Monday, January 14, 2008

चिकन सूप, नये कटोरे में..

अंग्रेजी का एक पहुंचा हुआ पत्रकार जो दु:खी होकर अभी तीन महिने पहले सवाल कर रहा था कि सचिन को अब रिटायर नहीं हो जाना चाहिए?, आज सवाल पूछता एसएमएस संग्रहित कर रहा है कि सचिन भारतरत्‍न के हक़दार क्‍यों नहीं हैं! टेलीविज़न के आजू-बाजू फुदकते हमारी समय की कुल अब इतनी ही स्‍मृति बची है! इन सजे-बजे पत्रकारों के पीछे-पीछे आज हम किसी को हिमालय पर चढ़ा देना चाहते हैं, और चार दिन न बीते उसे दुरदुराते फिरने के लिए कसमसाने लगते हैं! इन पत्रकारों की ही तरह, हमारी ऑपिनियन भी, हर चौथे रोज़ बदलती चलती है! मैं नहीं कह रहा, तहलका के एक मीडिया समीक्षक दुखी हो रहे हैं.. सो टचिंग फॉर अ सेंस ऑव हिस्‍टरी!

इसके बाद जीवन की तरतीब में कोई कसर रह जाये तो उसे रोंडा बर्न जैसों की चमकती स्पिरिचुएलिटी पढ़कर पूरा करें, धन्‍य हो लें. इस चिंतन का ज़रा एक नमूना देखिए, “अगर तुम्‍हारा कज़ि‍न मर रहा हो और तुमसे उसपर बात करना चाहे, तो विषय बदल दो. सिर्फ़ उसपर बात करते हुए तुम बीमार पड़ सकते हो.’’ मगर इन दो कौड़ी की चिंतामणियों से सज्जित किताब खूब धमाधम बिक रही है! यहीं नहीं, दुनिया भर में.. छह महिनों में चालीस लाख प्रतियां, मज़ाक नहीं.. फिर किताब के पीछे फ़ि‍ल्‍म.. उसके भी अब तक बीस लाख डीवीडी बिक चुके हैं!.. क्‍यों बिक रही हैं? (टाईम पत्रिका के दुनिया के सौ महत्‍वपूर्ण लोगों की सूची में रोंडा चढ़ी हुई हैं..) वह क्‍या है जो हमें इस तरह की दो कौड़ी के लेमनचूसों के पीछे उत्‍साह से लेलो-लेलो ललचवाता है? आमतौर पर ही नहीं, आज़ादी के बाद से अभीतक शिक्षा के भयानक गड्ढे में गिरे (और धीरे-धीरे वह गड्ढा और बड़ा हो रहा है!), मगर उसे पूरी तरह अनदेखा किये चुप बने, लेकिन ‘तारे ज़मीन पर’ जैसी फ़ि‍ल्‍म देखकर फिर लेलो-लेलो करते हुए ताली बजवाता है?..

No comments:

Post a Comment