Tuesday, December 30, 2008

इतना दांत मत चियारो, ससुर, कि मुंह का ओर-छोर पिराने लगे..

कुछ का कुछ पोत दूं? कहीं का कहीं जोत दूं? हिन्‍दी की हुशियारी, चौथी जमातवाली समझदारी पर बाल नोंच लूं? या नीलहा करीखा पोत लूं? सींग उगा लूं? या एह छोर से ओह छोर तक दांत चियारे गाल बजा लूं? भवकाल ठेल दूं? या ठिले हुए अकाल पर आलता का लाल? या जगजीत सिंग का पुरनका, मेहराया ग़ज़ल- फिर इस दिल को बेक़रारी है? कहीं पहुंचेगा ये समाज कि मंडी में खड़ा तीन बकरी, चार भेंड़ और खाली बसीया तरकारी है? जय रघुनंदन राम गोंसाईं, केकरा-केकरा के चप्‍पल सजाईं? बाबू जदुनंदन सिंह का पोतधन जहंवा कहीं हो अदालत का कठहरा में हाज़ि‍र हो? अऊर केतना टैम तक नौटंकी पार्टीक का सलीमा-सीनरी चलेगा? बहुत हुआ चिमरखापना बंद करो अब परदा ऊपर उठेगा कि जी, नीचे गिरेगा?

(ऊपर की कलांतक चिरकुटई माइक्रोसॉफ्ट पेंट जनित-फलित है)

गुडलक एंड गुडबाई..

पुराना साल जा रहा है. वक़्त हुआ था जायेगा ही. जिन्‍हें जाना होता है, हमारे-आपके जैसे हेंहें-ठेंठें करते रहते हैं, वे चुपके से निकल लेते हैं. अगस्‍त के महीने हम दुनिया में आये, क़ुर्रतुल आपा पिछले साल इसी महीने निकल लीं. शायद हमारी मसखरी उनसे और झेलना न हुआ. ताज़्ज़ुब की बात नहीं, कभी-कभी हमसे भी नहीं होता. अब याद करके तक़लीफ़ हो रही है कि गयीं. हिंदी सभ्‍य व स्‍वस्‍थ समाज होता तो उनकी लिखी हर चीज़ उनके गुज़र चुकने के इस एक वर्ष की अवधि में अबतक एक जगह कहीं मुहैय्या होती. मगर हिंदी पाठकों की नहीं, प्रकाशकों व सरकारी खरीद की सहूलियत का प्रकाशन- संसार है. तो उनके लिखे की कॉपीराइट जेब में लेकर टहल रहे कहीं धूप ले रहे होंगे, दीवार पर पान की पीक दे रहे होंगे; अचानक मौका निकल आये तो शब्‍दों की दलाली की कमाई खानेवाले नौजवान हैसियतखार ‘आह’ और ‘ओह’ का मौज़ूं समां बांधते तालकटोरा से तृप्तिमार्ग के बीच भले गाल बजाते घूमते फिरें, फ़ि‍लहाल उन्‍हें याद, व चिंता नहीं होगी कि क़ुर्रतुलऐन हैदर के आत्‍मकथ्‍य, सफ़रनामे उर्दू से हिंदी में अभी भी आने बाकी हैं, पता नहीं आयेंगे भी? एक उपन्‍यास ‘गर्दिशे रंगे चमन’ कभी आया था, जाने कैसा अनुवाद था, बहुत समय से वह भी सर्कुलेशन में नहीं है.

ख़ैर, मालूम नहीं है अच्‍छा है या नहीं कि मैं इस तरह भावुक हो रहा हूं. आपा रहतीं तो शायद न होतीं. ‘चांदनी बेगम’ के एकदम शुरुआती पैरा में ही, उपजाऊ मिट्टी की खुशहाल ज़िंदगी की तारीफ़ करते-करते आपा कह जाती हैं: ‘भुरभुरी मिट्टी के अंदर केंचुए अपने काम में लगे रहते हैं- सारी उम्र अपने काम में मसरूफ़. ख़ैर, केंचुओं की क्‍या उम्र और क्‍या ज़िंदगी..’ कहते-कहते कहां से क्‍या, और किस अंदाज़ से कह जाने का सलीका कोई आपा से सीखे. कहीं आगे अचानक एक टुकड़ा आता है: ‘सारे इंसान मुहरबंद लिफ़ाफ़े हैं. कोई एक-दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानता. बंद पार्सल. दमपुख्‍त हांडियां. कुछ पार्सलों के अंदर टाईम-बम रखे (होते) हैं.’

एक नन्‍हीं चिड़ि‍या गरदन मोड़ अपने पंखों के बीच कुछ ढूंढ़ती फिरेगी. एक नर्स हॉस्‍टल के गलियारे में खड़ी जाने किस चीज़ को ढूंढती सांझ का धुंधलका तकती होगी. मां सोचती होगी इतना समय हुआ बेटे के सपनों में जाने से बच रही हूं, कहां भटक रही हूं. मैं पाई-पाई जोड़ता सोचता बैठता होऊंगा कि कुछ किताबें दिख तो रही हैं दीवानगी जगाने को: “Other Rooms, Other Wonders”, “The Brief Wondrous Life of Oscar Wao”, “Curfewed Night”, उन तक पहुंच पाऊंगा? कब घर लाऊंगा? ओह, क़ुर्रतुल आपा, आप कहां हैं? कैसी हैं? आप होतीं तो भागा-भागा शायद इसी, किसी बहाने नोयेडा आपके हुज़ूर में पहुंचता? मगर जानेवाले कहां रुकते हैं? 2008 भी क्‍यों रुकेगा? वेल, गुडलक एंड गुडबाई.

यह क़ुर्रतुलऐन हैदर से उनकी ज़ि‍न्‍दगी के आख़ि‍री दिनों में हुई बातचीत का एक लिंक है. यह 'चांदनी बेगम' के छपकर आने के बाद बीबीसी के परवेज़ आलम से हुई उनकी मज़ेदार बातचीत का ऑडियो लिंक रहा..

