Wednesday, January 9, 2008

नाम ग़ुम जायेगा?..

इंदु, बिंदु, संजु हो सकता है आपकी साली का हो मगर नाम में क्‍या रखा है? होने को मधु या मनमोहन भी हो सकता था. नाम. उससे क्‍या हो जाता? मनमोहन साली की जगह साले होते (इस तबाह मुल्‍क के प्रधानमंत्री होते. अधिक से अधिक) और क्‍या होता? नाम में क्‍या रखा है? मगर एक मिनट ठहरिये, साले या साली की जगह बात आपके पुत्ररत्‍न या रत्‍ना की होती तो तब भी चर्चा का टेक यूं ही कैज़ुअल सहजता का बना रहता? रह पाता? यही मुश्किल है. साले-सालियों की लोग जाने देते हैं लेकिन अपने ख़ून के नामकरण का प्रश्‍न उठते ही भारी गंभीर, किंचित चिंतित-से होने लगते हैं. नाम में क्‍या रखा है वाला मुहावरा याद दिलायें तो ये गालियां याद दिलाने लगते हैं. मगर सोचने की बात है नाम में सचमुच ऐसा क्‍या रखा है? नाम आते कहां से हैं? और चढ़े हुए नामों का कुछ वक़्त बाद स्‍टॉक नीचे कैसे चला आता है? क्‍यों? ओह, नामों का क्‍या कोई सीक्रेट प्रदेश है? उम्‍बेर्तो एको के थ्रिलर ‘द नेम ऑफ़ द रोज़’ की तरह रहस्‍यलोक?..

एक समय था बहुत सारे शंकर, सुरेश, रमेश, महेश सर्कुलेशन में थे, अब सब गायब हो गए हैं. सड़क पर चाय का खोखा लगानेवाला भी अपने बच्‍चे का रमेश जैसा डाऊनमार्केट नाम नहीं रखना चाहता. अपमार्केट फिर क्‍या होगा? राजर्षि? ऋत्विक, ऋषिवर्द्धन? राजीव बाबू के सिंहासनारुढ़ होने व मुक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था को अंकवार में भरने की शुरुआत के साथ ही नामकरण की दुनिया में अचानक ऋषि-विदुषी बड़े ट्रेंडी हो गए. हाईस्‍कूल फेल बंदा भी घर में मंजुषा और मेनका ठेलने लगा. सारी मंजुएं, रंजुएं देशनिकाला हो गईं. इसके पीछे कौन ताक़तें काम कर रही हैं? या एक्‍ज़ॉटिक बुद्धि? क्‍या घर में हम जर्नादन या दिलीप जैसे नाम अब फिर कभी नहीं सुनेंगे? कि बीस वर्ष बाद ऋषियों की तरह इनकी पुनर्वापसी होगी?..

एक तरह से सोचिए तो कितना झमेले का काम है. शादी के बाद पहले बच्‍चा लाने का काम कीजिए (हड़बड़ाहट में कुछ लोग पहले ही कर ले जाते हैं.. मगर यहां फ़ि‍लहाल परंपरावादियों की बात हो रही है, परंपरा परे व परों की नहीं), और एक बार बच्‍चा ले आये तो चैन पा गए ऐसा नहीं. फिर वाजिब नाम पाने की ठेलमठेली में लगिए (हालांकि कुछ समझदार लोग इसका निदान खोजे रहते हैं.. शादी से पहले ही नाम संजोकर रखते हैं.. कि बाद में बच्‍चे पर यही नाम चिपकाना है. दरअसल ऐसे समझदार शादी करते ही इसलिए हैं कि बच्‍चा लाने का रास्‍ता खुले और कहीं ऐसा न हो कि जेब में संभालकर रखा नाम अनयूज़्ड रह जाये!).

मुझे एक बात समझ नहीं आती कि प्रयोगों से भयानक रूप से बचते रहनेवाले इस देश में नाम के क्षेत्र में ही कुछ प्रयोग क्‍यों नहीं कर लिए गए? मसलन ज्‍यामिति वाली सहजता अपनाकर किसी ने घर में तीन बच्‍चोंवाले घर में बच्‍चों को ‘अ’, ‘ब’, ‘स’ का नाम दिया? या फिर निहायत अपरिचित, अजाने ऋषियों-विदुषियों के पीछे लड़ि‍याये रहते हैं, मगर अपनी मनपसंद मिठाइयों की संज्ञा से बच्‍चों को सुशोभित करने से बचते रहेंगे, क्‍यों? फिर भाववाचक, और उसमें भी सकारात्‍मक, संज्ञाओं के पीछे भागना. अकिंचन, प्रसन्‍न, शुभम्! अरे. उद्वि‍ग्‍न क्‍यों नहीं, भई? प्रमोद प्रमाद या विषाद होता तो नाम में नुकसान हो जाता? कुमुदिनी प्रमादा या विषादिनी होती तब आप उससे बात नहीं करते? अरे?..

एक दौर था ज़्यादा कुत्‍ते टॉमी, रॉकी, बॉबी के नाम से जाने जाते थे. बाद में हिंदी फ़ि‍ल्‍मजगत के अभिनेताओं-अभिनेत्रियों ने अपने बच्‍चों के लिए वे नाम ले लिए तो पता नहीं इस संकट का कुत्‍ताजगत ने क्‍या हल निकाला. मगर हम जो निकाल रहे हैं वह बड़ा हिला हुआ चंचल हल है, और मैं तो कतई संतुष्‍ट नहीं हूं. पता नहीं आप कैसे और क्‍यों हैं. अब समय आ गया है कि बच्‍चों का नाम आजतक, सहारा और समय सब रखा जाये. आपने नहीं रखा है तो चलिए, इसी बहाने एक बार फिर बाप बनने का सपना संजो सकते हैं. नॉट अ बैड आइडिया.

1 comment:

  1. दिलचस्प विषय है। राम नयन,राम अवतार, लाल बहादुर, महेंद्र प्रताप, समरेंद्र, राजीव, अजय, अनिल, सुरेश... फिर शिवम्, क्षितिज, रोनित, श्वेताभ, तन्मय से होते हुए सिलसिला अपने तत्सम शब्दों तक जा पहुंचा है। इसमें पूरे 50-60 सालों की यात्रा है। वाकई नामों का पूरा समाजशास्त्र है। वैसे यह सिलसिला क्षैतिज ही नहीं, लंबवत भी है। जब इंदिरा अपने बेटे का नाम राजीव रख चुकी थीं, उसके पांच-दस साल आम लोग अपने बेटों का नाम राजीव रखने लगे।

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