Thursday, January 24, 2008

बर्फ़ और पानी..

अधनंगे देह चार दिन से मुंबई की सर्दीली हवायें संभालता मैं यूं ही घबराया हुआ हूं, फिर सीधे मस्‍क्‍वा से अवतरित हुए मिखायल अलेंक्‍सांद्रोविच को अकबकाये-कांपते देख, स्‍वाभाविक था मुझे ऊकताहट होती. वही हो रही थी जो मैंने उकतायी-चिढ़ी आवाज़ में मिखायल अलेंक्‍सांद्रोविच से शिकायत की- खादी भंडार का भारी चदरा रख दिया जाये तो भी बदन पर गड़ने लगता है, हम वैसे मुंबईवाले तक इस ठंड को झेले लिये जा रहे हैं. और आप, ससुर, मस्‍क्‍वा से आकर इन पनीली हवाओं में ऐसे मलिन, पानी-पानी हुए जा रहे हो.. हद है, यार?

मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच ने सिर झुकाये अपनी कंपकंपी वाली कंटिन्‍यूटी बनाये हुए धीमे से जवाब दिया- पता नहीं मस्‍क्‍वा के बारे में तुमने क्‍या ग़लतफ़हमी पाल रखी है.. वहां ऐसी ठंड नहीं है!.. मैं तो पानी की किल्‍लत से घबराकर यहां आया था लेकिन देख रहा हूं मुंबई में ज्‍यादा मारामारी है.. और ठंड तो त्रास्‍नोया दिस्‍गोस्‍तोशा सित्, सित्, सित्!

मैंने भाप फेंकते समोवार का ढक्‍कन हटाकर काठ के कलछुल से बाउल भरा, मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच की सर्द हाथों में उसे छोड़ आया- हूं.. तो अब मस्‍क्‍वा पुश्किन, तुर्ग्‍येनेव, दोस्‍तोव्‍स्की की दुनिया नहीं रही.. चमकीले-बर्फीले देश में पानी की मारामारी का सिनेरियो सजा हुआ है, हं?..

मेरे सवालिया स्‍टेटमेंट पर मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच ने मुझे ऐसी नज़रों से देखा मानो वह आसनसोल सिनेमाहॉल यूनियन का अवैतनिक कर्मचारी हो और मैं उससे दिमित्री मेंद्येलेव के पीरियोडिक टेबल के बारे में सवाल कर रहा होऊं. मुंबई की ठंड में कांपते मस्‍क्‍वा के मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच को मैं परेशान करना नहीं चाहता था, अलबत्‍ता मायकोव्‍स्‍की की जगह मैंने मार्क्स का ज़ि‍क्र किया- सबकुछ जो ठोस है हवा में पिघलता जाता है.. बुर्जूआ समाजों की खासियत है.. 1848 में बाबा की कही बात हमारे वक़्त के लिए कितना सटीक बैठती है!..

मिखायल अलेक्‍सांद्रोविच ने ठंड की घबराहट और कम्‍यूनिस्‍ट मेनिफेस्‍टो और मार्क्‍स के प्रति उकताहट ज़ाहिर करते हुए सवाल किया- यहां पानी की दिक्‍कत कब से है?

मैंने समझदारों वाली मुस्‍कान भरी और समोवार की गरमी के नज़दीक जाकर खड़ा हो गया- जो कलतक उपस्थित था वह नहीं ज़ाहिर करता कि आज भी रहेगा! डिडिंट मार्क्‍स से दैट ऑल दैट इज़ सॉलिड मेल्‍ट्स इनटू एयर? पानी बहुत उलझा सवाल है, मिक्‍खू, वी आर गोईंग टू हैव बिग ट्रबल्‍स ओवर इट.. फ्रॉम ऑस्‍ट्रेलिया टू अज़रबैजान (हैजंट आलोक सेड सो?) !

2 comments:

  1. मुंबई में ठंड का प्रकोप जारी है सर

    ReplyDelete
  2. ठंड की अधिकता और टिप्प्णीयों की शून्यता से दुखी ना हों. कभी पानी बर्फ हो जाता है डर के मारे कभी बर्फ पानी हो जाती है शरम से.जिदगी इन्हीं दो अवस्थाओं के बीच की ही तो कहानी है.

    ReplyDelete