चलते-चलते, आपा की ज़हीन-हसीन आवाज़ की संगत में हमारे एक पुराने ऑडियो- ऑडपोस्‍ट को चेंपना क्‍या किसी तरह संगत होगा? मगर, फिर क्‍या मालूम, ऐनी आपा होतीं तो कहतीं हमारी हसीन महफ़ि‍ल में तेरे केंचूकास्‍ट को लेकर क्‍या इतना बिसुरना, चल, बज जाने दे.. बहा अपनी बयार, खा हमारा कपार?

और चलते-चलते कोई बंधु यह भी बताता चले कि लाईफ़लॉगर में अटके अपने पॉडकास्‍टी भटके प्‍लेयर को हम अन्‍यत्र कहां, कैसे प्राप्‍त करें. या पॉडकास्‍ट-निर्वासित ही रहें?

Monday, December 29, 2008

दिसम्‍बर के बाल.. खाल पता नहीं किस कल्‍पना के..

लाईनों में आदमी चौंका दीखेगा?



या लड़की नाराज़?..



याकि मैं ही बेमतलब साल के आख़ि‍र में बाल की खाल निकालता दीखूंगा?..



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Sunday, December 28, 2008

फिर वही, कहीं दीप जले कहीं दिल टाइप..

जाने ब्‍लॉगर पर इन दिनों क्‍या चक्‍कर है कि पोस्‍टों की लिंक की एकदम ऐसी की तैसी किये हुए है. कहीं का लिंक कहीं चिपकाता चलता है. अदबदाकर दूसरे खुद को बचा भी ले जाते हों, मैं जाने कैसे चिपकता रहता हूं. आज निगाह गई तो लाल्‍टू के संजीदा-से पोस्‍ट पर मेरी एक पुरानी चितवन दीवार पर खड़ी हौंक रही थी, पढ़कर मन वैसे ही उदास हो गया जैसे किसी ज़माने में हमें प्रेमपत्र लिखनेवाली, मगर अब बेटी के लिए वर की खोज में वारंगल पहुंची धुंआती रूपसी को गोड़ पर ऑयोडैक्‍स मलते (मगर ज़रूरत के सब काम से बचते) देखकर अभी तो गुज़रे साल एक बार फिर हो गया था. हमने आह भरकर पूछा था हमारा डुयेट याद है? धुंआती रूपसी हंसकर गोड़ नहीं, ऑयोडैक्‍स छिपाते हुए बोली थीं अब गाना कहां गाते हैं अलबंग अंकिलजी?

एनीवे, मैं भी कहां का लिंक कहां क्‍यों चिपका रहा हूं, लाल्‍टू के यहां दीखा तो जाने किस पुरानेपन की स्‍मृति में भावुक हुआ, किसी और की पीठ की जगह अपनी ही दीवार को एक बार फिर से गंदा करने के मोह से बच नहीं पा रहा हूं, लीजिये, पढ़कर आप भी गंदा होइये..

मंदी ब्‍लूज़..

कहीं दीप जले कहीं दिल..



कहीं घास बने मुश्किल..



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Saturday, December 27, 2008

कुबरन के क़ि‍स्‍से..

मालूम नहीं सैदनपुर वास्‍तव में कोई जगह था.. गुंबद, मीनार, मुरझाये घास और बांस के झाड़ों घिरी सूनी- धीमे-धीमे गुज़र रही आंखों देखी अंसारियों की वह कोई असल हवेली थी.. या वह धूमिल, उजाड़लोक कल्‍पना के उनींदे बियाबान से मैंने खुरच-खुरचकर यूं ही बाहर कर लिया था..



खरखराती आवाज़ों के गुमसुम सन्‍नाटे में गली से बाहर लालटेनबत्‍ती की टिमटिमाती रोशनी में कोई सियाह साया बाहर आता दीखता तो हड़बड़ाकर जैतून मियां के ओसारे की दीवार के पीछे छुप जाने से अलग जान बचने की कोई सूरत न होती..



मगर शैतान की मनहूस आंखें पीछा थोड़े छोड़तीं?..



बांस की झाड़ के आगे दांतों पर सुरती रगड़ने की तैयारी करते जैतून मियां फुसफुसाते शैतान-फैतान कुछ नहीं, कुबरन का कसाई मंगेतर है, उन्‍नाव में कवनो फौज़दारी के मुकदमे में उलझाव होय गयी रही, ऊंहवा से भागकर आये हैं..



कुबरन का मंगेतर? सच्‍ची में ताज़्ज़ुबवाली बात नहीं थी कि अकेली पड़ी बड़कन बेगम के दुखियारे दिनों की नौकरानी- न देखे में न सुने में- कुबरन इस बुढ़ौती में अपने बास्‍ते मंगेतर ढूंढ़ लायी थी?..



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गृहस्‍थी..

एक सचमुच का गिरहत्‍थ..



दूसरी बहकी मन की उड़ान..

ज़रामुश..?


रोज़ ज़रा-सा खुद को सहेजता हूं, रोज़ थोड़ा-सा खुद से छूट जाता हूं, घबराकर हूकता हूं देखा तुमने, कहां छूटा? तुम हंसकर कहती हो क्‍या?

धूप उठते-उठते-उठते उठी जायेगी ऊंची इमारतों की लम्‍बी दीवारों के पार, मैं तंग दायरों में हड़बड़ कमीज़ खोजूंगा कि लो, यह बाबू भी बटन-बर्बाद निकले? तुम मुंह फेरकर कहोगी आख़ि‍री बार कब था जब आबाद निकले?

पैरों की उंगलियां होंगी, समूचा पैर न होगा, हरकत होगी हाथ का सगरे हिलोर न होगा, अनजाने दरख़्तों के अंधेरे झुरमुट-से छितराये-उझराये शब्‍द होंगे मन में लहरकर उतर जाये सा जादुई भाषायी वन न होगा, जंगले होंगे जंगल न होगा? तुम कहोगी हूं..

Friday, December 26, 2008

प्रिय साथ रहना, मोरमन..

