंदर का कारोबार देखते हैं..

बाइस्‍कोप के अंदर अंधेरे में क्‍या?.. हाथी.. खूउउउउब बड़ा!.. हाथी के दांत नहीं थे.. दिखाने को भी नहीं थे, और न छुपाने को सूंड़ था. दिख कुछ नहीं रहा था सिर्फ़ सुनाई पड़ रही थी.. समूचे क़ि‍ले को हिला देनेवाली एक चिंघाड़, गर्जना! सुनील न दिखते हाथी पर नहीं, सिर्फ़ सुने-जा-सकते गर्जना पर सवार होकर नीचे उतर रहा था. कह नहीं सकते कितना डरा हुआ था.. कि अंदर तक भरा-भरा हुआ था?.. मगर जो भी था उतर रहा था.. और इस ‘जो’ के साथ-साथ सुनील..

नीचे सिटी गार्डेन था? फुलों की कोई बग़ि‍या थी? क्‍या मालूम क्‍या था.. और वह ‘क्‍या’ इतना नीचे था कि फ़ि‍लहाल दिख नहीं रहा था! अलबत्‍ता महक आ रही थी.. खूब गमकवाली, मदहोश करती महक.. और इतनी ज्‍यादा थी कि तय करना मुश्किल कि उसे ‘सुगंध’ कहें कि ‘कुगंध’! कुगंध कह सकते हैं? आजतक तो कभी किसी को कहते सुना नहीं.. मगर आजतक जो नहीं सुना उसे आगे कभी नहीं सुनेंगे, ऐसा कोई नियम है? नियमवाली किताब में कहीं लिखा है? फिर सच पूछा जाए तो सुनील ने तो कभी किसी के मुंह से ‘सुगंध’ निकलता भी नहीं सुना..

किसी के मुंह से नहीं सुना, हवा में सूंघा बहुत दफ़े है!

उतरता गया नीचे.. नीचे.. नीचे.. बहुअअअत नीचे!.. रास्‍ते में एक कुम्‍हलाया हुआ चूहा दिखा. धीमे-धीमे बेमन महक की पंखुड़ि‍यां कुतरता हुआ भूख मार रहा था. टाईम मारने के टेलीविज़न या वीडियो गेम जैसे इंतज़ाम उसके पास नहीं थे. इसके पहले कि सुनील उसे देखता, चूहे ने ही सुनील को देख लिया, और ऐसी नज़रों से देखा, कि देखो, कैसा बुरा वक़्त आ गया है, कि पंखुड़ि‍यों को कुतर-कुतर कर भूख मार रहा हूं.. ज़ि‍न्‍दगी गुज़ार रहा हूं? मगर सुनील, जैसा पहले ही कहा गया, पाजी था; चूहे को सहानुभूति वाली नज़रों से देखने की जगह उसने उसे घिन्‍न में नाक-भौं सिकोड़ने वाली नज़र से देखा.. फिर भोलेपन से बात निकाली- मुझे सुशील समझने की गलती मत करना, मैं सुनील हूं!..

बदले में चूहे ने भी नथुने व मूंछें सिकोड़ी और जवाब में कहा- तुम जो भी हो, बड़े बद्तमीज़ हो.. इतनी गर्जना के साथ उतर रहे हो कि दिन भर की हवा प्रदूषित हो गई!

सुनील ने मासूम होकर जवाब दिया- गर्जना इतनी न होती तो मैं इतने नीचे न आ पाता और तुमसे मुलाकात न हो पाती..

चूहे ने इस पर गौर किया. फिर कहा- ऐसा? अच्‍छा तब ये बताओ, हमारी मुलाकात से ऐसा कौन कमाल हो गया?..

चूहे की बेवक़ूफी की बात सुनील ने पहले सुनी नहीं थी, मगर अब ताज़ा-ताज़ा अपनी आंखों के आगे देख रहा था. बेवक़ूफी का ऐसा प्रत्‍यक्ष प्रमाण पाकर वह हंसने लगा.. उसकी देखादेखी चूहे ने भी हंसने की कोशिश की.. मगर हंसी की जगह उसके मुंह से कुछ अजीब-सी आवाज़ निकली.. जिसे सुनकर भय में सिर्फ़ चूहा ही नहीं, सुनील भी चुप हो गया.. फिर राज़दारी में सिर से सिर सटाकर सुनील ने चूहे को एक पते की बात बताई- अब तक तुम्‍हारी दुनिया में क्‍या था? थोड़ी हवा थी, महक की पंखुड़ि‍यां थीं और एक अकेले तुम थे! अब देखो, मैं भी चला आया हूं और तुम्‍हारी दुनिया बड़ी हो गई है!..

चूहे ने अपना थूथन सुनील के सिर से अलग किया, और ताजुब्‍ब में भरकर कहा- तुम्‍हारे चले आने से दुनिया बड़ी हो जाती है?..

अबकी मर्तबा सोच-सोचकर बेवक़ूफ बनने की बारी सुनील बाबा की थी.. और चूहेराज जो थे हो-हो करके हंस रहे थे!..

(क़ि‍स्‍सा खत्‍म नहीं हुआ है.. यह तो महज़ टीज़र था..)