Thursday, January 31, 2008

पतितकुमार की डायरी का एक अप्रतिम अंतरंग पृष्‍ठ..

ऐसा नहीं है कि मेरी चमड़ी या मैं मोटा नहीं. सिर पर कुछ बाल ही नहीं बचे थोड़ी बुद्धि भी बची है- आई स्‍वेयर- मगर फिर भी मैं पैरानॉयड हो रहा हूं (मगर कहां हो रहा हूं?) व्‍हाई? कैन एनीवन टैकल दीज़ फीमेल पताकाज़? एंड पतिंगाज़?.. ओह, गो अवे यू नैस्‍टी डिमविट पैरा एंड नॉया.. सी, दे आर नॉट गोईंग? दे आर नॉट इवन मूविंग! मेरे डायरेक्‍शन में देख रही हैं.. और उस नज़र से नहीं देख रहीं, बद्तमीज़, कि मैं भी हिलगकर नज़र मिलाऊं.. रस लूं, रम जाऊं! हिलगने की जगह हिल जा रहा हूं.. जबकि वह जमी हुई हैं.. गिविंग मी दोज़ लुक्‍स (यू नो व्‍हॉट लुक्‍स, मैन!).. मगर ऐसा क्‍या अलल-बलल किया मैंने कि ये इतना फैल रही हैं? फूल रही हैं? इनकी फेंस पर खड़े होकर सीटी बजायी? इनके बैकयार्ड से नींबू तोड़े? दैन, व्‍हाई दे आर पेंटिंग द टाउन रेड.. एंड मी ब्‍लैक? इनको मालूम नहीं कि आप कितना भी ब्‍लैक-ब्‍लैक चीखो मैं ब्‍लू ही देखूंगा? बिकॉज़ दैट्स माई एजुकेशन. एंड आई अम अ मैन ट्रू टू माई ट्रेडिशन. ढाई हज़ार साल से उसी ट्रेडिशन की मज़बूत ज़मीन पर खड़ा हूं और आनेवाले ढाई हज़ार साल तक वहीं खड़ा रहूंगा. पनामा के पायलट कॉंफ्रेंस में पहुंचकर भी मुस्‍कराते हुए अपना पुष्पित पुष्‍पक यान-ज्ञान ठेल दूंगा. विल ऑलवेज़ रिमेन लाइक दिज़. अनमुवेबल. अनमूव्‍ड. मगर तुम औरतें हो कि समझती नहीं हो. मुझको तो नहीं ही समझतीं. मगर मैंने भी इतना सीख ही लिया है कि औरतों को समझना हंसी-मज़ाक नहीं. हंसी तो नहीं ही है. मज़ाक.. लेट्स फॉरगेट अबाउट इट..

लेकिन यह सब मेरी समझ से बाहर है. रियली. आई मीन ऐसा कभी हुआ कि किसी लेडी ब्‍लॉगर के कमेंटबॉक्‍स में कमेंट की जगह मैंने अपने शिमरिंग इमोशंस रखे हों? और रखे भी हों तो मुझे तो ऐसा याद नहीं पड़ता.. और उस लेडी को भी याद पड़ भी जाये तो इससे पहले तो उसने या किसी और ने प्‍याले में या कहीं भी तूफ़ान खड़ा नहीं किया? देन व्‍हाई नाऊ दिज़ डिमविट पैरा एंड नॉया? बिकॉज़ दे थिंक दे आर समथिंग? समवन स्‍पेशल? कमॉन, गर्ल्‍स, डोंट गो ऑन गिविंग मी दोज़ लुक्‍स.. मैं अच्‍छा बच्‍चा हूं, रियली? गो एंड आस्‍क माई मदर.. ऑर सिस्‍टर (घरवाली, हास्पिटल वाली नहीं.. प्‍लीज़, डोंट आस्‍क हर एनीथिंग.. द बिच विल टेल यू ऑल फेब्रिकेटेड स्‍टोरिज़!).. औरतों, लड़कियों, बच्चियों सबके प्रति मेरे मन में अतिशय (अननेसेसरी, आई वुड से) सम्‍मान है! हैव यू सीन माई कमेंट्स ऑन बेटियों का ब्‍लॉग? हाथ से ही नहीं मैंने वहां सिर झुका-झुकाके कमेंट किया है. खुद को गिराके किया है सच्‍ची कह रहा हूं. एक और काम की बात बताऊं? लिसन.. औरतों का तो है ही, जल्‍दी ही मैं एक लड़कियों का ब्‍लॉग शुरू करने जा रहा हूं.. लड़कियां वहां चाहें जो करें (खाना बनायें, रेसिपी लिखें, मेरे चरण धो-धोके पियें.. और जब चरण धो-धोके पीते हुए धन्‍य न हो रही हों तो जितना चाहें मधु मुस्‍कान और मणिमुकुंद मार्तण्‍ड या माता मछिंदरी देवी का पाठो करती रहें) एंड वी विल क्‍लैप फॉर देम. दूसरे न भी करें, मैं करुंगा, पैरा, दैट्स अ प्रॉमिस!..

एनीवे, मैं कुछ और कह रहा था; वेरी मीनिंगफुल एंड ट्रू टू माई नारीवादी फीलिंग्स.. वो मदर और सिस्‍टर वाली बात.. मैंने हमेशा सिस्‍टर और मदर के हाथ की चाय पी है.. और हमेशा पी ली है, कभी वापस पलटकर थ्रो-बैक नहीं किया.. किया है तो वह मेड की बनायी चाय को किया है और मेड पर ही किया है मदर पर नहीं! मदर को तो मैंने हमेशा माता समझा है और उनपर कुछ फेंका है तो स्‍वयं को उनकी चरणों पर फेंका है! उनके यह कहने पर- जबसे आई है, हमरे बिटवा को खाय गई, मुंहजार!- ढकेला भी है तो मदर को नहीं अपने बेटर हाफ को ढकेला है.. और उसी शाम छै सौ की साड़ी खरीदकर उस बेवकूफ के साथ मेकअप भी किया है दैट्स आल्‍सो अ फैक्‍ट! हालांकि हर काम के लिए आसरे न रहना होता तो इच्‍छा तो ज़रूर होती है कि बदकार को कभी मनभर कुटूं.. (ओह, इस एक छोटे जीवन में कितनी तो इच्‍छायें यूं भी अव्‍यक्‍त की अव्‍यक्‍त ही बनी रह जाती हैं- तुम कभी नहीं जान पाओगी, पैरानॉया!)..

मैं भी इन लड़कियों के पीछे कहां-कहां तो बहक रहा हूं.. मदर और सिस्‍टर की बता रहा था कहां उस बदकार के भंवर में उलझने लगा.. ओह, सिस्‍टर, व्‍हेयर डू आई प्‍लेस यू? हमेशा तुम्‍हें सिर और आसमान पर बिठाकर नहीं रखा? नहीं, नहीं, आज सबको बता ही दो! इज़ंट इट ट्रू सिस्‍टर कि हमेशा सिस्‍टर को प्रोटेक्‍ट किया है? जब वह अनप्रोटेक्‍ट होना चाहती थी तब भी किया है. कॉलेज में उसके नोटबुक में लेटर रखनेवाले एक जोकर की वो कुटाई की है कि ज़िंदगी भर याद रखेगा. ऐसे-ऐसे पीस और प्रोटेक्‍शंस प्रोवाइड किये हैं कि सिस्‍टर तो लाईफलॉंग याद रखेगी ही.. मैं अच्‍छा बच्‍चा हूं, पैरा. एंड नॉया. कांट यू लीव मी अलोन? दिखता नहीं दूसरी औरतें देख रही हैं और तुम्‍हारी वजह से मेरी इमेज हिल रही है? मैं तो रहा ही हूं. हिल.. बट रियली? इज़ंट माई चमड़ी मोटी एंड माथा छोटा?

(यह शुद्ध और खांटी पतितकुमार की डायरी का ही पृष्‍ठ है. कृपया कोई अन्‍य सज्‍जन या दुर्जन इसे अपनी डायरी का समझकर पढ़ने की धृष्‍टता न करें..)

और नाला बहता रहा..

प्रेमीयुग्‍म के लिए आज कितना तो सुहाना दिन था. मनोज कुमार जीतकर लौटे थे और मनीषा जी तो रही ही थी, अभिलाषाओं को भी जीतती रही थी.. जीते हुए प्रेमीयुगल, ओहोहो!.. नाले पर बनी पुलिया के उसी लवरपॉंयट पर प्रेमीद्वय मिले जहां पिछले बाईस महीनों से मिलते आ रहे थे. गर्मियों में सूख जाने पर नाला भयानक दुर्गंध छोड़ने लगता था, फ़ि‍लहाल अपने करीयरपने में सजा स्निग्‍ध सुगमता से बहता- प्रेम की प्राकृतिक लालसाओं का उद्दीपन बना- अपने सौंदर्य में ढहा व प्रेमीयुगल को श्रृंगार व मन की उमंगी बहार में ढहाये जा रहा था..

मनोज कुमार इस वैचारिक प्रौढ़ता को साबित कर रहे थे कि मन में काव्‍य की हुमसती कामनाएं हों तो उद्दीपन के लिए वियेना का क्‍लासिकी संगीत व पैरिस की सपनीली सांझ की ज़रा भी ज़रूरत नहीं बचती.. कश्‍मीर की सुरम्‍य वादियां और झूमते झील व्‍यर्थ ही नहीं बकवास हैं.. मन-प्रांगण नाले पर भी रम सकता है.. रम ही नहीं सकता, मीठे ताज़महल खड़े करके मुमताज़ की मम्‍मी और शाहजहां का बाप हो सकता है.. वही हो रहा था- शाह और जहांओं का बाप.. मगर मुमताज़ की मम्‍मी मीनिंग मनीषा कांप-कांप जा रही थी. उसी कोमल कंपन में अकुलाई (इठलाई नहीं) बोली- पता नहीं, प्रिये, सब इतना सुखकर है, आह्लादकारी है फिर भी मन में जाने क्‍या है कि कुछ मुरझाया-मुरझाया सा लगता है..

मनोज कुमार कार्ल गुस्‍ताव युंग और कलहिब्‍नोरब मरक़त बै की तर्ज़ पर नहीं अपनी ही तर्ज़ पर सोच रहे थे.. फिर भी चेहरे पर एक फीक़ी मुस्‍कान लिए सोचने से बाज नहीं आ पाये- हां, कुछ है जो सकुचाया-सकुचाया सा लगता है.. क्‍या है?

बैकग्राउंड में कहीं टी-सीरीज़ के अनुराधा पौडवाल के भजन की जगह अब लता मंगेशकर महबूब की मेंहदी की लीना चंदावरकर को ‘जाने क्‍यों लोग मुहब्‍बत किया करते हैं’ गवा-गवा के रुला रही थी.. नतीजे में प्रेमीयुग्‍म को कातर बना रही थी..
उमठी व उमेठी हुई मनीषा के मुंह से आह फूटी- ओह, मन में क्‍यों यह उलझा-उलझा सा दर्द उमड़ता है, प्रियंवद? क्‍यों उठती हैं ऐसी तप्‍त सिसकारियां.. चिनगारियां?

मनोज कुमार हुमसकर चाहते थे स्‍वयं से छूट जायें. उमड़कर भार्या के होंठ चूम लें, जीवन का जाम पी लें.. मगर पुलिया की सार्वजनिकता में कितनी आंच जीते? जहां बैठे थे वहीं बैठे रहे.. लब नहीं चूमा, नयनों ही नयनों मुस्‍कराये. मनीषा का हाथ अपने हाथों में लेकर हल्‍के से दबा दिया.. मन के श्रृंगारिक कामनाओं पर पुष्‍प अर्पित किया और सोचते रहे काव्‍य के किस नये पथ पर अगला प्रमुदित चरण धरेंगे..

नाला बेशर्मी से अपने करीयरपने में बहती रहा..

Wednesday, January 30, 2008

मालगुडी की तर्ज़ पर बकलोल डेज़..