साथ रहता है मन, रहते-रहते फिर छिटककर कहां तो निकल जाता है, पकड़ नहीं आता, मैं सोचता हूं मन को जानता तो था?- मगर जैसाकि जुसेप्‍पे कहता, जानना ज़रूरी नहीं समूचेपन में पहचानना हो, जैसे लोगों के पीछे बहलते हुए, सामूहिक दायरों में टहलते हुए अचानक कैसा तो निबिड़ भारी, दुर्दांत अकेलापन नहीं घेर लेता?- पहचाने चेहरे, जानी दुनिया कैसे सियाह धुंआये गलियारे बन जाते हैं, अजानी ज़बानों की फुसफुसाहटों की अभेद्य दीवारें बन जाती हैं, एक दरकन- कांपती-सी सिहरन में मन थाहता अकुलाता है पैरों के नीचे कैसी ज़मीन है, कितनी है, हवा में घूमती आवाज़ें एक आततायी वक़्त की दुश्‍वारियों, घबराहटों का इश्‍तेहार भर हैं- कि उंगलियों के पोर पर बसे मन के हिलोर, नेह का दुलार, कान की लब पर किसी नशीले डंक की तरह उन्‍मत्‍त कर देनेवाला प्‍यार भी हैं? धीमे-धीमे बनते-बुनते एक संश्लिष्‍ट सांगितिक का संसार? भी हैं?- जिसमें कहां तो निकल गया आवारा, अघोर मन वापस लौटता है, वैसे ही जैसे भगोड़ा योगी ममता की मार में, एक बछिया के प्‍यार में वापस लौटा हो उन्‍हीं बिछिलाहटों भरी अपनी चिर-परिचित गन्‍दायी दुनिया में? गंवईन की बीमारी और पुरइन के व्‍यभिचारी अंधलोक में? बखूबी जानते हुए कि नहीं जल जायेगी पहाड़ पर दिप्‍प् से बत्‍ती, नहीं पसर जायेगा पगडंडियों पर दूर तक अंजोर, मगर मन तकता रहेगा सधे-साधे अंधेरा? एक बेसुरे बाजे को रहेगा बांधे? कि अघोर मन इन्‍हीं अंधेरों में आंकेगा मोर-मन?..

Thursday, December 25, 2008

अपना-सा एक दोस्‍त, अपनी-सी थोड़ी खुली जगह..

अचक्‍के बहुत वर्षों बाद एक दोस्‍त से मुलाक़ात हुई..



वही जानी-पहचानी सुव्‍यवस्थित अव्‍यवस्‍था.. ज़रा-सी जगह, थोड़े-से हरे की हसरत..







मैंने घबराकर कहा इतने साल गुज़र गये तुमने कभी फ़ोन नहीं किया? कभी यही पूछने के लिए कर लिया होता कि मैंने बालों में सफ़ेदी डालना बंद किया या नहीं.. या ग़लत पते पर ग़लत चि‍ट्ठि‍यां डालना? दोस्‍त मेरे सवालों का जवाब देने की जगह विदेशी दारु की बोतल खोजने लगा.. फिर निरखने के लिए नीचे फ़र्श पर गिरी मेरी आत्‍मा देखने लगा..





ग़नीमत है नीचे आत्‍मा नहीं मेरे पैर और आत्‍मा में उतरनेवाले मसाले का एक छोटा-सा एंगल भर था..



मैंने दोस्‍त का ध्‍यान मसाले से हटाकर फ़र्श पर एक कंपोज़ि‍शन मतलब अपनी कला की ओर किया..



फिर ठोढ़ी पर हाथ डाले चाय पीते हुए हम उन्‍नीसवीं सदी के बुद्धिजीवियों वाली सैर पर निकल गये.. मैंने दोस्‍त से सवाल किया सामने का संसार दिखता है? इस पर दोस्‍त सामने की बजाय ज़रा एंगल से देखने लगा..





फिर चाय छोड़कर दोस्‍त खड़ा हो गया, उलटकर मुझसे सवाल किया- क्‍या चाहते हो फिर दस साल हम न मिलें?



क्‍या करता है व्‍यक्ति ऐसे मौकों का? मेरी तरह के लोग कुछ अल्‍ल-बल्‍ल बकते हैं, वर्ना क्‍या है मन निरुत्‍तर हो जाता है..

Saturday, December 20, 2008

किसानों को जो रास्‍ता मिलेगा.. बच्‍चों को.. हमारे भविष्‍य को?..

मंदी पर सब सर्तक निगाह रखें की समझाइश देकर चंदू नोट कमाने निकल गये. मैं चूंकि कहीं कमाने नहीं जा रहा, मंदी के साथ बकिया गंदी चीज़ों में उलझा पड़ा हूं. लोग घबराकर ऐसे क्षणों में मानस पढ़ने लगते होंगे, मैं ‘भूख नक़्शे से हट गया है’ जैसा सरस साहित्‍य पढ़कर खिंचा-खिंचा हो रहा हूं. बहुत सारे सवाल हैं, फ़ि‍लहाल अंग्रेजी में छपे दीख रहे हैं- A quarter of India’s population lives below what has been termed a ‘starvation line’. Why are chronic hunger and under-nutrition still so widespread? Why have foodgrain and calorie consumption actually fallen in the last 15 years of structural adjustment? अंतुले को घेरकर चप्‍पल मारो का हमारा अकुलाया पता नहीं किस तरह का अंधा राष्‍ट्रप्रेम सर्वत्र दीखता है, लोगों को खाना और बेहतर भविष्‍य कैसे मिलेगा के सवाल हमारे ज़ेहन में तो कैसे आयेंगे, अखबारों के मुखपृष्‍ठ पर भी कभी नहीं मिलते.

जवाब छोड़ि‍ये, ऐसे सवालों का ठीक-ठीक परिदृश्‍य समझने तक के लिए छापामार खोजायी करनी पड़ती है. जिन्‍हें कुछ नहीं खोजना, और जो यथास्थितिवाद की तुरही जेब में लिये और मुंह में ‘ओहो, कैसा देश हमारा न्‍यारा!’ बजाते- किसी भी अप्रीतिकर सवाल से बचते- ‘ठोंको पाकिस्‍तान को. पीटो पाकिस्‍तान को!’ की तरफ़ हमें ठेलते रहेंगे, कोई इन्‍हें टोककर नहीं पूछेगा कि पाकिस्‍तान को ठोंकने और पीटने से पहले बंसी बजाते हुए हम सुखी-सुखी ही थे? और थे ही तो वे कौन लोग थे. जो नहीं थे वे कौन थे? उसका किस तरह का सोशल डेटा है हमारे पास. बच्‍चों की कितनी बड़ी आबादी थी जो पेट भर खाने के अभाव में रोज़ मर रही थी? या ऐसे घर जहां हफ़्ते में एक मर्तबा चूल्‍हा जल रहा था? मैं नहीं, राहुल वर्मन कानपुर आईआईटी के अध्‍यापक हैं, वह कह रहे हैं: Earlier this year we saw two news items together on the front page – Indian Prime Minister Dr Manmohan Singh once more extolling the virtues of the 9% growth rate, and the chairman of the National Commission for Enterprises in the Unorganised Sector reporting that four out of five Indians live on less than Rs 20 a day.

