Thursday, January 10, 2008

ए नॉट सो टिकलिंग-ग्लिटरिंग नाईटमेयर..

एक भारीपन ओढ़े भारी-भारी कदमों, या जो भी होगा जिसकी मदद से वह घूमता है, उस छोटे से बेमतलब दायरे में वह घूम रहा था. वही. सांप. सर्र-सर्र वाला कोई दर्पीला भाव नहीं, अस्थिर करती एक थरथराहट थी, बस. यह ज़ाहिर करती भयानक उदासी कि देखो, जीवन जीने में कितनी थकान है. श्रम. व्‍यर्थ का दोहराव. मैंने सोचा हद है सपने के रीयलिज़्म की, सांप होकर ट्रेजेडी की तस्‍वीर बुन रहा है! कुडंट इट बी मोर वीयर्ड एंड सर्रीयल? माने मैंने ठीक-ठीक ऐसा सोचा नहीं लेकिन कुछ इसी तरह सोचने जैसा भाव अंदर ही अंदर महसूस किया. इनसाइड सपना. सांप कंटिन्‍यूड विद् इट्स भारीपन एंड थरथराती ट्रेजेडी. घबराहट में मेरे यथार्थ का एक वास्‍तविक लेयर तैरता हुआ कहीं से घुसा. सपने में. कि नौंवी कक्षा की विज्ञान की एक एनसीआरटी की एक किताब खरीदकर लाया हूं, और किताब में फि‍ज़ि‍क्‍स के ढेरों इक्‍वेशंस हैं कि देखकर मन की वही दशा हो रही है जो न खानेवाले बंदे की पान में बहुत सारा ज़र्दा खाकर होने लगती है. मोर ट्रेजिक दैन द सर्पेंटाइन ट्रेजेडी! कसाइन-कसाइन की तर्ज़ पर मन ज़र्दाइन-ज़र्दाइन-सा हो गया..

करुणा व वितृष्‍णा की कुछ प्रगाढ़ बयार रही होगी, जभी उसके असर में सांप गायब हो गया.. दृश्‍य अब किसी चमकती आंखों में डिसॉल्‍व हुआ.. और ग्रेविटेशनल थरथराहट की जगह इस बार फास्‍ट मूवमेंट.. रियलाईज़ हुआ चूहा है.. सांप से गिरे चूहे में लटके?.. प्‍लीज़, यार, अब चूहा मत दिखाओ! गिड़गिड़ाकर मैंने प्रार्थना नहीं की लेकिन वैसा ही कुछ करता-करता-सा महसूस किया.. मगर बेशर्म आकारहीन वह दिखता रहा.. चूहा.. एक्‍सट्रीम क्‍लोज़अप में.. अपनी सारी गंदगी व सारे रोंवों समेत! मैंने मन ही मन सपने की चेतना की आंखें मूंद लीं.. लेकिन इसके पहले कि वह वीभत्‍स छवि धूमिल होती, उसके मैलसने नाख़ूनों के नीचे दबे नोटों के बंडल दिखे.. नये, चमकते.. जुगुप्‍सा हुई जाने बांग्‍लादेशी टाका हैं डालर्स हैं क्‍या हैं?.. चेतना की आंखों को मैंने हड़बड़ाकर मुंदने से रोकने की कोशिश की.. मुंदती-मुंदती-सी पलकें अलसायी-अलसायी-सी अटकीं.. अब रोंवे, गंदगी व नोटों की चमक कुछ अजब लुकाछिपी का खेल खेलने लगे.. मैं सपने में उठने.. और कुछ उसी मार्मिकता में पिटने लगा!..

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