Saturday, January 19, 2008

बकलोल बहक..

पृथ्‍वी की उम्र के वर्षों की संख्‍या बराबर झाड़ का जंगल था चील को जिसे तैरते हुए पार करके आसमान में उड़ जाना था.. लेकिन पृथ्‍वी की उम्र के वर्षों की संख्‍या का सुदीर्घ विस्‍तार कुछ ऐसा पसरता फैला था कि चील उड़ता रहा, उड़ता रहा, उम्र निकल गई मगर जंगल की हद तक पहुंच न सका.. वैसे ही जैसे अस्तित्‍ववाद की उलझी किताब में उलझी, तय किये कि आज जो हो जाये भेद पाकर दम लेगी, भिनभिनाती-झल्‍लायी मक्‍खी माथा मारती रही और झख मारकर अंत में बेवक़ूफ ने माथा फोड़ लिया!

घोड़े, ऊंट, जिराफ और कंगारु कहां जानते हैं? अफ्रीकी बीहड़ के मस्‍त व दर्पीले हाथियों ने भी कब ज़ि‍क्र किया है उन्‍हें ख़बर है. मेटेओराइट, मार्स और मोलेक्‍यूल जितनी नक़्शेबाजी करें, इस संबंध में उन्‍होंने भी मुंह सिला ही हुआ है.. सच्‍चाई है सिर्फ़ भगवान ही जानता है भगवान की गुत्‍थी क्‍या है. मगर कभी विचार करनेवाली बात है गुत्थियों की भगवान को भी कितनी ख़बर है. ख़बर है? क्‍योंकि बहुत बार दिन चढ़ आता है, जलप्‍लावन की चढ़ान चढ़ती चलती है, तक़लीफ़ और गंद की गलाजत चढ़ती चली जाती है, तब प्रियदर्शन भगवान की वत्‍सल करुणप्रियता के दर्शन नहीं, माताराम चौबे का लघु-क्षुद्र ब्राह्मणत्‍व दर्शित होता है.. मुंह में मगही पान दाबे माताराम चौबे बोधि वृक्ष के भूगोल की हद में टहलते हुए बुद्धत्‍व की नहीं सोचते होते. बंबई की माया, बग़दाद में बॉंबिंग और गदहे की उस लीद के बारे में भी नहीं सोच रहे होते- चंदेक मिनटों में जिसके रसायन में उनका बायां पैर सना जायेगा और वे बकलोलों की तरह मंदिर की दिशा में देखते हुए मुस्‍करायेंगे मानो उनके पैरों में गदहे की लीद नहीं, गरदन में लक्ष्‍मी का जयमाल चढ़ा हो..

घोड़ा कहता है इतना दौड़के हम कहीं पहुंच रहे हैं? क्रॉसवर्ड के काउंटर पर बैठी लड़की फीका मुस्‍काती है कि किताबों के बीच रहकर आप किताबत्‍व नहीं पा लेते.. जैसे खोयों और खजूर के बीच बैठे मिठाई लाल मीठा नहीं हो जाते.. दुनिया में रहकर कोई दुनिया पा लेता है? मेरे ब्‍लॉग पर आकर आप मुझे पा लेते हैं (पाते हैं?).. मैं ही स्‍वयं को कहां पा लेता हूं?..

2 comments:

  1. सुंदर लेख है। अच्छा लिखा है आपने। साधुवाद।

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