चूल्‍हे में डालिये राहुल वर्मन को, गांधी नहीं वर्मन है, शर्तिया देशद्रोही होगा, अगड़म-सगड़म ऑब्‍ज़र्वेशन कर रहा है. मगर एक ऑब्‍ज़र्वेशन वर्ल्‍ड बैंक ने किया था, 1995 में, ज़रा नमूना देखिये. इस अध्‍ययन के मुताबिक 2010 तक गांवों से शहरों की ओर जो आबादी विस्‍थापित होकर पहुंचेगी वह इंगलैण्‍ड, फ्रांस और जर्मनी की मिली-जुली आबादी का दुगना यानी 40 करोड़ के आसपास होगी. किसानी को दुरुस्‍त करने की सरकार बहुत सोचती दीख रही है, लेकिन किसानों की भलायी उस सोच का हिस्‍सा नहीं है.

दिल्‍ली के देविंदर शर्मा ने समूची परिस्थिति का बड़ा वाजिब अध्‍ययन किया है. यह पंक्तियां देखिये: “Numerous national policies are being recast at a frantic pace and are facilitating this distress. The underlying object is clear in policies related to seed, water, biodiversity, adivasis, the environment, biotechnology, trade, food safety and agriculture, amongst others- make way for the big agro-industries. With the support of a political system cutting across party colors, Indian industry and business are upbeat about the potential of agriculture. A slew of FICCI-sponsered ‘reforms’ for raising farm incomes plans to pump large amounts of public money into an industry-driven agriculture, while the farmer survies in the margins. The ‘reforms’ clearly are not aimed at resurrecting agriculture but at bringing profits for the owners of the industries.” पूरा लेख यहां पढ़ि‍ये.

मुंबई पर हुए हमले के दौरान सुरक्षा के लिहाज़ से दिखा कांग्रेस-चालित यह सरकार (उसकी जगह कोई ग़ैरकांग्रेस-चालित होती तो ऐसा नहीं कि नतीजा कुछ अलग होता) अपनी सुरक्षा किस जतन से करती है. मतलब वीआईपी सुरक्षा के आंकड़े देखकर आप बेदम होते रहें, और उसके बाद जो वीआईपी नहीं हैं उनकी ईश्‍वर जाने कैसे रक्षा होगी की सोचना शुरू करें तो फिर नये सिरे से बेदम होवें! सोचनेवाली बात है यह सरकार (और इसके आगे-पीछे जो दूसरी आयेगी वह इससे अलग नहीं होगी) किसकी रक्षा और हित में काम करती है. और नाकारा है ऐसा कहकर मज़ाक उड़ाते हुए उसे बरी करना हमारा भोलापन व बेवक़ूफी होगी, क्‍योंकि जिनकी झोली में फ़ायदे गिरा रही हैं हम देखते रहे हैं कितनी समझदारी और स्‍मार्टनेस से गिराती है.

(ऊपर स्‍केच को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकयाकर अलग खिड़की में खोलें)

Friday, December 19, 2008

हाय-हाय की हाय-हाय..



अच्‍छा मज़ा है. स्‍केच का शार्पनेस उड़ गया है. कैमरे से क्लिकियाये मेरी आंखों की कमज़ोरी का कमाल होगा, मगर दिख ऐसे रहा है मानो लक़ीरें धुंधली सियाही से उकेरी गयी हों. आपके उत्‍साह का धुंधलका छंटा हुआ हो, और मेरी कला के रंग में- ओह, कितना तो रंगा हुआ हो- संभवत: तभी आप, अलग विंडों में भी, स्‍केच के धुंधलके से ऊपर उठ सकेंगे..
शुक्रिया.

Thursday, December 18, 2008

देहात भेद..



स्‍केच को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकयाकर नयी खिड़की में खोलें. टेक्‍स्‍ट पढ़ने में असुविधा हो (स्‍कैनर न होने का अब ससुर यह दु:ख भी होगा, दूसरे जो हैं सो तो हैं ही) तो साथ अलग से नत्‍थी कर दे रहा हूं..

आयेगी दुनिया समझ में? गांव की दुनिया? यूं ही टहलते हुए महाराष्‍ट्र में (ठीक है, महाराष्‍ट्र नहीं, बंबई से सौएक किलोमीटर दूर) किसानी साफ़-सुथरी सुखी दुनिया लगती है. लोग बिना कड़वाहट के सीधे-सीधे बात करते हैं.. जबकि हिन्‍दी प्रदेशों की, यूपी-बिहार की याद करें तो सिर्फ़ गंदगी और कड़वाहट याद आती है!!.. एक ही दुनिया है फिर इतना फर्क़ क्‍यों? महाराष्‍ट्र में लोग 'अच्‍छा' जीवन समझते हैं, बिहार-यूपी में नहीं?.. या जैसाकि एक मित्र की टिप्‍पणी थी, महाराष्‍ट्र में लोगों का मेंटल-स्‍पेस साफ़-सुथरा है, बिहार-यूपी में नहीं?


आपके दिमाग़ में कभी यह सवाल घूमा है?

Wednesday, December 17, 2008

समीर अमीन ज़ि‍न्‍दाबाद!

