Sunday, October 21, 2007

जे जोन प्रेमेर भाब जाने ना, तार सोंगे की लेना-देना..

कुछ और नहीं तो आपने 'घरौंदा' फ़ि‍ल्‍म का वह गाना तो सुना ही होगा, 'तुम्‍हें हो ना हो, हमको तो, इतना यकीं है, हमें प्‍यार, तुमसे नहीं है, नहीं है..' मन में मीठी टीस उठाती किसके बारे में सोचते हुए सुना था? ख़ैर, मीठी टीस और जाने क्‍या-क्‍या जगानेवाली इन रुना लैला को कल हमने साक्षात सुना. धन्‍य हुए. काला ब्‍लाऊज और भारी काली साड़ी में भारी चकमक का काम सहेजते हुए रुना थक रही थीं.. देखते हुए हमारा दिल टूट रहा था कि देखो, उम्र ने कैसा भारी बना दिया है! (हमको नहीं बनाया है? मगर उससे तबियत के महीन हल्‍केपन कोई छिन गए हैं?).. रुना के भी नहीं छिने हैं.. स्‍वर की मिठास और लोच देह के दु:ख भुलवाकर जल्‍दी ही मीठी तीर छोड़ने लगती है. कल रात ज़हर घुले ऐसे ढेरों मीठे तीर छुटते रहे, मैं रिसीव कर-करके घायल होता रहा. सिरी फोर्ट के मुख्‍य सभागार के ठंसे हॉल में काफी बूढ़े थे जो इन तीरों के असर में लचकीले होते रहे. जवान अकेला शायद मैं ही था.

इंडियन वीमेंस प्रेस कोर्प्‍स और आईसीसीआर के सौजन्‍य से आयोजित इस संध्‍या में बांग्‍लादेश से रुना, पाकिस्‍तान से ताहिरा सैयद, और अपने यहां से रीता गांगुली की तिकड़ी गा रही थी. सबसे पहले ताहिरा, तीन कुशन्‍स पर शराफ़त से माईक के सामने बैठीं, शराफ़त से कुछ कम तो कुछ अच्‍छा मीठा-मीठा गाती रहीं. उनके बाद फिरोजी छटा में खूब बनी-ठनी रीता आईं तो 'गगरी उतार..' का ऊंचा गुहार लगाती ऑडियेंस के साथ संबंध बनाने की एक कोशिश की उन्‍होंने. आखिर में तामे-झामेवाले ऑर्केस्‍ट्रल इंट्रोडक्‍शन के साथ रुना आईं और आते ही कुल्‍हे पर थाप लगाती स्‍टेज पर टहलने लगीं, मंच से उतरकर अपने साथ नाचने के लिए किसी लड़की को मंच पर लिवा ले गईं. जितना सपरता रहा, दर्शकदीर्घा में एनर्जी इंन्‍फ़्यूज़ करने की कोशिश करती रहीं, लेकिन 'दमादम मस्‍त कलन्‍दर..' की बार-बार गुहार लगानेवाले चिरकुट जोश से ताली बजाने में फेल होते हुए अपनी रुना का दिल तोड़ते रहे.. अभी कार्यक्रम खत्‍म भी नहीं हुआ था और भाईलोग भेड़ों की मानिन्‍द एक्जि़ट की ओर ऐसे लपके मानो स्‍कूल की छुटटी का घंटा बज गया हो! हद है. किस चीज़ में हम कभी सभ्‍य होंगे? एक सीधा-सादा म्‍यूज़ि‍कल शो तक सीधे-सादे तरीके से देखने की हमें तमीज़ नहीं? किस तरह की सभ्‍यता हैं हम? सिर्फ़ चिकन के कुर्ते और जवाहर कट जैकेट की रंगीनियां सजाना सीख लिया है? महफ़ि‍ल में बैठने की तो नहीं ही सीखी है..

रुना, तुम बुरा मत मानना. मैं अभी भी तुम्‍हारे इश्‍क में घायल हूं. अगली बार हिन्‍दुस्‍तान आओगी तो इसी तरह पलक-पांवड़े बिछा तुम्‍हारी राह तकता बैठा मिलूंगा..

Saturday, October 20, 2007

पुराने यार से दुलार..

बालु प्‍यारे, दोस्‍त दुलारे. मिले और देखो, पहचान नहीं पाये. मैं भी मुंह पर हाथ डाले बैठा रहा सकुचाया, शरमाया. उमर हो रही है अब क्‍या किया जाये, दोस्‍त. बाल पक रहे हैं, देह फूल रही है, सीढ़ि‍यों को देखकर कांपने-हांफने लगते हैं. फिर हाथ का बोझा देखकर तुम हंसने लगे कि अबे, तुम अब भी पढ़ते हो? समय, समाज और अपने अभिशाप को मैंने मुंह के बल गिरा लिया, बचाकर झोला ओढ़ा दिया. बोला, तुम पियो दारु, चहको, रहो मस्‍त, हम इसी भवुकई में रहेंगे. आईंदा फिर मिलना हुआ तो तुम रुककर नज़दीक मत आना, हम पटरी पर कुछ खोजते-सहेजते रहेंगे, तुम पीठ पीछे गाड़ी से बिन-पहचाने निकल जाना.

बालु ने मुंह घुमा लिया, यार, मज़ा नहीं है, ईएमआई में अटक गए हैं! तुम यकीन नहीं करोगे सात साल हो गए किन्‍नी से मिले. ऐसा भी नहीं कि वही भागी चली आई मगर शर्म लगती है किसलिए साला इतना घुल रहे हैं! यही पाने के लिए घिस रहे हैं इतना भूल रहे हैं? मैंने कहा, कोई ऑरिजनल नहीं बता रहे हो, बहुत सुन रक्‍खी हैं ऐसी ही कहानियां पहले भी, छोड़ो हटाओ. क्‍यों नहीं ऐसा करते गुरु, कि सब ताक पर रखकर, इसके पहले कि सर्दियां शुरू हों, हफ़्ते भर को पहाड़ पर निकल जायें? संगत रहेगी, बहुत मज़ा रहेगा, बालु? हांफते हुए ऊंचाइयां नापें, लकड़ी के चूल्‍हे पर आलू पकायें, तुम अपने किस्‍से सुनाओ, बताओ?

