Thursday, January 17, 2008

ऐसी उतावली क्‍यों है?..

“पैरों के नीचे कंकड़ हैं? शीशा, पारा, आग? गरीब की जान है? क्‍या है फिर जिसकी इतनी तक़लीफ़ है?”
- संसार का स्‍वाद, श्री चिंतारत्‍नप्रकाश

“रात के बाद दिन के बाद रात होती है, ज़िंदगी स्‍साली इसी तरह तमाम होती है.”
- गंगाराम माडर्न हेयर कटिंग मंदिर

“निहुरे निहुरे, बलम, दुनिया देखी. सिहुरे सिहुरे शाम.. ”
- एक नाइजेरियन ठुमरी

आलम की नौकरी नहीं छिनी थी, न कुबेर को उसकी बैंक से धमकियों भरे फ़ोन आ रहे थे.. फिर भी दोनों बीयर इसी तरह पी रहे थे मानो अपने जीवन के न्‍यूक्लियस को गिलासों के उस फ़ेनिल संसार में जज़्ब करके सब भुला देना चाहते हों.. मगर न्‍यूक्लियस था कि चुकते झाग के पीछे से बार-बार ऊपर उभर आता.. इतनी सारी बीयर पीकर भी समय भूलता नहीं की हारी, उदास नज़रों से आलम ने कुबेर को देखा और सिर नीचे गिरा लिया.. कुबेर ने फ़ीकी मुस्‍कान भरी और थोड़ी देर ख़ामोश रहने के बाद बुदबुदाकर कहा- सब इतना उलझा क्‍यों है?

- तुम बताओ हम बतलायें क्‍या.. आलम ने बिना सिर उठाये कहा.. एक कविता पढ़ी थी.. किसी दौर में जब कवितायें पढ़ता था, उसकी याद आ रही है.. एक ड्राईवर का टायर बराबर हो गया है और वह मन ही मन सोच रहा है: जहां से आया हूं मुझे वह जगह पसंद नहीं, न जहां जा रहा हूं वह जगह पसंद है. तो फिर टायर बदलने की ऐसी उतावली क्‍यों है?..

कुबेर ने बाल की लटों पर पीछे हाथ फिराते हुए मुस्‍कान भरी- हूं, ब्रेख़्त. बर्तोल्‍त ब्रेख़्त की कविता है.

- मालूम है किसकी है. एक वक़्त था लगता था ब्रेख़्त को जानता हूं.

- अब भी जानते हो.

- ना. अब नहीं जानता.. आलम ने यूं जवाब दिया मानो दोस्‍त के सवाल से वह चौंक गया हो.

ज़रा ठहरकर कुबेर ने कहा- वैसे तुम्‍हें मेटाफ़र एक्‍सप्‍लेन करना होगा.. कौन या क्‍या है यह टायर?..

दोस्‍त का जवाब देने की जगह खोये-खोये-से कुबेर ने बीयर की नयी बोतल खोली और उसे गिलास में उड़ेलना शुरू किया.

2 comments:

  1. कहना क्या चाहते हैं आप आदमी न हड़बड़ाए.. ना "है कौन ये साला टायर?" जैसे सवाल पूछे.. हैं? करे क्या आदमी? बैठ कर बीयर की बोतलें खोलता रहे.. ?

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  2. पानी में मीन पियासी....

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