कभी-कभी अपनी वक्‍तृत्‍व-प्रतिभा, व साथ ही लोगों की समझ-सुरभि के ऐसे नज़ारे देखने को मिलते हैं कि जलकर रह जाता हूं. जलकर रह जाने के अनंतर अदबदाकर फिर यह भी सोचने पर मजबूर होने लगता हूं कि बेहतर हो हिंदी की बजाय फ़्रेंच में ही ब्‍लॉगिंग की जाये. मतलब हमारे लिखे पर ‘कुछ समझे, कुछ कहां समझे’ की घबरायी प्रतिक्रिया आयेगी तो कम से कम समझने को यह संतोष तो रहेगा कि फ्रेंच की कलकत्‍ता और कानपुर में इतनी ही समझ है! एक फ़ोन घंटियाने के बावज़ूद शीकुमार ‘ग़लती हो गयी, मफ़ि‍याया जाये, महाराज?’ वाला गाना नहीं गा रहे होंगे, और शुकुल ‘ई ठकुरवा फिर टंटा खड़ा कर रहा है क्‍या, गुरु?’ के असमंजस से पार नहीं पा रहे होंगे?

शायद स्‍माइलाश्रित हिंदी ब्‍लागसमाज बेस्‍माइली पंक्ति के आगे जाकर वैसे ही खड़ा हो जाता है जैसे हाईस्‍कूल के इम्‍तहान में हम अंकगणित का पर्चा हाथ में आने के पश्‍चात खड़े रह जाते थे. और फिर वैसे ही खड़े रहते थे, भली-भांति जानते हुए कि इम्‍तहान के नतीजों में हमारा कहीं भी खड़े होना संभव न होगा. मज़ाक दरकिनार, दरअसल सब कसूर सुकुल शीकुमार का नहीं, कुछ हमारे पक्‍के में पंकमिश्रण का भी दोष है. होगा ही. स्‍ट्रक्‍चरल डेफिसियेंसी वाला मामला है. कुछ लोग होते हैं सात सौ की नौकरी से शुरू करते हुए सत्‍तर हज़ार वाले मंथली पैकेज तक हंसते-हंसते पहुंच जाते हैं. माने ग्राफ़ वैसा ही बनता है जैसा ग्राफ़वाली पुस्तिकाओं में हमसे ग्राफ़ बनने-बनाने की उम्‍मीद की जाती है. मेरे साथ दिक़्क़त है सात सौ से शुरू करके बीच ग्राफ़ में गुलगुला तलने लगता हूं. बिनस्‍माइली जग सूना की अभ्‍यस्‍त आंखें अदबदाकर जलने लगती हैं. कहने का मतलब बेवज़ह शीकुमार की एसटीडी का बिल बढ़ता है, हमारे दिल का बढ़ता है सो अलग.

सचमुच सोचनेवाली बात है भाषा में गुलगुले क्‍यों तले जायें? मेरे चिंतन में यह पूंजीवादी पतनोन्‍मुखता के लक्षण हैं? ज़रूरत से ज़्यादा फ़्रेंच फ़ि‍ल्‍में देख रखी हैं मैंने? और हिंदी फ़ि‍ल्‍मों की भंड़ैती से ठीक-ठीक सबक ले नहीं सका? या ये हमारी फटही चिंतन के टुटही वितान हैं, कि बाबू बुद्धदेव की तरह टाटा से अलग वैकल्पिक विकास का कोई रास्‍ता हमारे दिमाग़ में बनने-बुनने नहीं देता? दक्खिनपंथियों की तो रहने ही दें, वामभाई भी घबराये यही उच्‍चारते हैं कि नियो-लिबरल इकॉनमी ही इतिहास का अंत नहीं? मिस्र के अर्थशास्‍त्री समीर अमीन की तरह कोई ताल ठोंककर दोटूक बात कहां करता है, सामान्‍यजन के आगे बेमतलब की ठेलता है, असल काम की बात कॉरपोरेट कमरों के भीतर ही करता है, और पार्टीकमान के अख़बारों में जो करता है वह हमारी हिंदी की तरह गुलगुले की मिठायी होती हैं.

दुनिया की माली हालत के कॉंटेक्‍स्‍ट में भारतीय आर्थिक परिदृश्‍य की थोड़ी सुसंगत समझ में आपकी दिलचस्‍पी बनती हो तो ‘फ्रंटलाईन’ के ताज़ा अंक में समीर अमीन का यह दिलचस्‍प इंटरव्‍यू पढ़ डालिये. उन्‍हें ज़्यादा पढ़ने की इच्‍छा हो तो देखिये, भारतीय बाज़ार में उनकी किताबों की उपलब्‍धता का एक लिंक यह रहा.

Friday, December 12, 2008

विनोदधन..


बेचैनियां बमबरसाती विमानों की तरह आसमान में सत्रह दिशाओं में दौड़ती क्‍यों नज़र आती हैं? किसी एक अकेली तितली की तरह फूलों पर सुस्‍ताती मिलती? बेचैनी का एक लघुकाय-मासूम दृश्‍य होता, बमबारियों का बारोक, बीहड़-लाचारियां न होतीं.. मगर तिरे प्‍यार में कितने तन्‍हां रहे, ऐ सलम की ससुर तन्‍हायी, इकलौताई कहां मिलती है.. सिंगुलर दृश्‍य कहां, थोकमार्केट के होलसेल दृश्‍यबंध ही मिलते हैं..

कड़वाहटसना मैं अब चुप ही रहता हूं, आगे की कहनी विनोदधन साहित्‍यरतन की ही कहता हूं:

“दृश्‍य में एक देहाती स्‍टेशन आ रहा था. और एक पैसेन्‍जर रेलगाड़ी आ रही थी कि देहाती स्‍टेशन का दृश्‍य रेलगाड़ी में बैठकर आ रहा था. इसके पहले जो रेलगाड़ी आयी थी दृश्‍य का काफी हिस्‍सा उसमें आ चुका था. एक यात्री उतरता तो एक दृश्‍य की तरह उतरता. एक यात्री एक दृश्‍य की तरह चढ़ता. बूंदाबांदी एक दृश्‍य की तरह हो जाती. धूप का निकलना एक दृश्‍य की तरह होता. दृश्‍य की भरमार थी. दृश्‍य में एकरसता कभी नहीं थी. परन्‍तु लगता था देहाती स्‍टेशन का दृश्‍य यहां हमेशा के लिए उतर गया हो.”