अबकी बालु एकदम चुप हो गया, फिर कुछ ज़्यादा ही हंसने लगा. मैं सिर झुकाये अपने भावुक उत्‍साह पर लजा रहा था, और बालु दरअसल बिला-वजह बहुत ज़्यादा घबरा रहा था..

दिल्‍ली के अंधेरे..

नहीं छूट पाता चार हाथ के अपने दायरों से. रहता हूं उसी में गुड़ा-मुड़ा. रेजगारी, गोल्‍ड फ्लैक की डंडी और चिरकुट चिंताओं के साथ. कसमसाता, बसाइन-बसाइन. अलबत् मन छूटकर भागता रहता है पहाड़ों के पार, पराये गांवों के परायी ज़बानों के बीच. दृश्‍यावलियां कितनी पहचानी हैं. देखी फ़ि‍ल्‍मों में सब बार-बार, अपनी जानी हैं. रजत पर्दे से छिपी रह गई थी जो दु:ख की नदी कसैली, वनैली वह जार-जार धुंआधार फ़्रेम पर फैलने लगती है. छुप जाता है सिनेमा बचे रहते हैं ज़लालत के चोट खाये चेहरे. गरीबी, अपमान के अंधेरे कैदख़ाने. दिल्‍ली का फ़रेब, बर्बरता और राजनीति की अंधी दुनिया.

(संजय काक की कश्‍मीर पर डॉक्‍यूमेंट्री 'जश्‍न-ए-आज़ादी' देखकर)

Thursday, October 18, 2007

कोई दूर से आवाज़ दे..

भोर की साफ हवा. कंटीला ठंडापन. देह के पोर-पोर खुल रहे हैं. साथ ही सिकुड़ रहे हैं. ऐसे में बाहर क्‍यों निकला हूं इसका अपने पास जवाब नहीं. शायद उस बड़ी, सियाह चील के असर में जो भारी पंखों से हवा को एक रिद्मिक अंदाज़ में काटती सिर पर मंडरा रही है? उसके पंखों से हवा का 'साक्! साक्!' कटना कानों में पड़ रहा है.. या कि सिर्फ़ मेरा वहम है. आवाज़ जो है पंखों की नहीं, भोर की हवा की है. आसमान में एक धुंधला नीला खालीपन है, कोई चील नहीं है. दरअसल सुबह की इस सुहानी हवा को फेफड़ों में उतारता मैं भी बाहर नहीं हूं. जहां हूं इट्स समव्‍हेयर एल्‍स! फिर सिर के ऊपर मंडराती चील? मेरे अंतर्मन में महज एक छवि है? सुबह की स्‍वच्‍छता में? क्‍यों है?..

किसी मेले में नहीं भटका. किसी भंवर में नहीं फंसा जहां से निकलना असम्‍भव हो रहा है. न कोई पीछे जान पर टूटा पीछा कर रहा है, और पैर में भारी पत्‍थर बंधे हैं कि एक-एक कदम भारी पड़ रहा है, और पीछा करनेवाले की दूरी पल-पल कम हुई जा रही है! सीधे माथे पर साक्! साक्! की सेंसुअस, सिडक्टिव आवाज़ निकालता चील.. बिम्‍ब ज़ाहिर क्‍या करना चाहता है.. कि मैं चिंथे जाने को प्रस्‍तुत हूं? सो सिंपल? रैश एंड स्‍ट्रेट? आई एम स्‍टन्‍न्‍ड. सहमकर पैर के खुरदुरे नाखुन टटोलता हूं. बांह के रोयें और गरदन के बाल छूकर देखता हूं, कोई ज़ख्‍म नहीं है. आंखें भी देख रही हैं, सुरक्षित हैं. पैर में चप्‍पल है (उंगलियों के किनारे गर्द में काले भले पड़ गए हों, शीत में अकड़े नहीं), सेलफ़ोन भी जेब में साबूत है और काम कर रहा है. एक रिक्‍शावाला नींद के अकड़ेपन में कसमसाकर जग गया है. एक आदमी पूजा के फूल इकट्ठा करने बाहर निकला है. एक कुत्‍ता देह झाड़कर मुस्‍तैदी से दिन के लिए तैयार हो रहा है, लेकिन मैं आश्‍वस्‍त नहीं हो पा रहा हूं. अवचेतन में साक्! साक्! के स्‍वर गूंजते रहते हैं. किसी लूप की तरह रिपीटेडली घूमते रहते हैं.

मेरा नाम शाहिद कपूर नहीं, न रामगोपाल वर्मा की फ़ैक्‍टरी की तरह मेरी फ़ि‍ल्‍में हैं जो फ्लॉप हो रही हैं. न मनमोहन की तरह मुझे किसी बुश को जवाब देने की मजबूरी है. मैं वही हूं जो सालभर पहले था, अभी दो दिन पहले तक था, फिर साक्! साक्! के इस लूप के लपेटे क्‍यों..

Wednesday, October 17, 2007

व्‍हॉट इज़ टू बी डन?..

सुबह की चमकीली धूप में ठेले पर सिगरेट खरीद रहा हूं. ट्रांजिस्‍टर पर आशा भोंसले 'सैंया ना थामो बैंया' गा रही है. विनती के शब्‍दों की आड़ में मादक अदायें पिच कर रही है. लेकिन सैंयाजी बैंया थामे हुए हैं, न छोड़ रहे हैं न आगे बढ़ रहे हैं; शायद भूल गए हैं. क्‍योंकि आशाजी पुनि:-पुनि: उसी टेक पर लौट रही हैं. अलबत्‍ता बगल में बरमुडा धारे एक नौजवान बच्‍चा अपने मोटर-मैकेनिक से जिरह करते हुए बहुत प्रसन्‍न नहीं दिख रहा. माने सैंया-बैंया वाले श्रृंगारी भाव उसके मन को नहलाने में असमर्थ रहे हैं. मतलब गाना और माहौल एक-दूसरे को अथॉंटिकेट नहीं कर रहे. कोई बैंया लहर-लहरकर सामने आती होती, तो मैं भी उसे एक ओर ठेलकर कहता- जरा सांस लेने दो, सजनप्रिया, अपने जलवे किसी और वक़्त के लिए रखो!

