Saturday, January 26, 2008

ये तरीका है बात करने? अरे?..

प्रत्‍यक्षा ने एक पोस्‍ट चढ़ाया है, देखकर एकदम दिमाग सुलग गया. दिमाग सुलगाने के लिए ज़रूरी नहीं आदमी चीन जाये (उसका लिंक यह रहा), यहां रहकर भी लड़कियां (जो पता नहीं क्‍यों औरतें हो गईं) दिमाग सुलगवा सकती हैं! सबसे पहले तो प्रत्‍यक्षा से मैं यह पूछना चाहता हूं कि दिमाग किसी मोटी किताब में रखकर यह पोस्‍ट लिखी, या लिखते वक़्त भूल गई कि दिमाग और धर्म कहीं आसपास रखकर ही ऐसे गड्ढों में पैर उतारा जाता है? औरत को तो विशेष उतारने की भी ज़रूरत नहीं क्‍योंकि वह पहले से ही गड्ढे में है. नहीं है? डोंट टेल मी.. बिकॉज़ दैट आई वुड फाइंड वेरी सरप्राइजिंग! वेरी फनी रियली.. क्‍योंकि धर्म को पहचान के तदनुसार काम किया हो (यानी पोस्‍ट लिखा हो) ऐसा तो दूर-दूर लक्षित नहीं ही हो रहा, नैतिकता का संकीर्ण कॉंसेप्‍ट भी कंसिडर किया गया (पोस्‍ट लिखने में) इस ह्यूजली डाउटफुल!

सबसे पहले तो ऐसी, और इन जैसियों सबसे मैं ये पूछना चाहता हूं कि जब सब (माने इलाहाबाद, आगरावाले) डेली भास्‍कर और दैनिक अवेकनिंग पढ़ रहे हों तो आपको (माने इनको) अरागां-सरोयां पढ़ने की, और इस तरह से हम इलाहाबाद और आगरावालों को बेचैनी में डालने की, क्‍या ज़रूरत है? और आपको (माने इनको) ज़रूरत का ऐसा ही बुखार चढ़ा है तो उसे रजाई के अंदर छिपाके पढ़ने की जगह हिंदी ब्‍लॉगअंतर्लोक के व्‍यापक सौ मनई मंच पर सार्वजनिक करके इस ठंड में कंपकंपी उठवाने में कौन तुक है? हम (माने इलाहाबाद, आगरावाले) चीख-चीखकर कहते रहते हैं कि ये हंसी-दिल्‍लगी और कवितायें ठिलवाने (और बीच-बीच में हमारी समझवाली नैतिकता और धर्म-टर्म करने), हमारा बंग्‍लो और कुपे की फ़ोटो झलकवाने का सामुदायिक मंच है मगर आप (माने ये) आउट ऑफ कोर्स ऋग-यजुर-साम-अथर्व टाइप (एंड नेरुदा-वेरुदा एज़ वेल टाइप) भयानक लेखों की श्रृंखला ठेलने से बाज नहीं आओगे? (आओगी?) हम हंसी-ठिठोली करें कि मुंह सी के बैठ ही जायें? जिस प्रदेश (हरयाणा) में आप रहती हैं, हर दूसरे महीने आपकी जेंडर के साथ एक न एक रोमांचकारी कृत्‍य हो ही जाता है, माने हमारे एंड से हंटर फटकारते और लात लगाते रहने में हम कोई कसर नहीं ही रख रहे हैं.. फिर भी आप बाज नहीं आ रही हैं.. उल्‍टे प्रोवोक कर रही हैं!

