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Jan 21, 2008

मेरी चीन यात्रा: सत्‍ताइसवां भाग..

ऐसा नही है कि गुस्‍सा सिर्फ़ सईद मिर्ज़ा के अल्‍बर्ट पिंटो को ही आता हो. गुस्‍से का भूगोल ही विस्‍तृत नहीं होता उसकी ज्‍योलॉजी भी काफी उलझी होती है. फिर सांप के बिल या अजांग के दिल में ज़हर फिंकवाने के बाद गुस्‍सा कान और नथुने से न छूटे तब वह गुस्‍सा कैसा. फिर वह अजांग ही कैसा?

क्‍या सोचकर (और मुझे समझकर) गाओपिंग ने ऐसी ऊटपटांग चिट्ठी लिखी (या लिखवायी, एक ही बात है)? मैंने उसका (या किसी का भी) क्‍या बिगाड़ा है? जीवन में जब कभी बिगाड़ा है हमेशा खुद का ही बिगाड़ा है.. लेकिन फिर भी मुझे चिट्ठि‍यां मिलती हैं.. और ज़्यादातर इसी प्रकृति की मिलती हैं.. कि लगे उम्‍मीद की कोई किरण फूटेगी.. मगर आखिर में गड्ढों के फूटने का ही दृश्‍य खुलता है! पत्र लिखने का ऐसा ही बुखार चढ़ा था तो गाओपिंग किसी और को नहीं लिख सकती थी? चीन में भी आखिर छोटे कद के आमिर और छोटी बुद्धि के अभिषेक होंगे.. अपना छोटापन उन्‍हीं पर लुटाती, मुझे लपेटने की क्‍या ज़रूरत थी? दारु के ठेके और लू ह्वाई की करतबों में मैं पहले से ही पर्याप्‍त लिपटा हुआ नहीं हूं?..

गाओपिंग की बेवकूफी पर गुस्‍सा आने लगा. आमतौर पर ऐसा गुस्‍से को मैं अमूमन जितेंद्र-लीना चंदावरकर टाइप फ़ि‍ल्‍म देखकर काबू में लाने की कोशिश करता हूं, या दो दिन की दाढ़ी और बिखरे बालों में चिंता से हाथ डाले गुलज़ार की फ़ोटो के साथ गुलज़ार टाइप किसी लेख को पढ़कर.. या चरित्र और नैतिकता पर गोविंदा और प्रियंका चोपड़ा का टीवी पर कोई इंटरव्‍यू सुनते हुए.. इन सबका एक ‘हीलिंग’ पहलू यह है कि इन सबके बीच देह, आत्‍मा (व अन्‍य वांछित हिस्‍सों) में ऐसी-ऐसी झुरझुरी उठती है कि पहलेवाला गुस्‍सा स्‍थानांतरित होकर भुल जाता है.. और उससे छिलने की जगह हम कुछ और छीलने में उलझ जाते हैं.. मगर चीन में रहते हुए अभी दिक़्क़त थी कि हम चाहकर भी जीतू और लीना की ‘हाय रे हाय, नींद नै आय’ देख नहीं सकते थे.. गुलज़ार, गोविंदा, प्रियू को सुन भी कहां-कैसे सकते थे.. आंखों के आगे वह दो कौड़ी की चिट्ठी पड़ी थी जिसे देख-देखकर जलते रह सकते थे. तो वो तो रहे ही थे. मगर जलके खाक़ नहीं हो पा रहे थे!

कुछ लोगों की आदत होती है किसी भी बात पे दांत निपोर देते हैं. निपोरे-निपोरे ख़बर करेंगे कि मौसी गुज़र गई. बेटा इंटर में फेल हो गया. बीवी हलवाई के बेटे के साथ भाग गई. बड़ा बुरा हुआ.. सुन रहे हैं, भाई साब? निपोरे-निपोरे. उसी तरह कुछ लोग हर घड़ी सुलगन में रहते हैं. बीवी के जुड़वां हो गया, सुलगन में हैं. नहीं हुआ तो हैं ही.. कि हरामख़ोर, एक जुड़वां तक न जन सकी! अलग-अलग लोग, अलग-अलग तबीयत. मेरा मामला अलग है. मैं आसानी से दांत निपोरे रह सकता हूं, मगर हाथ में एक गाओपिंग टाइप चिट्ठी पकड़ा दीजिए फिर देखिए, मैं कैसे रस्‍सी की तरह जलने लगता हूं! अच्‍छा होता पीछे ‘कोयला भयी न राख़’ टाइप कोई चिरकुट गाना बजता होता. नहीं बज रहा था. पता नहीं उसका कैसा तो एक चीनी संस्‍करण बज रहा था..



लू ह्वाई से मैंने छिनकी आवाज़ में कहा- अबे, क्‍या ठेले हुए हो.. बंद नहीं करवा सकते?..

लू ह्वाई ने फट के कहा तो तुम्‍हारी छाती पर मलाई गिराने के लिए क्‍या रुना लैला सुनायें?..



जैसे एक काफी न हो, उससे लगे-लगे एक और..!



मैंने जवाब नहीं दिया. सन्‍न नज़रों से लू ह्वाई को देखता रहा. जवाब में लू ह्वाई भी लगभग वैसी ही नज़र नहीं कान से जो बज रहा था उसे सुनता रहा..

हारकर मैंने लू से कहा- ओ सुलगते आग, साऊंडट्रेक बदल दे, बच्‍चा, इन द मूड फॉर लव नहीं हूं..



इसे सुनकर समझ नहीं आ रहा था अब क्‍या करूं.. एक बार मन किया कि साले को दारु छोड़कर सब झंझट ही खत्‍म कर दूं.. फिर लगा यह घंटा क्‍या बुद्धिमानी होगी..

छोड़ी नहीं, हाथ की बोतल से गटकते हुए कुकुरमुत्‍ते के पकौड़े खाता गाओपिंग की अम्‍माओं को कोसता रहा.. चाहता नहीं था मगर गुस्‍से में एक बार फिर इसकी याद हो आई कि फेल्लिनी और बेन्निनी दोनों ने हमारा कितना चूतिया काटा है. ‘ला दोल्‍चे विता’ और ‘ला विता ए बेल्‍ला’ दोनों ही कितने झूठे टाइटल हैं!

(बाकी..)

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2 कमेंट:

अभय तिवारी said...

बेल्ला.. बेल्ला!!

Tarun said...

प्रमोदजी, गुस्से को नियंत्रण में लाने का तरीका पसंद आया