Sunday, January 27, 2008

संडे क्‍या.. कभी भी आये, गुस्‍सा विशुद्ध चिरकुटई है!

गुस्‍सा आना अच्‍छी बात नहीं. ख़ास तौर पर मेरे जैसों का तो और, जो यूं भी बरिस्‍ता और बंगलो की बजाय गलाजत की छत के नीचे रहते हैं.. और गुस्‍सा आया नहीं कि गलाजत गले में वरमाल डालने के लिए छटपटाने लगती है! दिमाग और देह के दूसरे हिस्‍से पटपटाते हैं वह एक अलग प्रक्रिया शुरू हो जाती है. औरतों से तो कुछ उम्‍मीद करने का मतलब नहीं ही है, उंगलियों पर गिनकर जो चार आदमी ‘जेंटलमेन’ की चिप्‍पी अपने डायरेक्‍शन में प्रेषित करने की किसी तरह ठेलमठेल करके सोच सकते थे, वो भी अकबकाकर महटियाने लगते हैं. स्‍टेप बैक कर जाते हैं.. मांएं जो नहीं पढ़ पाती हैं, और पढ़ती हैं तो जीवन की किताब पढ़ते हुए ही धन्‍य बनी रहती हैं, हमारी पोस्‍टें पढ़ लें तो न पोस्‍ट न हमको समझ पाती हैं.. वह भी गुस्‍सा पढ़के न केवल समझ जाती हैं, बल्कि सन्‍न हो जाती हैं, और बनी रहती हैं (हम तो जो बन जाते हैं उसकी फ़ोटू जितना छिपाये रखें उतना ही अच्‍छा!).. तो ऐसे गुस्‍से का क्‍या फ़ायदा.. घेले भर का नहीं.. जो आपको (यानी मुझको) माताओं का दुलरुवा बुचरू होने की जगह मोहब्‍बत व ममताभरी एक चाय तक से वंचित कर दे.. आपकी तक़लीफ़ को मधु मुस्‍कानी समाज में उल्‍टे उपहासास्‍पद विद्रूप में बदल जाये, वह ऊपर का बोनस.

पचास लोगों की मधु मुस्‍कानी महफ़ि‍ल में (बहुत बार बिना किये, मगर ज़्यादा मौकों पर) हेंहे-ठेंठे करते हुए लोकप्रियता की चुस्कियां किसको अच्‍छा नहीं लगता.. अलोकप्रिय होने के ख़्याल से नेहरु साहब की भी रूह फना होती होगी.. फिर हम नेहरु तो क्‍या नलिनविलोचन नारायनदास तक नहीं!.. मगर अंदर कोई समझ, विवेक की ऐंठ है जो अपनी ठौंस से अपना राग और अपना टप्‍पा ही गवाती है.. और इस पतनशीलता की रौ में (पता नहीं क्‍या गड़बड़ी है कि) बीच-बीच में चिरकुट ‘प्रगतिशील’ गुस्‍सा भी ठिलवाकर लिये आती है! क्‍या हो जाता है इससे.. चार घण्‍टे के लिए मधु मुस्‍कानी रेल डिरेल होती है, बाकी जो है सो है और क्‍या उखड़ता है? इस उखड़े हुए देश में दो-दो कौड़ी की चिरकुटइयों पर दांत चियारते रहने से अलग अब किसी भी बात से किसी का क्‍या उखड़ता है? कुछ नहीं.. तो फिर हम ही फैल और फूटकर फटते हुए अलोकप्रियता के चप्‍पल क्‍यों खाना चाहते हैं? भूल गए थे तो खुद को सिर नवाये शर्मिंदगी में याद दिला रहे हैं कि गुस्‍सा ग़लत बात है. माफ़ी चाहते हैं अगर हमने गुस्‍सा थूका था. थूका था तो उस थूके को चाट लेते हैं. सॉरी.

चिरकुट लोग बहुत बार एक चिरकुट बात काफी पीटते रहते हैं कि इस देश में शिक्षा और संस्‍कृति बहुत दूर की बात है. सारी आईआईटी और आईआईएम और ये और वो जो जेम हैं एक अदद रोज़गार पाने का साधन मात्र हैं, वह किसी ठेंगे से आधुनिकता का कोई संस्‍कार नहीं लायी हैं, न इन रास्‍तों से कभी लायेगी. संस्‍कृति तो बहुत दूर की कौड़ी हुई, वह एक बेसिक एलिमेंटरी लोकतांत्रिक भावना तक नहीं लायेंगी. क्‍यों नहीं लायेंगी, भाई? क्‍योंकि यूपी, बिहार, राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश के हम हिंदी भाषी सर्वज्ञों ने उसे लड़कर जीता नहीं है. और जो चीज़ लड़कर जीती नहीं जाती, घर बैठे घेलुआ में मिलती है, उसकी हम वाजिब क़ीमत नहीं जानते (इज़्ज़त करना तो नहीं ही जानते). इसलिए भी अस्‍वाभाविक नहीं कि हमारी सारी लोकतांत्रिक अपेक्षाएं और कामनाएं सड़क, पुल और अस्‍पताल बनवाने के मांगों तक सीमित हो रखी हैं. उससे ज़्यादा की बात पर हम जोकर बताये और दिखाये जाने लगते हैं. फिर किसी की पत्‍नी से खिचड़ी खाने की मांग उठायी जाये या उससे या किसी से पेड़ पर चढ़के दिखाओ तो जानें की ऐसी, वैसी, कैसी भी मानसिकता निजी पत्र नहीं सार्वजनिक मंच पर ज़ाहिर किया जा रहा हो, यह उनका आपसी सौहार्दमय अंतरंग संवाद और चुटकी समझके कड़वे पान की तरह गटकके मुस्किया लिया जाना चाहिए. भई, पत्‍नी किसी और की, चुटकी आदरणीय गुणरत्‍न बड़के भैया ले रहे हैं, तो हमको धुआं-धुआं होने का हक़ कहां से बनता है? बनता भी हो तो उसे एक सीक्रेटीव पत्र या फ़ोन में व्‍यक्‍त करने की जगह पचास लोगन के पब्लिक डोमेन में लाके रार फैलावें, इसका अंतरंग अधिकार कहां से बनता है? गुस्‍सा करने का तो किसी भी तरह से नहीं बनता, क्‍योंकि जैसा मैंने पहले ही कहा था वह इस पचास लोगन की मधु मुस्‍कानी महफ़ि‍ल में किसी व्‍यक्ति से हेंहें-ठेंठे तो नहीं ही दिलवाती, किसी महिला से जेंटलमेन तो क्‍या ‘ओ, मैन!’ तक की लड़ि‍याहटों का दुलार भी कहां दिलवाती है?

भारतीय लोकतांत्रिक भावना, स्त्री-ट्री विमर्श सबकी जै! सबको जै!

1 comment:

  1. बहुतै 'सीरियसली' ले लिए मामला को . चुपाय जाऔ ठाकुर ! काहे लट्ठ लिए घूम रहे हो .

    देखो अविनाश से कसके सींग भिड़ाने वाला अभय केतना ठंडा माथा से लिया है . और हर दिशा से केतना सर्टीफ़िकेट पा रहा है जेंटलमैन होने का . ब्लॉग जगत का देवता-राक्षस सब उस पर विह्वल भाव से पुष्प-वृष्टि कर रहा है . ई होता है ठंडा माथा का कमाल . बूझलेन !

    हालांकि बूझते हम भी नहीं हैं . पर उपदेश देना कौनौ खर्च की मद नाहीं है सो दे रहे हैं .

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