अब सुखसंसार की सुनें:

“सुख भविष्‍य के बहुत नज़दीक नहीं होता. दु:ख का वर्तमान इतना लम्‍बा, नुकीला होता है कि भविष्‍य में उसकी नोक घुसी होती. ऐसा कम होता है कि दु:खी हुए और चार मिनट बाद सुखी हो गये. सुख थोड़ा लचीला होता. इतना लचीला कि पांच मिनट के सुख को खींच-खींच कर किसी तरह ग्‍यारह मिनट तक ले आये. बारहवें मिनट में सुख के टूट जाने का डर होता. दु:ख से पीछा छुड़ाना मुश्किल होता.”
विनोदकुमार शुक्‍ल के उपन्‍यास ‘खिलेगा तो देखेंगे’ (आधार प्रकाशन, 1999) से साभार.

कांटा अड़ा है..

एक अदद तस्‍वीर कितनी कहानियों का कैसा बड़ा रहस्‍यलोक हो सकती है? या एक चेहरा? या हमसे ज़रा-सा पीछे को छूटा समय? हमें वह समय समझ आता है? वह क्‍यों, यही अपना समय कितना आता है- समझ? क्‍यों नहीं आ पाता? बस किताबों की लड़ि‍याहटें, स्‍केच-ग्राफ़ि‍क्‍स की खुमारियां याद रहती हैं? मैं, बहका-बहका-सा आगे निकल गया.. खुद स्‍वयं को कितना याद रहता हूं?

Thursday, December 11, 2008

जानता हूं?..

आसमान का निर्मल टुकड़ा होगा, बच्‍चे की धुली कमीज़-सी चमकती धूप में बादलों के फाहे होंगे डगर-मगर बहलते, भलमनसी में बिना तीन-तेरह के टहलते. अरमानों की तूफ़ानों की ओह, कैसी तो लरजती एक समूची दुनिया होगी, थरथराता उमगता मन हवा में एकदम ऊपर जाता लहराता होगा, खिलखिल कोई झिलमिल बुलाता होगा, अजाना आह्लादकारी गाना कोई रह-रहकर कान की लौ छूकर जाता होगा, वापस लौटकर उंगलियों में बिजलियों की तरह बजाता सनसनाता होगा. निरर्थकता के बाज़ार के बेमतलब कारोबार के इने-गिने चिल्‍लर सहेजता मानो भांग की पिनक चढ़ी हो जैसे मैं बेहया हंसने लगता होऊंगा, दुधिया रात में पुलिया पर लहराकर गुज़रती किसी रेल की तरह चमकने बहकने लगता होऊंगा.. थोड़ी देर का तिलिस्‍म होगा. एकदम थोड़ी ही देर का. क्‍योंकि फिर जल्‍दी ही कंधे की तक़लीफ़ अपना बेसुरा सुनाती होगी, बिसुरती पैर की उंगलियां फ़र्श ठकठकाती. दिल हदसकर ज़र्द दीवारों की बार-बार सुनता होगा क्‍या दुनिया कैसी दुनिया.. मैं खुद से चार हाथ की दूरी बनाकर पुछूंगा तुम्‍हें कितना जानता हूं?..

Wednesday, December 10, 2008

रात की बेमतलब बातें..

बातें इतनी बेमतलब होंगी कि बेमतलब बकने की अपनी पुरानी आदत तक से चिढ़ होने लगे पहले सोचा नहीं था. अब चूंकि चिढ़ हो रही थी तो बेमतलब पर पेंसिल चलाते हुए झींक रहा था. शिकायत की- इतना बेमतलब ठेल रहा हूं, आप मतलब के रास्‍ते पर नहीं ला सकती थीं? उनने बेमतलब की हवा कुछ और गुज़रने दी, खखारकर गला साफ़ किया, फिर इतमीनान से बोलीं- नहीं, ऐसा तो कतई नहीं है..

- ऐसा तो क्‍या कतई नहीं है? अभी तक बाल भी ठीक से संवारे नहीं, रात का तेल चुपड़ा दिख रहा है, और होंठों पर जाने वह क्‍या सफ़ेद निशान है, उठकर मुंह धोने की भी फ़ुरसत नहीं मिली? और माथे के दाहिने वह फुंसी क्‍या है जिसपर उंगली रखते ही पानी निकल जाये? इसी खूबसूरती के नज़ारे के लिए यहां आना था तो कहीं और जाकर सलीमा नहीं देख आता? सब ऐसा-वैसा ही है, बेमतलब कहती रहती हैं कि नहीं, ऐसा नहीं है!..

उनने पलटकर हमारी शिकायत पर शिकायत नहीं की. चुप हो गयीं मानो जूही के फूल को लौकी के डलिये में रखने का ख़ामोश विरोध कर रही हों. मैंने कहा- अब क्‍या हुआ? बिना हमारे बेमतलब को खिंचवाये चैन नहीं पड़ता?

- सब बेमतलब ही है, क्‍या किया जाये- उनने सर्द आहभरी आवाज़ में लगभग फुसफुसाते हुए कहा.

- कंचन से कामा हॉस्पिटल वाले वाक़ये के बारे में बात कर रही थी. वह पूरा किस्‍सा बेमतलब नहीं तो और क्‍या लगता है. ऐसी खौफ़ जगानेवाली, मातम बरसानेवाली रात में उन दो टेररिस्‍टों के वहां, हॉस्पिटल, दस बजे पहुंचने की ख़बर होती है, और सलस्‍कर, काम्‍टे और करकरे को मारकर उनकी क्‍वालिस में उनके भागने पर वक़्त क्‍या हुआ है? 10.59 मिनट हो रहे हैं. पूरा एक घंटा! ऐसी मुश्किल तोड़फोड़ की रात दो प्रोफ़ेशनल टेररिस्‍ट एक अस्‍पताल जैसी जगह में पूरा एक समूचा घंटा निकाल दें, बात पल्‍ले नहीं पड़ती. तोड़फोड़ मचाने और ख़ून बहाने को उनके लिए और दूसरी जगहें थीं, वह उनके पीछे भागते, किसी अस्‍पताल में एक समूचा घंटा इस तरह टाईमपास करते हुए खराब नहीं कर रहे होते, आपको नहीं लगता?.. फिर पुलिस के तीन ऐसे ऊंचे अधिकारी, एक साथ, अस्‍पताल पहुंचे किसलिए थे, और ऐसे पहुंचे थे कि उन्‍हें अपने डिफेंस में बंदूक निकालने की फ़ुरसत तक न मिली? मैं नहीं जानती उस रात दस से ग्‍यारह के दरमियान ठीक-ठीक हुआ क्‍या मगर जो कहानी मुझसे मानने को कहा जा रहा है वह मुझे बेमतलब ही लगती है.

