Tuesday, January 29, 2008

दौड़ती हुई लड़की.. सम्‍हल के!

प्रत्‍यक्षा मान नहीं रही.. कहा था चुप रहूंगी मगर लिखके बोल रही है.. लिख क्‍या रही है दौड रही है (कि दौड़ते हुए लिख रही है? दौड़ते हुए गिर गई तो? इसके बारे में सोचा है? गिरी हुई लड़की को कोई उठाने आयेगा? अपने यहां उठाते हैं? हिंदी ब्‍लॉगजगत की लड़ि‍याहटें तो टेलीविज़न टाइप एक्‍सटेंडेट फैमिलीवाला इल्‍यूज़न है, ऐसी गिरी हुइयों से तो घरवाले तक हाथ झाड़कर अलग खड़े हो जाते हैं.. कि टंटा बैगेज हैंडलिंग की एक सीमा होती है, सीमा से पार जाओगी तो विशुद्ध गड्ढे में गिरोगी! शौक है गिरी रहो, हमको मत इनवाईट करो.. हद है.. रोते-गाते दस टिप्‍पणी मिलती है, क्‍या चाहती हो तुम पर छतरी तानने के पीछे अपने टिनहा टिप्‍पणी-बैंक में छेद कर दें? साल भर हमारे हर पोस्‍ट पर कमेंट कसती रहोगी ऐसा कॉंट्रेक्‍ट लिखित में हमरे जी-मेल अकांऊट में भेजा तब्‍बो नुकसान हमारे ही एंड पर होगा.. नहीं, गिरी हुई बेटी, हम आपको अन-एकनॉलेज करते हैं.. आप गिरी रहो.. हमने पहले ही कहा था इतने तेज़ कदम मत दौड़ो.. दौड़ी तो अब भुगतो भी! देखते हैं कितने दिन तुम्‍हारे ब्‍लॉग पर पोस्‍टों की बत्‍ती जलती है.. इन एंड आऊट अमावस न करवा दिया तो हम भी, लड़किन्‍नी, वाजिब ब्‍लागपुरुष नहीं!)..

इसी बहाने अच्‍छा हुआ पता चला (दूसरों को नहीं, हमें) कि अभय अपने निर्मल-आनन्‍द में कभी-कभी सेल्‍फि‍श भी हो सकते हैं, माने उनका आनन्‍दत्‍व दूसरों के बीच कड़वाहट का सबब भी बन सकता है.. और प्रियंकर तो.. मीठे कंकड़? अप्रीतिकर? आई डोंट नो, एम स्टिल सोर्टिंग आउट..

दूसरे, यह इस ओरकुट टाइप इंटर-ऑफिस नेटवर्क को वैली ऑफ द ब्‍लाईंड्स पुकारना कुछ ज़्यादा नहीं हो गया? वोंट इट बी मोर अक्‍यूरेट टू कॉल इट वैली ऑफ द भैंगास? वेल, दैट वॉज़ एन आइडिया.. लेकिन, फिर कहूंगा, इतना दौड़ना वैसे ठीक बात नहीं.. गिरीं तो साथ में कोई नहीं रहेगा.. मैं तो नहीं ही रहूंगा.. मैं वैसे ही बहुत गिरा हुआ हूं!

6 comments:

  1. बॉल जेब में डाल लिया है और बैट से दनादन छक्के पे छक्के मारे जा रहे हैं . अब बस भी कीजिए . नाक रगड़वा कर मानेंगे क्या ?

    -- मीठा कंकड़

    ReplyDelete
  2. 'वैली ऑफ द भैंगास?'

    क्या बात है! हम इस 'कॉइनिंग' के मुरीद ऐसे ही थोड़े हैं .

    ReplyDelete
  3. लड़कियाँ तो बहुत पहले से ही दौड़ भाग रही हैं। आपको चिन्ता हो रही है अच्छा है पर निश्चिन्त रहिये। गिरने वाली नहीं। काफी कुछ दुनिया उठी हुई ही ऐसी लड़कियों की वजह से हैं। रही उठाने की बात ...उसकी भी जरूरत नहीं है...इन लड़कियों को खुद सँभलना आता है।

    मुद्दे की बात....फिर एक प्यारी सी लड़की का ही कहा

    Ayn Rand in interview with Playboy

    PLAYBOY: Do you believe that women as well as men should organize their lives around work -- and if so, what kind of work?

    RAND: Of course. I believe that women are human beings. What is proper for a man is proper for a woman. The basic principles are the same. I would not attempt to prescribe what kind of work a man should do, and I would not attempt it in regard to women. There is no particular work which is specifically feminine. Women can choose their work according to their own purpose and premises in the same manner as men do.

    PLAYBOY: In your opinion, is a woman immoral who chooses to devote herself to home and family instead of a career?

    RAND: Not immoral -- I would say she is impractical, because a home cannot be a full-time occupation, except when her children are young. However, if she wants a family and wants to make that her career, at least for a while, it would be proper -- if she approaches it as a career, that is, if she studies the subject, if she defines the rules and principles by which she wants to bring up her children, if she approaches her task in an intellectual manner. It is a very responsible task and a very important one, but only when treated as a science, not as a mere emotional indulgence

    एक बात और है....दुनिया सपाट तो है नहीं....कहीं पहाड़ है कहीं वैलिज़....सबकी अपनी जगह हैं....और कहते हैं सब बदल रहे हैं।

    ReplyDelete
  4. गिरीं तो साथ में कोई नहीं रहेगा.. pramod ji...HUM SAATH SAATH HAIN.....

    ReplyDelete
  5. अनैतिकता बोली नैतिकता से
    मंडियों , बाजारों और कोठो
    पर मेरे शरीर को बेच कर
    कमाई तुम खाते थे
    अब मै खुद अपने शरीर को
    बेचती हूँ , अपनी चीज़ की
    कमाई खुद खाती हूँ
    तो रोष तुम दिखाते हो
    मनोविज्ञान और नैतिकता
    का पाठ मुझे पढाते हो
    क्या अपनी कमाई के
    साधन घट जाने से
    घबराते हों इसीलिये
    अनैतिकता को नैतिकता
    का आवरण पहनाते हो
    ताकि फिर आचरण
    अनैतिक कर सको
    और नैतिक भी बने रह सको

    ReplyDelete