“मी लॉर्ड, महामहोपाध्‍याय! तमाम गवाहियों के आधार पर आज मैं यह साबित कर देना चाहता हूं!” (क्‍या साबित कर देंगे.. और शिवमणि उपाध्‍याय कौन कहां के लॉर्ड?.. और हम ससुर, अलल-बलल बकते स्‍वयं पर मुग्‍ध होते बकलोल प्रसाद?).. जेब में पैसे नहीं, नहीं तो ताज्‍जुब की बात न होती कि हम ‘दामिनी’ के सनी देओल टाइप वकील वाला काला झगबग कोट सिलवा लाये होते.. और आत्‍ममुग्धि की मुस्‍की में नहाये का एक फ़ोटो उतारकर अपने ब्‍लॉग पर चिपका दिया होता! कितना स्‍वस्‍थ्‍यकारी, संतोषदायी होता है किसी वाजिब बात के लिए जोर से हुंकारी भरना.. दुनिया के उलझे, जटिल महामशीन में अपने होने की सार्थकता का एक क्षणिक ही सही, तरल-निर्मल एहसास! लेकिन थोड़ी देर के लिए हमें ग़लतफ़हमी भले बन जाये, इससे यह नहीं साबित हो जाता कि दुनिया- माने शिवमणि उपाध्‍याय की छतरी के नीचे का तुरई बराबर संसार- गरदन तक कीच में धंसी है और हम धवल-नवल कमलरत्‍न लाइफ़बॉय के अवतार हैं! कीच में रहनेवाला जितना कीच को प्रभावित करता है उतना ही कीच से प्रभावित भी तो होता है.. मनुष्‍य (अपने को मनुष्‍यत्‍व की हाई कैंडीडेसी दे सकता हूं? स्‍वास्‍थ्‍यकर होगा?) अपने समय और समाज की ही तो पैदावार होता है.. तो मैं अपने समय से तो नहीं ही उठ पा रहा हूं, समाज से उठकर कहां जाऊंगा? जा पाऊंगा? और चला ही जाऊंगा तो रघुराज फ़ोन पर पिनपिनायेंगे नहीं कि सब ठकुरैती धोके पी गए, ससुर, बस छांटने को अब यही शेक्‍सपीयरी बची है?

ख़ैर, तरल-निर्मल एहसासों के क्षण बड़े क्षणिक होते हैं. बकिया के नॉर्मल काटनेवाले क्षण नहीं घंटों में रुना लैला चीख-चीखकर याद दिलाती ही रहती है कटे नहीं दिन-रैन किसना तेरे बिना (बंशीधर फटिक कि किशन घई?)..

और फिर वह नानी वाली कहानी है ही (पता नहीं किसकी नानी थी).. कि एक गांव था गोल. कुछ गोल मानुस थे कुछ पोल (पौलेण्‍ड वाले नहीं). कुछ उल्‍टे थे, कुछ और ज़्यादा उल्‍टे थे.. कुछ पूरी उल्‍टी ही थे.. मगर औसत बकलोलों का ही था. सारे नीति-नियम बकलोली के थे.. बकलोली में सुबह खिड़की से परदा उठता, बकलोली में रात लालटेन की बत्‍ती बुझाई जाती.. थोड़ी शांति नहीं छाती कि फिर कहीं बकलोली का हल्‍ला होने लगता.. कबहुंओ चैन नहीं था, बच्‍चा.. ओह, व्‍हॉट अ नैस्‍टी बकलोल विलेज़ इट वॉज़!

Tuesday, January 29, 2008

दौड़ती हुई लड़की.. सम्‍हल के!

प्रत्‍यक्षा मान नहीं रही.. कहा था चुप रहूंगी मगर लिखके बोल रही है.. लिख क्‍या रही है दौड रही है (कि दौड़ते हुए लिख रही है? दौड़ते हुए गिर गई तो? इसके बारे में सोचा है? गिरी हुई लड़की को कोई उठाने आयेगा? अपने यहां उठाते हैं? हिंदी ब्‍लॉगजगत की लड़ि‍याहटें तो टेलीविज़न टाइप एक्‍सटेंडेट फैमिलीवाला इल्‍यूज़न है, ऐसी गिरी हुइयों से तो घरवाले तक हाथ झाड़कर अलग खड़े हो जाते हैं.. कि टंटा बैगेज हैंडलिंग की एक सीमा होती है, सीमा से पार जाओगी तो विशुद्ध गड्ढे में गिरोगी! शौक है गिरी रहो, हमको मत इनवाईट करो.. हद है.. रोते-गाते दस टिप्‍पणी मिलती है, क्‍या चाहती हो तुम पर छतरी तानने के पीछे अपने टिनहा टिप्‍पणी-बैंक में छेद कर दें? साल भर हमारे हर पोस्‍ट पर कमेंट कसती रहोगी ऐसा कॉंट्रेक्‍ट लिखित में हमरे जी-मेल अकांऊट में भेजा तब्‍बो नुकसान हमारे ही एंड पर होगा.. नहीं, गिरी हुई बेटी, हम आपको अन-एकनॉलेज करते हैं.. आप गिरी रहो.. हमने पहले ही कहा था इतने तेज़ कदम मत दौड़ो.. दौड़ी तो अब भुगतो भी! देखते हैं कितने दिन तुम्‍हारे ब्‍लॉग पर पोस्‍टों की बत्‍ती जलती है.. इन एंड आऊट अमावस न करवा दिया तो हम भी, लड़किन्‍नी, वाजिब ब्‍लागपुरुष नहीं!)..

इसी बहाने अच्‍छा हुआ पता चला (दूसरों को नहीं, हमें) कि अभय अपने निर्मल-आनन्‍द में कभी-कभी सेल्‍फि‍श भी हो सकते हैं, माने उनका आनन्‍दत्‍व दूसरों के बीच कड़वाहट का सबब भी बन सकता है.. और प्रियंकर तो.. मीठे कंकड़? अप्रीतिकर? आई डोंट नो, एम स्टिल सोर्टिंग आउट..

दूसरे, यह इस ओरकुट टाइप इंटर-ऑफिस नेटवर्क को वैली ऑफ द ब्‍लाईंड्स पुकारना कुछ ज़्यादा नहीं हो गया? वोंट इट बी मोर अक्‍यूरेट टू कॉल इट वैली ऑफ द भैंगास? वेल, दैट वॉज़ एन आइडिया.. लेकिन, फिर कहूंगा, इतना दौड़ना वैसे ठीक बात नहीं.. गिरीं तो साथ में कोई नहीं रहेगा.. मैं तो नहीं ही रहूंगा.. मैं वैसे ही बहुत गिरा हुआ हूं!

Monday, January 28, 2008

धुआं धूल गोली..



घोड़ा सरपट दौड़ता भागा
पुलिया पर अकस्‍मात उठा गर्द
सब कहीं पसर गयी धूल की होली या
वह थी बेसाख्‍ता छूटी दन्‍न गोली?
ठीक-ठीक कहना मुश्किल है क्‍योंकि
मैं हकबकाया हुआ था, एड़ी पर खड़ा
हमेशा की तरह घबराया हुआ था
एक औरत लपककर चीखी या
कोई बच्‍चा था छूटकर गिर पड़ा
कोई हारमोनियम बजा रहा था या
जाने कुछ गा रहा था जबकि
मैं बेवक़ूफ ठंड के सूखेपन
में हथेलियों से चेहरा सहलाता
साफ़ कर रहा था घोड़ा था खच्‍चर था
आख़ि‍र माजरा था क्‍या. नेक़ी में नहाये
इतने में कोई थे शराफ़तलाल नज़दीक कान के
आये संजीदगी से फुसफुसाकर कहा-
गजब करते हो, मियां, दिखता नहीं
क्‍या मजमा है और तुम गुनगुनाने
गोली खाने निकले हो? कमसकम
साथ की जनाना का ख़्याल किया होता?
चिथड़े-चिथड़े भटक रहा था मगर जाने क्‍यों
एकदम-से हंसी आ गयी, हिलते-हिलते कहा-
कौन किधर किसकी जनाना? सुनिये, शरीफ़दास
ऐसी-ऐसी माथापच्चियों के बाद किसी तरह तो
जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं और आप हैं कि
जोड़ने की जगह तोड़ रहे हैं?
चलिए, यही एहसान कीजिए बताइए
कहां खड़े होकर शहर को कैसे देखें
या कोई तो गोल होगा जिसमें आत्‍मा हिलगाकर
आदमी की तरह मुस्‍करा सकेंगे कि यह
ज़्यादा की कामना हो जायेगी?
इस पुलिया पर आधुनिक मिज़ाज सिर्फ़
और सिर्फ़ अभिशाप होगा, शराफ़तलाल?
इतने में दरककर कोई दीवार गिरी
या कोई एक हाथी था पागल हो गया था
या मैं ही था बहककर पुलिसवाले से उलझ गया था
या शीशे से टकराकर सिर फोड़ लिया था
गो मज़ेदार बात थी अब भी उजबकों की तरह
हंस रहा था. सड़क पर थोड़ा ख़ून था संभवत:
हमारे समय का था मेरा नहीं था
जो मेरा था, बटुये की घिसी पहचान
की तरह धीमे-धीमे मैं उसे सहेज रहा था.

(बॉदेलेयर की चरणों में बैठकर)

Sunday, January 27, 2008

संडे क्‍या.. कभी भी आये, गुस्‍सा विशुद्ध चिरकुटई है!

गुस्‍सा आना अच्‍छी बात नहीं. ख़ास तौर पर मेरे जैसों का तो और, जो यूं भी बरिस्‍ता और बंगलो की बजाय गलाजत की छत के नीचे रहते हैं.. और गुस्‍सा आया नहीं कि गलाजत गले में वरमाल डालने के लिए छटपटाने लगती है! दिमाग और देह के दूसरे हिस्‍से पटपटाते हैं वह एक अलग प्रक्रिया शुरू हो जाती है. औरतों से तो कुछ उम्‍मीद करने का मतलब नहीं ही है, उंगलियों पर गिनकर जो चार आदमी ‘जेंटलमेन’ की चिप्‍पी अपने डायरेक्‍शन में प्रेषित करने की किसी तरह ठेलमठेल करके सोच सकते थे, वो भी अकबकाकर महटियाने लगते हैं. स्‍टेप बैक कर जाते हैं.. मांएं जो नहीं पढ़ पाती हैं, और पढ़ती हैं तो जीवन की किताब पढ़ते हुए ही धन्‍य बनी रहती हैं, हमारी पोस्‍टें पढ़ लें तो न पोस्‍ट न हमको समझ पाती हैं.. वह भी गुस्‍सा पढ़के न केवल समझ जाती हैं, बल्कि सन्‍न हो जाती हैं, और बनी रहती हैं (हम तो जो बन जाते हैं उसकी फ़ोटू जितना छिपाये रखें उतना ही अच्‍छा!).. तो ऐसे गुस्‍से का क्‍या फ़ायदा.. घेले भर का नहीं.. जो आपको (यानी मुझको) माताओं का दुलरुवा बुचरू होने की जगह मोहब्‍बत व ममताभरी एक चाय तक से वंचित कर दे.. आपकी तक़लीफ़ को मधु मुस्‍कानी समाज में उल्‍टे उपहासास्‍पद विद्रूप में बदल जाये, वह ऊपर का बोनस.

पचास लोगों की मधु मुस्‍कानी महफ़ि‍ल में (बहुत बार बिना किये, मगर ज़्यादा मौकों पर) हेंहे-ठेंठे करते हुए लोकप्रियता की चुस्कियां किसको अच्‍छा नहीं लगता.. अलोकप्रिय होने के ख़्याल से नेहरु साहब की भी रूह फना होती होगी.. फिर हम नेहरु तो क्‍या नलिनविलोचन नारायनदास तक नहीं!.. मगर अंदर कोई समझ, विवेक की ऐंठ है जो अपनी ठौंस से अपना राग और अपना टप्‍पा ही गवाती है.. और इस पतनशीलता की रौ में (पता नहीं क्‍या गड़बड़ी है कि) बीच-बीच में चिरकुट ‘प्रगतिशील’ गुस्‍सा भी ठिलवाकर लिये आती है! क्‍या हो जाता है इससे.. चार घण्‍टे के लिए मधु मुस्‍कानी रेल डिरेल होती है, बाकी जो है सो है और क्‍या उखड़ता है? इस उखड़े हुए देश में दो-दो कौड़ी की चिरकुटइयों पर दांत चियारते रहने से अलग अब किसी भी बात से किसी का क्‍या उखड़ता है? कुछ नहीं.. तो फिर हम ही फैल और फूटकर फटते हुए अलोकप्रियता के चप्‍पल क्‍यों खाना चाहते हैं? भूल गए थे तो खुद को सिर नवाये शर्मिंदगी में याद दिला रहे हैं कि गुस्‍सा ग़लत बात है. माफ़ी चाहते हैं अगर हमने गुस्‍सा थूका था. थूका था तो उस थूके को चाट लेते हैं. सॉरी.