- हमें क्‍या लेना-देना कामा-धामा से?- मैंने जम्‍हाई लेकर कहा, जिनको जाना था, गये, जिनकी किस्‍मत थी, वे अभी भी मुंह बाये दायें-बायें टहल रहे हैं. ख़ैर, कंचन आपकी थियरी पर हंसी नहीं?

- नहीं. कंचन की अपनी थियरी है, और ज़्यादा ड्रमैटिक है. कह रही थी उसके पास जो ख़बरें हैं उनके मुताबिक तो सलस्‍कर, काम्‍टे, करकरे कभी कामा गये ही नहीं. तीन इतने बड़े अधिकारियों का एक गाड़ी में इस तरह इकट्ठे पाया जाना अपने में लॉजिकल ही नहीं..

- ऐसा? फिर लॉजिकल क्‍या है? आपके यहां चाय-वाय कुछ मिलेगी या नहीं?

- लॉजिकल यह है कि पुलिस मुख्‍यालय में सीएसटी वाले अटैक के बाद बड़े आधिकारिक स्‍तर की एमर्जेंसी मीटिंग बुलायी गयी थी, सलस्‍कर, काम्‍टे, करकरे उसी मीटिंग के सिलसिले में पुलिस मुख्‍यालय पहुंचे थे.. तभी किसी वक़्त अचानक वहां टेररिस्‍ट पहुंचे; पुलिस के तीनों बड़े अधिकारियों की हत्‍या ठीक पुलिस मुख्‍यालय के अंदर हुई.. इनसाइड द पुलिस हेडक्‍वाटर्स इटसेल्‍फ़. इस सच्‍चायी को एक्‍सेप्‍ट करना पुलिस मोराल को ह्यूजली डैंपेन करेगा इसलिए यह कड़वी सच्‍चायी किसी भी सूरत में सामने लायी नहीं गयी. न कभी लायी जायेगी..

- वेरी फ़नी.. एंड वेरी बेमतलब. रियली. कौन इस तरह की ख़बरें सर्कुलेट करता है? और इस घर में कभी चाय मिलती है?.. हमारी खातिर कोई खूबसूरत? दिखने की कोशिश करता है?

Tuesday, December 9, 2008

जंगल से गुज़रते हुए: एक

धुंधले-कुहासे-सी रोशनी के निर्जन फैलाव में आठ-नौ लोग कदमों को थाहते, सन्‍नाटे और भय को काटते धीमे-धीमे आगे बढ़ रहे हैं. झीने हरे पत्‍तों के अंधेरों का अंत नहीं है. एकदम नज़दीक पहुंचने पर उनका रंग खुलता, और थोड़ा दूर हटते ही वे फिर एक अव्‍याख्‍यायित कुहरीलपने में ग़ुम हो जाते. एक तरह से कहें तो धुंध हमारे अंदरूनी अंधेरे की आड़ थी. उस आड़ के आसरे थोड़ी देर बाद कभी होगा जंगल ख़त्‍म हो जायेगा की भोली उम्‍मीद थी. दूसरों के मन में जाने क्‍या बातें चल रही थीं, मुझे धीमे-धीमे अलबत्‍ता पक्‍का यक़ीन हो चला था कि इस मनहूस विस्‍तार का अंत नहीं होगा. कभी होगा भी तो उसके पहले मैं ख़त्‍म हो चुका होऊंगा! मेरे कहने के तरीके से हो सकता है आप ड्रामेबाजी महसूस करके इरीटेट हों, लेकिन हमारी परिस्थिति की वास्‍तविकता में कहीं ज़्यादा नाटकीयता थी. मतलब पिघलते मोम की तरह सन्‍नाटे में डूबा एक अजाना जंगल जिसके ओर-छोर की थाह नहीं लग रही है, क्‍या मतलब है इसका? चुपचाप सिर नवाये नौ लोग चल रहे हैं (नौवां मैं).. आठ उतने ही अजाने जितना अजाना मेरे लिए यह जंतर-मंतर जंगल! सचमुच. न किसी का नाम मालूम न ठिकाना. भारी-भारी कपड़े ऐसे लाद रखे हैं मानो कश्‍मीर की तैयारी करके निकले हों! सच्‍ची में. मैंने खुद देह पर भारी ऊनी ओवरकोट डाल रखा है, और अब बात निकली है तो सोचकर ताज़्ज़ुब हो रहा है क्‍यों डाल रखा है? ऐसा कोई कोट, या कैसा भी कोट तो मेरे पास था भी नहीं? फिर इसे पहनकर मैं कैसे टहल रहा हूं? क्‍या हम सचमुच कश्‍मीर की जंगलों में भटक गये हैं?..

दरख़्तों के बीच एक सरसराहट हुई, फिर एक परिंदा हमारे माथों को छूता, एक बदहवास उज्‍जड चीख़ उगलता, गुज़रा. पतली काठी का ऐंठा हुआ एक बदसूरत जवान था तेज़ी से ऐसे पलटा जैसे फ़ि‍ल्‍मों में अचानक बंदूक से किसी का काम तमाम करने को क़ि‍रदार पलटते हैं. मैंने धमाके के खौफ़ में एकदम से आंखें मूंद लीं, कान पर हाथ रख लिये. लेकिन कोई धमाका सुन पड़ा नहीं. आंखें खोली तो वही दिखा जिसे इतनी देर से देखते-देखते अब आंखें थक रही थीं- कुहरीले अंधेरे में दरख़्तों के बीच रास्‍ता बनाते लोग चुपचाप आगे को चल रहे हैं! हद है. अचानक मेरे कान में आकर कोई फुसफुसाकर कहता ये सारी सूरतें हक़ीक़त नहीं, धुंये की लकीरे हैं तो यकीन मानिये मुझे ताज़्ज़ुब नहीं होता. हालांकि इतनी देर तक धुंधलके में चलते, और ऐसे लोगों की संगत में चलते हुए मेरे कान में आकर कोई यह भी फुसफुसाकर कह जाता कि मैं भी असल नहीं आत्‍मा हूं, शायद तब भी मुस्‍कराकर हामी में सिर हिलाकर मैं यही कहता कि सही कहते हो, दोस्‍त..

