Tuesday, January 15, 2008

टूटकर बिखरिये नहीं जुड़े रहिये.. यही नियम है

चीज़ें टूट क्‍यों जाती हैं? जैसे मेरे कुछ परिचित हैं (मैं भी हूं), दुनिया में हो रहे उथल-पुथल के केंद्र में स्‍वयं को अनुपस्थित पाकर वे (मैं भी) टूटे-टूटे-से रहते हैं. अभ्‍युदय की जनाना है, सुबह-सुबह बीसेक साल का एक गबरू लौंडा दूध पहुंचाने आया करता था जिस पर खूब हर्र-हर्र नेह उमड़ाती थीं, मगर फिर कोई वजह हुई, बच्‍चे ने आना बंद कर दिया और अभ्‍युदय की जनाना जो हैं टूट गईं. मेरा ही दिल, पता नहीं क्‍यों, पीले रंग के फूल-पत्‍तीदार एक चीनी के बाउल से लगा हुआ था, लगा क्‍या एकदम चिपका हुआ था.. सुबह सहेजते में हाथ से छिनककर उसकी डंडी टूट गई और.. नतीजे में मैं एकदम टूट गया हूं!

क्‍यों टूट जाती हैं? चीज़ें? और टूटने के बाद फिर जुड़ भी जाती हैं! जैसे चीन की एक डॉक्‍यूमेंट्री में मैंने देखा कि सूने-फालतू गांवों में सूनी आंखोंवाले फालतू बूढ़े चीनी के टूटे बरतनों की मरम्‍मत करते घूम रहे हैं (जबकि हमारे यहां, ससुर, सूनी-फालतू आंखोंवाले बूढ़े भले हों, उन्‍हें चीनी के बरतनों की मरम्‍मत करते नहीं देखा गया. और देखा गया भी हो तो दूसरे भी देख लें ऐसी उनपर जगत्‍प्रकाश जगानेवाली डॉक्‍यूमेंट्री नहीं बनीं). हालांकि चीन में भी, तरक्‍की की चकमकी दुनिया में, चीनी के टूटे बरतन ही रीपेयर हो रहे हैं, अभ्‍युदय की जनाना का टूटा दिल नहीं. कभी वापस हो सकेगा, सीरियसली संदेहास्‍पद है. जबकि पता नहीं क्‍यों, मेरे साथ सीरियसली संदेहास्‍पद नहीं हो पाता. यही दिल टूटकर टूटी रहनेवाली बात. मगर एवरेज़ में देखें तो स्‍पष्‍ट ज़ाहिर होता है कि चीज़ें टूटकर बिखरती नहीं, जुड़ती रहती हैं. आईंस्‍टाइन ने भी सौ वर्ष पहले एनर्जी इक्‍वल टू मास वाला फ़ॉर्मूला दे ही दिया था, कि चीज़ें टूटतीं नहीं, एनर्जी में कन्‍वर्ट होती रहती हैं. सौ वर्ष बाद वही बात मैं बिना फ़ॉर्मूले के दे रहा हूं.

मगर यूनिवर्सल लॉ के बतौर इसे सामने ठेलते हुए कहीं मैं ग्‍लोबल कॉरपोरेट पूंजी के- दुनिया के गरीब और उनकी गरीबी जैसी है वैसी ही बनी रहे- षड्यंत्र में सहभागी तो नहीं हो रहा? इस फ़ॉर्मूले को खींचकर लेंस के नीचे छिद्रान्‍वेषण करते हुए परिवर्तनकामी ताक़तें यथास्थितिवाद का ख़तरनाक़ नतीजा निकालने पर मजबूर.. और मुझे चप्‍पल-चप्‍पल पीटने पर आमादा.. तो नहीं हो जायेंगी? मगर क्‍या यह सचमुच इतना घबराहट जगानेवाला विषय है? होना चाहिए?.. इस भयावहता की कोई निर्भय काट भी तो होगी मगर? जस्‍ट फ़ॉर द सेक ऑव द अदर साईड ऑव द आर्ग्‍युमेंट? बिफरती है तो बिफरी ही नहीं रहती अनंतर ठंडाती भी है टाइप?.. यानी अभी जो चप्‍पल-चप्‍पल हो रहे हैं, वो एक वक़्त के बाद दुलार देने के लिए ज़मीन पर लोटेंगे भी.. श्‍युर, दैट्स द ओन्‍ली वे दिज़ डायलेक्टिक्स हैज़ टू गो! नो?..

चलते-चलते. आप आज टूटे और बिखरे हुए हैं तो ऐसी घबराने की बात नहीं. कल जुड़ेंगे भी. आईंस्‍टाइन प्रदत्‍त प्रकृति का नियम है.

4 comments:

  1. सत्य वचन! परातु जब टूतते हैं तब तो ऐसा ही लगता है कि अब नही जुड़ पाएंगे और इसी मनःसथिति मे कुछ लोग अपने को खत्म कर लेते है वहीं ग़लत हो जाता है।

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  2. मतलब जो जुड़े हुए हैं वो बिखर जाएंगे.. ह्म्म..

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  3. फिर से जुड़ना एक ख्वाहिश है फकत, जिससे कि हर बार अपना होना होता है। बकौल शमशेर (मोर ऑर लेस)-

    लौट आ ओ धार
    टूट मत ओ दर्द के पत्थर हृदय पर
    लौट आ ओ फूल की पंखुड़ी
    फिर फूल से लग जा...

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  4. @अभय,
    ये क्‍या तरीका है? शुभ नहीं सोच सकते.. घर से गुड़ और गजक लेके आये हो फिर भी? (ख़ैर, चिंता की बात नहीं.. इसका भी दुहरा पहलू होगा ही.. आज गनहला सोच रहे हो, कल सुनहला सोचोगे.. नियम है!)

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