चिरकुट लोग बहुत बार एक चिरकुट बात काफी पीटते रहते हैं कि इस देश में शिक्षा और संस्‍कृति बहुत दूर की बात है. सारी आईआईटी और आईआईएम और ये और वो जो जेम हैं एक अदद रोज़गार पाने का साधन मात्र हैं, वह किसी ठेंगे से आधुनिकता का कोई संस्‍कार नहीं लायी हैं, न इन रास्‍तों से कभी लायेगी. संस्‍कृति तो बहुत दूर की कौड़ी हुई, वह एक बेसिक एलिमेंटरी लोकतांत्रिक भावना तक नहीं लायेंगी. क्‍यों नहीं लायेंगी, भाई? क्‍योंकि यूपी, बिहार, राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश के हम हिंदी भाषी सर्वज्ञों ने उसे लड़कर जीता नहीं है. और जो चीज़ लड़कर जीती नहीं जाती, घर बैठे घेलुआ में मिलती है, उसकी हम वाजिब क़ीमत नहीं जानते (इज़्ज़त करना तो नहीं ही जानते). इसलिए भी अस्‍वाभाविक नहीं कि हमारी सारी लोकतांत्रिक अपेक्षाएं और कामनाएं सड़क, पुल और अस्‍पताल बनवाने के मांगों तक सीमित हो रखी हैं. उससे ज़्यादा की बात पर हम जोकर बताये और दिखाये जाने लगते हैं. फिर किसी की पत्‍नी से खिचड़ी खाने की मांग उठायी जाये या उससे या किसी से पेड़ पर चढ़के दिखाओ तो जानें की ऐसी, वैसी, कैसी भी मानसिकता निजी पत्र नहीं सार्वजनिक मंच पर ज़ाहिर किया जा रहा हो, यह उनका आपसी सौहार्दमय अंतरंग संवाद और चुटकी समझके कड़वे पान की तरह गटकके मुस्किया लिया जाना चाहिए. भई, पत्‍नी किसी और की, चुटकी आदरणीय गुणरत्‍न बड़के भैया ले रहे हैं, तो हमको धुआं-धुआं होने का हक़ कहां से बनता है? बनता भी हो तो उसे एक सीक्रेटीव पत्र या फ़ोन में व्‍यक्‍त करने की जगह पचास लोगन के पब्लिक डोमेन में लाके रार फैलावें, इसका अंतरंग अधिकार कहां से बनता है? गुस्‍सा करने का तो किसी भी तरह से नहीं बनता, क्‍योंकि जैसा मैंने पहले ही कहा था वह इस पचास लोगन की मधु मुस्‍कानी महफ़ि‍ल में किसी व्‍यक्ति से हेंहें-ठेंठे तो नहीं ही दिलवाती, किसी महिला से जेंटलमेन तो क्‍या ‘ओ, मैन!’ तक की लड़ि‍याहटों का दुलार भी कहां दिलवाती है?

भारतीय लोकतांत्रिक भावना, स्त्री-ट्री विमर्श सबकी जै! सबको जै!

Saturday, January 26, 2008

ये तरीका है बात करने? अरे?..

प्रत्‍यक्षा ने एक पोस्‍ट चढ़ाया है, देखकर एकदम दिमाग सुलग गया. दिमाग सुलगाने के लिए ज़रूरी नहीं आदमी चीन जाये (उसका लिंक यह रहा), यहां रहकर भी लड़कियां (जो पता नहीं क्‍यों औरतें हो गईं) दिमाग सुलगवा सकती हैं! सबसे पहले तो प्रत्‍यक्षा से मैं यह पूछना चाहता हूं कि दिमाग किसी मोटी किताब में रखकर यह पोस्‍ट लिखी, या लिखते वक़्त भूल गई कि दिमाग और धर्म कहीं आसपास रखकर ही ऐसे गड्ढों में पैर उतारा जाता है? औरत को तो विशेष उतारने की भी ज़रूरत नहीं क्‍योंकि वह पहले से ही गड्ढे में है. नहीं है? डोंट टेल मी.. बिकॉज़ दैट आई वुड फाइंड वेरी सरप्राइजिंग! वेरी फनी रियली.. क्‍योंकि धर्म को पहचान के तदनुसार काम किया हो (यानी पोस्‍ट लिखा हो) ऐसा तो दूर-दूर लक्षित नहीं ही हो रहा, नैतिकता का संकीर्ण कॉंसेप्‍ट भी कंसिडर किया गया (पोस्‍ट लिखने में) इस ह्यूजली डाउटफुल!

सबसे पहले तो ऐसी, और इन जैसियों सबसे मैं ये पूछना चाहता हूं कि जब सब (माने इलाहाबाद, आगरावाले) डेली भास्‍कर और दैनिक अवेकनिंग पढ़ रहे हों तो आपको (माने इनको) अरागां-सरोयां पढ़ने की, और इस तरह से हम इलाहाबाद और आगरावालों को बेचैनी में डालने की, क्‍या ज़रूरत है? और आपको (माने इनको) ज़रूरत का ऐसा ही बुखार चढ़ा है तो उसे रजाई के अंदर छिपाके पढ़ने की जगह हिंदी ब्‍लॉगअंतर्लोक के व्‍यापक सौ मनई मंच पर सार्वजनिक करके इस ठंड में कंपकंपी उठवाने में कौन तुक है? हम (माने इलाहाबाद, आगरावाले) चीख-चीखकर कहते रहते हैं कि ये हंसी-दिल्‍लगी और कवितायें ठिलवाने (और बीच-बीच में हमारी समझवाली नैतिकता और धर्म-टर्म करने), हमारा बंग्‍लो और कुपे की फ़ोटो झलकवाने का सामुदायिक मंच है मगर आप (माने ये) आउट ऑफ कोर्स ऋग-यजुर-साम-अथर्व टाइप (एंड नेरुदा-वेरुदा एज़ वेल टाइप) भयानक लेखों की श्रृंखला ठेलने से बाज नहीं आओगे? (आओगी?) हम हंसी-ठिठोली करें कि मुंह सी के बैठ ही जायें? जिस प्रदेश (हरयाणा) में आप रहती हैं, हर दूसरे महीने आपकी जेंडर के साथ एक न एक रोमांचकारी कृत्‍य हो ही जाता है, माने हमारे एंड से हंटर फटकारते और लात लगाते रहने में हम कोई कसर नहीं ही रख रहे हैं.. फिर भी आप बाज नहीं आ रही हैं.. उल्‍टे प्रोवोक कर रही हैं!

सबसे पहले से भी पहले तो आप ये बताइए कि आपको बहुत बढ़िया खिचड़ी (मेरा सर्वाधिक प्रिय भोजन) बनानी आती है या नहीं? नहीं आती है तब तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी. फिर मैं करूंगा क्‍या? क्‍योंकि कुपे और कलकत्‍ते में बैठके मैं पोस्‍ट भले लिख लूं, किचड़ी नहीं बना सकता? खिचड़ी के लिए (मेरा सर्वाधिक प्रिय भोजन. आपका क्‍या है ये आप अपने मन में रखिये, हमें बताने का कोई फ़ायदा नहीं..) फिर क्‍या मैं मायावती, मॉनिका, मेनका, मानषी, मर्लिन, मीना और मलिना की चिरौरी करूंगा? सब मुंह फुलाके ज़ि‍द करने लगीं कि हमें किचड़ीकुक नहीं मेरी क्‍यूरी बनना है, तब? मायावती तो हाथ छोड़ सकती हैं (ऋग-यजुर-साम-अथर्व के आगे-पीछे जाने कौन-कौन गाली बक डालें, सो अलग)! गड्ढा में ज़रा सा पैर उतारकर हमारे लिए आप कितना वृहदाकार वृत खोद रही हैं, अहसास है आपको? या जिस दिशा में खेद रही हैं, उसका?

सबसे पहले से भी पहले से भी पहले तो ये बताइए दस साल में आप करोड़ उगा सकती हैं? क्‍योंकि नहीं उगा सकती हैं तो आपका जो कुछ भी ये क्षितिज या विशाल अंतरलोक या जो भी चिरकुटप्रसाद है उसका हम घंटा करें क्‍या. फटही गंजी में लपेटकर अगरबत्‍ती बालें? नहीं, आप थोड़ा क्लियर कर ही डालिए. क्‍योंकि समय और समाज की तो अभी यही सच्‍चाई है (हमारी तो है ही) कि मायावती हमारी कान उमेठकर दो चपत लगा दे इसकी हम भले न सोचें, नैतिकता और धर्म की बीच-बीच में ठेलते भी रहें, मगर मौके पर तो बाबू प्रेमचंद भी सामने पड़ जायें तो सबसे पहले यही जवाब तलब करेंगे कि मुंशी, फलाना दारोगा और ईदगाह-टिदगाह सब तो ठीक है मगर करोड़ पैदा कर सकते हो कि नहीं.. नहीं पैदा कर सकते हो तो ससुर, फिर किस काम के?..

और, ल्‍ल्‍लो, इस झंझट में हमारी चाह तो रह ही गई! ऐसा न हो इस तीखी कंपकंपाहट में मिठासभरा एक देसी गाना भी रह जाये तो उसे चिपकाय लें..



(गाना डेनीस आरकां की कनैडियन-फ्रेंच फ़ि‍ल्‍म द बारबैरियन इनवेज़ंस से उड़ाया गया है)

Thursday, January 24, 2008

पानी: एक फ्यूचरिस्टिक स्‍केच..

नल में पानी नहीं था. नाली में भी नहीं था. पूछने पर पता चला खुदरा पैसों के इन्‍वेस्‍टमेंट से नानी के यहां नैनो पहुंच चुका है हालांकि पानी की हाय-हाय वहां भी मची है. नीदरलैण्‍ड में तो मची ही हुई है. यकीन न हो तो कल के ‘वाटर टाइम्‍स’ के हेडिंग्‍स पर एक नज़र मार लीजिए. नाज़रेथ पर भी. सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं. कभी भी दंगा भड़क जायें इसकी पूरी संभावना है. क्‍या हालत हो गई है.. कैसी हो गई है.. मुहावरे तक तेल नहीं पानी लेने जाते दिख रहे हैं! कुछ दिनों में क्‍या, अभी ही कहने को नहीं रहा कि फलाने (शर्म से या जिस किसी से) पानी-पानी हो गए.. नहीं हो सकेंगे.. क्‍योंकि फलाने के पानी-पानी होते ही बहुत सारे लोग कंटेनर और घड़ों के साथ बाजू में भरने को मुस्‍तैद मिलेंगे! बुरी हालत हो गई है.. मीडिया का दो कौड़ीपना हालांकि रोज़ ही ज़ाहिर होता है मगर एक बार फिर इस तथ्‍य से नाटकीय तौर पर ज़ाहिर हुआ कि शेखर कपूर छै सालों से ‘पानी’ ‘पानी’ बनाने को रो रहे थे.. मीडिया, चाहती तो, इस ख़बर के निहितार्थ और शेखर की सघन अंडरस्‍टैंडिंग ऑफ हिज़ टाइम्‍स से दुनिया को नहीं तो कम से कम हिंदुस्‍तानियों को सचेत कर सकती थी, नहीं की, अब झूट्ठे गाल बजा रही है. सारे चैनलों में सूखी टोंटियों के टोटे चल रहे हैं. जो भी पानी है डिब्रूगढ़ से आ रहा है (पता नहीं डिब्रूगढ़ वालों का कहां से आ रहा है). सभी अतिथियों को सख़्त निर्देश है कि स्‍टूडियो में एक बार पैर रखने के बाद अपने-अपने जल के लिए स्‍वयं जिम्‍मेदार हों (पीने और बहाने- दोनों वाला!)..