दिल्‍ली में दिन बीत रहे हैं. महीने के ऊपर अब ये घलुआ बीत रहे हैं. माथे में कुछ विचार थे कि राजधानी में रहते हुए यह-यह सब करना होगा. वह सब कुछ नहीं हुआ. और जो हो रहा है उसके बारे में बहुत साफ़ नहीं हूं कि हो क्‍या रहा है. कुछेक दिनों में ठंड बढ़ेगी तो शायद मेरे मुंह और दिमाग का अंड-बंड भी बढ़े. लक्षण वैसे ही हैं. अच्‍छे नहीं हैं. कभी-कभी चमकीली धूप और आशा भोंसले की लड़ि‍याहटों से ज़्यादा खुद से घबराहट होती है. किताबें और बेचैनियां बढ़ाने से अलग, मैं सुलझाता क्‍या हूं? फ़ि‍क्सर क्‍यों नहीं हो पाता. एक से एक तो हैं राजधानी में, तो मैं क्‍यों नहीं हो पाता?

कविवर बोधिवर ने इत्तिला किया है कि आज उनके सुधड़ सुपुत्र, बाबू अभय तिवारी और पूजेय-अजेय दूधनाथ सिंह का जन्‍मदिन है. तीनों को हमारी भी शुभकामनाएं. हमारी बीए की हिंदी कक्षाओं में कुछ रंग सफेद चमकते कुर्ते-पैजामे में दूधनाथजी की तरफ से भी आता रहा. अब कभी-क‍भी पत्रिकाओं के फ़ोटू में वे दिखते हैं तो सफेद चमकती दाढ़ी में दिखते हैं. मुझसे और छात्र होंगे, उनकी शुरुआती कहानियों के पाठक होंगे, सबकी ओर से उनके स्‍वास्‍थ्‍य व दीर्घायु की कामना. मानस बच्‍चा है और अभय बाबू तो दीर्घायु के पराक्रमी रथ पर चढ़ ही चुके हैं. दिल्‍ली की दीवारों पर 'तीन दिन तक लगातार खांसी आए तो टीबी की जांच करायें!' जैसे विज्ञापनों के बगल से रिक्‍शा गुजरता था, और उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती थी. 'इफ़ यू आर सफरिंग फ्रॉम ऑवरवेट देन प्‍लीज़ काल सच एंड सच नम्‍बर..' जैसा विज्ञापन दिखने पर वह मेरी ओर देखकर मुस्‍कराने लगते थे. मैं, कातरता में, क्‍या देखूं क्‍या अनदेखा कर जाऊं गाने लगता था!

जन्‍मदिन की बात उठने पर अपने साथ तो कम से कम अब यही होता है: सेलिब्रेटरी मोड में जाने की सूझती नहीं. रीवर्स में अटके दु:खी होते रहते हैं कि देखो, एक साल और गया! इस बीच मेरा सिगरेट चुक गया है, आशा भोंसले की सैंयावाली प्रार्थना नहीं चुकी है. इच्‍छा हो रही है घुमाकर एक हाथ लगाऊं. हालांकि मौसम अच्‍छा है, फिर पराये शहर में हूं और सड़क पर दो पुलिसवाले वैन रोककर चाय पी रहे हैं.. फिर भी.. यू गॉट एनी सजे़शन?

Tuesday, October 16, 2007

पैसा..

देखता हूं रोज मोटे शीशों और रंगीन
फाइबर में सजी गाड़ि‍यों के ऊपर से
गुजरती, अपोलो अस्‍पताल, एयरपोर्ट
और होटेल लाउंज में, और तो और
बीच सड़क बार-बार चौबीस गुना सात

इतना भोला नहीं हूं, जानता हूं किस
चिड़ि‍या का नाम है पैसा
हाथ से छूकर उसके मुलायम
पंख कभी देखे नहीं मगर जिया है
कैसे गप् निगल लेती है, चींथकर खत्‍म
कर देती है आत्‍मा, चुग चुकी जीवन
का सारा प्रेम, बिचारे हारे, हकलाये
हंसते है हाथ हिलाते हैं मगर देखिए,
सीधे मुंह बात तक नहीं करती..
टेढ़े भी कहां करती है?
उम्‍मीद की एक नल टप्-टप् चूती है

समूचा पूरा दिन अगोरते हैं
अकबकाये चिरौरी करते हैं
रतजगा करके लेकिन हाय
हाथ कहां आती है
एक पंख तक नहीं गिरता!
गिरे हमीं रहते हैं

बेहया फिर भी हारते कहां हैं
कभी दायें टेक लेते हैं
कभी बायें. सर्द रातों में नंगे पैर
भागे आंगन में आकर देखते हैं
काले आसमान में किधर उड़ रही है चिड़ि‍या

पहाड़ों के ऊपर धुंआ छोड़ती जाती है
शहर के चौक में बजवाती है नगाड़े
चिड़ि‍या, मस्‍त बच्‍चे चिंहुकते पूछते
है क्‍या बला. अमरीका कि जापान
हवा और पानी की खुराक
पर कोई कराहता हिन्‍दुस्‍तान.

Monday, October 15, 2007

सोचो तो..



