Wednesday, January 16, 2008

हिलते-हिलाते, ठिलते-ठिलाते..

कल अभय ने एक पोस्‍ट लिखा था- काम चलाने की मानसिकता. अपनी-अपनी समझ के अनुरुप इस ख़्याल से हम सभी कभी न कभी ज़रूर रूबरू होते हैं कि अपने यहां यह काम चलानेवाली मा‍नसिकता क्‍यों है भला. ‘एक्‍सेल’ करना हमारी फ़ि‍तरत तो दूर, ‘एवरेज’ से ज़्यादा करने तक के ख़्याल से हमारा दम फूलता है. कहानी लिखनेवाला व्‍यक्ति कहानी जैसी चीज़ लिख ली गई, और अब जल्‍दी-जल्‍दी किसी तरह कहीं छप जाये के लिए कसमसाने लगता है. उस किसी तरह लिख ली गई कहानी को ‘अच्‍छी’ या ‘अद्भुत’ कहानी बनाने की भी कोई रचनात्‍मक यात्रा हो सकती है जैसी चिंता अपने कहानीकार की रात की नींद हराम नहीं करती. कहानी जैसी कहानी लिख ली गई है की मानसिकता में वह सुखी बना रहता है. उसी तरह जैसे एक चम्‍मच या चप्‍पल बनानेवाला मैनुफैक्‍चरर चम्‍मच या चप्‍पल जैसी दिखती चीज़ पैदा करके बाज़ार में किसी तरह ठेलने मात्र की अपनी कारीग़री में संतुष्‍ट रहता है. कैसे उसकी चम्‍मच या चप्‍पल दुनिया में बेहतरीन कारीग़री का नमूना बताकर पेश किया जाये, और इस दिशा में कैसे उसका विशिष्‍ट कौशल रास्‍ता तैयार करे जैसे विचार उसके भेजे में नहीं घुसते. घुसते होंगे भी तो ज़्यादा देर वहां ठहरते नहीं. क्‍यों नहीं ठहरते?

चिरकुट संडास जैसे संडास में से हम फारिग होकर बाहर आ गए, चिरकुट अख़बार जैसे अख़बार को पलटकर हमने अख़बार देख लिया के भाव में सुखी हम दिन शुरू कर देते हैं. क्‍यों कर देते हैं? हमारा ख़ून उबलता क्‍यों नहीं कि ये चीज़ें दस गुना.. सौ गुना और बेहतर हो सकती थीं, दूसरी जगहों में होती हैं, फिर हम क्‍यों सिर्फ़ काम चलाते रहते हैं? काम से ज़्यादा आखिर कब चलायेंगे? या ऐसा करने की कोशिश में हमारी तौहीन हो जायेगी? वह भारतीय संस्‍कृति का अंग नहीं समझा जायेगा?

आखिर काम चल जाने से ज़्यादा की अपेक्षा हमारी तबीयत क्‍यों नहीं बनती? क्‍या हम किसी तरह काम चला लेते हैं की ज़िंदगी जीनेवाले दूसरे दर्जे के लोग हैं? सातवें-आठवें दर्जे के? वही ऑथेंटिक (प्राचीन, या आधुनिक पता नहीं क्‍या) भारतीय संस्‍कृति है? क्‍योंकि एक्‍सेल करनेवाला दिमाग़ कभी-कभी तो दिख जाता है. मगर वह यहां नहीं, एक्‍सेल करने के लिए अमरीका व योरप गया होता है! तो अपने यहां की ज़मीन में ही कोई खोट है? ज़मीन शिक्षा और संस्‍कार देती है कि काम चलाने भर काम कर लो, ज़्यादा करोगे तो आगे की ज़िंदगी रोने और समाज में परायापन महसूस करते हुए बीतेगी? क्‍योंकि यह क़ि‍स्‍सा भी अपने यहां उतना ही आम है कि फलाना सिपाही या ढिकाना लांसनायक परमवीर चक्र पाने के बाद बुढ़ौती यह रोते हुए काट रहा है कि उसने देश को अपनी ज़िंदगी दी और देश बदले में उसे आठसौचालीस रुपये का पेंशन देकर काम चला रहा है! तो यहा आप और हम नहीं, समूचा देश (अखंड राष्‍ट्र और जाने क्‍या-क्‍या) ही है जो किसी तरह काम चला लेने की मानसिकता का उज्‍जवल उदाहरण बना हुआ है?..