नयी बीमारियों ने समाज पर धावा बोला हुआ है. लोग ठीक से पेशाब नहीं कर पा रहे हैं. जो थोड़े खुशकिस्‍मत हैं, कर पा रहे हैं, वो पानी की जगह दूध और जाने क्‍या-क्‍या बहा रहे हैं. एक नया मुहावरा सर्कुलेशन में आया है.. ‘दूध की नदियां बहती थीं’ की जगह ‘कभी यहां पानी बहता था’ कह-कहकर लोग भावुक और सन्‍न हो रहे हैं! बोकारो में पाण्‍डे और चतुर्वेदी परिवार के बीच झगड़ा छिड़ जाने की ताज़ा ख़बर है. आरोप है पाण्‍डों ने अपने लड़के का चतुर्वेदी की लड़की से रिश्‍ता तय करते हुए स्‍पष्‍ट आश्‍वासन दिया था कि चतुर्वेदी की लड़की जहां जायेगी वहां ढंग से पानी-पानी नहायेगी. लड़की के ससुराल पहुंचने पर चतुर्वेदियों को राज़ खुला कि जलाभाव में उनकी बेटी बारह दिनों से बेनहायी पड़ी है. बेपियी तो पड़ी ही थी!

बीएसई में पानी का भाव आसमान पर है. मॉल्‍स में भी पानी के स्‍टॉल्‍स के आगे लोगों की ग़दर है. ज़मीन में दबे एक नये सोते की ख़बर के साथ रीवां और रतलाम दोनों ही जगहों भारी जनजमाव शुरू हुआ है. हालांकि रिलायंस (पॉवर) कहती है इन सोतों के स्‍त्रोतों पर उसका निजी अधिकार है. जनहित में सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसा ही फ़ैसला दिया है.. मगर लोग हैं कि इस फ़ैसले को लात लगाकर रिलायंस के स्‍थानीय गुर्गों की ज़िंदगी हलक़ान किये हुए हैं. गजब कुंभ मेले-सा भावप्रवण, मार्मिक समां बना हुआ है. चम्‍मच और कप लेकर कृपया आप भी पानी बटोरने पहुंचिए.. मेरा नहीं, स्‍वामी मायामछिंदरजी मदनास्‍वरुपजी का आवाह्न है..

बर्फ़ और पानी..

अधनंगे देह चार दिन से मुंबई की सर्दीली हवायें संभालता मैं यूं ही घबराया हुआ हूं, फिर सीधे मस्‍क्‍वा से अवतरित हुए मिखायल अलेंक्‍सांद्रोविच को अकबकाये-कांपते देख, स्‍वाभाविक था मुझे ऊकताहट होती. वही हो रही थी जो मैंने उकतायी-चिढ़ी आवाज़ में मिखायल अलेंक्‍सांद्रोविच से शिकायत की- खादी भंडार का भारी चदरा रख दिया जाये तो भी बदन पर गड़ने लगता है, हम वैसे मुंबईवाले तक इस ठंड को झेले लिये जा रहे हैं. और आप, ससुर, मस्‍क्‍वा से आकर इन पनीली हवाओं में ऐसे मलिन, पानी-पानी हुए जा रहे हो.. हद है, यार?

मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच ने सिर झुकाये अपनी कंपकंपी वाली कंटिन्‍यूटी बनाये हुए धीमे से जवाब दिया- पता नहीं मस्‍क्‍वा के बारे में तुमने क्‍या ग़लतफ़हमी पाल रखी है.. वहां ऐसी ठंड नहीं है!.. मैं तो पानी की किल्‍लत से घबराकर यहां आया था लेकिन देख रहा हूं मुंबई में ज्‍यादा मारामारी है.. और ठंड तो त्रास्‍नोया दिस्‍गोस्‍तोशा सित्, सित्, सित्!

मैंने भाप फेंकते समोवार का ढक्‍कन हटाकर काठ के कलछुल से बाउल भरा, मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच की सर्द हाथों में उसे छोड़ आया- हूं.. तो अब मस्‍क्‍वा पुश्किन, तुर्ग्‍येनेव, दोस्‍तोव्‍स्की की दुनिया नहीं रही.. चमकीले-बर्फीले देश में पानी की मारामारी का सिनेरियो सजा हुआ है, हं?..

मेरे सवालिया स्‍टेटमेंट पर मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच ने मुझे ऐसी नज़रों से देखा मानो वह आसनसोल सिनेमाहॉल यूनियन का अवैतनिक कर्मचारी हो और मैं उससे दिमित्री मेंद्येलेव के पीरियोडिक टेबल के बारे में सवाल कर रहा होऊं. मुंबई की ठंड में कांपते मस्‍क्‍वा के मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच को मैं परेशान करना नहीं चाहता था, अलबत्‍ता मायकोव्‍स्‍की की जगह मैंने मार्क्स का ज़ि‍क्र किया- सबकुछ जो ठोस है हवा में पिघलता जाता है.. बुर्जूआ समाजों की खासियत है.. 1848 में बाबा की कही बात हमारे वक़्त के लिए कितना सटीक बैठती है!..

मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच ने ठंड की घबराहट और कम्‍यूनिस्‍ट मेनिफेस्‍टो और मार्क्‍स के प्रति उकताहट ज़ाहिर करते हुए सवाल किया- यहां पानी की दिक्‍कत कब से है?

मैंने समझदारों वाली मुस्‍कान भरी और समोवार की गरमी के नज़दीक जाकर खड़ा हो गया- जो कलतक उपस्थित था वह नहीं ज़ाहिर करता कि आज भी रहेगा! डिडिंट मार्क्‍स से दैट ऑल दैट इज़ सॉलिड मेल्‍ट्स इनटू एयर? पानी बहुत उलझा सवाल है, मिक्‍खू, वी आर गोईंग टू हैव बिग ट्रबल्‍स ओवर इट.. फ्रॉम ऑस्‍ट्रेलिया टू अज़रबैजान (हैजंट आलोक सेड सो?) !

Tuesday, January 22, 2008

एकायामी आदमी.. और उससे आगे?..

साठ के दशक के गिर्द जो वैचारिक उथल-पुथल की तूफ़ानी हवायें चली थीं, उसने ढेरों रोमांचक कृतियों को जन्‍म दिया.. उन्‍हीं में एक बड़ी किताब हरबर्ट मारकूज़ की ‘एकायामी आदमी’ भी थी.. आज जब समाजिक विमर्श में किताब, विचार सबकुछ क्षणिक हुआ पड़ा है, बड़ी किताबें और उनकी बड़ी चिंतायें भी छिटकी पड़ी हैं. उनकी कालजयता का तो क्‍या कहना (फिर कालजयी, और वाजिब मार्क्‍सवादी अर्थों में राजनीतिक रूप से मारकूज़ के विचार कितना सही थे इसके आकलन की अपनी तो सामर्थ्‍य नहीं ही है). बहरहाल, तत्‍कालीन पूंजीवाद और सोवियत ढांचे के वामपंथ की बखिया उधेड़ते ‘एकायामी आदमी’ में किन्‍हीं सज्‍जन की दिलचस्‍पी हो तो यहां उस पर नज़र मार सकते हैं..

किताब से उठाया एक उद्धरण: “The people recognize themselves in their commodities; they find their soul in their automobiles, hi-fi sets, split-level homes, kitchen equipment.”

बात बड़ी वाजिब है. मगर सच्‍चाई का शायद यही एक आयाम नहीं है. कि है? मार्शल बरमन तो इसकी तीखी शब्‍दों में मुखालफ़त कर रहे हैं. उनकी मुखालफ़त व विचारों पर फिर कभी..

फासबिंडर की उदासियां..

सिस्‍टम पर प्‍ले हो रहे साऊंड को सीधे उड़ाने का एक गुर हाथ लगा है, आजमा रहा हूं.. मेरे चंद पसंदीदा फ़ि‍ल्‍ममेकर्स में से एक राइनर वेर्नर फासबिंडर की फि‍ल्‍म ‘लोला’ (1981) का टाईटल ट्रेक है.. परदेस में कतरा-कतरा हो रहे मजूर की उदासी का ज़ाम आप भी पीजिए..

नीचे गाना है, ऊपर उसका अंग्रेजी शब्‍दानुवाद..

The day has come
When we dream of foreign lands
Here where we live
Is far too small, I'm told..

The day has come
When we head for foreign lands
And soon we'll ask
What will the future hold
A white ship sets sail for Hong Kong
And I long for those distant places
But once I reach foreign seashores
I long to return home
So I tell the wind and white clouds
Take me with you where you're going
I would gladly trade those new lands
Just to be right back at home.

The day has come
When we live in foreign lands
And feel like we're
Abandoned and alone
A white ship sets sail for Hong Kong
And I long for those distant places
But once I reach foreign seashores
I long to return home
So I tell the wind and white clouds
Take me with you where you're going
I would gladly trade those new lands
Just to be right back at home.


Monday, January 21, 2008

काकेश के वर्थ का अर्थ?..

उर्फ़ अरविंद गुप्‍ता के मुफ़्ति‍या वेबसाइट की लूट

कुछ लोग हैं, मतलब काकेश ही हैं, जिन्‍हें एजुकेट किये जाने की ज़रूरत है. मतलब यह क्‍या बात हुई कि बड़ा निपोरे-निपोरे लिख डालेंगेवैसे मेरे पास भी कई ऑफर आये अमरीका जाने के लेकिन ना जाने क्यों अभी तक खुद को तैयार नहीं कर पाया..’ ऐसे ही लोग हैं जो कभी किसी भी चीज़ के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते. अमरीका जाने के लिए न किसी मॉल प्रांगण में दिल लुटाने के लिए (मॉली-बॉली में चप्‍पल खाने की घटना जो घटी थी वह क वाले काकेश के साथ नहीं अ वाले किन्‍हीं अन्‍य विमानुष के संग घटी थी. उसका ज़ि‍क्र फिर करूंगा, यह उसका मंच नहीं है). हमेशा दिल और जेब सम्‍हाले रहते हैं. यही काकेश टाइप. हद है मर्चेंट ऑव वेनिस का क्‍या वो कैरेक्‍टर था टाइप व्‍यवहार की? नहीं है? ज़रा नमूना देखिये पैसा बचाने की लॉजिस्टिक का: ‘अभी पिछ्ले दिनों आपकी बतायी हुई ओरहान पामुक की स्नो देखी एक स्टाल में सोचा खरीद लूँ पर दाम 400 रुपया देख कर सोचा शायद इसकी इतनी वर्थ नहीं है इतनी..’ अरे! वर्थ? ओरहान का नहीं है? गोड़ के जूता और बरिस्‍ता की कॉफ़ी का? पेट्रोल, पत्‍नी की साड़ी? वह 400 से कम में मिलती है? मगर ऐसों को समझाने का क्‍या फ़ायदा? आईटीयन और काकेश को समझाने का तो नहीं ही है. यही वजह रही होगी कि आईआईटीयन अरविंद गुप्‍ता हारकर मुफ़्ति‍या किताबों, और मुफ़्ति‍या ये और वो का वेबसाइट बनाने पर मजबूर हुए होंगे.. कि बचाये रहो 400.. स्‍नो नहीं तो कम से कम साइंस तो पढ़ लो! हद है. हद है स्‍क्‍वायर इन फैक्‍ट..

Saturday, January 19, 2008

बकलोल बहक..

पृथ्‍वी की उम्र के वर्षों की संख्‍या बराबर झाड़ का जंगल था चील को जिसे तैरते हुए पार करके आसमान में उड़ जाना था.. लेकिन पृथ्‍वी की उम्र के वर्षों की संख्‍या का सुदीर्घ विस्‍तार कुछ ऐसा पसरता फैला था कि चील उड़ता रहा, उड़ता रहा, उम्र निकल गई मगर जंगल की हद तक पहुंच न सका.. वैसे ही जैसे अस्तित्‍ववाद की उलझी किताब में उलझी, तय किये कि आज जो हो जाये भेद पाकर दम लेगी, भिनभिनाती-झल्‍लायी मक्‍खी माथा मारती रही और झख मारकर अंत में बेवक़ूफ ने माथा फोड़ लिया!