सोचो तो तारों भरी रात है
उम्‍मीद है, सपना है
तुम दिल के इकदम
करीब हो, मैं हमदम हूं
तुम्‍हारा अजीज़, अपना हूं

सोचो तो कितनी बातें हैं
क़ि‍स्‍सोंभरी हज़ार रातें हैं
सुनहले दिन की सजीली पगडंडियां हैं
अधूरी-अधछूटी यात्राओं का रोमांच है
शर्मीली शामों की उमगती बेचैनियां हैं
पैरों से गुजरती इक मीठी का चुप्‍प बहना
कोई गाना पहले कभी सुना नहीं फिर भी
मन उमेंठता जैसे सगा पुराना, पहचाना

सोचो तो सब कैसी मासूम मामूली हसरतें हैं
कि मैं चन्‍द समझदार पंक्तियां लिख सकूं और
तुम समझदारी के तरतीब में उन्‍हें समझ सको
शर्म हो तो मेरा ही न हो, तुम्‍हें भी तोड़ जाये
मुसकराओ तो मैं भी तुम्‍हारे साथ खुलकर हंस सकूं.

सोचो तो समूची ज़िंदगी की ज़ि‍ल्‍लत है
रोज़, हर रोज़ की बात है. सोचो तो
पास कोई नहीं, सब सूना, इक लम्‍बी सियाह
रात है. या फिर सोचो तो हथेली पर नर्म
घास है, लूट के इस बंजर वक़्त में तुम्‍हारी
आत्‍मा में हम सबकी उम्‍मीदों का भाप है.

Sunday, October 14, 2007

मेरी ठसक, सामाजिक सन्‍नता.. व ईद के मुबारक़बाद..

इन अनूप शुक्‍ला का आखिर क्‍या किया जाये (बंगलॉनुमा उनका मकान व धान के खेत का नहीं, वह तो मैं सहर्ष किसी भी क्षण हड़पने को प्रस्‍तुत हूं ही..)? इस घड़ी-घड़ी फ़ोनियाते मस्तियाये शख्‍स का क्‍या किया जाये जो हंसते-हंसते अचानक एक मामूली सच्‍चाई से रूबरू होने पर एकाएक सन्‍न हो जाता है. फिर सन्‍न ही बना रहता है? सोचते-सोचते मैं बीच में थक जाता हूं हिन्‍दी की ऐसी बेचारी-हारी कल्‍पनाशीलताओं से. होगा क्‍या. जाएगी कहां हिन्‍दी? क्‍या उखड़ेगा? ऐसे आप फिर धान ही उखाड़ते रहिये, बाकी क्‍या उखा‍ड़ि‍येगा. हद है! ओह. एनीवे, जैसाकि मेरे साथ अमूमन होता है, मैं गंभीर बात कर रहा था, और जैसाकि अनूप के साथ है, गंभीर बात सुनते ही उनके हंसी छूटने लगी. बेबात हंस रहे थे, और मैं वयस्‍क अपरिपक्‍वता के ऐसे साक्षात से जेनुइनली डिप्रेस हो रहा था, झींककर गंभीरता के अपने मानकों से ज़रा नीचे उतर आया, रोज़मर्रा के मामूलीपने में घुसा ही था, माने अपनी उम्र की सच्‍चाई और अभय के फरेब की पोल-पट्टी का ज़ि‍क्र किया ही था कि अनूप सन्‍न रह गए. सारी हंसी उड़ गई. हकलाते हुए फिसलने लगे कि हमारी श्रीमतीजी तो अभय को पच्‍चीस का सर्टिफिकेट दे चुकी हैं? दीखा होगा तभी दी हैं, हमारी श्रीमतीजी से चूक नहीं होती! मैंने चिढ़कर कहा चूक नहीं होती जभी तो आप-सा गुणगणेश गणरत्‍न प्राप्‍त की हैं? बाबू अनूप, अभय हों पच्‍चीस कि उन्‍नीस, मुझसे आप ये नोट करा लो कि मैं उससे तीन साल छोटा हूं, और वह आपको और आपकी श्रीमतीजी को जवान दिखता है तो मैं कम हसीन नहीं दिखता होऊंगा! और दिखने में कोई कसर रह जा रही है तो दोष मुझमें नहीं आपकी दृष्टि में है, और अभय, अपने, व श्रीमतीजी के बाल रंगने के साथ-साथ जेनुइन रंगीनी देखनेवाली दृष्टि पाइए पहले!

अनूप सन्‍न बने रहे. मैंने ऊबकर फ़ोन रख दिया. ऐसे आदमी से कोई क्‍या बात करे. करे क्‍या?.. खामखा बैठे-बिठाये संडे खराब कर दिया. माने अभी दिन और पूरी शाम बची हुई है, मगर आसपास जैसे एक से एक प्रतिभाशास्‍त्री बने हुए हैं, आगे संडे के सत्‍यानाश को मैं आखिर क्‍या खाके रोक लेनेवाला हूं? रूका हुआ आदमी हूं नहीं ही रोक सकूंगा.

अब इसी को लीजिए, मैं ठहरा हुआ देखता रह गया, और माथे से एक-एक करके सांय-धांय समूचा एक महीना निकल गया! राजधानी में न दो कौड़ी का कोई रोज़ग़ार ढूंढ सका हूं, न ऐसा कोई ठौर जहां कोई रूपसी गोद में मेरा पैर लेकर दाबते हुए अपना जीवन साथर्क करे! अपने को जो मेरा मित्र बताते थे, वे मेरी मौजूदगी के तनाव में घबराकर अपना फोन फेंक दे रहे हैं, कि अचानक सामने पड़ने पर कह सकें कि अरे, भैया, फोनवे हेरा गया तो का करते? नंबरे नै था जो आपको कंटैक्‍ट करते!..

बुझइछि, बुझइछि, हमरा आगै कथा-काहिनी नै पेलतौ, हां? ससुर बात करते हैं फोन हेरा गया था! अबे, आपै काहेला नै हेरा गए, आं?..


