Wednesday, January 2, 2008

इतना सारा हंसती लड़की..

बच्‍चा तकलीफ़ में रोता है की तरह हंसती है लड़की. बेबात, जबर्दस्‍ती फंसती है. मेरे चुप बने रहने पर घबरायी चुप्‍पी में पूछती है, बताइये न, कैसे होते हैं सुखी? शायद साथी मिल जाये, हो जाऊं? सुलझा-समझदार हो, मीडिया में धंसा हो कहीं लेक्‍चरी में फंसा हो. उसकी बातों पर हंस सकूं, मेरे दु:ख में वह रो सके, साथ सो सके? ओह, कितना अच्‍छा होगा.. मगर इतने में लड़की का आत्‍मविश्‍वास धुआं हो जाता है. सर्दीली सांस और दर्द के झांस में स्‍वर बिगाड़कर कहती है उफ़्फ़, लेकिन ऐसा कोई मिलता कहां है!

पता नहीं मेरा क्‍या होगा, किधर जाऊंगी, इस नौकरी और ऐसे समाज में कितना रह पाऊंगी? सब बैकवर्ड मैंटालिटी के हैं, मेरा अकेलापन आंखों में गड़ता है. दांत दिखाकर मुंह बनाकर कहते हैं आप जैसी कभी यहां देखी नहीं. कलेजा सुलगने लगता है, घूंट पीकर रह जाती हूं. अच्‍छा होता दारु पीती होती, आधी बोतल में सब परायापन भूल जाती, नहीं? लेकिन तब भी सुखी हो पाती?

ओह, इतना सारा आदर्श, इतनी सारी किताबें पार करके आख़ि‍र कहां पहुंचे हमलोग? सिर्फ़ अपना नहीं कह रही, हां. सीवान से शिलंग तक चोट खाये, मुरझाये, सहमे-सहमे सकपकाये कितनी उखड़ी कहानियां हैं दोस्‍त हैं क्‍या फ़ायदा ऐसी ज़िंदगियों का? ज़रा-सा समझौता करके थोड़ा-सा सुखी रह लेने में ऐसी क्‍या हेठी है इतना क्‍या बुरा है बताइये न? सुखी कैसे होऊं, प्‍लीज़, सुझाइये न!

क्‍या करूं, जुगत जुड़वाऊं, दिल्‍ली पहुंच जाऊं? खूब-खूब पैसे कमाऊं और बाकी सब भूल जाऊं. शायद सुखी होने का यही सबसे वाजिब सॉल्‍यूशन होगा, नहीं? काम से लौटकर आजकल रोज़ दिमाग में सब यही सवाल बजते हैं. देखती हूं कोई सपना है चहक-चहककर सबसे मिल रही हूं, कितना खिल रही हूं, पोर-पोर सुखी हूं! रियली?

2 comments:

  1. लेख अच्छा लगा ।
    शायद लड़की ही नहीं अधेड़ उम्र या कुछ वृद्ध सी होती स्त्री भी हँसती है । हँसे नहीं तो जीये कैसे ? हँसना भी जीने का एक हथियार है । बचपन से लेकर मरने तक, हर संस्कार, हर रूप में,जीवन की हर राह में समझौते बिना हँसे नहीं होते । यदि दूसरों पर नहीं तो स्वयं पर, यदि खुशी में नहीं तो अपने हाल पर हँसना ही उसे जीवित रखता है । क्या कोई पुरुष एक बार प्रसव पीड़ा के बाद दोबारा यह सहने को तैयार होगा ? अपने उस हाल पर भी उसकी इस हँसने की इस विशेषता से ही मनुष्य का यह समाज चल रहा है । खैर मनानी चाहिये कि वह हँस सकती है ।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  2. पिछले तीनों पीस बहुत शानदार हैं। खासकर यह और सुकू वाला। इसी रवानी में आपकी असली चीज निकलती है- जगर-मगर जीवन के बीच चिलकती हुई टीस, जिसके कुछ मायने भी नहीं बनते। बीच-बीच में कुछ बीती आवारगी के सटल-सबलाइम पीसेज भी ठेलें, जिन्हें आपसे निकलवाना काफी जिगरे का काम है।

    ReplyDelete