घोड़े, ऊंट, जिराफ और कंगारु कहां जानते हैं? अफ्रीकी बीहड़ के मस्‍त व दर्पीले हाथियों ने भी कब ज़ि‍क्र किया है उन्‍हें ख़बर है. मेटेओराइट, मार्स और मोलेक्‍यूल जितनी नक़्शेबाजी करें, इस संबंध में उन्‍होंने भी मुंह सिला ही हुआ है.. सच्‍चाई है सिर्फ़ भगवान ही जानता है भगवान की गुत्‍थी क्‍या है. मगर कभी विचार करनेवाली बात है गुत्थियों की भगवान को भी कितनी ख़बर है. ख़बर है? क्‍योंकि बहुत बार दिन चढ़ आता है, जलप्‍लावन की चढ़ान चढ़ती चलती है, तक़लीफ़ और गंद की गलाजत चढ़ती चली जाती है, तब प्रियदर्शन भगवान की वत्‍सल करुणप्रियता के दर्शन नहीं, माताराम चौबे का लघु-क्षुद्र ब्राह्मणत्‍व दर्शित होता है.. मुंह में मगही पान दाबे माताराम चौबे बोधि वृक्ष के भूगोल की हद में टहलते हुए बुद्धत्‍व की नहीं सोचते होते. बंबई की माया, बग़दाद में बॉंबिंग और गदहे की उस लीद के बारे में भी नहीं सोच रहे होते- चंदेक मिनटों में जिसके रसायन में उनका बायां पैर सना जायेगा और वे बकलोलों की तरह मंदिर की दिशा में देखते हुए मुस्‍करायेंगे मानो उनके पैरों में गदहे की लीद नहीं, गरदन में लक्ष्‍मी का जयमाल चढ़ा हो..

घोड़ा कहता है इतना दौड़के हम कहीं पहुंच रहे हैं? क्रॉसवर्ड के काउंटर पर बैठी लड़की फीका मुस्‍काती है कि किताबों के बीच रहकर आप किताबत्‍व नहीं पा लेते.. जैसे खोयों और खजूर के बीच बैठे मिठाई लाल मीठा नहीं हो जाते.. दुनिया में रहकर कोई दुनिया पा लेता है? मेरे ब्‍लॉग पर आकर आप मुझे पा लेते हैं (पाते हैं?).. मैं ही स्‍वयं को कहां पा लेता हूं?..

Friday, January 18, 2008

आओ, नदियों की डंडा लगायें, फकत पैसे बनायें

उर्फ़ हम सबक क्‍यों सीखेंगे?..

फ्रंटलाईन के ताज़ा अंक में मुंबई की नदियों के रख-रखाव संबंधी एक रपट छपी है. हमने परसों किसी तरह काम चला लेने की मानसिकता पर एक पोस्‍ट लिखा था. गौर कीजिए, यहां किसी तरह काम चलानेवाली मानसिकता नहीं काम कर रही. कंस्‍ट्रक्‍शन इंडस्‍ट्री के स्‍वार्थों और मनी-मेकिंग के हित में सब लीप-धोकर आंखें मूंदे रहने की मानसिकता का नंगा, फूहड़, गंवारू राज चल रहा है..

रपट पर गौर कीजिए:

It has been over two years since a freak rainfall paralysed Mumbai. The 2005 floods that wreaked havoc in the city were a wake-up call and the city’s administrators and developers vowed that they had learnt a lesson. But the current trend of development in the city throws up doubts on whether those warnings have been heeded. The mistakes acknowledged by the administration have just not been rectified. Worse, they are being repeated. Scattered across the city are examples of dangerous development, which are especially visible in the suburbs, which suffered the most during the floods.

The floods brought Mumbai’s rivers into prominence. In the normal course of events, the rivers would have served as effective storm-water drains, channelling the floodwaters swiftly into the sea at a pace that cannot be matched by any manmade construction. But Mumbai’s obsession with concrete has not spared even the rivers. They have been encroached upon, their natural course has been forcibly altered by the construction of roads and retaining walls, and they are used as sewers and as a dumping ground for debris. Their natural capacity as a disaster-prevention system has been disabled. The rivers are themselves, ironically, disasters in the making. They are Mumbai’s most abused ecological feature.

लाइला बावदम की लिखी पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां जायें.

Thursday, January 17, 2008

ऐसी उतावली क्‍यों है?..

“पैरों के नीचे कंकड़ हैं? शीशा, पारा, आग? गरीब की जान है? क्‍या है फिर जिसकी इतनी तक़लीफ़ है?”
- संसार का स्‍वाद, श्री चिंतारत्‍नप्रकाश

“रात के बाद दिन के बाद रात होती है, ज़िंदगी स्‍साली इसी तरह तमाम होती है.”
- गंगाराम माडर्न हेयर कटिंग मंदिर

“निहुरे निहुरे, बलम, दुनिया देखी. सिहुरे सिहुरे शाम.. ”
- एक नाइजेरियन ठुमरी

आलम की नौकरी नहीं छिनी थी, न कुबेर को उसकी बैंक से धमकियों भरे फ़ोन आ रहे थे.. फिर भी दोनों बीयर इसी तरह पी रहे थे मानो अपने जीवन के न्‍यूक्लियस को गिलासों के उस फ़ेनिल संसार में जज़्ब करके सब भुला देना चाहते हों.. मगर न्‍यूक्लियस था कि चुकते झाग के पीछे से बार-बार ऊपर उभर आता.. इतनी सारी बीयर पीकर भी समय भूलता नहीं की हारी, उदास नज़रों से आलम ने कुबेर को देखा और सिर नीचे गिरा लिया.. कुबेर ने फ़ीकी मुस्‍कान भरी और थोड़ी देर ख़ामोश रहने के बाद बुदबुदाकर कहा- सब इतना उलझा क्‍यों है?

- तुम बताओ हम बतलायें क्‍या.. आलम ने बिना सिर उठाये कहा.. एक कविता पढ़ी थी.. किसी दौर में जब कवितायें पढ़ता था, उसकी याद आ रही है.. एक ड्राईवर का टायर बराबर हो गया है और वह मन ही मन सोच रहा है: जहां से आया हूं मुझे वह जगह पसंद नहीं, न जहां जा रहा हूं वह जगह पसंद है. तो फिर टायर बदलने की ऐसी उतावली क्‍यों है?..

कुबेर ने बाल की लटों पर पीछे हाथ फिराते हुए मुस्‍कान भरी- हूं, ब्रेख़्त. बर्तोल्‍त ब्रेख़्त की कविता है.

- मालूम है किसकी है. एक वक़्त था लगता था ब्रेख़्त को जानता हूं.

- अब भी जानते हो.

- ना. अब नहीं जानता.. आलम ने यूं जवाब दिया मानो दोस्‍त के सवाल से वह चौंक गया हो.

ज़रा ठहरकर कुबेर ने कहा- वैसे तुम्‍हें मेटाफ़र एक्‍सप्‍लेन करना होगा.. कौन या क्‍या है यह टायर?..

दोस्‍त का जवाब देने की जगह खोये-खोये-से कुबेर ने बीयर की नयी बोतल खोली और उसे गिलास में उड़ेलना शुरू किया.

Wednesday, January 16, 2008

हिलते-हिलाते, ठिलते-ठिलाते..

कल अभय ने एक पोस्‍ट लिखा था- काम चलाने की मानसिकता. अपनी-अपनी समझ के अनुरुप इस ख़्याल से हम सभी कभी न कभी ज़रूर रूबरू होते हैं कि अपने यहां यह काम चलानेवाली मा‍नसिकता क्‍यों है भला. ‘एक्‍सेल’ करना हमारी फ़ि‍तरत तो दूर, ‘एवरेज’ से ज़्यादा करने तक के ख़्याल से हमारा दम फूलता है. कहानी लिखनेवाला व्‍यक्ति कहानी जैसी चीज़ लिख ली गई, और अब जल्‍दी-जल्‍दी किसी तरह कहीं छप जाये के लिए कसमसाने लगता है. उस किसी तरह लिख ली गई कहानी को ‘अच्‍छी’ या ‘अद्भुत’ कहानी बनाने की भी कोई रचनात्‍मक यात्रा हो सकती है जैसी चिंता अपने कहानीकार की रात की नींद हराम नहीं करती. कहानी जैसी कहानी लिख ली गई है की मानसिकता में वह सुखी बना रहता है. उसी तरह जैसे एक चम्‍मच या चप्‍पल बनानेवाला मैनुफैक्‍चरर चम्‍मच या चप्‍पल जैसी दिखती चीज़ पैदा करके बाज़ार में किसी तरह ठेलने मात्र की अपनी कारीग़री में संतुष्‍ट रहता है. कैसे उसकी चम्‍मच या चप्‍पल दुनिया में बेहतरीन कारीग़री का नमूना बताकर पेश किया जाये, और इस दिशा में कैसे उसका विशिष्‍ट कौशल रास्‍ता तैयार करे जैसे विचार उसके भेजे में नहीं घुसते. घुसते होंगे भी तो ज़्यादा देर वहां ठहरते नहीं. क्‍यों नहीं ठहरते?

चिरकुट संडास जैसे संडास में से हम फारिग होकर बाहर आ गए, चिरकुट अख़बार जैसे अख़बार को पलटकर हमने अख़बार देख लिया के भाव में सुखी हम दिन शुरू कर देते हैं. क्‍यों कर देते हैं? हमारा ख़ून उबलता क्‍यों नहीं कि ये चीज़ें दस गुना.. सौ गुना और बेहतर हो सकती थीं, दूसरी जगहों में होती हैं, फिर हम क्‍यों सिर्फ़ काम चलाते रहते हैं? काम से ज़्यादा आखिर कब चलायेंगे? या ऐसा करने की कोशिश में हमारी तौहीन हो जायेगी? वह भारतीय संस्‍कृति का अंग नहीं समझा जायेगा?

आखिर काम चल जाने से ज़्यादा की अपेक्षा हमारी तबीयत क्‍यों नहीं बनती? क्‍या हम किसी तरह काम चला लेते हैं की ज़िंदगी जीनेवाले दूसरे दर्जे के लोग हैं? सातवें-आठवें दर्जे के? वही ऑथेंटिक (प्राचीन, या आधुनिक पता नहीं क्‍या) भारतीय संस्‍कृति है? क्‍योंकि एक्‍सेल करनेवाला दिमाग़ कभी-कभी तो दिख जाता है. मगर वह यहां नहीं, एक्‍सेल करने के लिए अमरीका व योरप गया होता है! तो अपने यहां की ज़मीन में ही कोई खोट है? ज़मीन शिक्षा और संस्‍कार देती है कि काम चलाने भर काम कर लो, ज़्यादा करोगे तो आगे की ज़िंदगी रोने और समाज में परायापन महसूस करते हुए बीतेगी? क्‍योंकि यह क़ि‍स्‍सा भी अपने यहां उतना ही आम है कि फलाना सिपाही या ढिकाना लांसनायक परमवीर चक्र पाने के बाद बुढ़ौती यह रोते हुए काट रहा है कि उसने देश को अपनी ज़िंदगी दी और देश बदले में उसे आठसौचालीस रुपये का पेंशन देकर काम चला रहा है! तो यहा आप और हम नहीं, समूचा देश (अखंड राष्‍ट्र और जाने क्‍या-क्‍या) ही है जो किसी तरह काम चला लेने की मानसिकता का उज्‍जवल उदाहरण बना हुआ है?..