ठेकुआ, पूड़ी-दही वाली सारी दोस्तियां दो कौड़ी की साबित हुईं. किसी ने गर्दन तो क्‍या, कुर्सी के हत्‍थे पर भी ज़्यादा वक़्त हाथ धरने नहीं दिया. या तो बेबात खीं-खीं हंसते रहे, और मौका लगते ही गलत बस में चढ़के अंतर्ध्‍यान हो गए (फ़ोन तो पहले से फेंका हुआ था ही!).. दिल्‍ली की ठंड शामें मैं ऐसी ही दोस्तियों की सोचता गर्मी जगाकर अंचिया रहा हूं.

प्रत्‍यक्षा दोस्‍त नहीं थी, लेकिन अपने वॉशिंग मशीन और बेटे के बाथरूम के इस्‍तेमाल की अनुमति देकर उसने होने से पहले मुझे किया. सन्‍न. बालकनी पर कपड़े सुखाते हुए उसकी साहित्यिक निधि का निरीक्षण करते हुए भी मैं सन्‍न ही होता रहा. अलबत्‍ता अपने साहित्यिक अनुराग का परिचय देते हुए जब वह अपने पठन-पाठन का विवरण देने लगी तो मैं बाथरूम-ऋण के बावजूद लड़ाई की मुद्रा में आने से स्‍वयं को रोक न सका- इतनी कथा-कहानी पढ़ती हो, क्‍यों पढ़ती हो? पढ़ो तो सिर्फ़ श्रेष्‍ठ साहित्‍य पढ़ो! प्रत्‍यक्षा ने आपत्ति की कि कहां क्‍या लिखा जा रहा है देखेंगे-जानेंगे नहीं तो पता कैसे चलेगा खुद क्‍या-कैसा लिख रहे हैं! मैंने हुंकारती आवाज़ में जवाब दिया- बित्‍ते भर की छोटी-सी ज़िंदगी है, सिर्फ़ श्रेष्‍ठ पढ़ो, श्रेष्‍ठ! उससे मन उकता जाये तो मेरा लिखा पढ़ो!

मेरा जवाब सुनकर प्रत्‍यक्षा सन्‍न रह गई. मैं इतमिनान से चाय की चुस्‍की लेता रहा. बीच-बीच में घड़ी देखता कि कोई मियां मित्र ईद की सेवइयों के लिए जाने कब बुलव्‍वा भेज दे. अभी तक नहीं भेजा है. मगर मन ही मन मुबारक़बाद, मुबारक़बाद बुदबुदाता मैं अभी भी उम्‍मीदबर हूं! आप बुलवा रहे हैं, कि खामखा मेरी गर्मी बढ़वा रहे हैं?..

Friday, October 12, 2007

हिन्‍दुस्‍तान से होकर गुज़रना नोबेल के तीन साहित्यिक तिलंगों का..

इलाहाबाद के दारागंज पहुंचकर दारियो फ़ो का झकास परिहास उबा‍सियां भरने लगा. किसी के बताने पर चौंककर बोले- अच्‍छा, यहां इतने कवि हुए हैं? विपिन अग्रवाल ने ‘एब्‍सर्ड’ लिखा है सोचकर उन्‍हें ताजुब्‍ब हुआ.

डोरिस लेसिंग
घूम आईं उत्‍तराखंड के बीहड़ उजाड़, अजानी ज़बानों में सुनती रहीं झारखंड और छत्‍तीसगढ़ के आदिम आदिवासी किस्‍से. इतना सारा जीकर, जान-समझकर भी कितना रहता जाता है जानने को. पहचानने को एक उम्र कितना कम कितना-कितना कम होती है.

ओरहान पामुक
खोये-खोये धीमी मुस्‍कान मुस्‍कराते खुद को बचाते रहे- जनाब, ऐसा क्‍या ख़ास है आपके हिन्‍दुस्‍तान में जो हममें हमारे यहां नहीं है. वहीं धोखे हैं मक़्क़ारियां हैं. रहस्‍यवाद है बीच राजधानी पहाड़ पर सुरम्‍य बंगले हैं, कोई अधपागल बुढ़ि‍या बेसुरे सूफ़ी छंद गाती है; स्‍कूलों से बाहर आवारा बच्‍चों का गिरोह है, बेशर्म कुत्‍ते हैं लाचारियां हैं. ऐसा मत स‍मझिए आपके यहां नहीं आये तो हम वहां हुए नहीं, इस्‍तांबुल में रहना आपकी दिल्‍ली से गुज़रना ही है.

सुभो-सुभो हाय नोटपैड की क्‍या मह-मह मस्‍ती..

आज सारी कमीनाई धरी रही घुस गई चतुराई.
भूल गए जैसे होते थे कैसे बेहया होती क्‍या बेहयाई.
सन्‍न देखता रह गया, खुद के देखने से पहले महेश, गणेश,
मातादीन, मंदप्रसाद सब सोये रहे मैं उठ गया.
ताज़ी हवा सूंघकर थोड़ा घबराया कहीं ज़्यादा ही गड़बड़ न हो गया हो विचारता कुछ शरमाया भी.
मगर अब क्‍या हो सकता था.
चाय उबल रही थी नल चल रहा था.
साइकिल के मुरचा खाये चेन पर
नए तेल की कुप्‍पी की सिंगार की तरह
मैं नवल रहा था. अकड़ी हुई पीठ की धजा तान
हाय, सुभो-सुभो नोटपैड पर कैसा हलल-हलल चल रहा था!

मेरी चीन यात्रा: बीसवां भाग..

चू देह की जर्द ललियाही दीवार से लगा मैं जाने कितने घंटों चलता रहा. मन शुष्‍क, होंठ खुश्‍क; रहते-रहते महसूस होता जैसे ज़माने से यूं ही चला जा रहा हूं. अपने से निष्‍कासित.. अपनी संधान में. किसी पराई ज़मीन पर परदेसी पथिक नहीं, स्‍वदेश में कोई अपना स्‍वत्‍व भूल गया हो ऐसे. बीच-बीच में राह गुज़रते लोगों को देखकर मन में भाप उठता- अरे, सब मुझी-से तो हैं, फिर भी हा रे किस्‍मत, देख, मैं इनके बीच कितना पराया हूं?..