सबसे पहले से भी पहले तो आप ये बताइए कि आपको बहुत बढ़िया खिचड़ी (मेरा सर्वाधिक प्रिय भोजन) बनानी आती है या नहीं? नहीं आती है तब तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी. फिर मैं करूंगा क्‍या? क्‍योंकि कुपे और कलकत्‍ते में बैठके मैं पोस्‍ट भले लिख लूं, किचड़ी नहीं बना सकता? खिचड़ी के लिए (मेरा सर्वाधिक प्रिय भोजन. आपका क्‍या है ये आप अपने मन में रखिये, हमें बताने का कोई फ़ायदा नहीं..) फिर क्‍या मैं मायावती, मॉनिका, मेनका, मानषी, मर्लिन, मीना और मलिना की चिरौरी करूंगा? सब मुंह फुलाके ज़ि‍द करने लगीं कि हमें किचड़ीकुक नहीं मेरी क्‍यूरी बनना है, तब? मायावती तो हाथ छोड़ सकती हैं (ऋग-यजुर-साम-अथर्व के आगे-पीछे जाने कौन-कौन गाली बक डालें, सो अलग)! गड्ढा में ज़रा सा पैर उतारकर हमारे लिए आप कितना वृहदाकार वृत खोद रही हैं, अहसास है आपको? या जिस दिशा में खेद रही हैं, उसका?

सबसे पहले से भी पहले से भी पहले तो ये बताइए दस साल में आप करोड़ उगा सकती हैं? क्‍योंकि नहीं उगा सकती हैं तो आपका जो कुछ भी ये क्षितिज या विशाल अंतरलोक या जो भी चिरकुटप्रसाद है उसका हम घंटा करें क्‍या. फटही गंजी में लपेटकर अगरबत्‍ती बालें? नहीं, आप थोड़ा क्लियर कर ही डालिए. क्‍योंकि समय और समाज की तो अभी यही सच्‍चाई है (हमारी तो है ही) कि मायावती हमारी कान उमेठकर दो चपत लगा दे इसकी हम भले न सोचें, नैतिकता और धर्म की बीच-बीच में ठेलते भी रहें, मगर मौके पर तो बाबू प्रेमचंद भी सामने पड़ जायें तो सबसे पहले यही जवाब तलब करेंगे कि मुंशी, फलाना दारोगा और ईदगाह-टिदगाह सब तो ठीक है मगर करोड़ पैदा कर सकते हो कि नहीं.. नहीं पैदा कर सकते हो तो ससुर, फिर किस काम के?..

और, ल्‍ल्‍लो, इस झंझट में हमारी चाह तो रह ही गई! ऐसा न हो इस तीखी कंपकंपाहट में मिठासभरा एक देसी गाना भी रह जाये तो उसे चिपकाय लें..



(गाना डेनीस आरकां की कनैडियन-फ्रेंच फ़ि‍ल्‍म द बारबैरियन इनवेज़ंस से उड़ाया गया है)

8 comments:

  1. ये लात है कि घात है कि मात है या उन जैसों (यानि इन जैसों)की जात है.

    कहीं मैं यह ना कह बैठूँ की आप गुस्से में कितना अच्छा लगते (यानि लिखते) हैं...

    लात खाने के इंतजार में आपका..

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  2. सारी बातें एक तरफ। अपना दावा है कि जैसी खिचड़ी अपन बनाते हैं , कसम हातिमताई की , उसके अब्बाजान भी नहीं बना सकते होंगे। कमबख्त अलकेमिस्ट वाला भी इधर से गुज़रा था और उसे मैने ही फार्मूला दिया था। बदबख्त ने सहरा में गुमा दिया।
    भोपाल आइये जनाब, खाइये खिचड़ी। ये वो नहीं जो तुर्क पकाया करते थे , जिसे मंगोल उबाला करते थे। ये वो है जो अजित भाई भोपाली पकाते हैं और जिसे बिना खाए प्रमोद भाई काहे के प्रमोद भाई....

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  3. अच्छी चुटकी ली है।

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  4. खिचड़ी का खुला निमंत्रण हम ने दे दिया है सब को.. आप भी आमंत्रित हैं..

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  6. भोत सई । खिचड़ी खाके इत्‍ती तीखी डांट लगाई है कि क्‍या कहें । हां तो राही की आत्‍मकथा का जुगाड़ कर लिया है । अब ज़रा गुस्‍सा शांत कर लीजिए तो आगे कुछ कहें ।

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  7. aapki lekhani ke to pehley hi FAN the hum...aaj kuch aur nayaa ruup rang liye..waah..shukriyaa

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  8. सात्विक क्रोध में तमतमाई लेखनी कितना सुंदर लिखती है और प्रभावोत्पादक भी . जिओ !

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