अब रतन टाटा के नये-नये लॉंच हुए नैनो का ही क़ि‍स्‍सा लीजिए. कटक से बदायूं और मुंबई से मलाबार तक एक लाख कार वाली सनसनी तनी हुई है. लोग एक्‍साइटमेंट में सो नहीं पा रहे. और किसी तरह पा रहे हैं तो सपने में नैनो का लाल देखकर एक्‍साइटमेंट में फिर उठ जा रहे हैं! जल्‍दी ही ऐसी कोई ख़बर आयेगी कि बारह लोगों की एक छोटी कंपनी के बारहों लोगों ने नैनो बुक किया है! मगर उसके बाद क्‍या होगा? किसी तरह से कार वाले होकर कार वाले हो जाने की मानसिकता से काम चला ले जायेंगे? इसके बारे में कोई चिंता करेगा कि पहले से ही कचर-मचर बनी शहर की सड़कों पर ये कारें जगह कहां पायेंगी? सड़कों का वह कौन-सा इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर है जहां ये सुहाने सपने तैरेंगे? कि शहर ठेल-पेल के इन्‍हें अपने में हिलाते-झुलाते आगे बढ़ाते किसी तरह से काम चला ही लेगा?..

Tuesday, January 15, 2008

टूटकर बिखरिये नहीं जुड़े रहिये.. यही नियम है

चीज़ें टूट क्‍यों जाती हैं? जैसे मेरे कुछ परिचित हैं (मैं भी हूं), दुनिया में हो रहे उथल-पुथल के केंद्र में स्‍वयं को अनुपस्थित पाकर वे (मैं भी) टूटे-टूटे-से रहते हैं. अभ्‍युदय की जनाना है, सुबह-सुबह बीसेक साल का एक गबरू लौंडा दूध पहुंचाने आया करता था जिस पर खूब हर्र-हर्र नेह उमड़ाती थीं, मगर फिर कोई वजह हुई, बच्‍चे ने आना बंद कर दिया और अभ्‍युदय की जनाना जो हैं टूट गईं. मेरा ही दिल, पता नहीं क्‍यों, पीले रंग के फूल-पत्‍तीदार एक चीनी के बाउल से लगा हुआ था, लगा क्‍या एकदम चिपका हुआ था.. सुबह सहेजते में हाथ से छिनककर उसकी डंडी टूट गई और.. नतीजे में मैं एकदम टूट गया हूं!

क्‍यों टूट जाती हैं? चीज़ें? और टूटने के बाद फिर जुड़ भी जाती हैं! जैसे चीन की एक डॉक्‍यूमेंट्री में मैंने देखा कि सूने-फालतू गांवों में सूनी आंखोंवाले फालतू बूढ़े चीनी के टूटे बरतनों की मरम्‍मत करते घूम रहे हैं (जबकि हमारे यहां, ससुर, सूनी-फालतू आंखोंवाले बूढ़े भले हों, उन्‍हें चीनी के बरतनों की मरम्‍मत करते नहीं देखा गया. और देखा गया भी हो तो दूसरे भी देख लें ऐसी उनपर जगत्‍प्रकाश जगानेवाली डॉक्‍यूमेंट्री नहीं बनीं). हालांकि चीन में भी, तरक्‍की की चकमकी दुनिया में, चीनी के टूटे बरतन ही रीपेयर हो रहे हैं, अभ्‍युदय की जनाना का टूटा दिल नहीं. कभी वापस हो सकेगा, सीरियसली संदेहास्‍पद है. जबकि पता नहीं क्‍यों, मेरे साथ सीरियसली संदेहास्‍पद नहीं हो पाता. यही दिल टूटकर टूटी रहनेवाली बात. मगर एवरेज़ में देखें तो स्‍पष्‍ट ज़ाहिर होता है कि चीज़ें टूटकर बिखरती नहीं, जुड़ती रहती हैं. आईंस्‍टाइन ने भी सौ वर्ष पहले एनर्जी इक्‍वल टू मास वाला फ़ॉर्मूला दे ही दिया था, कि चीज़ें टूटतीं नहीं, एनर्जी में कन्‍वर्ट होती रहती हैं. सौ वर्ष बाद वही बात मैं बिना फ़ॉर्मूले के दे रहा हूं.

मगर यूनिवर्सल लॉ के बतौर इसे सामने ठेलते हुए कहीं मैं ग्‍लोबल कॉरपोरेट पूंजी के- दुनिया के गरीब और उनकी गरीबी जैसी है वैसी ही बनी रहे- षड्यंत्र में सहभागी तो नहीं हो रहा? इस फ़ॉर्मूले को खींचकर लेंस के नीचे छिद्रान्‍वेषण करते हुए परिवर्तनकामी ताक़तें यथास्थितिवाद का ख़तरनाक़ नतीजा निकालने पर मजबूर.. और मुझे चप्‍पल-चप्‍पल पीटने पर आमादा.. तो नहीं हो जायेंगी? मगर क्‍या यह सचमुच इतना घबराहट जगानेवाला विषय है? होना चाहिए?.. इस भयावहता की कोई निर्भय काट भी तो होगी मगर? जस्‍ट फ़ॉर द सेक ऑव द अदर साईड ऑव द आर्ग्‍युमेंट? बिफरती है तो बिफरी ही नहीं रहती अनंतर ठंडाती भी है टाइप?.. यानी अभी जो चप्‍पल-चप्‍पल हो रहे हैं, वो एक वक़्त के बाद दुलार देने के लिए ज़मीन पर लोटेंगे भी.. श्‍युर, दैट्स द ओन्‍ली वे दिज़ डायलेक्टिक्स हैज़ टू गो! नो?..

चलते-चलते. आप आज टूटे और बिखरे हुए हैं तो ऐसी घबराने की बात नहीं. कल जुड़ेंगे भी. आईंस्‍टाइन प्रदत्‍त प्रकृति का नियम है.

Monday, January 14, 2008

चिकन सूप, नये कटोरे में..

अंग्रेजी का एक पहुंचा हुआ पत्रकार जो दु:खी होकर अभी तीन महिने पहले सवाल कर रहा था कि सचिन को अब रिटायर नहीं हो जाना चाहिए?, आज सवाल पूछता एसएमएस संग्रहित कर रहा है कि सचिन भारतरत्‍न के हक़दार क्‍यों नहीं हैं! टेलीविज़न के आजू-बाजू फुदकते हमारी समय की कुल अब इतनी ही स्‍मृति बची है! इन सजे-बजे पत्रकारों के पीछे-पीछे आज हम किसी को हिमालय पर चढ़ा देना चाहते हैं, और चार दिन न बीते उसे दुरदुराते फिरने के लिए कसमसाने लगते हैं! इन पत्रकारों की ही तरह, हमारी ऑपिनियन भी, हर चौथे रोज़ बदलती चलती है! मैं नहीं कह रहा, तहलका के एक मीडिया समीक्षक दुखी हो रहे हैं.. सो टचिंग फॉर अ सेंस ऑव हिस्‍टरी!

इसके बाद जीवन की तरतीब में कोई कसर रह जाये तो उसे रोंडा बर्न जैसों की चमकती स्पिरिचुएलिटी पढ़कर पूरा करें, धन्‍य हो लें. इस चिंतन का ज़रा एक नमूना देखिए, “अगर तुम्‍हारा कज़ि‍न मर रहा हो और तुमसे उसपर बात करना चाहे, तो विषय बदल दो. सिर्फ़ उसपर बात करते हुए तुम बीमार पड़ सकते हो.’’ मगर इन दो कौड़ी की चिंतामणियों से सज्जित किताब खूब धमाधम बिक रही है! यहीं नहीं, दुनिया भर में.. छह महिनों में चालीस लाख प्रतियां, मज़ाक नहीं.. फिर किताब के पीछे फ़ि‍ल्‍म.. उसके भी अब तक बीस लाख डीवीडी बिक चुके हैं!.. क्‍यों बिक रही हैं? (टाईम पत्रिका के दुनिया के सौ महत्‍वपूर्ण लोगों की सूची में रोंडा चढ़ी हुई हैं..) वह क्‍या है जो हमें इस तरह की दो कौड़ी के लेमनचूसों के पीछे उत्‍साह से लेलो-लेलो ललचवाता है? आमतौर पर ही नहीं, आज़ादी के बाद से अभीतक शिक्षा के भयानक गड्ढे में गिरे (और धीरे-धीरे वह गड्ढा और बड़ा हो रहा है!), मगर उसे पूरी तरह अनदेखा किये चुप बने, लेकिन ‘तारे ज़मीन पर’ जैसी फ़ि‍ल्‍म देखकर फिर लेलो-लेलो करते हुए ताली बजवाता है?..

Thursday, January 10, 2008

ए नॉट सो टिकलिंग-ग्लिटरिंग नाईटमेयर..

एक भारीपन ओढ़े भारी-भारी कदमों, या जो भी होगा जिसकी मदद से वह घूमता है, उस छोटे से बेमतलब दायरे में वह घूम रहा था. वही. सांप. सर्र-सर्र वाला कोई दर्पीला भाव नहीं, अस्थिर करती एक थरथराहट थी, बस. यह ज़ाहिर करती भयानक उदासी कि देखो, जीवन जीने में कितनी थकान है. श्रम. व्‍यर्थ का दोहराव. मैंने सोचा हद है सपने के रीयलिज़्म की, सांप होकर ट्रेजेडी की तस्‍वीर बुन रहा है! कुडंट इट बी मोर वीयर्ड एंड सर्रीयल? माने मैंने ठीक-ठीक ऐसा सोचा नहीं लेकिन कुछ इसी तरह सोचने जैसा भाव अंदर ही अंदर महसूस किया. इनसाइड सपना. सांप कंटिन्‍यूड विद् इट्स भारीपन एंड थरथराती ट्रेजेडी. घबराहट में मेरे यथार्थ का एक वास्‍तविक लेयर तैरता हुआ कहीं से घुसा. सपने में. कि नौंवी कक्षा की विज्ञान की एक एनसीआरटी की एक किताब खरीदकर लाया हूं, और किताब में फि‍ज़ि‍क्‍स के ढेरों इक्‍वेशंस हैं कि देखकर मन की वही दशा हो रही है जो न खानेवाले बंदे की पान में बहुत सारा ज़र्दा खाकर होने लगती है. मोर ट्रेजिक दैन द सर्पेंटाइन ट्रेजेडी! कसाइन-कसाइन की तर्ज़ पर मन ज़र्दाइन-ज़र्दाइन-सा हो गया..

करुणा व वितृष्‍णा की कुछ प्रगाढ़ बयार रही होगी, जभी उसके असर में सांप गायब हो गया.. दृश्‍य अब किसी चमकती आंखों में डिसॉल्‍व हुआ.. और ग्रेविटेशनल थरथराहट की जगह इस बार फास्‍ट मूवमेंट.. रियलाईज़ हुआ चूहा है.. सांप से गिरे चूहे में लटके?.. प्‍लीज़, यार, अब चूहा मत दिखाओ! गिड़गिड़ाकर मैंने प्रार्थना नहीं की लेकिन वैसा ही कुछ करता-करता-सा महसूस किया.. मगर बेशर्म आकारहीन वह दिखता रहा.. चूहा.. एक्‍सट्रीम क्‍लोज़अप में.. अपनी सारी गंदगी व सारे रोंवों समेत! मैंने मन ही मन सपने की चेतना की आंखें मूंद लीं.. लेकिन इसके पहले कि वह वीभत्‍स छवि धूमिल होती, उसके मैलसने नाख़ूनों के नीचे दबे नोटों के बंडल दिखे.. नये, चमकते.. जुगुप्‍सा हुई जाने बांग्‍लादेशी टाका हैं डालर्स हैं क्‍या हैं?.. चेतना की आंखों को मैंने हड़बड़ाकर मुंदने से रोकने की कोशिश की.. मुंदती-मुंदती-सी पलकें अलसायी-अलसायी-सी अटकीं.. अब रोंवे, गंदगी व नोटों की चमक कुछ अजब लुकाछिपी का खेल खेलने लगे.. मैं सपने में उठने.. और कुछ उसी मार्मिकता में पिटने लगा!..

Wednesday, January 9, 2008

कोई इस बेवकूफ को समझाये, रास्‍ता दिखाये!..