मेरे चेहरे पर पागलपने की कोई उलझी मुस्‍कान होगी, या कोई सन्‍न कर देनेवाला चोट खाया-सा कोई भाव जभी कोई बुज़ुर्ग मेरी राह में आकर बोले- बच्‍चे, लगता है तुमने ज्यादा चढ़ा ली है तभी ऐसी बहकी हरकत कर रहे हो! सामने की सराय में घड़ी भर सुस्‍ता लो, मुंह-हाथ धोओ, तब अपनी राह निकल जाना..

अब बुड्ढे से मैं क्‍या जिरह करता कैसी राह, किधर निकल जाऊं, दादा.. जीवन में राह पा लेना क्‍या इतना ही आसान है? मगर इस बंजर में वह बूढ़ा मेरी तक़लीफ़ क्‍या समझता. क्‍या समझता कितना झेला है मैंने, और कैसे कांटें व कंकड़ भविष्‍य की झोली में आगे रक्‍खे हैं मेरे वास्‍ते? वैसे भी आज अपना दुख किसी से कहकर क्‍या होता है. फ़रेबी हवा में सहानुभूति व हाय-हाय की कुछ मोहक, महीन अदायें बुनती-फुसलाती हैं, फिर बोध होता है हास्‍य व विद्रूप का एक मसाला भर तैयार होता रहा, बस. मैं बुड्ढे के आगे मज़ाक नहीं होना चाहता था. इसीलिए इसके पहले कि वह हंसता, मैं हंसता-हंसता उसके पीछे सराय की ओर बढ़ चला- आप भी कमाल करते हो, चाचा! फिर मोह में बांध रहे हो.. और तुम्‍हें लगता है अपन ऐसे चिरकुटप्रसाद हैं कि फिर लपेटे में फंस जायेंगे?..

बुर्ज़ुग कुछ सहानुभूति का प्रपंच, और कुछ एक सिरफिरे को झेलने की मानसिक तैयारी-सा करता मेरी कुहनी पर हाथ दिये मुझे सराय तक लिए गया. मैं बार-बार मुंह खोलकर कुछ कहता-कहता अटक जाता, यह सोचकर कि शायद बुड्ढा अब कुछ बोलेगा; मगर हुज़ूर मुझे यूं ही चकमा दिये लकड़ी के फट्टों व सीमेंट की उस पुराने खस्‍ताहाल इमारत तक चले आए. हार-खीझकर अंतत: झुंझलाहट में मैंने बड़बड़ाकर कहा- चक्‍कर क्‍या है, चचा? कहां सीखे हैं ये अदाकारी- रांची कि रामपुर? सस्‍पेंस काहेला बनाते हैं, बोलिए, बोलिए?..

चचा चुप रहे. मैं उनकी और अपनी चुप्‍पी में चौंधियाया रहा. यह बुड्ढा कहीं फुसलाकर मुझे किसी गड्ढे में ठेलने की भूमिका तो नहीं बना रहा? दिमाग में आड़ी-तिरछी कैसी-कैसी तो तस्‍वीरें बनती रहीं- स्‍नेहिल तरलाहटों, व आततायी अकुलाहटों की.. कभी अपने सारे कवच तोड़ मैं निर्द्वंद्व भाव से मैं उनमें डूब जाना चाहता, तो कभी घबराया, छिनककर उनसे छूट भागना चाहता..

बगल के धूलभरे मैदान में दो बच्चियां गोटी-गोटी खेल रही थी (शायद सराय में काम करनेवाली स्‍त्री की बेटियां हों), अपरिचित मुसाफिरों का आना देखकर ठिठक गईं. अंदर मालूम नहीं रेडियो पर या किसी अन्‍य बाजे पर काफी गुजरे ज़माने का कोई गाना बज रहा था. मेरी ज़ाहिर बेचैनियों को लक्ष्‍य करके चचा ने कहा- सनयात सेन के ज़माने का ऑपेरा है, अच्‍छा है ना?

मैंने चिंहुककर कहा- अरे! और अभीतक सर्कुलेशन में है? आपलोग तो सच्‍ची कमाल के हो.. क्‍यों रे, छोरियों?¬¬..

मगर बच्चियां शायद मेरे नाटकीय उछल-कूद से घबरा गई थीं, वो दौड़ती हुई सराय के पीछे की ओर भाग गईं. मैंने ठंडी सांस भरी, और होश में पहली बार अपने आसपास को देखा. धूलसने नारंगी, लाल आसमान को देखा.. और चकित होकर चीखा- वाह, चचा! देखो, ज़रा.. कैसे सेब की फांक की तरह सूरज पहाड़ों को चूम रहा है? वाह!

सेब नहीं, नारंगी, बुड़बक- चचा मुस्‍कराकर बोले. उनकी मुस्‍की देखकर जाने सारी उदासियां कहां घुल गईं, मैं बे‍फिक्री में खुलकर एकदम बच्‍चों-सा निर्दोष हंसने लगा. हंसते हुए भी मुझे ताजुब्‍ब हो रहा था कि देखो, ऐसी एक हंसी छिपी थी मेरे भीतर ही कहीं और मैं उसे किस तरह भूला हुआ था?

ओह, कैसी सुर्ख़ ख़ूनसनी शाम थी!.. जीवन में ऐसी निर्दोष हंसियोंवाली कितनी शामें आती हैं? दो, तीन, चार? क्‍या ऐसी शामों को बचाया नहीं जा सकता?..

(बाकी..)

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Thursday, October 11, 2007

बहुरुपिया मैं की अकबक अलबलाहटें..