अब रतन टाटा के नये-नये लॉंच हुए नैनो का ही क़ि‍स्‍सा लीजिए. कटक से बदायूं और मुंबई से मलाबार तक एक लाख कार वाली सनसनी तनी हुई है. लोग एक्‍साइटमेंट में सो नहीं पा रहे. और किसी तरह पा रहे हैं तो सपने में नैनो का लाल देखकर एक्‍साइटमेंट में फिर उठ जा रहे हैं! जल्‍दी ही ऐसी कोई ख़बर आयेगी कि बारह लोगों की एक छोटी कंपनी के बारहों लोगों ने नैनो बुक किया है! मगर उसके बाद क्‍या होगा? किसी तरह से कार वाले होकर कार वाले हो जाने की मानसिकता से काम चला ले जायेंगे? इसके बारे में कोई चिंता करेगा कि पहले से ही कचर-मचर बनी शहर की सड़कों पर ये कारें जगह कहां पायेंगी? सड़कों का वह कौन-सा इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर है जहां ये सुहाने सपने तैरेंगे? कि शहर ठेल-पेल के इन्‍हें अपने में हिलाते-झुलाते आगे बढ़ाते किसी तरह से काम चला ही लेगा?..

6 comments:

  1. एक्सेंलेंस के लिए अकेला हो जाने, अलग-थलग पड़ जाने की हिम्मत चाहिए। एक लात खाए समाज में ऐसी हिम्मत जानलेवा साबित हो सकती है।

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  2. आपकी चिंताऎं वाजिब है. हमारी इस काम चलाऊ मानसिकता के लिये हमारी शिक्षा और समाज भी पूरी तरह जिम्मेवार है.

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  3. आज की पोस्ट का बदला मिजाज़ ज़्यादा अच्छा नही लगा पर हमने काम चला लिया है ।
    अब चलने दो , अब निबट जाने दो ,खत्म करो --यह स्वभाव हमारा सब की साँझी पारम्परिक विरासत है । इसी से मुझे भयंकर चिढ है । चिढने वालों की चिढ भी यहाँ ठीक की जाती है ।ब्लू लाइन घिसट रही है , घिसटने दो , 5 रु में घर भी पहुँचा रही है। रेस करती है ,करने दो , मानेंगे है नही ड्राएवर किसी की , चलो जल्दी घर ही पहुँच जाएंगे ........

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  4. aapkii post padhey bina kaam bhi nahi chaltaa aur hameshaa padhney ke baad ...dimaagi uthal puthal ....shuruuuuuuuuu

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  5. देखिये इस विषय पर एक किताब लिखी जा सकती है पर हम लोगों ने एक पोस्ट से काम चला लिया!

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  6. यदि आप अति उत्तम हैं तो लोग पसन्द नहीं करते । बॉस डरता है कि क्या मुझसे आगे निकलना चाहता है । पड़ोसी सोचता है कि एक पार्टी ही तो कर रहे हो, उसे पर्फैक्ट बनाने की क्या जरूरत । पड़ोसिन सोचती है कि एक साड़ी ही तो काढ़ रही हो, थोड़ा सा नमूना गलत हो गया तो क्यों उधाड़ना ? दर्जी सोचता है कि यदि बटन टंगा भर है तो क्या बुराई है? दो दिन बाद या पहली बार पहनते से ही टपक जाए तो टपके । हम सोचते हैं, ब्लॉग ही तो लिख रहे हैं , अशुद्धियाँ होतीं हैं तो कौन दोबारा पढ़कर ठीक करे ?
    घुघूती बासूती

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