समय आखिर सीधी रेखा में क्‍यों चलता है? ज़रा उलट जाता कभी? या सुबह के भूले शाम को लौटे की तर्ज़ पर कभी पीछे ही लौट आता? फिर क्‍या-क्‍या देख गुजरने के सुख में हम अमीर हो लेते! जवाहरलाल कौन सा अंडरवीयर यूज़ करते हैं या चरखे पर वाक़ई क्‍या कातकर खादी कमिटी को मन ही मन कितनी गालियां दे रहे हैं के सारे प्रसंग रोचक व जीवंत हो जाते. यह भी भेद साफ़ हो जाता कि बहादुरशाह की जूतियां क्‍वालिटी में गुच्‍ची से हिप हैं या कमतर! मगर अपने अहंकार में नहाये और ह्यूजली प्रेडिक्टिबल रूट पर रूटिनली चल रहा समय ऐसा क्‍योंकर करने लगा कि पीछे लौटकर हमें गुजरे वक़्त का बाईस्‍कोप दिखा दे. उसकी हेठी नहीं चली जायेगी? फिर लोग समय की हाय-हाय कैसे करेंगे? खुद मैं अपनी प्रकृति के खिलाफ़ जाकर चहकने नहीं लगूंगा? आपही को अच्‍छा लगेगा? मुझको? फिर? तो समय को यह सब मंजूर नहीं. वह सीधी लकीर पर आगे ही आगे को पीटता रहेगा. आप कुढ़न में सिर के सारे बाल भले नोचते बैठो. या जो भी.

मगर समय आखिर ज़माने की हदबद से निर्लिप्‍त, आंखें मूंदे ये सीधे-सीधे जा क्‍यों रहा है? जहां जा रहा है वहां क्रेडिट कार्ड्स और नियन रोशनियों में रात-रात भर चमकते फ्लाईओवर्स न हुए तो? घुप्‍प अंधेरा और सन्‍नाटे में नहाया समय हुआ? ऐसे समय का समय साक्षात कर पायेगा? अदबदाकर व पूंछ दाबकर पीछे नहीं भागेगा? ऐसे डरे हुए समय का तब क्‍या मोह पालकर हम स्‍वागत करेंगे? कर पायेंगे? हमीं क्‍यों बांग्‍लादेश या बुरकिना फासो भी कर पायेगी? समय के लिए सोचनेवाली बात है.

दूसरी सोचनेवाली बात है इस बेहया, अकड़वाले बंदे से आजतक किसी ने पूछा नहीं कि इतने वक़्त से इस बेसिर-पैर के सफ़र से वह कभी थका नहीं? कभी तो कंटेप्‍लेशन, रिफ़्लेक्‍शन के लिए ठहरकर रुकता, सोचता? काहिरा और मराकेश के किसी सराय के आगे अपने ऊंटों के काफ़ि‍ले को रोक किसी हूर के हुस्‍न का मुआयना करता, कोई क़सीदा पढ़ता, हमारे-आपकी तरह की कोई चिरकुटई करता? ज़िंदगी निकल जायेगी, ससुर, ये सब उल्‍टे-सीधे अरमान कब पूरे होंगे? कि समय सचमुच नैतिकताओं की बकवास में नहाये हुए है? किसी हूर-टुअर को संपूर्णत: अक्षम? अविश्‍वसनीय है, नहीं?

मगर ओल्‍ड एज, बुढ़ापे का? कोई डर है या नहीं है समय को? यार, किसी की तो परवाह होगी? कोई तो इस दो कौड़ी के अक़लवाले को समझायेगा? या यह किसी की न सुनेगा, आंख की नोक में चुपचाप आगे गड्ढे में ही जायेगा?..

नाम ग़ुम जायेगा?..

इंदु, बिंदु, संजु हो सकता है आपकी साली का हो मगर नाम में क्‍या रखा है? होने को मधु या मनमोहन भी हो सकता था. नाम. उससे क्‍या हो जाता? मनमोहन साली की जगह साले होते (इस तबाह मुल्‍क के प्रधानमंत्री होते. अधिक से अधिक) और क्‍या होता? नाम में क्‍या रखा है? मगर एक मिनट ठहरिये, साले या साली की जगह बात आपके पुत्ररत्‍न या रत्‍ना की होती तो तब भी चर्चा का टेक यूं ही कैज़ुअल सहजता का बना रहता? रह पाता? यही मुश्किल है. साले-सालियों की लोग जाने देते हैं लेकिन अपने ख़ून के नामकरण का प्रश्‍न उठते ही भारी गंभीर, किंचित चिंतित-से होने लगते हैं. नाम में क्‍या रखा है वाला मुहावरा याद दिलायें तो ये गालियां याद दिलाने लगते हैं. मगर सोचने की बात है नाम में सचमुच ऐसा क्‍या रखा है? नाम आते कहां से हैं? और चढ़े हुए नामों का कुछ वक़्त बाद स्‍टॉक नीचे कैसे चला आता है? क्‍यों? ओह, नामों का क्‍या कोई सीक्रेट प्रदेश है? उम्‍बेर्तो एको के थ्रिलर ‘द नेम ऑफ़ द रोज़’ की तरह रहस्‍यलोक?..

एक समय था बहुत सारे शंकर, सुरेश, रमेश, महेश सर्कुलेशन में थे, अब सब गायब हो गए हैं. सड़क पर चाय का खोखा लगानेवाला भी अपने बच्‍चे का रमेश जैसा डाऊनमार्केट नाम नहीं रखना चाहता. अपमार्केट फिर क्‍या होगा? राजर्षि? ऋत्विक, ऋषिवर्द्धन? राजीव बाबू के सिंहासनारुढ़ होने व मुक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था को अंकवार में भरने की शुरुआत के साथ ही नामकरण की दुनिया में अचानक ऋषि-विदुषी बड़े ट्रेंडी हो गए. हाईस्‍कूल फेल बंदा भी घर में मंजुषा और मेनका ठेलने लगा. सारी मंजुएं, रंजुएं देशनिकाला हो गईं. इसके पीछे कौन ताक़तें काम कर रही हैं? या एक्‍ज़ॉटिक बुद्धि? क्‍या घर में हम जर्नादन या दिलीप जैसे नाम अब फिर कभी नहीं सुनेंगे? कि बीस वर्ष बाद ऋषियों की तरह इनकी पुनर्वापसी होगी?..

एक तरह से सोचिए तो कितना झमेले का काम है. शादी के बाद पहले बच्‍चा लाने का काम कीजिए (हड़बड़ाहट में कुछ लोग पहले ही कर ले जाते हैं.. मगर यहां फ़ि‍लहाल परंपरावादियों की बात हो रही है, परंपरा परे व परों की नहीं), और एक बार बच्‍चा ले आये तो चैन पा गए ऐसा नहीं. फिर वाजिब नाम पाने की ठेलमठेली में लगिए (हालांकि कुछ समझदार लोग इसका निदान खोजे रहते हैं.. शादी से पहले ही नाम संजोकर रखते हैं.. कि बाद में बच्‍चे पर यही नाम चिपकाना है. दरअसल ऐसे समझदार शादी करते ही इसलिए हैं कि बच्‍चा लाने का रास्‍ता खुले और कहीं ऐसा न हो कि जेब में संभालकर रखा नाम अनयूज़्ड रह जाये!).

मुझे एक बात समझ नहीं आती कि प्रयोगों से भयानक रूप से बचते रहनेवाले इस देश में नाम के क्षेत्र में ही कुछ प्रयोग क्‍यों नहीं कर लिए गए? मसलन ज्‍यामिति वाली सहजता अपनाकर किसी ने घर में तीन बच्‍चोंवाले घर में बच्‍चों को ‘अ’, ‘ब’, ‘स’ का नाम दिया? या फिर निहायत अपरिचित, अजाने ऋषियों-विदुषियों के पीछे लड़ि‍याये रहते हैं, मगर अपनी मनपसंद मिठाइयों की संज्ञा से बच्‍चों को सुशोभित करने से बचते रहेंगे, क्‍यों? फिर भाववाचक, और उसमें भी सकारात्‍मक, संज्ञाओं के पीछे भागना. अकिंचन, प्रसन्‍न, शुभम्! अरे. उद्वि‍ग्‍न क्‍यों नहीं, भई? प्रमोद प्रमाद या विषाद होता तो नाम में नुकसान हो जाता? कुमुदिनी प्रमादा या विषादिनी होती तब आप उससे बात नहीं करते? अरे?..

एक दौर था ज़्यादा कुत्‍ते टॉमी, रॉकी, बॉबी के नाम से जाने जाते थे. बाद में हिंदी फ़ि‍ल्‍मजगत के अभिनेताओं-अभिनेत्रियों ने अपने बच्‍चों के लिए वे नाम ले लिए तो पता नहीं इस संकट का कुत्‍ताजगत ने क्‍या हल निकाला. मगर हम जो निकाल रहे हैं वह बड़ा हिला हुआ चंचल हल है, और मैं तो कतई संतुष्‍ट नहीं हूं. पता नहीं आप कैसे और क्‍यों हैं. अब समय आ गया है कि बच्‍चों का नाम आजतक, सहारा और समय सब रखा जाये. आपने नहीं रखा है तो चलिए, इसी बहाने एक बार फिर बाप बनने का सपना संजो सकते हैं. नॉट अ बैड आइडिया.

Tuesday, January 8, 2008

गुरु, एनीवन फॉर गुरु?..

कल भयग्रस्‍तता की बात की थी, देखिए, कुछेक घंटों में कितना भय भरा-भरा, मरा महसूस कर रहा हूं. मेरी ही तरह तीक्ष्‍ण-तीव्र संवेदनाओं के असर में आप भी रहते होते तो अब तक आप भी महसूस करते होते. बहुत कुछ. तुच्‍छता व बेगानेपन का कैसा ऊलजलूल गाना तो गुनगुना ही रहे होते (मन्‍ना डे और सबुरी व बहरी बेग़मोंवाला नहीं जिसे मनीष और युनूस हर आठवें ऑरिजनल गाना बता-बताके ठेलते रहते हैं.. और इस ठिलवाये जाने पर, स्‍वभावत: आदमी, व मैं, भयग्रस्‍त हो ही जाते हैं).. मगर अभी आपके दूसरी तरह के गायन की बात कर रहा था.. वह जिसे मन के भीतर उठाते हुए आवाज़ नहीं आंसू फूटते हैं.. आखिर अज्ञान का कुछ तो धिक्‍कारभाव मन में बनेगा, उठेगा. मनुष्‍य हुए तो उठेगा ही.. कि शर्म की सहज मनुष्‍यता से आप ऊपर उठे गए हैं? (हमारे उन और इन मानवरत्‍न परिचितों की तरह- अब नाम बुलवाकर लात मत खिलवाइए?)..

तो क्‍या कह रहा था? हां. माने आपने ‘समय का संक्षिप्‍त इतिहास’ या स्‍टीफ़न हॉकिंग का ‘द यूनिवर्स इन अ नटसेल’ कब पढ़ा था? कि मेरी तरह उसके चंद्रभूषण द्वारा अनुदित होकर हाथ में आने की राह तकते निर्द्वंद्व, किंतु ज्ञान के भारी अंधेरे में बैठे पड़े थे? या गिरे कहना सही होगा? ओह, आपका अपना खुद का रचा काला गड्ढा मतलब ब्‍लैक होल? गिरे रहे कुंए के मेंढक बने रहे? सो शेमफुल? बिग बैंग की जानकारी नहीं थी? कि थी? ऑनेस्‍टली? कितनी क्‍या जानकारी थी? और थी तो मुझे व दूसरों को बताने की आपने ज़रा भी गरज नहीं महसूस की? हमारे यहां स्‍कूलों में तो जो शिक्षा होती है होती है, समाज के बाहरी (माने हमारे चालीस लोगों के अंतरजालीय शिक्षा के आदान-प्रदान का भी आपने स्‍तर उन्‍नत करने की चेष्‍टा नहीं की? यही मन्‍ना डे वाला स्‍तर बनाये रखना चाहते थे? बनाये रखेंगे?..