माने एक बात है हर स्थिति-परिस्थिति का एक सलीका होता है. एक डिज़ाईन होता है, देयर इज़ सम लॉजिक टू इट. यहां क्‍या है, कुछ नहीं है. हू आर दीज़ एट गाइस, कौन हैं, क्‍यों हैं- और सबसे मज़े की बात मैं इनके साथ क्‍या कर रहा हूं, क्‍यूं हूं? और जा कहां रहे हैं आई डोंट हैव अ फेंटेस्‍ट आईडिया! ख़बर की जा सकती थी, ख़बर करना इतनी बड़ी बात न होती, लेकिन अपने-अपने, व माहौल के सन्‍नाटे में हर कोई कुछ इस तरह का रहस्‍यभेदी तनाव ओढ़े है कि एक छोटी बात तक के लिए मुंह खोलने में दम फूलता, घबराहट होती. लगता जैसे कॉमन कंसेंसस के खिलाफ़ किसी तरह का क्रिमि‍नल एक्‍ट कर रहे हों! सच्‍ची में. आगे-आगे तीसरे नंबर पर चल रहे दोहरी देह के एक अधेड़ सज्‍जन थे, तेज़ कदम टहलता हुआ मैं उनके साथ हो लिये था. थोड़ी बेतक़्क़लुफ़ी रही होगी लेकिन ऐसा नहीं कि मेरे लहजे में बेलिहाज़ जैसी कोई बात आयी. मैंने मासूमियत से सवाल किया था- भाई साहब, हम जा कहां रहे हैं? बड़े मियां ने ऐसी जलती नज़रों मुझे घूरा मानो सरेबाज़ार मैंने उनकी बेटी का हाथ मांग लिया हो! ईमानदारी से कहता हूं उन नज़रों में कुछ ऐसी नफ़रत थी कि मैं घबराया अपनी जगह अटका खड़ा रह गया था. स्‍टंड! आई एम सॉरी कहने की भी मुझे हिम्‍मत नहीं हुई थी.

माने कोई रिफ़्लेक्‍ट करे तो ऐसी घटना का कोई तुक है? एक छोटे से सवाल से भाई साहब की तौहीनी हो गयी? याकि हमारे मुंह खोलने से? साथ चलते में आदमी आपस में बात न करे फिर साथ चले ही क्‍यों? या क्‍या तो नाम है उस विदेशी मुल्‍क का, उसके चलन हम उधार ले रहे हैं जहां पड़ोसी के लिए भी दरवाज़ा बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर खोला जाता है? इज़ंट इट फ़नी? ऑर टेरीबली स्‍केरी? क्‍या लोग अब सीधे-सीधे आपस में बात करने का तरीका भूल गये हैं? उसे सीखने के लिए भी बिज़नेस-सोशल स्‍कूल ज्‍वॉयन करने की ज़रूरत होगी? व्‍हाट अ फार्स! एंड दिस डैम साला जंगल- डैम ईट!

फ़ि‍ल्‍मों में, असल ज़िंदगी में ऐसा नहीं कि मैंने पहले जंगल नहीं देखे. देखे हैं, चार-छह मर्तबा तो देखे ही हैं. रेल की खिड़की पर बैठा जंगलों के बीच से गुज़रा हूं. कैमरा क्लिक करके फोटुएं उतारी हैं. लेकिन ऐसा जंगल पहले कभी नहीं देखा. न ऐसे पेड़. किसी भी पेड़ के बगल से गुज़रो, उसे नज़दीक से देखो, घूर-घूरकर देखो, लगता ही नहीं इन्‍हें पहले कभी देखा है. सपने में भी नहीं. हो सकता है आपमें से किसी ने देखा हो. मैंने नहीं देखा. ऐसे बहके-बहके व घबराहट जगाने वाले रंग मेरे सपनों में नहीं आते. रौशन ने भी कभी सपने में ऐसा जंगल देखा हो मुझे नहीं लगता. देखती तो मुझसे ज़रूर कहती. ऐसे रंगों के बारे में ही कहती. क्‍या बला है ये? कहां फंस गया हूं?

दूर किसी रेल के गुज़रने की सीटी सुनाई दी. मैंने एकदम से चमककर देखा. मगर बाकी लोग चुपचाप आगे की ओर सिर नवाये चले जा रहे हैं, मानो किसी ने कोई आवाज़ सुनी ही न हो! सच बताऊं तो मैं एकदम से भागकर जंगल से निकल जाना चाहने लगा. इस पूरे बेमतलब खुराफ़ात से बाहर. बैक टू माई वर्ल्‍ड. बैक टू माई रौशन. लेकिन निकासी के रास्‍ते किधर थे. पलटकर एक नज़र पीछे की ओर देखा, जहां से होते हुए अभी थोड़ी देर पहले हम इधर आये थे, तो पीछे अंधेरे धुंध की चादर दिख रही थी, बस.. उससे परे? क्‍या होता उसके परे? और घुप्‍प अंधेरा?..

(अंगड़ाई है.. just a teaser for myself)

Monday, December 8, 2008

ओह, सच आर्टिस्टिक इम्‍प्रेशंस..

आवारा दिन, दोपहर, शाम की कुछ ठहरे, छूटते इम्‍प्रेशंस. बेमतलब में पता नहीं क्‍या लयकारी, गहरायी खोजते; न खोज पाने पर फिर अटकते-भटकते; बाहर से भीतर फिर भीतर से बाहर दौड़ जाते, अंतरंग को बुलाते, बजाते- कभी कोई दोस्‍ती थी तो क्‍या था उसमें अनोखा ऐसा की पहचान पुकारते.. अरुण, म्‍हाडा, हाईवे, सजल कमल विमल, मुंबई उत्‍तर के अनुत्‍तरित स्‍पेस, दीवारें, पाखी विनीता नितिन वर्मा प्रकाश मीरा कुशवाहा, गोलू मयंक रोड राय और वैसे ही जाने और क्‍या-क्‍या अगड़म-बगड़म..