बहुरु‍पी व्‍यक्ति. बहुरुपिया. कुछ लोगों के लिए सहज-साध्‍य होता है. कुछ लोग हांफते-कांपते रहते हैं मगर अपने खांचे से बाहर अपने को उकेर नहीं पाते. खांचे से बाहर कर दीजिए, वे एकदम गुम जाएंगे. मैं लिखने की अदाबाजियों में अपने बहुरुप को खोजता रहता हूं; कभी चार कदम की कोई छोटी सफलता मिलती है, तो ढेरों दफे हास्‍यास्‍पद भी होता रहता हूं (खांचे से बाहर खुद को खोजने व पाने में हास्‍यास्‍पद होते रहने के खतरे हैं, स्‍वाभाविक है; इसलिए जो मध्‍यवर्गीय वैनिटी के मफ़लर में अपनी ठंड तोपे रहना चाहते हैं, उन्‍हें सलाह है इस बहुरुप-तुरुप के टंटे में न पड़ें!).. लेकिन फिलहाल मैं अपनी अदाबाजियों की.. और अपनी असफलता, या कहिए, कोशिशों की सीमाओं की कह रहा था. कि चार दिशाओं में चार कदम चलने के अनंतर कैसे थक-हारकर मैं पतनशील का टैग लगाकर एक करवट सोने की सहूलियत से चिपक लेता हूं. बहुरुप सबकॉंशस में डोलता रहता है, उसकी पतली-महीन धारियां बनती-बिगड़ती रहती हैं; लेकिन वह ठीक-ठीक पकड़ में नहीं आता.

एक व्‍यक्ति है जो सुबह चेतना में लौटने के साथ फेफड़े में साफ़ हवा का स्‍वाद, प्‍याली भर चाय-कॉफ़ी खोजता है. देह पर धम्‍म से गिरते किसी छोटे बच्‍चे का बोझ, किसी अंतरंग की मीठी चुटकी के स्‍नेह में नहाये अलसाहट में दिन शुरू करता है. फिर अनसुलझे सवालों, विचारों व चिंताओं के छोटे-बड़े ढेरों तालाब निकल आते हैं, जिसमें अव्‍यवस्थित, हड़बड़ाई चिप्पियां चलती हैं- पुरानी लकड़ी के फट्टोंवाली एक कमज़ोर डोंगी.. कभी बूड़ती, कभी डगमगाती मंथ्‍ारगति डोलती चलती है. कभी उत्‍साह का झकझोर उठता है, और टिल्‍ली डोंगी दूर कहीं से कहीं निकल लेती है; तो कभी थिर पानी के सूनसान में अपने बीहड़ एकांतवास में- भयदग्‍ध- अपने अंत की राह तकती जैसे जड़मना भी हो जाती है. चित-पट के दोनों ही रूप हैं, और दोनों ही बराबर के वास्‍तविक हैं..

फिर एक वह शख्‍स है जो जहां जाये, परिस्थिति से निर्लिप्‍त किताबी टोह में रहता है, दैहिक बोझ हैंडिल करने में हड़बड़ाता है, मगर किताबी बोझ बढ़ाता चलता है. क्‍यों? इस क्‍यों का उसके पास जवाब नहीं. और भी ढेरों क्‍यों और कैसे हैं जिनका उसके पास जवाब नहीं. उन जवाबों की टोह में रहने की जगह वह वैश्विक नक्‍़शे पर कहीं और स्‍थानांतरित होकर किसी सपनीले लोक में मगन हो लेता है; छोटे-छोटे तारे-सितारे गढ़ता उन्‍हें इस नोट और उस बुक में दर्ज करता रहता है. कैसे इंडलजेंसेस हैं ये? इस रूप का वस्‍तुगत मूल्‍य क्‍या है?..

फिर सामाजिक निर्जन में हा-हा ठी-ठी की अदायें हैं. जो लोकोपचार के किसी वाजिब मशीन में कभी कोई सिलसिलेवार पंक्‍चुएशन नहीं ब‍नतीं. अपने पथरीलेपन में बस अपने को यूं ही एक्‍जॉस्‍ट करती रहती हैं. ऐंठेंपन का यह कैसा टेढ़ापन? कौन जाने. फिर अंदर सीली, मटमैली दीवारों के उस ओर धीमी गरज से बहता कोई सोता अचीन्‍हीं अंतरंगताओं का. कैसी गझमझ अंतरंगता? ठीक-ठीक चाहता क्‍या है? मांगता क्‍या है? अपने बहुरूप को व्‍यक्‍त करना जानता है?..

खांचे की मांग और दबाव से अलग खुद अपनी वर्जनाएं होती हैं, नासमझी और असमंजस की सीमाएं होती हैं. लोगों की तरह शहरों की भी एक खास तरह की स्‍मृति अपने झोले में दाबे लिये चलते हैं. बात निकलने पर याद आता है फलाने हिलते हुए हंसते हैं, या कितना अनफ्रेंडली शहर है. बहुरूप की टोह कहां रहती है? बहुरुपिया अपने विविध-अबूझ परतों में सोया रहता है.

Sunday, October 7, 2007

हिंदी की चिरगिल्‍ली दुकान..

मैं कोई ऑरिजनल बात नहीं कह रहा. रघुवीर सहाय ने इस विषय पर ढेरों बिम्‍ब पहले ही रच रखे हैं. ज़्यादा पैने, ज़्यादा मार्मिक- साहित्यिक; पच्‍चीस और तीस वर्ष पहले. तो मैं क्‍या कहूंगा? मुझे तो अभी भी हिंदी में साहित्यिक होना क्‍या है उसकी तमीज हासिल करनी है. साहित्‍य की जितनी तमीज है, उस नज़र से जगह बदल-बदलकर शहर को देखते हुए अलबत्‍ता बीच-बीच में सन्‍न ज़रूर होता रहता हूं. हिंदी का साहित्यिक नहीं होता. वह अपनी मंडी में मेज़ पर उंगलियां बजाता मस्‍त रहता है. मुस्‍कराता है. मेरे सन्‍नभाव को कुछ खिन्‍नमन देखकर जल्‍दी ही ऊबने लगता है. विषय बदलकर वापस अपनी आत्‍ममुग्‍धता के भूगोल में लौटना चाहता है. आराम से लौट आता है. वापस चहचहाचट शुरू हो जाती है. अहा हिंदी, ओहो हिंदी. मैं थका हुआ देरतक गिलास का पानी पीता रहता हूं, या चिढ़कर पतनशील बिम्‍ब बनाने लगता हूं.