ख़ैर, ज़्यादा मत बहकिये, प्‍वायंट पर लौटते हैं. माने मैं तो लौटता ही हूं.. बिग बैग के बारे में आपकी राय क्‍या है? या गुजरात पर तो नहीं ही थी इस पर भी नहीं है? सिंगुलैरिटी, टाईम का इलेवेंथ डायमेंशन? स्ट्रिंग थियरी? एटम, मैटर, मौलेक्‍यूल? फ़ि‍जिक्‍स के प्रकार? थियरी ऑफ रिलेटिविटी, क्‍वांटम? पैरेलल यूनिवर्स? नथिंग? टोटल इल्‍लै? ओह, आप कुछ नहीं जानते? मेरी ही तरह सप्‍लीमेंटरी और कंपार्टमेंटल वाले स्‍टूडेंट रहे हैं?..

व्‍हाट अ डिप्रैसिंग वे टू बिगन द बिगनिंग. ऑर मार्निंग. मगर कौन जानता है? किस विज्ञानी ज्ञानी को गुरु बनाया जाये?

Monday, January 7, 2008

आप झूठ बोल रहे हैं..

कह रहे हैं तो आप झूठ बोल रहे हैं. कौन भयमुक्‍त है? जो है स्‍वयं को मनुष्‍य कहलवाने का अधिकारी हो सकता है? मुझे नहीं लगता. आपको भी शायद तभी लगे जब आप मनुष्‍य कहलाने के अधिकारी न रह गए हों. दरअसल मनुष्‍यत्‍व बाद की अवस्‍था है भयग्रस्‍तता पहले चली आती है. कब आती है विशेषज्ञों के बीच अलबत्‍ता हमेशा विवादग्रस्‍त विषय रहा है. पोलिश विद्वान जुबोल्‍व्‍स्‍की शुरू से मानते रहे हैं गर्भावस्‍था से मनुष्‍य शंकाभाव सीने लगता है, मगर ताज्‍जुब की बात नहीं कि उससे भी पहले भयास्‍वादन कर चुका होता है. क्‍यों? क्‍या मतलब क्‍यों? ऐसे फालतू सवालों का अकादमीय संसार में कोई जवाब है? नहीं है. दूसरी ओर मैक्सिकन विद्वान ताबियो हुम्‍बेर्तो बताते हैं व्‍यक्ति पेशाब पर काबू पा सकता है भय पर नहीं. जिस दिन काबू पा ले मनुष्‍यता रसातल में चली जाएगी (मुरैना, आजमगढ़ व बिहार के छोटे शहरों में छोटी उम्र के नौजवानों के भयमुक्‍त दुस्‍साहसी आपराधिक कारनामों में हम मनुष्‍यता के रसातल में जाने का प्रत्‍यक्ष प्रमाण देख ही रहे हैं! नहीं देख्‍ा रहे हैं? तो फिर आप क्‍या खाक़ देखते रहे हैं..).

विद्वानों के पौलेण्‍ड और मैक्सिको में कहने जैसी यह दुरुह बात है भी नहीं. मैं यहां सीधे तरीके से कहूं तो आप सीधे होंगे, आपके सीधे-सीधे समझ में आएगी कि मनुष्‍य जन्‍म से आज़ाद भले न हो, डरा हुआ ज़रूर है. बच्‍चा संवेदनशील हो तो बिस्‍तर गीला होते ही अपराधबोध में डरकर रोने लगता है. यही मानसिकता उसके बड़े होने पर बिना बिस्‍तर गीला करवाये भी उसे रुलाती रहती है. नौकरी न मिलने तक नौकरी न मिलने का भय होता है, मिल जाने के बाद इसका कि कहीं बिना ऊपरी कमाई वाली न मिल जाये. वह मिल जाती है तो फिर इसका भय कि कहीं ऊपरी कमाई लेते हुए विजिलेंस वालों की नज़र में न उतर जायें. नौकरी से बाहर इसका (समाज तो गया तेल लेने) कि हम पत्‍नी की नज़रों में न उतर जायें. याकि कोई दूसरा पत्‍नी की नज़रों में चढ़ न जाये! या पत्‍नी किसी दूसरे की नज़रों.. अंकवार, प्‍यार पता नहीं कहां-कहां.. चढ़.. जाये!

एक बार चले आने के बाद फिर भय जाता नहीं. पीएफ और अन्‍य स्‍कीम्‍स की अवधि चुक जाती है, भय की नहीं. अंतिम अवस्‍था में भी धुकधुकी बनी रहती है कि आसपास कोई आग देनेवाला रहेगा या नहीं. ऐसा न हो गलत जगह दे दे. और हम बिना पाये रह जायें. आग एंड व्‍हाटेवर.

वैसे कुछ क्षुद्र मानसिकता के लोग भी हैं जो मानकर चलते हैं उनका भय भय और दूसरों का हो तो बकरी की बीट. या कबूतर की. जोकि सही नहीं है. यह अक्षम्‍य है कि आप कॉकरोच देखकर उछलने लगें, आपकी जान मुंह में आ जाये (या उन-उन स्‍थानों में- जहां आने में सहूलियत महसूस करे).. और हम मूषकराज देखकर गिर पड़ें तो आप (क्षुद्र मानसिकता वाले चिरकुटाधिराज आप) दांत चियारें (माने अपनी क्षुद्र मुर्खपना उघारें, एक ही बात है). ऐसा करने का आपको हक तब बनता जब आपने मूषक रोवों का मफ़लर धारा होता, या चलिए, कोट ही सिलवाये होते.. या चूहे के साथ बिस्‍तर में रात साथ गुजारी होती. इनमें से सब (या कुछ भी) किये बिना आप हंसने के, या मनुष्‍यत्‍व के अधिकारी कैसे हो सकते हैं? नहीं हो सकते. दरअसल, जैसा ज्‍यॉर्जियन विदुषी रसूलन हम्‍ज़ातोव ने पहले कह ही दिया है- आप डरे नहीं हैं तो खरे नहीं हैं!

(पतनशील पैम्‍पलेट, नववर्षांक, खंड- सात, अंक- तेरह)

ये आदमी और कीड़े और जाने क्‍या-क्‍या..

कौन किसकी पा रहा है? खा रहा है? समाज का तंत्र, इसे रचनेवाले तत्‍व व्‍यक्ति को नचवाते हैं, कि यह उसकी बनावट में ही कुछ अन्‍तर्निहित है जो उससे कुछ विशिष्‍ट लीक पीटवाती चलती है? बड़े गोल-गोल प्रश्‍न हैं.. पिछले दिनों कुछ फ़ि‍ल्‍में देखी, उनका कुछ गोल-गोल उद्धृत कर रहा हूं..

“Could you give me the chalk for a minute to try something?.. Know how to hypnotize a hen? You press its head to the ground and draw a straight line from the bill. We used to watch my grandfather do that. One could also draw a circle.Then the hen would run in a circle until it became exhausted. Ever seen a caterpillar procession? There are thousands of caterpillars creeping through the woods. If you change the direction of the first one so it follows the last… then they run in a circle until they are exhausted.”
- Signs of Life, Wener Herzog,
“We master ideas, which are nothing, but not our emotions, which are all..”
- Masculine- Feminine, Jean Luc Godard.
“Life's hard to bear, huh? People aren't happy. That's why. It's the reason. The great events... (they’re) all in search of happiness. The source of life is hidden… All these buildings, these great structures, not a stone will be left… some day.”
- Jesus of Montreal, Denys Arcand

Wednesday, January 2, 2008

इतना सारा हंसती लड़की..

बच्‍चा तकलीफ़ में रोता है की तरह हंसती है लड़की. बेबात, जबर्दस्‍ती फंसती है. मेरे चुप बने रहने पर घबरायी चुप्‍पी में पूछती है, बताइये न, कैसे होते हैं सुखी? शायद साथी मिल जाये, हो जाऊं? सुलझा-समझदार हो, मीडिया में धंसा हो कहीं लेक्‍चरी में फंसा हो. उसकी बातों पर हंस सकूं, मेरे दु:ख में वह रो सके, साथ सो सके? ओह, कितना अच्‍छा होगा.. मगर इतने में लड़की का आत्‍मविश्‍वास धुआं हो जाता है. सर्दीली सांस और दर्द के झांस में स्‍वर बिगाड़कर कहती है उफ़्फ़, लेकिन ऐसा कोई मिलता कहां है!

पता नहीं मेरा क्‍या होगा, किधर जाऊंगी, इस नौकरी और ऐसे समाज में कितना रह पाऊंगी? सब बैकवर्ड मैंटालिटी के हैं, मेरा अकेलापन आंखों में गड़ता है. दांत दिखाकर मुंह बनाकर कहते हैं आप जैसी कभी यहां देखी नहीं. कलेजा सुलगने लगता है, घूंट पीकर रह जाती हूं. अच्‍छा होता दारु पीती होती, आधी बोतल में सब परायापन भूल जाती, नहीं? लेकिन तब भी सुखी हो पाती?

ओह, इतना सारा आदर्श, इतनी सारी किताबें पार करके आख़ि‍र कहां पहुंचे हमलोग? सिर्फ़ अपना नहीं कह रही, हां. सीवान से शिलंग तक चोट खाये, मुरझाये, सहमे-सहमे सकपकाये कितनी उखड़ी कहानियां हैं दोस्‍त हैं क्‍या फ़ायदा ऐसी ज़िंदगियों का? ज़रा-सा समझौता करके थोड़ा-सा सुखी रह लेने में ऐसी क्‍या हेठी है इतना क्‍या बुरा है बताइये न? सुखी कैसे होऊं, प्‍लीज़, सुझाइये न!

क्‍या करूं, जुगत जुड़वाऊं, दिल्‍ली पहुंच जाऊं? खूब-खूब पैसे कमाऊं और बाकी सब भूल जाऊं. शायद सुखी होने का यही सबसे वाजिब सॉल्‍यूशन होगा, नहीं? काम से लौटकर आजकल रोज़ दिमाग में सब यही सवाल बजते हैं. देखती हूं कोई सपना है चहक-चहककर सबसे मिल रही हूं, कितना खिल रही हूं, पोर-पोर सुखी हूं! रियली?

Tuesday, January 1, 2008

गुरु, हां, ज़रा प्रिपेयर होके ही आना..

नये साल, प्‍यारे, हमी से मत पूछ, ज़रा अपनी भी बता. कपड़े नये लिए हैं या पुराने पर ही काम चला रहा है? खाने का क्‍या है? कुछ ऑर्गेनिक ऑर्गनाइज़ किया है? और हां, अभी पटरीवाली तरकारी खिलायेगा कि सबको गिन-गिनके रिलायंस फ्रेश का गाहक बनवायेगा? यार, अच्‍छा हो साफ़-साफ़ कह दे, कि हम पहले ही तीस रुपये वाली थाली की तैयारी कर लें. खामख्‍वाह क्‍या लड़ि‍यायें, पहले ही सर्द सांस भर लें, मन भारी औ’ छाती मजबूत कर लें? और प्‍यारे, काम-धंधे का पंचांग क्‍या कहता है? छुच्‍छे गाल बजायेंगे कि बैंक तक जाने का बहाना भी पायेंगे? कुछ कर, यार, जतन चला, जुगाड़ भिड़ा, सिटते-सेटियाते लोगों के बीच हमारा भी मंत्र पढ़वा! हां-हां और ना-ना कि ये भी और वो भी के आधे मन से मत आना, प्‍लीज़! सीधे-सीधे कह रहा हूं, आना फिर ज़रा समझदारी से ही आना. हंसना तो ठीक से हंसते हुए आना, रोना तो भगवान के लिए मेरी पूर्व-प्रेमिका के घर जाना. हां. और क्‍या? ग़लत नहीं कह रहा हूं, हर बात की सीमा होती है. और मैं पहले ही पका हुआ हूं, हां. दूसरी बात, पुराने क्‍यों झेलेंगे, कब तक झेलेंगे? तो झोली में कुछ नयी दोस्तियां लाना. माल-मत्‍ते की तो क्‍या कहें (कितनी मर्तबा कहें?) जब इतनी अक़ल भी नहीं तब, घंटा, क्‍या तुमसे दिल लगाना? एजेंडा में अभी और कुछ छूटा तो नहीं रह गया? रह ही गया हो तो थोड़ी बुद्धि अपनी भी लगाना, फिल इन द गैप्‍स ठीक से फिलअप करना, तभी अंदर पैर धंसाना, वर्ना हां, फिर लात खाने को तैयार होके ही आना..