Monday, January 28, 2008

धुआं धूल गोली..



घोड़ा सरपट दौड़ता भागा
पुलिया पर अकस्‍मात उठा गर्द
सब कहीं पसर गयी धूल की होली या
वह थी बेसाख्‍ता छूटी दन्‍न गोली?
ठीक-ठीक कहना मुश्किल है क्‍योंकि
मैं हकबकाया हुआ था, एड़ी पर खड़ा
हमेशा की तरह घबराया हुआ था
एक औरत लपककर चीखी या
कोई बच्‍चा था छूटकर गिर पड़ा
कोई हारमोनियम बजा रहा था या
जाने कुछ गा रहा था जबकि
मैं बेवक़ूफ ठंड के सूखेपन
में हथेलियों से चेहरा सहलाता
साफ़ कर रहा था घोड़ा था खच्‍चर था
आख़ि‍र माजरा था क्‍या. नेक़ी में नहाये
इतने में कोई थे शराफ़तलाल नज़दीक कान के
आये संजीदगी से फुसफुसाकर कहा-
गजब करते हो, मियां, दिखता नहीं
क्‍या मजमा है और तुम गुनगुनाने
गोली खाने निकले हो? कमसकम
साथ की जनाना का ख़्याल किया होता?
चिथड़े-चिथड़े भटक रहा था मगर जाने क्‍यों
एकदम-से हंसी आ गयी, हिलते-हिलते कहा-
कौन किधर किसकी जनाना? सुनिये, शरीफ़दास
ऐसी-ऐसी माथापच्चियों के बाद किसी तरह तो
जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं और आप हैं कि
जोड़ने की जगह तोड़ रहे हैं?
चलिए, यही एहसान कीजिए बताइए
कहां खड़े होकर शहर को कैसे देखें
या कोई तो गोल होगा जिसमें आत्‍मा हिलगाकर
आदमी की तरह मुस्‍करा सकेंगे कि यह
ज़्यादा की कामना हो जायेगी?
इस पुलिया पर आधुनिक मिज़ाज सिर्फ़
और सिर्फ़ अभिशाप होगा, शराफ़तलाल?
इतने में दरककर कोई दीवार गिरी
या कोई एक हाथी था पागल हो गया था
या मैं ही था बहककर पुलिसवाले से उलझ गया था
या शीशे से टकराकर सिर फोड़ लिया था
गो मज़ेदार बात थी अब भी उजबकों की तरह
हंस रहा था. सड़क पर थोड़ा ख़ून था संभवत:
हमारे समय का था मेरा नहीं था
जो मेरा था, बटुये की घिसी पहचान
की तरह धीमे-धीमे मैं उसे सहेज रहा था.

(बॉदेलेयर की चरणों में बैठकर)

2 comments:

  1. कविता का पांचवां त्रिकोण.

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  2. "सड़क पर थोड़ा ख़ून था संभवत:
    हमारे समय का था मेरा नहीं था
    जो मेरा था, बटुये की घिसी पहचान
    की तरह धीमे-धीमे मैं उसे सहेज रहा था."
    कितना अर्थ छुपा है इन लाइनो में,अच्छी लगी..

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