हिंदी के आत्‍मतुष्‍ट समाज में यह भी मज़ेदार अदा है. लोग आपको सुनने से पहले देखते हैं. आपकी आंखों की बेचैनी या आपके विचारों की ताप नहीं. आपकी सामाजिक हैसियत का कद. आपकी कॉरपॉरेट हैसियत और आपकी कार की मेक. उससे आपकी उपस्थिति और आपके विचारों का वज़न बढ़ जाता है. लात खाये व हीनता-ग्रंथि से ग्रस्‍त समाजों में लोकाचरण की शायद यह सामान्‍य परिपाटी हो. किसी प्रसून जोशी को जवाब देता शायद कोई बड़ा प्रकाशक ऐसा कहने में संकोच व सावधानी बरते कि क्‍यों वह किसी नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित लेखक का दो कौड़ी पैसों में दो कौड़ी का अनुवाद करवाता है! अपने कर्मों व विस्‍तार में मुदित बड़े प्रकाशक को इसका कोई अपराध-बोध भी नहीं. वह मज़े में बांह सहलाता कहता है- हां, वह अनुवाद अच्‍छा नहीं हुआ. मगर सवाल यहां इस और उस अनुवाद की नहीं. अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति की कोई भी अच्‍छी किताब उठा लीजिए, उसके अनुवाद को ज़रा उलटिये-पुलटिये, फिर या तो शर्म से सिर झुका लीजिए, या गदगद बने रहिए. आपका कुछ बिगड़े तो बिगड़े, हिंदी साहित्‍य का कुछ नहीं बिगड़ता.

सरकारी प्रतिष्‍ठान की एक अच्‍छे धज की सजी दुकान. शीशे के सुधड़ दरवाज़े. फिलहाल बंद हैं. मेरे सवाल करने पर बरामदे की बेंच पर दोपहर की सुस्‍ताहट में रमे कर्मचारियों के गुट में से कोई जवाब देता है- यह आज बंद ही रहता है. जवाबोपरांत प्रसंग की इतिश्री मान, कर्मचारी हाथ की सुरती मलता, साहित्‍य से परे अपने समय में लौट जाता है. एक दूसरी जगह इसी तरह की सजी अच्‍छी दुकान है. सरकार की नहीं, प्रकाशन की. बंद नहीं खुली है, मगर तत्‍काल उसका एक अन्‍य इस्‍तेमाल हो रहा है. शीशे के दरवाज़े के पार बुझी हुई बत्तियों के नीम अंधेरे में दीख रहा है कर्मचारी फ़र्श पर अख़बार बिछाये दोपहर का भोजन निपटा रहे हैं. एक औरत अपनी टिफिन में पानी गिराती हाथ धो रही है. शीशे से लगे मेरे चेहरे का ध्‍यान आने पर हाथ के इशारे से समझाती है- अभी जाओ. बाद में आओ.

एक लेखक गदगद है कि उसकी चर्चित, सफल किताब पर पिछले वर्ष बीस हजार की रायल्‍टी आई. मैं सन्‍न हूं कि यह सफलता की कहानी है तो असफलता की कहानियां कैसी होंगी. किस्‍से और भी हैं. आशा और उम्‍मीदों से भरे नहीं. इसी तरह के, चिरकुट स्‍तर के. फिर कहूंगा. आप गदगद समुदाय से हों तो मत पढ़ि‍येगा.

Friday, October 5, 2007

रहिया राह निराली..

बतियां बात निराली
बुड़-बुड़ हलबल डूबें
मनवा सूना खाली
डारि डगर लटिकैं झूलैं
कोंचें चिंचियायें हलहल होहो
मनवा माचिस बालें
रह-रह उजियारा देखें
फिर अंधियारा दुलराये
रहिया राह निराली..

का बोलें कापे मुंहवा तोपें
तापै टहिल अचक्‍का होवैं
धक्‍कम-धक्‍का धूम-धड़क्‍का
चोरि उचिक्‍का ऋषि गुन ज्ञानी
काको गावैं कोको लतियायें
कौन राग हरमुनिया सेटें
कौने करवट देह गिरायें
ता ता धिन्‍ना ता ता धिन्‍ना
अकबक-अकबक चमचम-चकमक
हरेराम हरैं हरियाली
रहिया राह निराली.

Monday, October 1, 2007

उजास अंधेरे..

मालूम नहीं लोग हैं कि उनके गिर्द पहरा बनाकर चलनेवाला समय है जिसका बुरा मानें. टूटे आईनों में कभी कोई मुस्‍कराहट दिखती है, या सूखी, मटमैली उदासियों के किसी आड़े-तिरछे तिराहे पर कोई पहचानी आवाज़ कहती है बड़ी मुश्किल है, दोस्‍त. चमकती धूप, सजावट में कटे वृक्षों व मज़बूत सड़कों के आत्‍मविश्‍वासी विस्‍तार पर तैरता मैं यकबयक कांप जाता हूं. छीजती रेज़गारी की पाकिट पर हाथ धरकर मानो अचानक याद आया हो हाय, अपरिचय के संसार में कैसा बहका-बहका लहरा रहा था, असमय गा रहा था. एक सज्‍जन पुरुष प्‍लेट की मिठाई चखते हुए कहते हैं सपनों का अनुशासन नहीं समझते तब तो चूतिया ठहरे आप. तंग गली के जगर-मगर में मैं फिर बारी-बारी से गिनता हूं सारे अपने, एक-एक. सपने. क्‍या किया जाये फेंक दिया जाये इन सपनों का मोल किया जाये. उठती सड़क भारी कदमों डोलता भीड़ में बिलगता हूं, ज़रा आगे जाकर दूर से देखता हूं. फिर हैरत होती है अपने को पहचानने में. इस तरह टुकड़े-टुकड़े खुद को जानने में.